दिल्ली की कुर्सी का मिज़ाज देश में सबसे अलग और थोड़ा सनकी टाइप का है। यहाँ की राजनीति का एक बड़ा सीधा सा उसूल है..
आप शहर में कितने ही बड़े-बड़े फ्लाईओवर तान दो, सड़कों को चमका दो, लेकिन अगर आम आदमी की थाली से दाल-रोटी या प्याज गायब हुआ, तो पब्लिक आपकी खटिया खड़ी करने में एक सेकंड नहीं लगाती।
आज की हमारी जनरेशन से अगर दिल्ली के मुख्यमंत्रियों का नाम पूछो, तो उन्हें अरविंद केजरीवाल याद आते हैं या फिर ज़्यादा से ज़्यादा शीला दीक्षित का दौर याद आ जाता है।
लेकिन 90 के दशक में दिल्ली की गद्दी पर एक ऐसा शख्स भी बैठा था, जिसके जूतों में हमेशा दिल्ली देहात के खेतों की मिट्टी लगी रहती थी।
हम बात कर रहे हैं माथे पर लाल टीका लगाने वाले और एकदम सादे से दिखने वाले दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा की।
आज की राजनीति में जहां नेता अपनी फॉर्च्यूनर गाड़ियों के काफिले और लाल बत्ती के बिना घर से बाहर कदम नहीं निकालते, वहां वर्मा जी की कहानी किसी पुरानी क्लासिक फिल्म जैसी लगती है।
एक ऐसा नेता जिसने आज की मॉडर्न दिल्ली (CNG और मेट्रो) की ज़मीन तैयार की, लेकिन एडमिनिस्ट्रेशन (प्रशासन) और किस्मत ने उनके साथ ऐसा गज़ब का खेल किया की एक ‘सब्जी’ ने उनकी पूरी सत्ता पलट कर रख दी।
साहिब सिंह वर्मा की कहानी इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है की राजनीति में आप कितने भी अच्छे और सादे इंसान क्यों न हों, अगर सिस्टम का रायता फैला, तो उसकी सफाई आपके ही कुर्ते से की जाती है।
खैर, आइए इस कहानी की शुरुआत एकदम शुरू से करते हैं।

मुंडका के खेतों और कॉलेज की लाइब्रेरी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री तक साहिब सिंह वर्मा का वो दिलचस्प राजनीतिक सफर
साहिब सिंह वर्मा का बैकग्राउंड ऐसा बिल्कुल नहीं था की उनके मुंह में कोई चांदी की चम्मच रही हो या उनके घर में पीढ़ियों से राजनीति चल रही हो।
15 मार्च 1943 को वो बाहरी दिल्ली के मुंडका गांव के एक जाट किसान परिवार में पैदा हुए। खेती-किसानी उनके खून में थी। सुबह खेतों में जाना, जानवरों को चारा डालना और फिर पढ़ाई करना… यही उनका रुटीन था।
वैसे, अक्सर जाट नेताओं को लेकर लोगों के दिमाग में एक स्टीरियोटाइप होता है की वो थोड़े अक्खड़ होंगे या सिर्फ पहलवानी-खेती तक सीमित होंगे।
लेकिन साहिब सिंह वर्मा ने इस सोच को बहुत पहले ही तोड़ दिया था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से बाकायदा लाइब्रेरी साइंस में डिग्री ली और बाद में दिल्ली के मशहूर ‘शहीद भगत सिंह कॉलेज’ में लाइब्रेरियन बन गए।
दिन भर किताबों के बीच रहना और युवाओं से घिरे रहना, इसी माहौल ने उनके अंदर की लीडरशिप को जगा दिया।
अब बात करते हैं राजनीति में एंट्री की। आरएसएस (RSS) से तो वो पहले ही जुड़े हुए थे। संघ के उसी अनुशासन ने उन्हें बीजेपी के करीब ला खड़ा किया।
1977 का दौर था, जब देश में आपातकाल (Emergency) के बाद चुनाव हो रहे थे, उसी लहर में वो दिल्ली नगर निगम के पार्षद (Councillor) चुन लिए गए।
यहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। 1993 आते-आते दिल्ली को अपना पहला विधानसभा चुनाव मिला।
मदन लाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और साहिब सिंह वर्मा को उनकी कैबिनेट में शिक्षा और विकास मंत्री (Education and Development Minister) बना दिया गया।
मंत्री बनते ही उन्होंने दिखा दिया की बॉस, देहात का आदमी जब सिस्टम में आता है तो काम कैसे होता है!
