बागपत बन रहा पाकिस्तान? दलित प्रोफेसर की मुस्लिम ससुरालियों ने पीट-पीटकर की हत्या, सारे राजनीति दल के नेता चुप

गाज़ियाबाद के बाहरी इलाके में गेहूं का एक खेत है, जिसे एक नौजवान अपनी ज़िंदगी में शायद ही कभी भूल पाए। 30 मार्च 2026 की उस अंधेरी रात में, वह लंबी-लंबी फसलों के बीच छिपा कांप रहा था। बस कुछ ही मीटर की दूरी पर उसके भाई का बेरहमी से कत्ल किया जा रहा था, और वह बेबस होकर वो खौफनाक आवाज़ें सुन रहा था। न वो चीख सकता था, न ही लड़ सकता था।

उसे तो बस किसी तरह ज़िंदा बचना था, ताकि एक दिन दुनिया को ये पता चल सके की नितिन कुमार- एक दलित हिंदू, एक प्रोफेसर, एक पति, एक बेटे- के साथ आखिर क्या हुआ था… और उसके कातिल कौन थे।

बागपत के प्राइवेट कॉलेजों में केमिस्ट्री पढ़ाने वाले और गाज़ियाबाद (यूपी) के लोनी इलाके के गीतांजलि विहार में रहने वाले नितिन कुमार जयंत ने ऐसा कुछ कर दिया था, जिसकी सज़ा कुछ लोगों की नज़रों में सिर्फ मौत थी- उसे मुस्कान अली नाम की एक मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया था। 

क़त्ल की उस मनहूस रात से करीब एक साल पहले, दोनों ने शादी कर ली थी- पूरी तरह कानूनी, अपनी मर्ज़ी से और मुस्कान की रज़ामंदी से। उसने मुस्कान के साथ अपनी एक अलग ही दुनिया बसाई थी। और बस इसी की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

सुलह-समझौते के बहाने उसे मुस्कान के घरवालों ने धोखे से बुलाया गया, करीब सात लोगों ने उसे घेरा, बुरी तरह पीटा, और फिर खुद उसके ससुर के भाई ने अपने हाथों से उसका गला घोंट दिया। हत्या को सड़क हादसा दिखाने के लिए उसकी लाश के ऊपर से गाड़ी भी चढ़ा दी गई।

नितिन को उन मुस्लिमों की धार्मिक कट्टरता ने मारा जो अपनी बेटी या बहन के लिए एक हिंदू दलित लड़का बर्दाश्त ही नहीं कर सके। एक सोची-समझी, ठंडे दिमाग से रची गई साज़िश के तहत उसे मारा गया। और मारने के बाद उसकी लाश को बेरहमी से कुचला गया, ताकि गला घोंटने वाले उन कातिल हाथों के निशान हमेशा के लिए मिटाए जा सकें।

ये सिर्फ नितिन कुमार की कहानी नहीं है। ये कहानी है उन तमाम दलित नेताओं, राजनेताओं और प्राइम-टाइम टीवी एंकरों की भी, जिन्होंने इस केस को देखा और फिर खामोश रहने का फैसला किया। क्योंकि आज के भारत में मुस्लिमों की हरकतों पे सब चुप्पी साध लेते हैं। उन्हें कुछ भी करने की पूरी छूट इन्ही राजनेताओं और मीडिया वालों ने दी हुई है।

शिक्षा से ऊपर उठा एक दलित हिंदू युवा जिसे मुस्लिमों की मज़हबी कट्टरता ने मार डाला

गाज़ियाबाद की उस रात में हमने क्या खो दिया, ये समझने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है कि नितिन कुमार आखिर था कौन।

नितिन एक दलित हिंदू था। उसने साइंस की पढ़ाई की, कॉलेज में केमिस्ट्री पढ़ाने के लायक डिग्रियां हासिल कीं, और बागपत के कॉलेजों में लेक्चरर की नौकरी पाई। पश्चिमी यूपी के एक दलित परिवार से आने वाले किसी भी युवा के लिए ये कोई छोटी-मोटी अचीवमेंट नहीं थी।

