BJP बनी ‘कांग्रेस 2.0’, तो कांग्रेस ‘नई मुस्लिम लीग’- TCS और Lenskart के बहाने कॉर्पोरेट में चलता रहेगा हिन्दुओं के खिलाफ ‘इस्लामिक’ एजेंडा

2014 से केंद्र और महाराष्ट्र में सत्ता में होने के बावजूद, बीजेपी हिंदुओं को इस्लामिक दरिंदों से बचाने में पूरी तरह फेल हो गयी है। भाजपा की वो “हिंदू राष्ट्रवादी” वाली इमेज तब ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है जब TCS और Lenskart में कट्टरपंथी मुस्लिम बेखौफ काम करते हैं और हिन्दू पहचान को खुलेआम मिटाने की साज़िश करते हैं।

भाजपा ने राम मंदिर तो बनवा दिया, लेकिन नासिक के TCS दफ्तर में उस हिंदू महिला को उसके हाल पर अकेला छोड़ दिया जिसके साथ पिछले चार साल से उसके ऑफिस के मुस्लिम सीनियर अधिकारी दुष्कर्म कर रहे हैं और उसे जबरन मुसलमान बनने पर मजबूर कर रहे हैं।

दूसरी तरफ है इंडियन नेशनल कांग्रेस- वो पार्टी जो कभी पूरे भारत की आवाज़ होने का दावा करती थी। लेकिन आज उसने अपना चोला पूरी तरह बदल लिया है और बंटवारे से पहले की ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ जैसी बन गई है.. एक ऐसा राजनीतिक संगठन जिसकी पूरी की पूरी रणनीति सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम भावनाओं को खुश करने पर टिकी है, भले ही इसके लिए हिंदू महिलाओं की इज़्ज़त की बलि क्यों न चढ़ानी पड़े।

टीसीएस नासिक का घिनौना सच जहाँ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने दफ्तरों को बना दिया हिंदू महिलाओं के खिलाफ कॉर्पोरेट जिहाद का अड्डा

नासिक, महाराष्ट्र में मौजूद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) का बीपीओ (BPO) सेंटर देश के सबसे खौफनाक और सोचे-समझे कार्यस्थल शोषण, धार्मिक दबाव और प्रीडेटरी ग्रूमिंग (शिकार बनाने की साज़िश) का अड्डा बन गया है। वहां काम कर रही हिंदू महिलाओं ने रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे किये हैं।

उन्होंने बताया की कैसे पूरे वर्कप्लेस को उनके खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। टीम लीडर और एचआर मैनेजर जैसी सीनियर पोस्ट पर बैठे उग्रवादी मुस्लिमों ने अपने ओहदे का फायदा उठाकर अपने से नीचे काम करने वालों हिन्दुओं का जमकर शोषण किया, उन्हें डराया-धमकाया और उनका इस्तेमाल किया।

महिलाओं की गवाही एक बेहद घिनौनी साज़िश का खुलासा करती है- कोई सीनियर मुस्लिम आरोपी पहले झूठे प्यार का नाटक करता, शादी का झांसा देता और फिर धोखे से शारीरिक संबंध बनाता। एक बार जब कोई लड़की जज़्बाती और शारीरिक रूप से टूट जाती, तो शुरू होता ब्लैकमेलिंग का खेल- उसके अंतरंग रिश्तों का डर दिखाकर उसे होटल ले जा कर अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ बार-बार शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता।

और बात यहीं खत्म नहीं होती थी। आरोपी जानबूझकर हमारे देवी-देवताओं को भद्दी गालियां देते थे। जैसे- “ब्रह्मा तो रेपिस्ट है,” “महादेव कोई भगवान नहीं,” “तुम्हारा भगवान तो है ही नहीं, सिर्फ अल्लाह है।।