दिल्ली के गांवों और कच्ची कॉलोनियों में उनकी ऐसी धाक जम गई की बीजेपी हाईकमान भी समझ गया था की ये बंदा दिल्ली के जाट और देहाती वोट बैंक का सबसे बड़ा सिकंदर है।

जैन हवाला कांड का वो बवंडर जिसने मदन लाल खुराना की गद्दी छीनी और साहिब सिंह वर्मा को पहना दिया दिल्ली का ताज
कहते हैं ना कि सियासत में कब किसका पत्ता कट जाए और किसकी लॉटरी लग जाए, कोई नहीं जानता। 1996 का साल दिल्ली बीजेपी के लिए एक भयंकर भूचाल लेकर आया।
उस समय देश भर में एक डायरी की बहुत चर्चा थी- ‘जैन हवाला डायरी’। इस डायरी में देश के कई बड़े-बड़े नेताओं के नाम लिखे थे जिन पर हवाला के पैसों के लेन-देन का आरोप था।
और इसी डायरी में नाम उछल गया दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना का।
अब खुराना जी ठहरे बीजेपी के कद्दावर नेता। मामला नैतिकता का आ गया था। दबाव इतना बना की खुराना जी को भारी मन से अपने सीएम पद से इस्तीफ़ा देना पड़ गया।
खुराना जी को उस वक़्त लगा था की मैं कुछ महीनों में अदालत से बेदाग़ साबित होकर आ जाऊंगा और फिर से अपनी कुर्सी पर बैठ जाऊंगा।
लेकिन उन्हें क्या पता था की सियासत की शतरंज पर कोई और ही चाल चली जा चुकी थी।
बीजेपी हाईकमान को अब एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो दिल्ली में पार्टी को संभाल भी सके और जिसका जनाधार बहुत तगड़ा हो।
और यहाँ फिट बैठे मुंडका के साहिब सिंह वर्मा। 26 फरवरी 1996 को एक लाइब्रेरियन, किसान और देहात का बेटा दिल्ली का चौथा मुख्यमंत्री बन गया।
जैसे ही साहिब सिंह वर्मा ने सीएम पद की शपथ ली, पूरी दिल्ली के ग्रामीण इलाकों, बाहरी दिल्ली और कच्ची कॉलोनियों में जश्न का माहौल बन गया।
दिल्ली देहात वालों को लगने लगा की “अब अपना छोरा गद्दी पर बैठा है, अब हमारे काम कोई नहीं रोक सकता।” वर्मा जी का स्टाइल भी एकदम अलग था।
वो सीएम ऑफिस में ऐसे बैठते थे जैसे गांव की चौपाल पर बैठे हों। कोई भी आम आदमी उनसे सीधे जाकर मिल सकता था। कोई वीआईपी (VIP) कल्चर नहीं, कोई फालतू का दिखावा नहीं।
लेकिन कुर्सी पर बैठना एक बात है और दिल्ली जैसे टेढ़े शहर का प्रशासन चलाना बिल्कुल अलग बात! वर्मा जी के अंदर विज़न तो गज़ब का था, पर किस्मत उनके लिए कुछ बहुत ही अजीबोगरीब सरप्राइज़ प्लान करके बैठी थी।
आज की दिल्ली जिस मेट्रो और CNG पर फर्राटे भर रही है उसकी ज़मीनी नींव रखने वाला वो भुला दिया गया दौर
यार, आज के दिल्ली वालों को लगता है की ये जो AC वाली चमचमाती दिल्ली मेट्रो है और सड़कों पर धुआं न उगलने वाली जो हरी-पीली सीएनजी (CNG) बसें हैं, ये सब बस कल ही किसी ने जादू की छड़ी घुमाई और प्रकट हो गईं।
लेकिन हकीकत कुछ और ही है। जिस मेट्रो में बैठकर आज दिल्ली की आधी आबादी रील बनाती है, उसके पेपर वर्क और ज़मीनी काम की असली शुरुआत साहिब सिंह वर्मा के उसी भुला दिए गए दौर में हुई थी।
विज़न के मामले में वर्मा जी का दिमाग एकदम क्लियर था। 1995-1996 के उसी दौर में ‘दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन’ (DMRC) को खड़ा करने की कागज़ी और क़ानूनी प्रक्रिया शुरू हुई थी।
उस वक़्त केंद्र और राज्य सरकार के बीच फंड्स और ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) को लेकर जो भयंकर पेंच फंसे हुए थे, उन्हें सुलझाने में साहिब सिंह वर्मा ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था।