वो गाज़ियाबाद के लोनी स्थित गीतांजलि विहार में अपने परिवार के साथ रहता था। न तो वो कोई रईस आदमी था, और न ही उसकी कोई तगड़ी राजनीतिक पहुंच थी। वो तो बस एक वर्किंग प्रोफेशनल था- एक टीचर।

फिर नितिन की मुलाकात मुस्कान अली से हुई, और दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया। मुस्कान उसी कॉलेज के माहौल से जुड़ी एक स्टूडेंट थी जहाँ नितिन पढ़ाता था। उनकी लव मैरिज थी- बिल्कुल वैसी ही शादी, जिसकी हिफाज़त की गारंटी हमारे देश का संविधान और उसका सेक्युलर ढांचा देता है। उनकी शादी आर्य समाज मंदिर में पूरे हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी।

दोनों ने अपनी मर्ज़ी से साथ जीने का फैसला किया था, लेकिन मुस्लिम लड़की के घरवालों ने इसे कभी नहीं अपनाया। उनके बयानों और रिपोर्टों से एक ही बात बार-बार सामने आई: नितिन एक हिंदू था, और ऊपर से दलित। उनकी नजरों में यही वो “अपवित्रता” थी जिसके चलते ये शादी उन्हें पहले दिन से ही खटक रही थी।

सुलह का धोखा और मुस्लिम ससुर के हाथों गला घोंटे जाने की वो खौफनाक साज़िश

नितिन और मुस्कान की शादीशुदा ज़िंदगी में पिछले कुछ समय से थोड़ी खटपट चल रही थी। घटना से कुछ दिन पहले ही सुबह जल्दी उठने जैसी छोटी सी बात पर नितिन और मुस्कान का झगड़ा हो गया और गुस्से में मुस्कान अपने मायके चली गई।

इसके बाद जो हुआ, वो कोई सुलह नहीं, बल्कि एक खौफनाक साजिश थी। 30 मार्च 2026 को मुस्कान के पिता मेहरुद्दीन और चाचा आसिफ अली ने नितिन और उसके बड़े भाई अमित कुमार को बातचीत कर मामला सुलझाने के बहाने बुलाया। उन दोनों को लगा कि चलो, बैठकर बात हो जाएगी, और वो उनके साथ चले गए।

लेकिन वहां कोई सुलह उनका इंतज़ार नहीं कर रही थी। उनका इंतज़ार कर रहे थे करीब सात लोग- जिनमें मुस्कान का पिता मेहरदीन और उसका चाचा आसिफ अली शामिल थे। जैसे ही ये दोनों भाई वहां पहुंचे, उन दरिंदों ने उन पर सीधा धावा बोल दिया।

नितिन के भाई ने उस हमले की जो खौफनाक कहानी बताई है, वो रोंगटे खड़े कर देती है। जब कुछ लोगों ने नितिन को ज़मीन पर पटक कर दबाया और उसके भाई को जकड़ लिया, तब आसिफ अली- मुस्कान का चाचा- नितिन की छाती पर चढ़ बैठा और अपने ही हाथों से उसका गला घोंट दिया। कोई हथियार नहीं इस्तेमाल किया। सिर्फ अपने हाथ।

उस अफरातफरी में नितिन का भाई किसी तरह खुद को छुड़ाकर भाग निकला। वो दौड़ा और पास के ही गेहूं के एक खेत में जाकर छिप गया। वहां वो अपनी सांसें रोके तब तक पड़ा रहा जब तक उसके भाई को मार नहीं दिया गया। वो तो बच गया। लेकिन हमलावरों ने अपने प्लान का दूसरा हिस्सा शुरू किया। 

