राजनेता या ‘पॉलिटिशियन’ का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? सफेद कुरता-पजामा, काले चश्मे, आगे-पीछे सायरन बजाती 10-15 लग्ज़री गाड़ियों का काफिला, आगे-पीछे दौड़ते गनमैन और चेहरे पर एक सत्ता का घमंड।
लेकिन ज़रा सोचिए, क्या कोई ऐसा मुख्यमंत्री या देश का रक्षा मंत्री हो सकता है जो बिना किसी सुरक्षा घेरे के, अपनी पुरानी खटारा सी मारुति कार या स्कूटर से बाज़ार में सब्ज़ी खरीदने निकल जाए?
सुनने में ये किसी आदर्शवादी किताब का पन्ना लगता है ना? लेकिन हमारे इसी हिंदुस्तान ने एक ऐसे ही राजनेता को जिया है, देखा है और उन्हें सिर आंखों पर बिठाया है। उनका नाम था- मनोहर पर्रिकर।
चलिए आज उस शख्सियत की पूरी कहानी गहराई से जानते हैं, जिसने अपनी कुशाग्र बुद्धि से ना सिर्फ समंदर किनारे बसे छोटे से गोवा का कायाकल्प कर दिया, बल्कि भारतीय सेना की रगों में भी एक नया खून दौड़ा दिया।

हाफ शर्ट और चप्पल में देश की सत्ता चलाने वाला वो नायक जिसने वीआईपी कल्चर को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया
आज के टाइम में अगर कोई आदमी किसी मोहल्ले का पार्षद भी बन जाए ना, तो उसके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते।
लेकिन मनोहर पर्रिकर जी उस मिट्टी के बने थे जहाँ पद और पावर कभी उनके दिमाग पर हावी हो ही नहीं पाई। सत्ता के सबसे ऊंचे शिखरों पर बैठने के बावजूद उन्होंने इस VIP कल्चर को हमेशा दूर रखा।
मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन पहनावा वही पुरानी आधी बांह वाली शर्ट और पैरों में आम सी सैंडल या चप्पल। दिल्ली हो या गोवा का सचिवालय, उनका गेटअप कभी नहीं बदला।
वो देश के रक्षा मंत्री जैसे भारी-भरकम पद पर रहे, लेकिन मजाल है की कभी प्राइवेट चार्टर्ड प्लेन के नखरे दिखाए हों!
वो अक्सर कमर्शियल फ्लाइट की इकॉनमी क्लास (Economy Class) में आम लोगों के बीच बैठकर सफर किया करते थे। एयरपोर्ट पर उतरकर वीआईपी लाउंज में इंतज़ार करने के बजाय, आम यात्रियों के साथ बेल्ट के पास खड़े होकर अपना लगेज खुद उठाते थे।
लोग अक्सर हैरान रह जाते थे की 13 लाख की फौज का बॉस, वो शख्स जिसके इशारे पर ब्रह्मोस मिसाइलें और सुखोई लड़ाकू विमान हरकत में आ जाते हैं, वो बंदा ऐसे लाइन में लगकर अपना सूटकेस क्यों उठा रहा है?
लेकिन पर्रिकर जी के लिए ये उनका असली स्वभाव था। वो दिल से मानते थे की नेता जनता का नौकर होता है, कोई राजा-महाराजा नहीं।
IIT बॉम्बे के उस कुशाग्र छात्र की कहानी जिसने कॉर्पोरेट का करोड़ों का पैकेज ठुकराकर मातृभूमि और संघ की शाखा को चुना
पर्रिकर जी की इस गज़ब की सादगी और ज़बरदस्त विज़न के पीछे उनके बचपन के संस्कार और उनकी पढ़ाई का बहुत बड़ा हाथ था।
13 दिसंबर 1955 को गोवा के मापुसा (Mapusa) शहर के एक साधारण से परिवार में उनका जन्म हुआ था। पढ़ाई में वो बचपन से ही कुशाग्र और तेज़ थे।
इसी दिमागी तेज़ी के दम पर उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में दाखिला लिया और 1978 में वहां से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग (Metallurgical Engineering) की डिग्री हासिल की।
यहाँ एक बात जानना बहुत ज़रूरी है। भारत के राजनीतिक इतिहास में आज तक बहुत से मुख्यमंत्री हुए हैं, लेकिन मनोहर पर्रिकर उस समय देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जिनके पास IIT की डिग्री थी।
अब आप ही सोचिए, 70 के दशक में आईआईटी बॉम्बे से निकला कोई टॉप इंजीनियर चाहता तो क्या नहीं कर सकता था?