उन्हें पता था कि दिल्ली की बढ़ती आबादी को अगर सड़कों के जाम से बचाना है, तो ज़मीन के नीचे से ट्रेन निकालनी ही पड़ेगी।
और प्रदूषण का तो पूछिए ही मत! 90 के दशक की दिल्ली आज से भी ज़्यादा खतरनाक थी। सड़कों पर दौड़ती पुरानी डीज़ल बसें और ऑटो ऐसा काला धुआं छोड़ते थे की पीछे चलने वाले का चेहरा पहचान में ना आए।
उसी वक़्त सुप्रीम कोर्ट का डंडा चला की भाई दिल्ली के पब्लिक ट्रांसपोर्ट को साफ करो। साहिब सिंह वर्मा की सरकार ने ही बिना किसी वोट बैंक की परवाह किए, दिल्ली के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को सीएनजी (CNG) में बदलने का वो कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया था।
सोचिए, एक ठेठ देहाती बैकग्राउंड से आने वाले मुख्यमंत्री ने वो फैसले लिए थे जो दिल्ली को एक मॉडर्न ग्लोबल सिटी बनाने वाले थे।
इसके अलावा, दिल्ली की जो कच्ची और अनधिकृत (Unauthorized) कॉलोनियां थीं, जहाँ लोग बिना सड़क, बिना पानी और बिजली के कीड़ों की तरह जी रहे थे, उनके लिए वर्मा जी किसी मसीहा से कम नहीं थे।
उन टेढ़ी-मेढ़ी गलियों वाली कॉलोनियों में ट्रांसफार्मर लगवाने और पानी की लाइनें बिछाने का पहला व्यवस्थित काम उन्हीं की सरकार ने शुरू करवाया था।
लेकिन कहते हैं ना दोस्त, आप 10 साल बाद का कितना ही शानदार विज़न क्यों न रख लें, अगर आज आम आदमी के घर का पंखा बंद है, तो वो आपको कल सुबह तक का टाइम नहीं देगा!

जब बिजली पानी ने निकाला दम और दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हैदरपुर प्लांट में खाट बिछाकर कर डाली पूरी कैबिनेट मीटिंग
अब थोड़ा राजनीति और प्रशासन (Administration) के उस डार्क साइड की बात करते हैं जिसने वर्मा जी की लुटिया डुबोनी शुरू कर दी थी।
सच कहूं तो एक बहुत अच्छा, नेक और ईमानदार इंसान होना एक बात है, और दिल्ली जैसे बेलगाम शहर की ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) से काम निकलवाना बिल्कुल अलग बात।
उनके दौर में दिल्ली का इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह चरमरा गया। दिल्ली वालों को भयंकर गर्मी में 10 से 12 घंटे की बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा था।
ऊपर से पानी की ऐसी किल्लत मची की लोग सुबह 4 बजे से बाल्टियां लेकर टैंकरों के पीछे भाग रहे थे।
अब आप ही बताइए, जब मई-जून की तपती गर्मी में दिल्ली वाले का कूलर ही नहीं चलेगा, तो उसे आपके मेट्रो वाले विज़न से क्या खाक मतलब होगा? जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचने लगा।
प्रशासन के अफसरों ने काम करना जैसे बंद ही कर दिया था और वर्मा जी इस सिस्टम को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लगे थे।
इसी पानी के बवाल के बीच दिल्ली की सियासत का एक ऐसा आइकॉनिक किस्सा हुआ, जिसे सुनकर आज भी पुराने पत्रकारों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
हुआ यूँ की पानी की किल्लत की रिपोर्ट लेते-लेते साहिब सिंह वर्मा का माथा ठनक गया। उन्होंने कहा की आज मीटिंग AC कमरों में नहीं होगी।
वो अपने पूरे लाव-लश्कर, सारे कैबिनेट मंत्रियों, मुख्य सचिव (Chief Secretary) और बड़े-बड़े अफसरों की गाड़ियों का काफिला लेकर सीधे पहुँच गए ‘हैदरपुर वाटर ट्रीटमेंट प्लांट’।
वहां पहुँचकर उन्होंने अफसरों की हवा टाइट कर दी। प्लांट के बीचों-बीच बाकायदा एक चारपाई (खाट) मंगवाई गई। मुख्यमंत्री जी उस खाट पर बैठ गए और बाकी मंत्री-अफसर उनके इर्द-गिर्द कुर्सियों पर!