उन्होंने नितिन की लाश पर गाड़ी चढ़ा दी। ये कोई घबराहट में हुआ हादसा नहीं था। गला घोंटकर की गई हत्या को ‘हिट-एंड-रन’ का मामला दिखाने की एक सोची-समझी चाल थी, ताकि पुलिस को भटकाया जा सके और नितिन के गले पर छपे जुर्म के निशानों को हमेशा के लिए मिटाया जा सके।

बाद में पुलिस ने मुस्कान के पिता मेहरदीन और कम से कम एक और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। ये गिरफ्तारियां बताती हैं की पुलिस ने एक्शन तो लिया, और जहां तारीफ बनती है वहां की जानी चाहिए। लेकिन महज़ गिरफ्तारी तो इंसाफ की सिर्फ एक शुरुआत भर है।

बड़ा सवाल ये है की क्या नितिन के परिवार को कभी इन लोगों को कड़ी सज़ा मिलते हुए देखने का मौका मिलेगा? क्या अदालतें तेज़ी से फैसला सुनाएंगी? क्या ये पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम इस केस को बिना किसी दबाव के चलने देगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब अभी किसी के पास नहीं हैं।

एक दलित हिंदू मां और बहन की चीखें जिन्हें आज का पूरा सिस्टम जानबूझकर अनसुना कर रहा है

जब राजनेता अपने वोटों का हिसाब-किताब लगा रहे हैं और टीवी स्टूडियो ये तय कर रहे हैं की किस मर्डर पर प्राइम-टाइम शो करना है, तब नितिन की मां और बहन उस गहरे सदमे में हैं जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने अपने जवान बच्चे को ऐसी बेमतलब की हिंसा में खोया हो।

वो कोई राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं कर रहीं। न ही उन्हें कोई कैंडल मार्च निकालना है। वो तो बस एक बहुत ही सीधी सी चीज़ मांग रही हैं, जो इस देश में मिलना सबसे मुश्किल है: इंसाफ।

नितिन की मां और बहन ने पब्लिकली आरोपियों के लिए सबसे कड़ी सज़ा की मांग की है- एनकाउंटर, या फिर फांसी। जो लोग उनकी इन मांगों को ‘एक्सट्रीम’ कहकर खारिज कर देते हैं, उनसे एक सवाल पूछना चाहिए: एक मां आखिर और क्या कहे जब उसके पढ़े-लिखे, शरीफ और नौकरीपेशा बेटे को धोखे से बुलाकर उसका गला घोंट दिया जाए और फिर उसकी लाश को गाड़ी से कुचल दिया जाए? 

एक बहन आखिर किस भाषा में बात करे जब सिस्टम ने उसे ये भरोसा ही नहीं दिलाया की वो उसके लिए कुछ करेगा? भारत में हिंदू दलित परिवारों ने एक के बाद एक केस को चुपचाप दफन होते, सेटल होते और भुलाए जाते देखा है।

ऐसे में फांसी की मांग कानून हाथ में लेना नहीं है। ये उन लोगों की आवाज़ है जो अपने कड़वे तजुर्बों से जान चुके हैं की बिना भारी दबाव बनाए, इस देश में आम आदमी को इंसाफ नहीं मिलता।

मुस्कान की छोटी बहन- यानी पीड़ित की साली- ने भी अपनी बात रखी है, और उसकी गवाही इस पूरे केस का सबसे अहम सबूत है। उसने साफ-साफ बताया है की उसका परिवार इस शादी के खिलाफ इसलिए था क्योंकि नितिन एक ‘हिंदू दलित’ था।

उसने कहा की घरवालों ने मुस्कान पर बार-बार अपनी ही बिरादरी में शादी करने का दबाव डाला, लेकिन मुस्कान ने साफ़ इनकार कर दिया और हत्या से करीब एक साल पहले नितिन के साथ रहने के लिए अपना घर छोड़ दिया।

