चुनाव से सत्ता पाना लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन रिजीम चेंज के नाम पर देश को जलाने और सत्ता हथियाने की साज़िश भारत को कतई मंजूर नहीं

आजकल हमारे देश के विपक्ष को विदेशी डिक्शनरी चाटने का कुछ ज्यादा ही शौक चढ़ गया है। पिछले दस-बारह सालों से ‘डेमोक्रेसी खतरे में है’, ‘संविधान खतरे में है’ चिल्ला-चिल्ला कर इनके खुद के गले बैठ गए हैं और जनता भी ये पुराना टेप रिकॉर्डर सुन-सुन कर बोर हो चुकी है।

तो अब मार्केट में बने रहने के लिए कुछ नया तो चाहिए ना? बस, इसीलिए इन लोगों ने एक नया विदेशी शब्द इम्पोर्ट किया है- “रिजीम चेंज” (Regime Change)।

आजकल हर जगह इसी बात का हल्ला है। कभी सड़कों पर, कभी टीवी डिबेट्स में तो कभी सोशल मीडिया के विदेशी प्रोपेगेंडा वाले अकाउंट्स पर। लेकिन ये रिजीम चेंज आखिर बला क्या है?

लोकतंत्र के नाम पर विदेशी डिक्शनरी का नया शब्द ‘Regime Change’ और सत्ता पाने की छटपटाहट

ज़रा आम हिंदुस्तानी की भाषा में समझिए। जब आप जनता के बीच जाते हैं, अपना काम बताते हैं, चुनाव लड़ते हैं और जनता आपको वोट देकर कुर्सी पर बिठा देती है… तो उसे ‘डेमोक्रेसी’ (लोकतंत्र) कहते हैं।

लेकिन जब आप चुनाव दर चुनाव हारते जाते हैं, जनता आपको घास नहीं डालती, और तब आप फ्रस्ट्रेट होकर पिछले दरवाज़े से विदेशी ताकतों, वामपंथी संगठनों और झोलाछाप एनजीओ का सहारा लेकर देश में आग लगाने की कोशिश करते हैं…

ताकि चुनी हुई सरकार को रातों-रात उखाड़ फेंका जाए… तो इस खौफनाक और गैर-कानूनी खेल को ‘रिजीम चेंज’ कहा जाता है।

विपक्ष की सबसे बड़ी दिक्कत यही है की उन्हें सत्ता की कुर्सी तो चाहिए, लेकिन वो चुनाव वाले सीधे और पक्के रास्ते से नहीं आ रही। तो अब शॉर्टकट तलाशा जा रहा है।

इन्हें लगता है की डेमोक्रेसी का चोला पहनकर अगर सड़कों पर अराजकता फैलाई जाए, तो ये सरकार डर जाएगी और सत्ता की चाबियां इन्हें सौंप देगी।

लेकिन यार, ये कोई 90 के दशक वाला कमज़ोर सिस्टम नहीं है। भारत की परिपक्व जनता अब इन विदेशी ड्रामों और टूलकिट्स को बहुत अच्छे से डिकोड करने लगी है।

सरकार बदलना जनता का अधिकार है, विदेशी आकाओं का नहीं, चिदंबरम जी समझिये इस बात को

जब इस ‘रिजीम चेंज’ की साज़िश पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने शिकंजा कसना शुरू किया, तो ज़ाहिर सी बात है विपक्ष के पेट में मरोड़ उठना ही था।

खुद को बचाने के लिए कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकारों में से एक, पी. चिदंबरम साहब मैदान में उतरे। उन्होंने बड़ी मासूमियत से कैमरे के सामने आकर सफाई दी की, “रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन) मांगना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है।”

अरे चिदंबरम साहब! बात तो आपने बिल्कुल सही कही, लेकिन आप आधी बात खा गए। सत्ता परिवर्तन मांगना भारत के हर नागरिक और हर राजनीतिक दल का परम अधिकार है।

लेकिन ज़रा ये तो बताइए की ये हक़ मांगा कहां जाता है? सत्ता परिवर्तन ईवीएम (EVM) का बटन दबाकर मांगा जाता है! बैलेट बॉक्स के ज़रिए मांगा जाता है! जनता की अदालत में मांगा जाता है!

जॉर्ज सोरोस (George Soros) के दिए हुए टुकड़ों और ‘डीप स्टेट’ (Deep State) के विदेशी टूलकिट के सहारे सड़कों पर बसें जलाकर सत्ता नहीं मांगी जाती।

उसे लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि तख्तापलट की साज़िश कहते हैं।

आप और आपका इकोसिस्टम ये भूल रहा है की ये नया भारत है। यहां की जनता को पता है की उसके वोट की कीमत क्या है।

अगर सरकार बदलने का फैसला वाशिंगटन या पेरिस में बैठे चंद विदेशी आका करेंगे, तो फिर हमारे देश के 100 करोड़ वोटरों की क्या औकात रह जाएगी?