वो आराम से किसी बड़ी मल्टीनेशनल कॉर्पोरेट कंपनी (MNC) में करोड़ों का पैकेज लेकर ऐशो-आराम की ज़िंदगी गुज़ार सकते थे।
लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। क्यों? क्योंकि उनके दिल में बचपन से ही राष्ट्रभक्ति का बीज बोया गया था।
महज़ 15 साल की उम्र में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे। शाखा की उस धूल ने उन्हें सिखा दिया था की निजी तरक्की से कहीं ऊपर मातृभूमि की सेवा होती है।
आईआईटी से निकलने के बाद उन्होंने संघ के एक समर्पित ‘मुख्य शिक्षक’ के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उनके काम करने की इसी ज़मीनी पकड़ को देखकर राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उन्हें उत्तरी गोवा में पार्टी को खड़ा करने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
और फिर राजनीति के मैदान में इस कुशाग्र इंजीनियर ने वो कमाल किया जो उससे पहले कभी किसी ने नहीं सोचा था। 1994 में वो पहली बार पणजी (Panaji) से विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे।
उस वक्त गोवा की राजनीति में कांग्रेस का एकछत्र राज और भारी भ्रष्टाचार का बोलबाला था। लेकिन पर्रिकर जी की बेदाग छवि, उनके तीखे सवाल और पब्लिक के बीच उनकी लोकप्रियता ने ऐसा जादू किया की साल 2000 में उन्होंने पहली बार गोवा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कमल खिला दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हुए।
उन्होंने कैथोलिक ईसाइयों की अच्छी-खासी आबादी वाले इस राज्य में बीजेपी को एक ऐसा ‘इंक्लूसिव’ (सबको साथ लेकर चलने वाला) ब्रांड बना दिया, जिसे वहां के चर्च और अल्पसंख्यक भी भरपूर सम्मान देने लगे।

गोवा को विकास का रोल मॉडल बनाने वाले पर्रिकर जो बने एकलौते CM जिन्होंने राज्य में पेट्रोल को किया बहुत सस्ता
जब मनोहर पर्रिकर ने गोवा की कमान संभाली, तब दुनिया की नज़रों में गोवा का मतलब सिर्फ समंदर की लहरें, विदेशी टूरिस्ट, शराब और पार्टियां हुआ करता था।
लेकिन इस आईआईटी इंजीनियर ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही तय कर लिया था की वो गोवा को सिर्फ एक हॉलिडे डेस्टिनेशन नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए विकास का एक रोल मॉडल बनाएंगे।
उनके काम करने की स्पीड इतनी पैनी थी की बाबू और अफसर लोग अक्सर उनके सामने कांपते थे। पर्रिकर जी के दिमाग में हर प्रोजेक्ट का नक्शा, उसकी कॉस्ट (Cost) और उसकी टाइमलाइन एकदम छपी होती थी।
कोई भी ठेकेदार या इंजीनियर उन्हें बेवकूफ नहीं बना सकता था। आज आप गोवा जाते हैं तो मांडवी नदी के ऊपर जो एक बेहद शानदार और विशाल ‘अटल सेतु’ (Atal Setu) आपको दिखता है, वो पर्रिकर जी के ही विज़न का सबसे बड़ा सुबूत है।
जुआरी नदी पर पुल हो या नई सड़कों का जाल, ये सब उसी इंसान की देन है जिसने रिकॉर्ड समय में प्रोजेक्ट्स पूरे करवाए।
टूरिज्म को एक नया और सभ्य इंटरनेशनल लेवल देने के लिए पर्रिकर जी ही वो शख्स थे जो 2004 में ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ (IFFI) को गोवा लेकर आए।
आज ये IFFI गोवा की एक ऐसी परमानेंट शान बन चुका है, जिसके चलते दुनिया भर के फिल्ममेकर और डिज़ाइनर हर साल गोवा का रुख करते हैं।
लेकिन उनका असली मैजिक सिर्फ कंक्रीट के पुल बनाने में नहीं था।
उनका दिल राज्य की औरतों और बच्चों के लिए धड़कता था। उन्होंने ऐसी सोशल स्कीम्स लॉन्च कीं जिन्होंने गोवा की जनता की ज़िंदगी में सीधे पैसा और आज़ादी पहुंचाई- बिना किसी बिचौलिए या दलाली के!