ये गवाही कत्ल के पीछे की किसी भी और कहानी की धज्जियां उड़ा देती है। ये कोई ज़मीन का विवाद नहीं था। न ही कोई पैसों का लेन-देन था। ये महज़ धर्म और जाति के अहंकार से भरी नफरत थी, जिसे खुद आरोपियों के परिवार की एक सदस्य ने सच साबित कर दिया।

और खुद मुस्कान का क्या? वो लड़की जिसने अपने ही मां-बाप के खिलाफ जाकर अपने पति को चुना, जिसने उसके लिए सब कुछ छोड़ दिया – वो आज इस कम उम्र में विधवा हो चुकी है। अपनों को खोने का दुख और एक अजीब सा गिल्ट, वो किस कदर इस बोझ को ढो रही होगी। इंसाफ की हक़दार वो भी है। जिन लोगों ने उससे प्यार करने का झूठा नाटक किया, असल में उन्होंने उसी की ज़िंदगी तबाह कर दी।

मुस्लिम लड़की और दलित लड़के का प्यार जिसे झूठी शान और मज़हबी नफरत ने कुचल दिया

बहुत से लोग ऐसे होंगे जो इस केस को उसका असली नाम देने से कतराएंगे। वो इसे ‘पारिवारिक विवाद’ या ‘पर्सनल मामला’ कहकर टालना चाहेंगे। वो हर मुमकिन गोलमोल शब्दों का इस्तेमाल करेंगे ताकि उस सच से बचा जा सके जो सबूतों, कबूलनामों और चश्मदीदों के बयानों से शीशे की तरह साफ है: नितिन कुमार का कत्ल एक ‘ऑनर किलिंग’ थी, जिसकी असली वजह थी धार्मिक कट्टरता।

कानून और समाजशास्त्र की भाषा में ‘ऑनर किलिंग’ का मतलब होता है किसी अपने ही परिवार के सदस्य की हत्या करना – सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है की उसके किसी फैसले (अक्सर शादी या प्यार) से परिवार की ‘इज़्ज़त’ मिट्टी में मिल गई है।

इस केस को जो बात सबसे ज्यादा भयानक बनाती है, वो ये है की आरोपियों ने खुद अपना जुर्म और उसकी वजह कबूल की: की एक दलित हिंदू लड़के से मुस्कान की शादी ने उनके मुस्लिम समाज में उनकी ‘बेइज़्ज़ती’ कर दी थी। ये कोई आपसी रंजिश नहीं थी। न ही कोई जुर्म था। ये सिर्फ ‘बेइज़्ज़ती’ थी। समाज में होने वाली शर्मिंदगी। उनकी नज़र में, एक आज़ाद मुस्लिम लड़की का अपनी मर्ज़ी से एक हिंदू पति चुनना एक ऐसा गुनाह है जिसकी कीमत सिर्फ खून से चुकाई जा सकती है।

और ज़रा सोचिए की नितिन था कौन। वो सिर्फ हिंदू नहीं था- वो एक दलित हिंदू था। उन कातिलों के दिमाग में उसके ऊपर दो ‘कलंक’ लगे थे: उसका धर्म और उसकी जाति। वो उनके लिए दोगुना अस्वीकार्य था। उनकी सड़ी हुई मानसिकता में, वो इंसान कहलाने लायक ही नहीं था।

हमारे देश की जिस प्रगतिशील राजनीति का पूरा ढांचा दलित-मुस्लिम एकता के नाम पर खड़ा है, आज वही ढांचा धड़ाम से गिर पड़ा है। जब एक मुस्लिम लड़की से प्यार करने के ‘जुर्म’ में कुछ मुस्लिम लोग एक दलित हिंदू का कत्ल कर देते हैं, तो वो सारी ‘एकता’ और भाईचारा गहरी चुप्पी में बदल जाता है।