सोचिए ज़रा वो नज़ारा… दिल्ली सरकार की पूरी की पूरी ऑफिशियल ‘कैबिनेट मीटिंग’ एक वाटर प्लांट में खाट पर बिछकर हो रही थी!
यह किस्सा दो बातें बहुत साफ़ बताता है। पहला, साहिब सिंह वर्मा का ज़मीनी जुड़ाव इतना तगड़ा था की उन्हें प्रोटोकॉल और दिखावे से कोई मतलब नहीं था; वो ज़मीन पर उतरकर काम करने में यकीन रखते थे।
और दूसरा, ये इस बात का भी सुबूत था की सिस्टम इतना बुरी तरह फेल हो चुका था की मुख्यमंत्री को खुद डंडा लेकर प्लांट में बैठना पड़ रहा था!
जनता को ये सब देखकर थोड़ा अजीब तो लग ही रहा था। लेकिन ये बिजली और पानी का संकट तो महज़ एक ट्रेलर था। असली पिक्चर तो अभी आनी बाकी थी।
एक ऐसा बवंडर आने वाला था, जिसमें ना सिर्फ साहिब सिंह वर्मा की कुर्सी उड़ने वाली थी, बल्कि दिल्ली से बीजेपी का ऐसा सूपड़ा साफ़ होने वाला था की उनको दिल्ली वापस आने के लिए 27 साल लग गए।
1998 का वो साल जब साठ रुपये किलो के प्याज ने लिख दी साहिब सिंह वर्मा की विदाई की स्क्रिप्ट
सियासत में एक बहुत पुरानी कहावत है की जब बुरा वक्त आता है, तो ऊंट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है।
1998 का साल साहिब सिंह वर्मा और दिल्ली बीजेपी के लिए बिल्कुल वैसा ही मनहूस साल साबित हुआ। उस साल दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसने वर्मा जी की राजनीतिक ज़मीन को पूरी तरह खिसका कर रख दिया।
शुरुआत हुई आम आदमी की रसोई से। अचानक से दिल्ली के बाज़ारों में प्याज गायब होने लगा और जो प्याज कल तक कौड़ियों के भाव बिकता था, उसकी कीमत आसमान चीरते हुए 60 रुपये प्रति किलो तक पहुँच गई!
आज आपको 60 रुपये शायद बहुत बड़ी रकम ना लगे, लेकिन भाई मेरे, 1998 में 60 रुपये किलो प्याज का मतलब था आम आदमी की जेब पर सीधा डाका!
लोग सब्ज़ी वालों से लड़ने लगे, थालियों से सलाद गायब हो गया और दाल बिना तड़के के बनने लगी।
और जब एक प्रेस कांफ्रेंस में साहिब सिंह वर्मा से पत्रकारों ने प्याज की बढ़ती हुई कीमतों को लेकर सवाल किया, तो उसका जवाब देते हुए साहिब जी ने कहा “गरीब आदमी प्याज नहीं खाता है।”
मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के इस बयान से जनता में भारी गुस्सा फैल गया। और उनकी कुर्सी जाने की स्क्रिप्ट लगभग तय हो चुकी थी।
प्याज ने रुलाया ही था की तभी दिल्ली पर एक ऐसी खौफनाक महामारी ने अटैक कर दिया जिसने पूरी दिल्ली को दहशत में डाल दिया।
इस बीमारी का नाम था- ड्रॉपसी (Dropsy)। हुआ यूँ की दिल्ली में बिकने वाले खुले सरसों के तेल में मिलावटखोरों ने ‘आर्जीमोन’ (Argemone/भड़भाड़) के ज़हरीले बीज मिला दिए।
इस मिलावटी तेल में खाना खाने से लोगों के हाथ-पैर सूजने लगे, दिल की धड़कनें रुकने लगीं। देखते ही देखते दिल्ली के अस्पतालों में लाशे बिछने लगीं। 60 से ज़्यादा लोग तड़प-तड़प कर मर गए।
आदमी सब्ज़ी बनाए तो प्याज नहीं, और अगर बिना प्याज के सब्ज़ी छौंकना चाहे तो कड़ाही में ज़हरीला सरसों का तेल!
