आज जब कलेंडर पर 5 नवंबर की तारीख दिखती है ना, तो हिंदुस्तान के संगीत प्रेमियों का सिर अपने आप सम्मान से झुक जाता है।
आज से ठीक 15 साल पहले, 5 नवंबर 2011 को देश ने एक ऐसी जादुई आवाज़ खो दी थी, जिसे पूरी दुनिया ‘सुधाकंठ’ (जिसके गले से साक्षात अमृत बरसता हो) के नाम से पूजती थी।
हम बात कर रहे हैं असम के प्रसिद्ध संगीतकार डॉ. भूपेन हजारिका की। आज उस महान आत्मा की पुण्यतिथि है।
एक दौर था जब हमारा पूर्वोत्तर (North-East) भारत पक्की सड़कों, पुलों और सुख-सुविधाओं के मामले में देश के बाकी हिस्सों से बहुत कटा हुआ था।
दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक लोगों को असम और नॉर्थ-ईस्ट की संस्कृति के बारे में बहुत कम जानकारी हुआ करती थी।
तब भूपेन दा ने वो काम कर दिखाया जो बड़े-बड़े राजनेता और हज़ारों किलोमीटर लंबी सड़कें भी नहीं कर पाईं। उन्होंने अपने संगीत के दम पर पूर्वोत्तर को उठाया और सीधे पूरे भारत के दिल से जोड़ दिया।

उनका संगीत कोई स्टूडियो में बैठकर बनाया गया बनावटी म्यूज़िक नहीं था भाई! उनकी आवाज़ में ब्रह्मपुत्र नदी की लहरों का शोर था, असम के चाय बागानों की माटी की खुशबू थी और वहां के आम लोगों का दर्द था।
जब वो गाते थे, तो ऐसा लगता था जैसे पूरा का पूरा असम उठकर आपके सामने आ गया हो। आज उनकी 15वीं पुण्यतिथि पर हम उस महान हस्ती की ज़िंदगी के उन पन्नों को पलटेंगे, जिनके बारे में हर हिंदुस्तानी को ज़रूर पता होनी चाहिए।
दस साल की उम्र में गाया पहला गीत और तिनसुकिया के एक छोटे से गांव सदिया से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक सफर
भूपेन हजारिका जी का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया ज़िले के एक बेहद छोटे और पिछड़े हुए कस्बे ‘सदिया’ (Sadiya) में हुआ था।
वो 10 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। घर में पैसों की भले ही तंगी रही हो, लेकिन उनकी माँ के गले में सरस्वती बसती थीं।
उनकी माँ ही उन्हें असमिया लोकगीत और लोरियां सुनाया करती थीं, और यहीं से नन्हे भूपेन के अंदर संगीत का वो बीज पड़ा जो बाद में एक विशाल वटवृक्ष बन गया।
भूपेन दा ने महज़ 10 साल की उम्र में अपना पहला गीत खुद लिखा और खुद ही उसे गाया था। बचपन में ही उनके अंदर का वो स्पार्क इतना तेज़ था की असमिया संस्कृति के दो सबसे बड़े दिग्गजों की नज़र उन पर पड़ गई।
ये दो दिग्गज थे- ज्योतिप्रसाद अग्रवाल (असमिया सिनेमा के पहले फिल्म निर्माता) और बिष्णु प्रसाद राभा (प्रसिद्ध कलाकार और कवि)।
ज्योतिप्रसाद अग्रवाल और बिष्णु राभा ही वो लोग थे जो भूपेन दा को पहली बार अपने साथ कोलकाता ले गए। और वहीं, साल 1936 में, सिर्फ 10 साल की उम्र में इस लड़के ने ऑरोरा स्टूडियो (Aurora Studio) में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया।
सदिया जैसे छोटे से गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ यह सफर अब एक ऐसे रास्ते पर निकल पड़ा था, जिसे सीधे इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज़ होना था।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से लेकर अमेरिका तक का सफर और पॉल रोबसन से वो मुलाकात जिसने दिया ‘गंगा बहती हो क्यों’ जैसा अमर गीत

अक्सर लोगों को लगता है की पुराने ज़माने के गायक बस सुरों के पक्के होते थे, पढ़ाई-लिखाई से उनका बहुत वास्ता नहीं होता था।
