जो ब्राह्मण कश्मीर में बांट रहे थे सिर्फ ज्ञान और शांति, उनका कर दिया गया भीषण नरसंहार, हर बात के लिए ब्राह्मणवाद को कोसने वाले आखिर कश्मीरी पंडितों के खून पर क्यों हो जाते मौन

हमारे देश में बहस का एक बड़ा ही अजीब सा फैशन चल पड़ा है। आज के समय में अगर किसी इंसान को सड़क पर चलते हुए ठोकर भी लग जाए, तो कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवी और नैरेटिव गढ़ने वाले लोग उसमें तुरंत ‘ब्राह्मणवाद’ का दोष ढूंढ निकालते हैं।

देश की हर छोटी-बड़ी समस्या, हर सामाजिक खाई और हर बुराई की इकलौती जड़ ब्राह्मणों और ‘ब्राह्मणवाद’ को बता दिया जाता है।

बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, मोटी-मोटी किताबें लिखी जाती हैं और सोशल मीडिया पर एक पूरा इकोसिस्टम दिन-रात इस ‘ब्राह्मणवाद’ नाम के शब्द को कोसने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है।

लेकिन कमाल की बात देखिए ना! सामाजिक न्याय का झंडा उठाकर चलने वाले इन बुद्धिजीवियों का यह चश्मा उस वक़्त अचानक धुंधला क्यों हो जाता है, जब बात कश्मीर की आती है?

आज 2026 आ गया है। 1990 से लेकर आज तक पूरे 36 साल बीत चुके हैं। जब कश्मीर के उन 7 लाख से ज्यादा शांतिप्रिय ब्राह्मणों (कश्मीरी पंडितों) की बात उठती है, जिन्हें रातों-रात उनके ही घरों से, उनकी ही ज़मीन से जानवरों की तरह खदेड़ दिया गया था..

तो न्याय के इन पैरोकारों के मुंह में जैसे दही जम जाता है। जो लोग देश के किसी भी कोने में मानवाधिकार के नाम पर मोमबत्तियां लेकर पहुँच जाते हैं, उनकी मोमबत्ती कश्मीरी पंडितों के दर्द पर आकर अचानक बुझ क्यों जाती है?

अगर सच में ‘ब्राह्मणवाद’ ही देश की हर समस्या की जड़ था और यह इतना ही क्रूर था, तो फिर कश्मीर में ऐसा क्या हुआ की वहां उन लाखों ब्राह्मणों का ही भीषण नरसंहार कर दिया गया?

ना कोई ज़मींदार ना कोई बाहुबली, ना ही कोई ब्राह्मणवाद.. फिर कश्मीर के इन लाखों शांतिप्रिय ब्राह्मणों का क्यों हुआ नरसंहार

इस नैरेटिव का सबसे बड़ा झूठ यह है की ब्राह्मणों को हमेशा शोषक, ज़मींदार या सामंतवादी (Oppressor) बताकर पेश किया जाता है।

एक ऐसा वर्ग जो दूसरों पर हुक्म चलाता हो। लेकिन ज़रा इतिहास और कश्मीर के ग्राउंड फैक्ट्स उठाकर देखिए की वहां के ये 7 लाख कश्मीरी पंडित आखिर थे कौन? क्या वे बाहुबली थे? क्या वे बंदूकें लेकर चलते थे?

बिल्कुल नहीं! कश्मीर का यह ब्राह्मण समाज शुद्ध रूप से एक नौकरीपेशा और पढ़ा-लिखा मध्यवर्गीय समाज था। ये वो लोग थे जिनके हाथों में कभी कोई हथियार नहीं रहा।

इनके घरों की आलमारियां किताबों से भरी रहती थीं। अगर आप पुराने आंकड़े और कश्मीर का सामाजिक ताना-बाना देखेंगे, तो पाएंगे की ये कश्मीरी पंडित ज़्यादातर सरकारी स्कूलों के टीचर थे, कश्मीर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थे, अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर थे, और पोस्ट ऑफिस या बैंक में काम करने वाले शांतिप्रिय क्लर्क थे।

इन्होंने कभी भी किसी मुस्लिम या सिख के साथ कोई सामाजिक भेदभाव नहीं किया। ये लोग कश्मीर के स्कूलों में उसी पीढ़ी को तालीम (Education) दे रहे थे, गणित और विज्ञान पढ़ा रहे थे, जिस पीढ़ी ने बाद में भड़क कर इन्हीं के सीनों में गोलियां उतार दीं।

ज़रा सोचिए, जो समाज सिर्फ ज्ञान बांट रहा हो, जो अस्पतालों में लोगों की जान बचा रहा हो, उसका आखिर गुनाह क्या था? उनका सिर्फ एक “गुनाह” था- उनकी पहचान और उनकी शांति!