उस दौर में जब गरीब बाप अपनी बेटी की शादी के लिए कर्ज़े में डूब जाता था, तब पर्रिकर सरकार ने लाडली लक्ष्मी योजना के तहत राज्य की लड़कियों को उनकी शादी के वक्त 1 लाख रुपये की सीधी आर्थिक मदद देना शुरू किया।
और 2012 में जब पूरे देश में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब पर्रिकर जी ने देश के इकलौते ऐसे मुख्यमंत्री होने का रुतबा हासिल किया था, जिन्होंने अपनी स्टेट में पेट्रोल पर वैट (VAT) को सीधा 11% घटा दिया था।
इस एक मास्टरस्ट्रोक से रातों-रात गोवा में पेट्रोल की कीमत गिरकर महज़ 55 रुपये प्रति लीटर हो गई थी! पूरा देश हैरत में था की अगर गोवा जैसा छोटा राज्य अपने नागरिकों को इतनी बड़ी राहत दे सकता है, तो बाकी मुख्यमंत्री क्यों नहीं?

दशकों से फाइलों में धूल फांक रहे ओआरओपी (OROP) और स्वदेशी तेजस को नई उड़ान देने वाला वो फौलादी रक्षा मंत्री
गोवा में पर्रिकर जी के काम का डंका इतनी ज़ोर से बजा की उसकी गूंज दिल्ली तक पहुँच गई। 2014 में जब केंद्र में नई सरकार आई, तो देश के रक्षा मंत्रालय की हालत बहुत खस्ता थी।
घोटालों के डर से पिछली सरकारों के रक्षा मंत्रियों ने कोई हथियार ही नहीं खरीदे थे। फाइलें सिर्फ एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक घूम रही थीं और भारतीय सेना गोला-बारूद की भारी कमी से जूझ रही थी।
ऐसे मुश्किल वक्त में देश के रक्षा मंत्रालय (Defence Ministry) की कमान संभालने के लिए दिल्ली बुलाया गया इसी फौलादी इंसान को।
रक्षा मंत्री बनते ही पर्रिकर जी ने सबसे पहले उस नासूर का इलाज किया, जो दशकों से हमारे पूर्व सैनिकों को अंदर ही अंदर खा रहा था- ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन)।
आपको जानकर हैरानी होगी की 40 सालों से कांग्रेस की सरकारें और डिफेंस के बाबू लोग हमारे रिटायर हो चुके फौजियों को सिर्फ गोलियां दे रहे थे। फाइलें घुमाकर कहते थे की इसकी कैलकुलेशन बहुत मुश्किल है।
लेकिन जब एक आईआईटी का दिमाग इस फाइल पर बैठा, तो उन्होंने खुद पेन-कागज़ उठाया, सारी तकनीकी कैलकुलेशन अपने हाथों से सॉल्व की, और ऐतिहासिक बजट पास करवाकर इस 40 साल से लटके मुद्दे को हकीकत में बदल दिया।
आज देश के लाखों रिटायर फौजी और उनके परिवार अगर चैन की सांस ले रहे हैं, तो उसके पीछे मनोहर पर्रिकर जी का ही मास्टरमाइंड था।
इसके बाद उनका ध्यान गया भारत के उस स्वदेशी सपने पर, जो लगभग वेंटिलेटर पर पड़ा था- स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ (LCA Tejas)।