लेकिन भूपेन दा के मामले में ये बात बिल्कुल उल्टी थी। उनका एजुकेशनल बैकग्राउंड इतना तगड़ा था की आज के बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी उनके सामने पानी भरें।
असम से निकलकर वो सीधे उत्तर प्रदेश के बनारस पहुंचे। वहां उन्होंने एशिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ (BHU) में दाखिला लिया।
BHU से उन्होंने 1944 में अपना ग्रेजुएशन (BA) पूरा किया और फिर 1946 में पॉलिटिकल साइंस (राजनीति विज्ञान) में मास्टर डिग्री (MA) हासिल की।
लेकिन उनका सफर यही नहीं रुका! इसके बाद 1949 में वो स्कॉलरशिप लेकर सीधे अमेरिका निकल गए और वहां की विश्व प्रसिद्ध ‘कोलंबिया यूनिवर्सिटी’ (Columbia University) में एडमिशन लिया।
वहां से उन्होंने मास कम्युनिकेशन में अपनी PhD पूरी की।
अमेरिका में पढ़ाई के दौरान ही एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने भारतीय संगीत को उसका सबसे बड़ा मास्टरपीस दिया।
न्यूयॉर्क में भूपेन दा की मुलाकात अमेरिका के मशहूर ब्लैक सिविल राइट्स एक्टिविस्ट और लीजेंडरी सिंगर ‘पॉल रोबसन’ (Paul Robeson) से हुई।
पॉल रोबसन भी अपनी भारी-भरकम आवाज़ (Baritone voice) और शोषितों के लिए गाने के लिए जाने जाते थे।
पॉल रोबसन का एक बहुत ही मशहूर गाना था- “Ol’ Man River” (ओल्ड मैन रिवर), जो अमेरिका की मिसिसिपी नदी को संबोधित करते हुए अश्वेतों के दर्द को बयां करता था।
जब भूपेन दा ने वो गाना सुना, तो उन्होंने रोबसन के उस गाने से प्रेरणा ली और उसे भारत के हालात, यहाँ के शोषित मज़दूरों और किसानों के दर्द के साथ जोड़कर अपना अमर गीत रच दिया।
वही गीत था जिसे उन्होंने पहले असमिया भाषा में “बिस्तिर्नो पारोरे” के नाम से गाया, और बाद में उसी गाने को हिंदी में ऐसा गाया की आज भी उसे सुनकर लोग रो पड़ते हैं-
“विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार… ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों?”
यह गाना बहती हुई गंगा से पूछा गया एक सीधा सवाल था की तुम्हारे किनारे पर इतना ज़ुल्म और गरीबी है, फिर भी तुम चुपचाप कैसे बह रही हो?
एक ही मुलाकात और एक ही गाने ने साबित कर दिया था की डॉ. हजारिका सिर्फ एक सिंगर नहीं, बल्कि अपने दौर के सबसे बड़े विज़नरी थे।

रुदाली का वो ‘दिल हूम हूम करे’ और ओ माझी रे सुनकर बॉलीवुड का हर बड़ा डायरेक्टर हो गया था उनके सुरों का दीवाना
अमेरिका से PhD करके लौटने के बाद डॉ. हजारिका ने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में कुछ समय के लिए बच्चों को पढ़ाया भी, लेकिन उनके अंदर का कलाकार उन्हें आवाज़ें दे रहा था।
उन्होंने असमिया सिनेमा की कमान अपने हाथों में ली। उन्होंने ‘शकुंतला’ और ‘प्रतिध्वनि’ जैसी बेहतरीन असमिया फिल्मों का ना सिर्फ निर्देशन (Direction) किया, बल्कि उनका संगीत भी तैयार किया।
इन फिल्मों ने सीधे राष्ट्रीय पुरस्कार (National Awards) जीते और असमिया सिनेमा को एक नई ऊंचाई पर खड़ा कर दिया।
लेकिन बॉलीवुड और पूरे हिंदी भाषी बेल्ट में उनका असली जलवा तब बिखरा जब उनका सामना मशहूर फिल्म डायरेक्टर कल्पना लाजमी से हुआ।
साल 1993 में आई फिल्म ‘रुदाली’ का संगीत भूपेन दा ने ही तैयार किया था। और भाई साहब, जब उन्होंने अपनी उस कड़क, गहरी और दिल को चीर देने वाली ‘बैरीटोन’ आवाज़ में गाना शुरू किया- “दिल हूम हूम करे घबराए, घन धम धम करे गरजाए”… तो पूरा का पूरा बॉलीवुड बस देखता ही रह गया!