अब खुद से एक सीधा सा सवाल पूछिए: अगर यही कहानी उल्टी होती – अगर किसी मुस्लिम लड़के ने हिंदू लड़की से शादी की होती और लड़की के सवर्ण हिंदू घरवालों ने उसे मार डाला होता – तो आज क्या माहौल होता? इसका जवाब देने के लिए किसी को बहुत दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं है; हम सबने ऐसे नज़ारे देखे हैं। 

हर बड़े इंग्लिश न्यूज़ चैनल पर प्राइम-टाइम में डिबेट्स चल रही होतीं। संसद में विपक्ष के नेता बड़े-बड़े बयान दे रहे होते। इंटरनेशनल मीडिया में हेडलाइंस छप जातीं। नए और कड़े कानून बनाने की मांग उठने लगती। लेकिन नितिन कुमार के मर्डर पर? इंग्लिश मीडिया में कोई कवरेज नहीं दिखा, प्राइम-टाइम पर सन्नाटा पसरा रहा, और सबसे ज़्यादा डराने वाली खामोशी तो उन राजनेताओं की तरफ से आई जो दिन-रात उसी जैसे लोगों की आवाज़ होने का दम भरते हैं।

पश्चिमी यूपी का दलित गढ़ जहां एक हिंदू की हत्या पर पूरा सियासी तंत्र गूंगा बन जाता है

बागपत और गाज़ियाबाद देश के कोई पिछड़े या भूले-बिसरे इलाके नहीं हैं। ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आते हैं, जो भारत के सबसे बड़े सूबे का सबसे हॉट सियासी मैदान है। इस पूरी बेल्ट में दलितों की एक बड़ी आबादी है और इतिहास गवाह है की यहां जातिगत तनाव, सामाजिक संघर्ष और राजनीतिक गोलबंदी का दौर हमेशा गरम रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो ये उत्तर भारत में दलित राजनीति का दिल है।

लेकिन ताज्जुब देखिए, इसी गढ़ में- उन पार्टियों की नाक के नीचे जिन्होंने अपनी पूरी पहचान ही दलितों के हक, उनके सम्मान और उनकी सुरक्षा के नाम पर बनाई है- नितिन कुमार को मार डाला गया। उसे उन मुस्लिमों ने मारा जिनका खुद का कबूलनामा है की एक दलित आदमी ने उनके समाज की लड़की से शादी करने की जुर्रत कैसे की।

इस इलाके ने पहले भी ऐसी कई घटनाएं देखी हैं। जब कोई हिंदू लड़का- खासकर दलित या ओबीसी हिंदू- किसी मुस्लिम लड़की से प्यार करता है या शादी करता है, तो लड़की के घरवालों की तरफ से उसे जानलेवा हिंसा का शिकार होना पड़ता है। ये पैटर्न इस बेल्ट के लिए नया नहीं है। बस फर्क इतना है की इन मामलों को वो राजनीतिक और मीडिया कवरेज कभी नहीं मिलता, जिसके ये हकदार हैं।

हिंदी के लोकल अखबारों में खबरें छपती हैं, गली-मुहल्लों में चर्चा होती है, और फिर ये ‘असुविधाजनक सच’ एक गहरी खामोशी में दफन हो जाते हैं। हर बार पीड़ित परिवार को अपनी लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती है। हर बार राजनीतिक इकोसिस्टम आंखें मूंद लेने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेता है। नितिन कुमार पहला नहीं है। और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो यकीनन वो आखिरी भी नहीं होगा।

मुस्लिम लड़कियों से प्यार करने वाले दलित और पिछड़े हिंदुओं की हत्याओं का एक पूरा खूनी पैटर्न

नितिन कुमार का मर्डर कोई इकलौती घटना नहीं है। हिंदू लड़कों – खास तौर पर दलित और ओबीसी के खिलाफ होने वाली हिंसा का एक पूरा दस्तावेज़ी इतिहास और बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न मौजूद है, जो तब सामने आता है जब वो किसी मुस्लिम लड़की से प्यार या शादी कर लेते हैं। मेरठ से लेकर हैदराबाद तक, और कर्नाटक से लेकर बिहार तक, एक के बाद एक वेरीफाइड केसेस यही कहानी दोहराते हैं।