भारतीय वायुसेना तेजस को लेने से कतरा रही थी क्योंकि 3 दशकों से इसका काम कागज़ों में ही अटका था। पर्रिकर जी ने डिफेन्स मिनिस्ट्री, HAL (हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) और वायुसेना के अफसरों को आमने-सामने बिठाया।
एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे 36 बार मीटिंग्स कीं! उन्होंने सारे तकनीकी अड़ंगे दूर किए, फाइलों के बैकलॉग को फाड़कर फेंका और 2016 में तेजस को भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल करवाकर ही दम लिया।
पर्रिकर जी ने डिफेन्स की दलाली और ‘ब्लैकलिस्टिंग’ पॉलिसी पर भी करारी चोट की। पहले क्या होता था की अगर किसी विदेशी हथियार कंपनी के किसी निचले एजेंट पर भी थोड़ा शक होता, तो पिछली सरकारें डर के मारे पूरी की पूरी विदेशी कंपनी को ही ब्लैकलिस्ट कर देती थीं।
इससे होता ये था की सेना को स्पेयर पार्ट्स मिलने बंद हो जाते थे और हमारे टैंक या विमान कबाड़ बनने लगते थे।
पर्रिकर जी ने डिफेन्स प्रोक्योरमेंट पालिसी (DPP) में बदलाव किया। उन्होंने नियम बना दिया की अब कोई कंपनी पूरी तरह से ब्लैकलिस्ट नहीं होगी, बल्कि गड़बड़ी करने वाले एजेंट पर भारी जुर्माना लगेगा और उसे जेल भेजा जाएगा, ताकि भारतीय सेना को हथियारों की कभी कमी न हो।

म्यांमार के जंगलों से लेकर उरी के आतंकियों तक, जब पर्रिकर के सटीक सर्जिकल स्ट्राइक ने तोड़ दी थी दुश्मनों की कमर
जब बात देश की सुरक्षा की आती थी, तो हाफ शर्ट और सैंडल पहनने वाला ये सीधा-सादा आदमी एक ऐसे फौलादी बॉस में बदल जाता था, जिसके फैसलों से दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे।
साल 2015 की बात है। मणिपुर में उग्रवादियों (NSCN-K) ने घात लगाकर हमला किया और हमारे डोगरा रेजीमेंट के 18 जवानों को शहीद कर दिया।
पूरे देश में गुस्से की लहर थी। पर्रिकर जी ने प्रधानमंत्री मोदी और सेना के टॉप कमांडरों के साथ मिलकर एक ऐसा प्लान बनाया जिसने भारत की डिफेंस हिस्ट्री ही बदल दी।
पहली बार भारतीय सेना के स्पेशल पैरा-कमांडो ने म्यांमार का बॉर्डर क्रॉस किया। घने जंगलों में घुसकर उन्होंने उग्रवादियों के कैंपों पर सीधा धावा बोला और चुन-चुन कर उन कातिलों को भून डाला।
यह सर्जिकल स्ट्राइक एक खुला संदेश था की अगर भारत की तरफ आंख उठाई, तो हम तुम्हारे घर में घुसकर तुम्हें मारेंगे!