उस एक गाने ने उन्हें रातों-रात पूरे हिंदुस्तान के हर घर में पहुंचा दिया। इसके बाद तो जैसे बॉलीवुड के बड़े-बड़े डायरेक्टर्स उनके सुरों के दीवाने हो गए।
उनका गाया एक और गीत “ओ माझी रे, अपना किनारा, नदिया की धारा है” आज भी संगीत की दुनिया का एक ऐसा नगीना है जिसे कोई दूसरा सिंगर कभी छू तक नहीं पाया।
सिर्फ गायक नहीं बल्कि असली सांस्कृतिक पुल थे भूपेन दा, जिन्होंने पहली बार चाय बागान के मज़दूरों का दर्द दुनिया को सुनाया
भूपेन हजारिका ने अपनी आवाज़ का इस्तेमाल हमेशा शोषितों, जनजातियों और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए किया।
असम के चाय बागानों में काम करने वाले वो गरीब मज़दूर, जिनकी पीठ पर टोकरियां होती थीं और पैरों में छाले, उनके उस दर्द को भूपेन दा ने पहली बार गीतों में पिरोकर पूरी दुनिया को सुनाया।
असम का जो पारंपरिक लोक नृत्य और संगीत ‘बिहू’ (Bihu) आज पूरी दुनिया में इतना मशहूर है, उसे असम के जंगलों और गांवों से निकालकर नेशनल और इंटरनेशनल लेवल के मंचों तक पहुंचाने का सबसे बड़ा श्रेय भूपेन हजारिका को ही जाता है।
उन्होंने असमिया लोक संगीत को वो इज़्ज़त दिलाई जो उससे पहले उसे कभी नहीं मिली थी।
भारत रत्न से लेकर धोला-सदिया के सबसे लंबे पुल तक, देश ने अपने इस महान सपूत के सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी
जब किसी इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी कला, अपनी आवाज़ और अपना वजूद इस देश को एक धागे में पिरोने के लिए लगा दिया हो, तो यह देश भी उस पर अपना प्यार लुटाने में पीछे कैसे रह सकता था?
भारत सरकार ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में भूपेन दा के इस योगदान के लिए उन्हें पदकों और सम्मानों से लाद दिया। उन्हें 1977 में ‘पद्म श्री’ से नवाज़ा गया।
1987 में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ मिला। साल 1992 में सिनेमा जगत का सबसे बड़ा और सबसे प्रतिष्ठित ‘दादा साहब फाल्के अवॉर्ड’ भी उनके कदम चूम रहा था।
इसके बाद 2001 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ और 2012 में मरणोपरांत ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया।
और आख़िरकार, साल 2019 में, इस देश ने अपने इस सच्चे लाल को देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (Bharat Ratna) देकर उनके नाम को इतिहास के सुनहरे अक्षरों में हमेशा के लिए अमर कर दिया।
लेकिन बात सिर्फ अवार्ड्स और मेडल्स की नहीं है। 2017 में भारत सरकार ने असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने के लिए, लोहित नदी (जो ब्रह्मपुत्र की ही एक अहम सहायक नदी है) पर भारत का सबसे लंबा नदी पुल बनाया गया।
इस 9.15 किलोमीटर लंबे महा-पुल का नाम रखा गया- “डॉ. भूपेन हजारिका सेतु”।
डॉ. भूपेन हजारिका भारत की आत्मा का एक ऐसा सुर थे जो युगों-युगों तक इस देश में गूंजता रहेगा। आज उनकी पुण्यतिथि पर, उस ‘सुधाकंठ’ को पूरे हिंदुस्तान का कोटि-कोटि और भावपूर्ण नमन!