बात यहीं तक नहीं रुकी, उन पर नमाज़ पढ़ने, रोज़ा रखने, बीफ खाने और धर्म बदलने का भारी दबाव डाला गया। कुछ को तो उनकी प्राइवेट फोटोज और वीडियोज के ज़रिए ब्लैकमेल तक किया गया।

मकसद एकदम साफ था- पीड़ित महिला के मन में उसके ही धर्म के प्रति नफरत भरना और फिर इस्लाम को एक बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करना। कई लड़कियों ने तो साफ़ बताया की उन पर धर्म बदलने का भारी दबाव डाला गया था।

ये कोई आम “कार्यस्थल दुराचार” या पर्सनल विवाद नहीं हैं। ये सीधे-सीधे कॉर्पोरेट जिहाद है- हिंदू सम्मान पर एक सोची-समझी स्ट्राइक, जहाँ धर्म बदलने के लिए सेक्सुअल हैरेसमेंट को हथियार बनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में हिंदू औरत की इज्जत को परिवार और समाज की नींव माना जाता है, पर ये कट्टरपंथी मुस्लिम उसे अपना शिकार बना कर हिंदू समाज को कुचलने की फिराक में हैं।

इस पूरे मामले को जो बात और भी ज़्यादा शर्मनाक बनाती है, वो है सिस्टम की वह नाकामी जिसने इस खेल को पूरे चार साल तक बेरोकटोक चलने दिया। जब महिलाएं इस उत्पीड़न की शिकायत लेकर एचआर (HR) के पास गईं, तो उनकी बातों को यह कहकर रफा-दफा कर दिया गया की ये मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं। और सबसे बड़ी विडंबना देखिए: जो एचआर मैनेजर उनकी हिफाज़त के लिए बैठी थी- निदा खान- वह खुद आरोपियों में से एक थी। वह बकायदा महिला कर्मचारियों को इस्लामी तौर-तरीके अपनाने के लिए उकसाती थी। और आज जब यह लेख लिखा जा रहा है, तो मोहतरमा फरार हैं।

कुछ ऐसी बातें भी सामने आई हैं जो गहरी चिंता पैदा करती हैं। जांच में यह अंदेशा जताया गया है की TCS नासिक के इस नेटवर्क के तार किसी बड़े रैकेट से जुड़े हो सकते हैं- यहाँ तक की कुछ मुस्लिम आरोपी हिंदू महिलाओं की मलेशिया में तस्करी करने की भी प्लानिंग कर रहे थे।

कंपनी ने आरोपी कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया, एक एसआईटी बनाई और पूरे नासिक दफ्तर को ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ पर भेज दिया। देखा जाए तो किसी भी कंपनी का यही सही कदम होना चाहिए- लेकिन सवाल ये है की ये फैसले पूरे चार साल की देरी से क्यों आए? वो भी तब, जब नौ पीड़ितों ने आखिरकार उस सिस्टम की खामोशी की दीवार को तोड़ दिया, जो इतने सालों से कट्टरपंथी मुस्लिमों को बचा रही थी।

खैर, जो सवाल पूरे देश को झकझोर देना चाहिए वो ये है: भारत की सबसे नामी कंपनियों में से एक के अंदर एक पूरा का पूरा उग्रवादी इस्लामिक प्रीडेटरी नेटवर्क कैसे पनप गया? हिंदू कर्मचारियों को चार साल तक यौन शोषण और धार्मिक दबाव का शिकार कैसे बनाया जाता रहा और किसी को कानो-कान खबर तक नहीं हुई? इसका जवाब सिर्फ किसी एक कंपनी की नाकामी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल की ओर इशारा करता है, जहाँ हिंदुओं को निशाना बनाए जाने की घटनाओं को कभी वह गंभीरता मिलती ही नहीं जिसकी वो हकदार हैं।

लेंसकार्ट की बेशर्मी जहाँ हिंदू बिंदी को मिटाकर इस्लामी कट्टरपंथ और हिजाब के आगे सरेआम घुटने टेके जा रहे हैं- नियम ना मानने पर जा रही हिन्दुओं की नौकरियां