ना जमाखोर पकड़े जा रहे थे और ना ही मिलावटखोरों पर कोई डंडा चल रहा था। वर्मा जी का वो सीधा-सादा रवैया इस भ्रष्ट सिस्टम के आगे पूरी तरह फेल हो चुका था।

खुराना से कुर्सी की जंग और फिर कुर्सी गवा के DTC बस में बैठकर घर लौटने वाला वो अनोखा मुख्यमंत्री
आपको याद है मदन लाल खुराना? जी हाँ, वही जो जैन हवाला कांड में कुर्सी छोड़कर गए थे। अब तक खुराना जी कोर्ट से बिल्कुल बेदाग़ बरी हो चुके थे और हाईकमान से अपनी कुर्सी वापस मांग रहे थे।
लेकिन साहिब सिंह वर्मा गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं थे। एक तरफ दिल्ली देहात के जाट वर्मा जी के साथ खड़े थे, तो दूसरी तरफ दिल्ली के पंजाबी वोटर खुराना जी के साथ!
इसी भयंकर गुटबाज़ी और प्याज के बवाल को देखते हुए, 1998 के विधानसभा चुनाव से ठीक 50 दिन पहले बीजेपी हाईकमान के हाथ-पांव फूल गए।
आनन-फानन में डैमेज कण्ट्रोल करने के लिए साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और उनकी जगह सुषमा स्वराज को दिल्ली की गद्दी पर बैठा दिया गया। (हालांकि डैमेज इतना भयंकर हो चुका था की कुछ दिनों बाद हुए चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ़ हो गया और कांग्रेस की शीला दीक्षित सत्ता में आ गईं)।
लेकिन जब साहिब सिंह वर्मा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनी गई, तब उन्होंने जो किया, वो आज की राजनीति में कोई सोच भी नहीं सकता।
वो चुपचाप सड़क पर आए, एक आम लाल रंग की डीटीसी (DTC) बस में चढ़े, अपनी जेब से टिकट का पैसा दिया और चुपचाप अपने घर मुंडका लौट गए!
अटल सरकार में श्रम मंत्री का रुतबा और एक दर्दनाक सड़क हादसे में खामोश हो गया दिल्ली देहात का नेता
कुर्सी जाने के बाद भी उनका रुतबा कम नहीं हुआ। 1999 में वो बाहरी दिल्ली से रिकॉर्ड वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे। उनकी इसी ताकत को देखते हुए 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में केंद्रीय श्रम मंत्री (Labour Minister) बना दिया।
मंत्री बनते ही उन्होंने दिखा दिया की वो मज़दूरों और आम कर्मचारियों के लिए किसी से भी भिड़ सकते हैं।
जब वित्त मंत्रालय ने ईपीएफ (EPF – Provident Fund) की ब्याज़ दरें कम करने का फैसला किया, तो साहिब सिंह वर्मा अपनी ही सरकार के खिलाफ अड़ कर खड़े हो गए।
उन्होंने साफ कह दिया की “कुछ भी हो जाए, मैं मज़दूरों के पीएफ का पैसा नहीं कटने दूँगा!” और आख़िरकार सरकार को उनकी बात माननी पड़ी।
लेकिन दिल्ली देहात के इस नेता की कहानी का अंत बहुत ही त्रासद और दर्दनाक रहा।
तारीख थी 30 जून 2007… साहिब सिंह वर्मा अपनी टाटा सफारी गाड़ी से राजस्थान के सीकर से दिल्ली लौट रहे थे।
तभी अलवर के पास जयपुर-दिल्ली हाईवे पर उनकी गाड़ी एक ट्रक से बुरी तरह टकरा गई। एक्सीडेंट इतना भयानक था की इस ज़मीनी नेता ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
राजनीति की इस दुनिया में साहिब सिंह वर्मा का वो सादगी भरा DTC बस का सफर हमेशा याद रखा जाएगा।