वे कश्मीर घाटी के उस सांस्कृतिक और बौद्धिक ढांचे की रीढ़ थे, जिसे तोड़ना उन लोगों के लिए बहुत ज़रूरी था जो कश्मीर को एक खास समुदाय के रंग में रंगना चाहते थे।

जो लोग आज ‘ब्राह्मणवाद’ को अत्याचारी कहते हैं, उन्हें कश्मीर का वो टीचर और डॉक्टर क्यों नहीं दिखता, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ दूसरों को पढ़ाने और बचाने में लगा दी?

जब मस्जिदों से गूंजे खौफनाक फरमान और कलम पकड़ने वाले हाथों को खंजरों से लहूलुहान कर दिया गया

अब आते हैं उस खौफनाक सच पर जिसे अक्सर बड़ी चालाकी से गायब कर दिया जाता है। जनवरी 1990 की उन ठंडी रातों को याद कीजिए।

क्या दुनिया के किसी भी तथाकथित ‘ब्राह्मणवादी’ समाज ने कभी लाउडस्पीकर लगाकर किसी दूसरे समाज को रातों-रात अपना घर छोड़ने की धमकी दी है? नहीं ना!

लेकिन कश्मीर के इन ब्राह्मणों ने यह भुगता है।

घाटी की मस्जिदों से खुलेआम वो खौफनाक ऐलान गूंज रहे थे- “रालिव, त्सालिव या गालिव”। मतलब या तो अपना धर्म बदल कर हमारे साथ मिल जाओ, या अपनी औरतों को यहीं छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ, या फिर मरने के लिए तैयार रहो।

अगर कश्मीर में ब्राह्मणों का इतना ही दबदबा था, अगर ‘ब्राह्मणवाद’ वहां का शासक था, तो वे अपने ही घरों में चूहे की तरह छिपने को क्यों मजबूर हो गए?

कश्मीरी पंडितों के इस नरसंहार में जो टारगेट किलिंग्स (Target Killings) हुईं, उनके नाम और उनका प्रोफाइल आपको अंदर तक झकझोर देगा। मारा किसे गया?

टीका लाल टपलू- जो एक बेहद लोकप्रिय वकील और समाजसेवी थे, जो बिना धर्म पूछे गरीबों के केस लड़ा करते थे। उन्हें सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया गया।

नीलकंठ गंजू- एक सम्मानीय सेशन जज, जिन्हें दिन-दहाड़े बाज़ार में मार गिराया गया।

लस्सा कौल- जो दूरदर्शन केंद्र के डायरेक्टर थे, उन्हें उनके ही घर के दरवाज़े पर मौत के घाट उतार दिया गया।

सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’- जो कश्मीर के एक बहुत बड़े और सम्मानित कवि थे, उन्हें और उनके युवा बेटे को घर से अगवा किया गया और उनके माथे पर कीलें ठोक कर उन्हें क्रूरता से मार डाला गया।

और गिरिजा टिक्कू का नाम तो शायद कोई भूल ही नहीं सकता- एक साधारण सी स्कूल टीचर, जिनके साथ चलती बस में जो हैवानियत हुई और फिर उन्हें आरी से जिस तरह चीरा गया, वो सोचकर भी इंसान की रूह कांप जाती है।

क्या ये लोग ज़ालिम थे? क्या ये किसी का शोषण कर रहे थे? नहीं! इन लोगों को इसलिए चुना गया क्योंकि ये समाज का बौद्धिक (Intellectual) वर्ग थे।

ये समाज की आवाज़ थे। जब आप किसी समाज के वकीलों, जजों, कवियों, पत्रकारों और शिक्षकों को चुन-चुन कर मारते हैं, तो आप उस पूरी सभ्यता की रीढ़ की हड्डी तोड़ देते हैं।

कलम पकड़ने वाले उन हाथों को जानबूझकर लहूलुहान किया गया ताकि कश्मीर घाटी से शांति, शिक्षा और सनातन की आवाज़ हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाए।