अगर टीसीएस नासिक का मामला कॉर्पोरेट दुनिया में हिंदू-विरोधी नफरत का सबसे हिंसक और खौफनाक चेहरा है, तो लेंसकार्ट का विवाद कुछ और ही धीमी ज़हर जैसी साज़िश को दिखाता है- प्रोफेशनल ग्रूमिंग (दिखावे) के नाम पर हिंदू धार्मिक पहचान को चुपचाप मिटा देने की साज़िश।

15 अप्रैल 2026 की बात है, भारत की सबसे बड़ी आईवियर कंपनी लेंसकार्ट का एक अंदरूनी ‘स्टाफ यूनिफॉर्म एंड ग्रूमिंग गाइड’ सोशल मीडिया पर लीक हो गया। फिर क्या था, पूरे देश में बवाल मच गया। उस दस्तावेज़ में जो लिखा था, वो एकदम साफ और कड़वा सच था: कर्मचारियों को स्टोर पर काला हिजाब या काली पगड़ी पहनने की तो खुली छूट थी, लेकिन हिंदू धार्मिक पहचान की सबसे बुनियादी चीज़ों- जैसे बिंदी, तिलक, सिंदूर या कलावा- पहनने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई थी।

ज़रा इस दोगलेपन को समझिए। भारत में चलने वाली एक कंपनी, जिसे हिंदुओं ने बनाया, जिसके ज्यादातर ग्राहक हिंदू हैं, उसने एक ऐसी फॉर्मल पॉलिसी बनाई जो मुस्लिमों को तो अपने धर्म का पालन करने की पूरी छूट देती है, लेकिन उसी देश के बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की धार्मिक पहचान पर सीधा बैन लगा देती है।

बवाल होने पर सीईओ पीयूष बंसल का पहला रिएक्शन तो जैसे कॉर्पोरेट लीपापोती की कोई ‘मास्टरक्लास’ थी। उन्होंने फौरन एक्स (X) पर आकर कह दिया की जो दस्तावेज़ वायरल हो रहा है वो ‘गलत’ और ‘पुराना’ है, ऐसी कोई पाबंदी असल में लागू नहीं है, और लेंसकार्ट ‘धार्मिक आज़ादी पर कोई रोक नहीं लगाता’। बयान सुनने में बड़ा मीठा और तसल्ली देने वाला था, लेकिन यह सरासर झूठ था।

बंसल के इस झूठ के 24 घंटे भी नहीं बीते थे की लेंसकार्ट के एक पूर्व कर्मचारी आकाश फलके ने प्रेस को कई ईमेल लीक कर दिए। इन ईमेल्स ने साफ कर दिया की आकाश नवंबर 2025 से ही लेंसकार्ट मैनेजमेंट के सामने इस भेदभाव वाली पॉलिसी को लेकर आवाज़ उठा रहा था- यानी विवाद सामने आने से पूरे चार महीने पहले से! लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी। उलटा, बाद में उसे नौकरी से निकाल दिया गया। आकाश के पास जो सबूत थे, उन्होंने बंसल के उस ‘पुरानी पॉलिसी’ वाले बहाने की एक ही झटके में हवा निकाल दी।

बात यहीं नहीं रुकी। लेंसकार्ट के एक ट्रेनी ने भी सामने आकर बताया की स्टोर फ्लोर पर जाने से पहले उसे अपनी शिखा (चोटी, जो कई आस्थावान हिंदू रखते हैं) काटने और तिलक हटाने का सीधा फरमान सुनाया गया था। जब उसने ऐसा करने से इनकार किया, तो उसे नौकरी से चलता कर दिया गया। तो ये कोई पुरानी या बंद हो चुकी पॉलिसी नहीं थी भाई; ये एक ऐसा नियम था जिसे पूरी सख्ती से लागू किया जा रहा था ताकि हिंदू कर्मचारियों की कोई पहचान ही न बचे।