लखनऊ में एक दलित हिंदू लड़के को उसके मुस्लिम साले ने घर से भागकर शादी करने के नौ साल बाद तब चापड़ से काट डाला, जब उसने उसे ढूंढ निकाला। मेरठ में एक दलित हिंदू युवा और उसकी मुस्लिम गर्लफ्रेंड का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया।

हैदराबाद में दिनदहाड़े एक 25 साल के दलित हिंदू लड़के को उसके साले ने सड़क पर बीचों-बीच मार डाला, जब वो अपनी पत्नी के साथ बाइक पर जा रहा था। 

कर्नाटक में, दलित हिंदू नागराज और मुस्लिम लड़की रेशमा बानो को रेशमा के ही घरवालों ने पीट-पीटकर मार डाला। और खुद बागपत में ही- उसी ज़िले में- जुलाई 2025 में सानिया नाम की एक 18 साल की मुस्लिम लड़की का उसके अपने ही रिश्तेदारों ने गला घोंट दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो सागर नाम के एक दलित हिंदू लड़के से प्यार करती थी।

इन सभी केसेस में एक चीज़ बिल्कुल कॉमन है: कत्ल की वजह कोई आपसी दुश्मनी नहीं है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम शादियों के खिलाफ एक कट्टटर वैचारिक और सामुदायिक विरोध है, खासकर तब जब लड़का दलित हिंदू हो। ये हिंसा अचानक नहीं भड़कती; ये पूरी तरह टार्गेटेड होती है। कई मामलों में तो इसे पूरी कम्युनिटी का मूक समर्थन हासिल होता है। 

और चूंकि हर मामले को अलग-अलग “छुटपुट घटना” बताकर रफा-दफा कर दिया जाता है- क्योंकि इन डॉट्स को जोड़ने से किसी भी राजनीतिक दल को वोट नहीं मिलने वाले- इसलिए इस पूरे पैटर्न को कभी वो नहीं कहा जाता जो ये असल में है- मुस्लिमों की नीच मानसिकता की बीमारी.. जिसका इलाज पूरे सिस्टम को मिलकर करना होगा।

मुस्लिम वोट बैंक के डर से बिलों में छिप गए बड़े-बड़े दलित नेता और बाबासाहेब के नाम पर धोखा

भीमराव रामजी अंबेडकर- हमारे बाबासाहेब- ने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ दलित हिन्दुओ को कानूनी बराबरी दिलाने में नहीं खपाई थी। उनकी लड़ाई इससे कहीं गहरी थी: वो ये जताना चाहते थे की एक दलित हिंदू की जान की कीमत भी किसी भी दूसरे इंसान जितनी ही है।

उन्होंने इसलिए संघर्ष किया ताकि एक दलित हिंदू सिर उठाकर चल सके, जिससे चाहे प्यार कर सके, इज़्ज़त की रोटी कमा सके, और अगर उसके साथ कुछ गलत हो, तो भारत का पूरा गणराज्य उसके साथ खड़ा हो। 

लेकिन आज? आज जो राजनीतिक पार्टियां बाबासाहेब की तस्वीर पर राजनीति करती हैं- जो हर होर्डिंग पर उनकी फोटो लगाती हैं, हर भाषण में उनका नाम जपती हैं, और खुद को दलित हिन्दुओं का इकलौता ठेकेदार बताती हैं- उन्होंने नितिन कुमार के मर्डर पर पूरी तरह से एक सधी हुई, कैलकुलेटेड चुप्पी साध रखी है।

बहुजन समाज पार्टी और उसकी सुप्रीमो मायावती ने (यह लेख लिखे जाने तक) नितिन कुमार की हत्या पर एक भी बयान जारी नहीं किया है। ये वही मायावती हैं जो चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, जिन्होंने दलित सुरक्षा के वादे पर अपना पूरा राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया, और जो किसी दलित पर अत्याचार होने पर बोलने का कोई मौका नहीं छोड़तीं- बशर्ते आरोपी उनके ‘खास’ राजनीतिक ढांचे में फिट बैठता हो। 