अगर ब्राह्मण होना सच में इतना बड़ा विशेषाधिकार है तो अपने ही देश में तंबुओं के नीचे क्यों दम तोड़ गए लाखों कश्मीरी पंडित

आजकल एक और शब्द बहुत फैशन में है- ‘विशेषाधिकार’ यानी प्रिविलेज (Privilege)। जो लोग दिन-रात पानी पी पी कर नैरेटिव गढ़ते हैं, उनका कहना है की इस देश में ब्राह्मण होना अपने आप में सबसे बड़ा ‘प्रिविलेज’ है।

ज़रा इन ज्ञान बांटने वालों से कोई यह पूछे की अगर कश्मीर के इन ब्राह्मणों के पास सच में इतना ही बड़ा विशेषाधिकार था, तो रातों-रात 7 लाख लोग अपने ही देश में, अपनी ही ज़मीन पर ‘रिफ्यूजी’ (Refugee) कैसे बन गए?

अपना पुश्तैनी घर, अपने सेब और अखरोट के बागान, अपनी ज़िंदगी भर की जमा-पूंजी और अपनी पहचान… सब कुछ पीछे छोड़कर रातों-रात जान बचाकर भागना… क्या दुनिया की किसी डिक्शनरी में इसे ‘विशेषाधिकार’ कहा जाता है?

जब ये कश्मीरी पंडित अपनी जान बचाकर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचे, तो वहां उनके स्वागत के लिए कोई लाल कालीन नहीं बिछा था।

उन्हें मिले थे मुट्ठी (Muthi) कैंप और जगती (Jagti) के फटे हुए टेंट। जो लोग कश्मीर की बर्फीली और ठंडी वादियों में पले-बढ़े थे, उन्हें जम्मू की 45 डिग्री वाली झुलसा देने वाली गर्मी में कैनवास के गर्म तंबुओं के नीचे धकेल दिया गया।

इन कैंपों की हकीकत ऐसी थी जिसे सुनकर किसी भी पत्थरदिल इंसान की आंखें छलक आएं। उन बदबूदार और घुटन भरे तंबुओं में कोई सुविधा नहीं थी।

सांपों और बिच्छुओं के काटने से, सनस्ट्रोक (लू लगने) से और भयानक बीमारियों से सैकड़ों कश्मीरी पंडितों ने तड़प-तड़प कर उन कैंपों में दम तोड़ दिया।

जो लोग कल तक कश्मीर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे, वे राशन की लाइन में खड़े होने को मजबूर हो गए। डिप्रेशन का आलम ये था की 30-40 साल के जवान लोग रातों-रात बूढ़े दिखने लगे।

हार्ट अटैक और ब्रेन हैमरेज से न जाने कितने घरों के चिराग बुझ गए।

अगर ब्राह्मणवाद एक शोषक व्यवस्था थी, तो ये लोग शोषित क्यों बन गए? सच्चाई तो ये है साहब, की इनका विशेषाधिकार इनकी जाति नहीं, बल्कि इनकी वो मेहनत और शिक्षा थी जिसे जिहाद की आग में जलाकर राख कर दिया गया।

और आज तक किसी तथाकथित मानवाधिकार संगठन ने इन तंबुओं में मरे हुए लोगों की गिनती तक करने की ज़हमत नहीं उठाई।

36 साल का वनवास और सिस्टम की नाकामी, क्या आज भी घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ बदला है

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का वनवास भी 14 साल में खत्म हो गया था, लेकिन अपने ही देश में निर्वासित इन कश्मीरी पंडितों का वनवास 36 साल बाद, आज 2026 में भी जारी है।

इन 36 सालों में क्या नहीं बदला? देश बदला, दुनिया बदली, दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक न जाने कितनी सरकारें आईं और गईं। सबने बड़े-बड़े वादे किए। सबने कहा की हम कश्मीरी पंडितों को ससम्मान वापस बसाएंगे।

इसी बीच ‘पीएम पैकेज’ (PM Package) के नाम पर एक योजना आई। कुछ हज़ार कश्मीरी पंडित युवाओं को सरकारी नौकरियां देकर वापस घाटी में भेजा गया।

लगा की शायद अब उम्मीद की कोई किरण जगेगी। शायद अब 36 साल बाद घाटी की हवा बदल गई होगी। लेकिन हकीकत क्या है?