5 अप्रैल 2026 (विवाद वायरल होने से सिर्फ 10 दिन पहले) की ऑडिट तस्वीरों ने तो इस भेदभाव की पोल ही खोल कर रख दी। तस्वीरों में साफ दिखा की हिंदू कर्मचारियों को बिंदी लगाने के लिए दंडित किया जा रहा था। हिजाब को लेकर किसी ने चूं तक नहीं की। अब पीयूष बंसल का दावा था की पॉलिसी फरवरी में ही रद्द कर दी गई थी, लेकिन इन तस्वीरों से तो यही साबित होता है की या तो सीईओ साहब को खबर ही नहीं थी कि उनके अपने स्टोर्स में चल क्या रहा है, या फिर उन्हें सब पता था और वो जानबूझकर झूठ बोल रहे थे। दोनों ही बातें उनके लिए शर्मनाक हैं।

यह विवाद तब और गरमा गया जब सोशल मीडिया यूज़र्स ने बंसल की पत्नी, निधि मित्तल बंसल के पुराने पोस्ट ढूंढ निकाले। उनके एक्स (X) अकाउंट पर हिंदुओं की भावनाओं को भड़काने वाली भद्दी टिप्पणियां थीं- जिनमें भगवान राम और हिंदू महासभा को लेकर ज़हर उगला गया था। उनके कुछ पुराने ब्लॉग भी सामने आ गए, जहाँ वो भारतीयों को पाकिस्तानियों से शादी करने की नसीहत दे रही थीं। निधि मित्तल ने कुछ ही घंटों में अपना अकाउंट तो डिलीट कर दिया, लेकिन तब तक उनके स्क्रीनशॉट्स पूरे प्लेटफॉर्म पर वायरल हो चुके थे।

इसके बाद जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर था। गुजरात में लेंसकार्ट के एक स्टोर के बाहर सीईओ का पुतला फूंका गया। सूरत में लोग पोस्टर लेकर सड़कों पर उतर आए, जिन पर पीयूष बंसल को ‘हिंदू विरोधी’ लिखा था। #BoycottLenskart कई दिनों तक ट्रेंड करता रहा। लोगों ने अपने लेंसकार्ट के चश्मे तोड़ते हुए वीडियो बनाकर धड़ाधड़ शेयर किए। मजबूर होकर, लेंसकार्ट ने आखिर में अपनी ‘इन-स्टोर स्टाइल गाइड’ में बदलाव किया और बिंदी, कलावा, तिलक समेत सभी धार्मिक प्रतीकों को पहनने की इज़ाज़त दे दी।

लेकिन जनता का शक करना बिल्कुल जायज़ था। कोई भी कंपनी अनजाने में ऐसी पॉलिसी नहीं बनाती जहाँ हिंदू प्रतीकों पर बैन हो और इस्लामी प्रतीकों को छूट मिले। इसके लिए मैनेजमेंट के कई स्तरों पर सोच-समझकर फैसले लिए जाते हैं। और ये सवाल तो अब भी वहीं का वहीं है की ऐसा किया क्यों गया?

कुछ जानकारों का मानना है की लेंसकार्ट का मिडिल ईस्ट और खाड़ी देशों में बड़ा बिज़नेस है- हो सकता है ये पॉलिसी इसी लालच में बनाई गई हो की अगर कर्मचारियों पर हिंदू प्रतीक दिखे तो वहां के मुस्लिम ग्राहक नाराज़ हो सकते हैं। अगर ये सच है, तो इसका सीधा मतलब है की एक कंपनी विदेशों में पैसा कमाने के लिए अपने ही हिंदू कर्मचारियों की धार्मिक पहचान का गला घोंटने को तैयार थी।

हिंदुओं का शिकार करता मुस्लिम कट्टरपंथ का ये ज़हर कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि जड़ों तक फैली एक सोची-समझी साज़िश है