जब कातिल उस समाज से आते हों जिनका वोट बैंक उन्हें चाहिए, तो उनकी पूरी आउटरेज मशीनरी का स्विच ही ऑफ हो जाता है। उनकी इस ‘सुविधाजनक राजनीति’ का सच कोई नया नहीं है; ये वो पुराना पैटर्न है जिसे खुद उनके सपोर्टर भी अंदर-ही-अंदर मानते हैं।

और बाकी वो तमाम लोग जो खुद को दलितों की आवाज़ बताते हैं- एक्टिविस्ट, बुद्धिजीवी, सिविल सोसाइटी के लोग- सब के सब गायब हैं। ये वही लोग हैं जो किसी सवर्ण हिंदू के हाथों मुस्लिमों के पिटने पर तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डालते हैं, लंबे-लंबे आर्टिकल छाप देते हैं, और इंटरनेशनल लेवल पर हंगामा खड़ा करके राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से तुरंत दखल की मांग करते हैं। लेकिन नितिन कुमार के लिए? उनके मुंह में जैसे दही जम गया है।

ऐसा क्यों? क्योंकि आज के भारत में दलित हिंदू राजनीति अब इंसाफ की नहीं, सिर्फ वोट बटोरने की मशीन बन गई है। दलित वोटर को बस एक ऐसा ‘कैप्टिव’ (बंधुआ) वोट बैंक मान लिया गया है जिसका इस्तेमाल सिर्फ बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया जाना है।

उसे एक ऐसा इंसान नहीं माना जाता जिसके दुख-दर्द पर बिना ये देखे आवाज़ उठाई जाए की आखिर जुर्म करने वाला कौन है। बाबासाहेब की विरासत के साथ ये सबसे बड़ा धोखा है- की जो लोग उनका नाम सबसे ज़ोर-शोर से उछालते हैं, उन्होंने उनके पूरे जीवन के संघर्ष को बस एक चुनावी गणित में समेट कर रख दिया है। और नितिन कुमार की मौत इसी गणित की कीमत है।

मुस्लिम कातिलों को बचाने के लिए भाईचारे का नाटक करने वाले विपक्ष का सबसे घटिया पाखंड

पिछले कुछ सालों में, इंडियन नेशनल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने दलित सुरक्षा और सामाजिक न्याय के नाम पर भारी-भरकम शब्दों का एक बड़ा जाल बुना है। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को सीधे तौर पर नफरत के खिलाफ और हर उस हिंदुस्तानी के सम्मान की यात्रा बताया गया जो हाशिए पर है – चाहे उसकी जाति या धर्म कुछ भी हो।

खिलेश यादव की समाजवादी पार्टी तो ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के वादे पर ही अपना पूरा चुनावी कैंपेन चलाती है, जो कथित तौर पर इन्हीं वर्गों के हितों को बचाने का गठजोड़ है।

लेकिन इन पार्टियों ने नितिन कुमार के लिए इंसाफ की मांग करते हुए कोई भी ढंग का बयान जारी नहीं किया। उन्होंने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बुलाई। किसी फास्ट-ट्रैक कोर्ट की मांग नहीं की। उन्होंने ये तक नहीं कहा की आरोपियों पर SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट लगाया जाए। नितिन के परिवार से मिलने कोई नहीं गया। उनके सोशल मीडिया पर कहीं नितिन का चेहरा नज़र नहीं आता।