लेकिन उनका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मास्टरस्ट्रोक अभी बाकी था। सितंबर 2016 में पाकिस्तान के पाले हुए कायर आतंकियों ने उरी (Uri) के आर्मी बेस पर सोते हुए जवानों पर हमला कर दिया। 19 जवान शहीद हो गए।
पूरा हिंदुस्तान बदले की आग में उबल रहा था। पर्रिकर जी ने कमान अपने हाथों में ली। और फिर आई 28-29 सितंबर 2016 की वो रात, जिसे पाकिस्तान की फौज और वहां के आतंकी आज तक नहीं भूल पाए हैं।
भारतीय सेना के कमांडो लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पार करके PoK में घुसे और आतंकियों के लॉन्च पैड्स को सरेआम नेस्तनाबूद कर दिया।
आपको जानकर हैरानी होगी की उस पूरी रात मनोहर पर्रिकर एक पल के लिए भी नहीं सोए। वो दिल्ली के वॉर रूम (War Room) में जमे रहे और खुद मॉनिटरिंग करते रहे की उनके भेजे हुए शेर सुरक्षित अपना काम करके वापस लौट आएं।
जब सारे कमांडो बिना किसी खरोंच के वापस आ गए, तब जाकर इस रक्षा मंत्री ने चैन की सांस ली।
बाद में जब देश ने इस शौर्य का जश्न मनाया, तो अपने उसी टिपिकल और तंज भरे अंदाज़ में पर्रिकर जी ने एक ऐसा डायलॉग मारा जिसने पाकिस्तान की रही-सही इज़्ज़त भी उतार दी।
उन्होंने हंसते हुए कहा- “हमने पाकिस्तान को बिना एनेस्थीसिया (Anesthesia) के सर्जरी का दर्द दिया है।”
नाक में लगी मेडिकल ट्यूब और जुबान पर ‘हाउ इज़ द जोश’… कैंसर से टूटते शरीर के बावजूद आखिरी सांस तक सिर्फ देश के लिए जिया वो कर्मयोगी
साल 2017 में गोवा की राजनीति में एक ऐसा मोड़ आया की वहां की जनता और पार्टी को अपने सबसे भरोसेमंद नेता की फिर से ज़रूरत पड़ गई।
दिल्ली का इतना बड़ा और पावरफुल रक्षा मंत्रालय छोड़कर, बिना किसी झिझक के पर्रिकर जी वापस अपनी मिट्टी में लौट आए और फिर से गोवा के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। 2018 में एक ऐसी खबर आई जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।
पता चला की पर्रिकर जी को एडवांस्ड पैंक्रियाटिक कैंसर (Pancreatic Cancer) हो गया है। लेकिन ये इंसान किसी और ही मिट्टी का बना था।
बीमारी ने उनके शरीर को अंदर से खोखला कर दिया था, वजन एकदम गिर चुका था, लेकिन उनके इरादों की रीढ़ की हड्डी अभी भी फौलाद की तरह तनी हुई थी।
29 जनवरी 2019 का वो दिन भारत के राजनीतिक इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया। गोवा विधानसभा का सत्र चल रहा था और राज्य का बजट पेश होना था। अचानक विधानसभा के दरवाज़े खुले और पर्रिकर जी अंदर आए।
उन्हें देखकर वहां बैठे हर शख्स की आंखें नम हो गईं। उनकी नाक में जीवन रक्षक नली (Medical Tube) लगी हुई थी, पेट के पास मेडिकल बैग बंधा था और वो बमुश्किल खड़े हो पा रहे थे।
कोई और राजनेता होता तो विदेश के किसी महंगे अस्पताल में आराम फरमा रहा होता, लेकिन पर्रिकर जी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने वहां आ खड़े हुए।
उन्होंने सदन में बजट भाषण पढ़ना शुरू किया। आवाज़ में भले ही थोड़ी कमज़ोरी थी, लेकिन जब उन्होंने वहां बैठे युवाओं और विधायकों की तरफ देखकर वो मशहूर डायलॉग बोला- “How is the Josh?” (हाउ इज़ द जोश?)
तो पूरी विधानसभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। और फिर उन्होंने खुद ही जवाब दिया- “I am in high josh!” (मैं पूरे जोश में हूँ!)
वो सिर्फ एक फिल्मी डायलॉग नहीं, वो उस महानायक की पूरी ज़िंदगी का निचोड़ था। वो बता रहे थे की शरीर भले ही टूट जाए, लेकिन देश के लिए काम करने का जज़्बा कभी नहीं मर सकता।
17 मार्च 2019 को आख़िरकार इस कर्मयोगी ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। जब उनके निधन की खबर आई, तो ना सिर्फ गोवा, बल्कि पूरे देश में एक सन्नाटा छा गया था।
आने वाले 100 सालों में, जब भी भारत के इतिहास में सादगी, ईमानदारी और बिना किसी दाग के सत्ता चलाने वाले नेताओं का ज़िक्र होगा, तो मनोहर पर्रिकर का नाम सुनहरे अक्षरों में जरूर लिखा जाएगा।