एक कंपनी में ऐसी घटना हो, तो उसे मैनेजमेंट की लापरवाही मान सकते हैं। लेकिन एक ही महीने में दो ऐसे मामले सामने आना, और देश भर में ऐसी घटनाओं का अचानक से बढ़ना, महज़ कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक पैटर्न है- और जब बात पैटर्न की हो, तो सिस्टम से जवाब मांगना ही पड़ता है।

TCS नासिक का मामला कोई अकेला मामला नहीं है। पूरे देश में, कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से लेकर गुजरात तक, 2025 और 2026 में दर्ज हुई कई एफआईआर (FIR) एक जैसे काम करने के तरीके का खुलासा करती हैं- किसी ओहदे पर बैठे मुस्लिम पुरुष- चाहे वे जिम ट्रेनर हों, दफ्तर के सहकर्मी, टीम लीडर या मैनेजर- हिंदू महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फंसाते हैं, झूठी शादी का वादा करते हैं, शारीरिक संबंध बनाते हैं, और फिर ब्लैकमेलिंग, शर्मिंदगी और धर्म के दबाव के जरिए उनका जबरन धर्मांतरण कराते हैं।

मिर्ज़ापुर में पुलिस ने जनवरी 2026 में दो जिम से चल रहे एक ऐसे ही ग्रूमिंग नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था। देहरादून में दिसंबर 2025 में एक महिला स्टूडेंट को परेशान करने के आरोप में एक जिम मालिक को गिरफ्तार किया गया। और अप्रैल 2026 में सूरत में तो एक जिम ट्रेनर को एक शादीशुदा हिंदू महिला के खुफिया तरीके से बनाए गए अंतरंग वीडियो के ज़रिए उसे ब्लैकमेल करने के जुर्म में पकड़ा गया।

देखा जाए तो लेंसकार्ट का मामला इसी बड़ी बीमारी का बस ‘सफेदपोश’ रूप है- यानी हिंदू पहचान को बड़े ही सलीके से दबाने की कोशिश। जब किसी कंपनी की पॉलिसी बिंदी पर बैन लगाती है और हिजाब की इजाज़त देती है, तो यह कोई ‘प्रोफेशनल’ नियम नहीं रह जाता। यह एचआर (HR) दस्तावेज़ों की भाषा में लिखा गया एक खुला ऐलान है की हिंदू धार्मिक पहचान कमज़ोर है, इसे जगह देने की कोई ज़रूरत नहीं है और बाकी धर्मों के मुकाबले इसे सिस्टम के संरक्षण की कम आवश्यकता है।

इसे ‘सिलेक्टिव सेक्युलरिज्म’ कहते हैं- सुनने में भले ही यह बड़ा भारी और पढ़ा-लिखा शब्द लगे, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इसका मतलब बस इतना है की सेक्युलरिज्म का इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं के ही खिलाफ एक हथियार की तरह किया जा रहा है।

मुस्लिम कट्टरपंथ पर खामोश और नई कांग्रेस बन चुकी बीजेपी के राज में खुद को ठगा महसूस करता हिंदू समाज

भारतीय जनता पार्टी मई 2014 में सत्ता में आई, और अपने साथ हिंदुओं की भारी-भरकम उम्मीदें लेकर आई। 67 सालों के कांग्रेस के राज के बाद- यानी 67 साल की मुस्लिम तुष्टिकरण और गठबंधनों के नाम पर हिंदू हितों को किनारे करने की राजनीति के बाद- हिंदू वोटर ने एक ऐसी पार्टी पर अपना भरोसा जताया था, जिसने कुछ अलग करने का वादा किया था। 2014 का वह जनादेश, जो 2019 में और भी बड़ा होकर वापस लौटा और 2024 में भी बना रहा, भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी भी पार्टी को मिला सबसे स्पष्ट जनादेश था।

लेकिन एक दशक गुज़र जाने के बाद, आज एक आम हिंदू के हाथ में क्या है?