हकीकत वो राहुल भट है, जिसे चडूर तहसील ऑफिस में, उसकी कुर्सी पर बैठे-बैठे दिन-दहाड़े गोलियों से भून दिया गया।

हकीकत वो पूरण कृष्ण भट है, जिसे उसके घर के बाहर मार दिया गया। हकीकत वो संजय शर्मा है, जो बैंक में एक साधारण सा गार्ड था, और जिसे सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि उसका नाम संजय था।

आज 36 साल बाद भी घाटी में एक कश्मीरी पंडित का नाम पूछकर, उसका आई-कार्ड देखकर उसे सरेआम मौत के घाट उतारने की धमकी दी जाती है।

और हमारा सिस्टम क्या कर रहा है? हमारा सिस्टम उन डरे-सहमे कर्मचारियों को पुख्ता सुरक्षा देने के बजाय, उनकी चिंताओं को समझने के बजाय, सिर्फ फरमान जारी कर देता है की “समाज में अशांति फ़ैलाने वालों पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी”।

आप उन्हें वापस उसी मौत के कुएं में बिना किसी सुरक्षा कवच के धकेल रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं की सब ‘नॉर्मल’ रहे।

घाटी में आज भी जो मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित बचे हैं, वे खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं, लेकिन हमारे विमर्शकारों को इसमें कोई ‘अन्याय’ नज़र नहीं आता।

कश्मीर से ब्राह्मणवाद नहीं बल्कि ब्राह्मणों का ही वजूद मिटा दिया गया और सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है की हम सब भूल गए

वो कहते हैं ना की जब आप किसी झूठ को सौ बार चिल्लाकर बोलते हैं, तो लोगों को वो सच लगने लगता है।

नैरेटिव गढ़ने वालों ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा था की उन्हें समाज से ‘ब्राह्मणवाद’ को मिटाना है, क्योंकि यही सारी असमानता की जड़ है।

लेकिन कश्मीर चीख-चीख कर कुछ और ही गवाही दे रहा है। वहां से ब्राह्मणवाद तो क्या मिटता साहब, वहां से तो ब्राह्मणों का ही समूल नाश कर दिया गया।

उनका वजूद, उनका इतिहास, उनकी संस्कृति, सब कुछ हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया गया।

और इस पूरी त्रासदी का सबसे खौफनाक और शर्मनाक पहलू क्या है, जानते हैं? वो पहलू ये है की आज देश का एक बहुत बड़ा तबका इस दर्द को भूल चुका है।

हमने मान लिया है की जो हुआ, सो हुआ। जब दुनिया के किसी दूर-दराज़ देश में किसी के साथ कोई अन्याय होता है, तो हमारे देश के ये बड़े-बड़े बुद्धिजीवी सड़कों पर तख्तियां लेकर उतर आते हैं, सोशल मीडिया पर ब्लैक-आउट कर देते हैं।

लेकिन अपने ही देश में, अपनी ही मिट्टी पर 36 साल से न्याय के लिए दर-दर भटक रहे इन 7 लाख कश्मीरी पंडितों पर इनकी कलम की स्याही अचानक सूख जाती है।

यह मौन, यह खामोशी एक बहुत ही सोची-समझी वैचारिक बेईमानी है। जब तक आप पीड़ित का दर्द उसकी जाति, उसका धर्म या उसकी विचारधारा देखकर तय करेंगे, तब तक आप न्याय की बात करने के लायक ही नहीं हैं।

अंत में बस एक ही जवाब जेहन में गूंजता है- जब तक इस देश का वामपंथी इकोसिस्टम, इस देश का विपक्षी समाज इस 36 साल पुराने घिनौने अन्याय को स्वीकार करके, इन लोगों के न्याय की बात नहीं करता…

तब तक ‘सामाजिक न्याय’ पर लिखी गयी आपकी सारी भारी भरकम किताबें, आपकी सारी डिग्रियां और आपके वो महंगे सेमिनार महज़ एक पाखंड से ज़्यादा कुछ नहीं हैं।

कश्मीर के पंडितों का बहा हुआ वो खून और उनके छिने हुए वो घर हमेशा इन तथाकथित बुद्धिजीवियों से सवाल पूछते रहेंगे की- “क्या सिर्फ ब्राह्मण होना हमारा सबसे बड़ा गुनाह था?”

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