इसके पीछे की वजह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इसके लिए किसी भारी राजनीतिक विश्लेषण की ज़रूरत नहीं है। ये भारतीय राजनीति का सबसे सीधा और क्रूर गणित है: मुस्लिम वोट बैंक। पश्चिमी यूपी में- गाज़ियाबाद, बागपत, मेरठ में- मुस्लिम वोटर एक बहुत बड़ा और संगठित तबका है। समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियां, जिनकी राजनीतिक ज़मीन ही मुस्लिम वोटों के एकमुश्त ध्रुवीकरण पर टिकी है, वो एक हिंदू दलित की हत्या करने वाले मुस्लिम आरोपियों की खुलेआम निंदा करने का रिस्क नहीं ले सकतीं। 

उन्हें डर है की ऐसा करने से एक ऐसा समुदाय उनसे छिटक जाएगा जो थोक में वोट देता है। इसलिए वो चुप रहते हैं। वो नितिन कुमार की मां को अकेले रोने के लिए छोड़ देते हैं। वो उसकी बहन को कैमरे पर एनकाउंटर की गुहार लगाने के लिए छोड़ देते हैं, जबकि वो खुद कमरे में बैठकर दलित अधिकारों पर अपना अगला झूठा नैरेटिव गढ़ने में बिज़ी रहते हैं।

भारतीय विपक्ष की राजनीति का यही सबसे बड़ा पाखंड है: वो खुद को मजलूमों का मसीहा तो बताते हैं, लेकिन उनका ये ‘बचाव’ इस बात पर तय होता है की ज़ुल्म करने वाला कौन है। अगर किसी दलित पर सवर्ण हिंदू ने अत्याचार किया? तो खूब ज़ोर से चिल्लाओ, फौरन वहां पहुंच जाओ, विदेश तक हल्ला मचा दो। और अगर किसी दलित पर मुस्लिम ने अत्याचार किया? एकदम खामोश। म्यूट बटन दबाओ। और आगे बढ़ जाओ।

सच कहूं तो ये राजनीति नहीं है। ये सीधा-सीधा एक सौदा है। दलित वोटर को बिना कहे, लेकिन साफ-साफ ये बताया जा रहा है कि: तुम्हारी जान की कीमत तब बहुत कम हो जाती है जब तुम्हारी जान लेने वाला हमारे वोट बैंक का हिस्सा हो। नितिन कुमार का मर्डर इन पार्टियों के मुंह पर एक करारा तमाचा होना चाहिए जब भी ये भविष्य में दलितों के सम्मान का राग अलापें।

ये किसी के सम्मान के लिए नहीं खड़े होते। ये सिर्फ अपने चुनावी समीकरणों के लिए खड़े होते हैं। और नितिन कुमार उनके चुनाव के लिए किसी काम का नहीं था। वो महज़ एक ऐसी चीज़ था जिसे कुर्बान किया जा सकता था।

नितिन कुमार को भुलाया नहीं जाना चाहिए

इस दर्दनाक घटना के बाद अब जातियों में बंटे हिंदुओं को जागना ही होगा। दलित भाइयों को उन नेताओं का बहिष्कार करना चाहिए जो चंद वोटों के लिए अपनी ज़बान बेच देते हैं। सही सोच वाले हर भारतीय को, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो, उन नेताओं से हिसाब मांगना चाहिए जो ‘सेलेक्टिव सेकुलरिज्म’ का खेल खेलते हैं।

ऐसी मध्ययुगीन मुस्लिम मानसिकता को बिना किसी माफी के कुचल देना चाहिए जो बेटियों को अपनी जागीर और हिंदुओं को नीचा समझती है।

अगर नितिन की शहादत से समाज में फैले इस कट्टरपन और दोगली राजनीति के खिलाफ लोग जाग जाते हैं, तो समझो उसकी जान बेकार नहीं गई। बागपत-गाजियाबाद के इस तथाकथित दलित गढ़ में एक हिंदू दलित का खून बहा है। अब खामोश रहने का वक्त चला गया। अब इंसाफ का वक्त आ गया है- वो इंसाफ जो बिना झुके, बिना रुके और बिना किसी समझौते के होना चाहिए।

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