सरकार बदलना भारत की जनता का अधिकार है, विदेशी ताकतों का कोई प्राइवेट प्रोजेक्ट नहीं।

चुनाव आयोग पर बेतुके आरोप और कल रामलीला मैदान में रची जा रही Regime Change की स्क्रिप्ट

अब आते हैं इस पूरे षड्यंत्र के उस हिस्से पर, जो इस वक्त देश में खुलेआम खेला जा रहा है।

कोई भी तख्तापलट या रिजीम चेंज हवा में नहीं होता, उसके लिए एक ‘विलेन’ गढ़ना पड़ता है।

इस बार विपक्ष और राहुल गांधी के INDI गठबंधन ने विलेन किसको बनाया है? देश के चुनाव आयोग (ECI) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को!

चुनाव आयोग ने अपना रूटीन काम करते हुए वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा और अपडेट करने के लिए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) शुरू किया। ज़ाहिर सी बात है, जो लोग दुनिया से चले गए या जो शिफ्ट हो गए, उनके नाम लिस्ट से कटेंगे ही। ये तो हर चुनाव से पहले का नॉर्मल प्रोसेस है।

लेकिन विपक्ष ने इसे ऐसा हौव्वा बना दिया जैसे कोई नेशनल इमरजेंसी आ गई हो। इन्होंने एक झूठा नैरेटिव सेट कर दिया की जानबूझकर 13 करोड़ वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं।

इसी झूठे नैरेटिव को ढाल बनाकर अब सड़कों पर उतरने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी है। कल ही की बात है, 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बहुत बड़ा जमावड़ा होने जा रहा है।

और मज़ाक देखिए, इस भीड़ को लीड कौन कर रहा है? वामपंथी छात्र संगठन “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP)।

रामलीला मैदान में होने वाली ये कल की रैली कोई चुनाव की रैली नहीं है। ये विशुद्ध रूप से सिस्टम को ब्लैकमेल करने, देश की राजधानी में अराजकता फैलाने और चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की साख को मिट्टी में मिलाने का एक स्क्रिप्टेड ड्रामा है।

ये ठीक वैसा ही है जैसे आप मैच हारने के बाद अंपायर पर ही बैट से हमला कर दें। जब चुनाव में दाल नहीं गलती, तो ये लोग चुनाव आयोग पर ही धावा बोल देते हैं।

पड़ोसी के घर लगी आग से भारत में हाथ सेंकने की साज़िश, बांग्लादेश वाली फैंटेसी

दरअसल, विपक्ष की इस अचानक उठी ‘रिजीम चेंज’ वाली खुजली के पीछे एक बहुत बड़ा विदेशी इन्स्पिरेशन (Inspiration) काम कर रहा है।

आपको याद होगा अभी हाल ही में, अगस्त 2024 में हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में क्या हुआ था। वहां कुछ छात्रों को मोहरा बनाकर, सड़कों पर आगजनी करवाकर चुनी हुई प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट कर दिया गया।

बस, पड़ोसी के घर लगी उसी आग को देखकर हमारे यहां के विपक्ष को अपने हाथ सेंकने की खौफनाक फैंटेसी होने लगी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और किरेन रिजिजू जैसे वरिष्ठ नेता बिल्कुल डंके की चोट पर यही बात कह चुके हैं की कांग्रेस और उनका अर्बन-नक्सल ईकोसिस्टम भारत में हूबहू वही ‘बांग्लादेश वाला मॉडल’ लागू करना चाहता है।

इन्हें लगता है की जैसे वहां सड़कों पर उतरकर रातों-रात सरकार को उखाड़ फेंका गया, वैसा ही कोई चमत्कार दिल्ली की सड़कों पर भी हो जाएगा।

लेकिन मुंगेरीलाल के इन हसीन सपनों पर ठंडे पानी की बाल्टी डालते हुए इन्हें एक छोटी सी बात याद दिलानी पड़ेगी।

भाई साहब, भारत वो देश नहीं है जहां आप चंद विदेशी डॉलर और ‘कलर रेवोल्यूशन’ (रंगीन क्रांति) के नाम पर चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर देंगे।

यहां की जनता ने अपना प्रधानमंत्री ईवीएम का बटन दबाकर चुना है, किसी विदेशी शक्ति के इशारे पर नहीं। आपकी ये खौफनाक फैंटेसी भारत की मज़बूत लोकतांत्रिक ज़मीन पर कभी भी सच नहीं होने वाली।

देश के भीतर बैठे मोहरे और डीप स्टेट का ग्लोबल टूलकिट खोल रहा है इस रंगीन क्रांति का असली कच्चा चिट्ठा

अब आप सोच रहे होंगे की क्या सच में इसके पीछे विदेशी ताकतें हैं या ये सिर्फ कोई राजनीतिक बयानबाज़ी है? तो चलिए ज़रा डेटा और फैक्ट्स की बात कर लेते हैं।

ये जो रामलीला मैदान में भीड़ जुटाने और देश में आग लगाने की स्क्रिप्ट लिखी गई है, इसके तार सीधे तौर पर 9 देशों में बैठे 101 विदेशी संगठनों से जुड़े हुए हैं।

बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया और हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने हालिया रिपोर्ट्स में इस पूरे ग्लोबल टूलकिट का भंडाफोड़ कर दिया है।

‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ (Progressive International) और ‘इंडियन एलायंस पेरिस’ जैसे विदेशी संगठनों का नाम अब खुलकर सामने आ रहा है।

ये वो संस्थाएं हैं जो भारत के वामपंथियों और विपक्ष के साथ मिलकर यहां अस्थिरता फैलाना चाहती हैं।

अभी इसी महीने (अक्टूबर 2026) विजयदशमी के पावन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत जी ने भी अपने भाषण में देश को इसी खतरे से आगाह किया है।

उन्होंने बिल्कुल सटीक शब्दों में कहा है की ‘पश्चिमी दानवी शक्तियां’ और ‘डीप स्टेट’ (Deep State) एक बहुत बड़ी ग्लोबल साज़िश रच रहे हैं।

इनका इकलौता मकसद है भारत को अंदर से खोखला करना। जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने जा रहा है, जब हमारा देश ग्लोबल सुपरपावर की रेस में दौड़ रहा है, तो इन विदेशी ताकतों को मिर्ची लगनी तय है।

और दुर्भाग्य की बात ये है कि हमारे ही देश का विपक्ष सत्ता की भूख में इन ‘दानवी शक्तियों’ का मोहरा बनने को तैयार बैठा है।

सुप्रीम कोर्ट से लगा करारा झटका और 13 करोड़ वोटरों का झूठ, Regime Change के लिए गढ़ा जा रहा है कृत्रिम संकट

जब आप झूठ के पैर पर खड़े होकर लंबी रेस दौड़ना चाहते हैं, तो आप मुंह के बल ही गिरते हैं।

विपक्ष के साथ भी कोर्ट में ठीक यही हुआ। इस ‘रिजीम चेंज’ साज़िश के तहत जब इन्होंने अपने बड़े-बड़े वकीलों की फौज लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और मांग की कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को तुरंत सस्पेंड कर दिया जाए, तो कोर्ट ने इन्हें ऐसा आईना दिखाया की इनकी बोलती बंद हो गई।

सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के CEC पर कोई भी अंतरिम रोक (Interim Order) लगाने से साफ इनकार कर दिया।

अब मज़ेदार बात देखिए, जब कोर्ट से इन्हें मनमाफिक फैसला मिल जाता है, तो ‘सत्यमेव जयते’ के नारे लगते हैं, लेकिन जब कोर्ट इनके झूठ को कचरे के डिब्बे में डाल देता है, तो ये तुरंत सड़कों पर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का रोना शुरू कर देते हैं।

और वो जो 13 करोड़ वोटरों के नाम कटने वाला हौव्वा खड़ा किया जा रहा है ना? उसकी असलियत भी सुन लीजिए। चुनाव आयोग (ECI) कोई ‘वोट चोरी’ नहीं कर रहा है।

दरअसल, सालों से वोटर लिस्ट में जमे हुए वो लोग जो अब दुनिया में नहीं हैं (Deceased), या जिनकी डबल-एंट्री है, या जो शिफ्ट हो चुके हैं, उनकी रुटीन सफाई (Cleanup) चल रही है।

विपक्ष का असली दर्द ये नहीं है की असली वोटरों के नाम कट रहे हैं, इनका रोना इस बात का है की इनका बरसों पुराना ‘फर्जी वोटबैंक’ खिसक रहा है। जब फर्जी वोटर ही नहीं बचेंगे, तो चुनाव में धांधली की इनकी प्लानिंग कैसे सफल होगी?

आख़िर में, ज़रा विपक्ष के उस नए स्लोगन का डिकोड भी कर लेते हैं जो आजकल ये लोग खूब उछाल रहे हैं- “Oppose, Expose, Depose” (विरोध करो, पर्दाफाश करो, और सत्ता से उखाड़ फेंको)।

ये कोई चुनाव सुधार या जनहित की मांग नहीं है। ये विशुद्ध रूप से विदेशी स्क्रिप्ट के तहत देश में एक ‘कृत्रिम संकट’ (Artificial Crisis) पैदा करने का ब्लूप्रिंट है।

ये चाहते हैं की देश में इतना बवाल हो जाए की दुनिया को लगे भारत में सब कुछ खत्म हो गया है और ये लोग सत्ता पर कब्ज़ा जमा लें।

लेकिन ये ‘नया भारत’ है। विरोध करना, सवाल पूछना और सरकार बदलना हमारा हक़ है। लेकिन जब विरोध के तार जॉर्ज सोरोस, विदेशी टूलकिट और देश को जलाने वाली साज़िशों से जुड़ जाएं, तो वो विरोध नहीं… भारत के खिलाफ सीधा युद्ध बन जाता है।

और भारत की जनता, चाहे वो किसी भी विचारधारा की हो, अपने ही देश के खिलाफ रची गई इस ‘रिजीम चेंज’ वाली घिनौनी साज़िश को कभी भी कामयाब नहीं होने देगी!

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