राम मंदिर- बिल्कुल। एक शानदार उपलब्धि, एक ऐसा सांस्कृतिक सुधार जिसका सदियों से इंतज़ार था। आर्टिकल 370 का हटना- हां, बिल्कुल। यह एक साहसिक और कड़ा फैसला था जिसने देश को एक किया। ये दोनों ही असली कामयाबियां हैं और इनका सम्मान भी होना चाहिए।

लेकिन सिर्फ संस्कृति और भव्यता के इन बड़े प्रतीकों से टीसीएस नासिक के दफ्तर में फंसी उस हिंदू महिला का बचाव नहीं होता, जिसे चार साल तक ब्लैकमेलिंग और धार्मिक ज़िल्लत का सामना करना पड़ा। ये बड़े कदम लेंसकार्ट को बिंदी बैन करने से नहीं रोक पाते। कुल मिलाकर, वे वह बुनियादी कानूनी ढांचा या कड़ाई नहीं देते जिसकी आज हिंदू समुदाय को असल में ज़रूरत है।

केंद्र में बीजेपी के दस साल के राज के बाद भी आज तक हिन्दू महिलाओं के धर्मांतरण के लिए होने वाली धोखेबाज़ी की शादियों- जिसे बीजेपी का खुद का वोटर बेस ‘लव जिहाद’ कहता है- के खिलाफ कोई केंद्रीय कानून नहीं है।

बीजेपी की कई राज्य सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी कानून ज़रूर बनाए हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का तरीका इतना ढीला है, उनका दायरा इतना सीमित है की टीसीएस नासिक जैसे कॉर्पोरेट दफ्तरों में बैठे मुस्लिम शिकारियों को इन कानूनों का ज़रा भी खौफ नहीं होता। उन्हें पता है की इन कानूनों से आसानी से बचा जा सकता है।

देश में ऐसा कोई नियम नहीं है जो कंपनियों की एचआर (HR) पॉलिसी को इस बात के लिए ऑडिट करे कि कहीं वो धार्मिक भेदभाव तो नहीं कर रहीं। नतीजा? लेंसकार्ट जैसी कंपनी बड़े आराम से हिंदू-विरोधी पॉलिसी बना लेती है और जब तक सोशल मीडिया पर लोग हंगामा नहीं काटते, तब तक उसका कोई बाल भी बांका नहीं होता।

टीसीएस नासिक मामले और लेंसकार्ट विवाद, दोनों पर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का जो रवैया रहा, उसने इनकी नाकामी की पूरी कलई खोल कर रख दी। एक टाटा कंपनी के अंदर हिंदू महिलाओं के लगातार हो रहे यौन शोषण और धर्मांतरण के दबाव को लेकर प्रधानमंत्री का बयान कहाँ था?

जब नासिक के इस नेटवर्क के मलेशिया ट्रैफिकिंग से जुड़े होने के अंदेशे सामने आए, तो गृह मंत्री ने किसी केंद्रीय एजेंसी को जांच का आदेश क्यों नहीं दिया? दोनों ही मामलों में जवाब एक ही है: एकदम सन्नाटा, सब कुछ राज्य पुलिस पर टाल देना और बिना कुछ कहे यह जता देना कि देश चलाने वालों की जगह अब सोशल मीडिया का गुस्सा ही काम करेगा।

सच तो ये है की बीजेपी ने कांग्रेस की किताब को बड़ी बारीकी से पढ़ लिया है। चुनाव से ठीक पहले ज़ोर-शोर से हिंदू बन जाना और सत्ता में आते ही चुपचाप सेक्युलर हो जाना- इस कला में उसे महारत हासिल हो गई है। उसने हिंदू समाज के गुस्से को सुलझाने के बजाय उसे सिर्फ ‘मैनेज’ करना सीख लिया है। उसे लगता है की राम मंदिर दे दिया तो बस, अगले चार साल तक उनका वोटर बेस बिना किसी सवाल के वफादार बना रहेगा।

कई राज्यों के चुनावों में, वो मुस्लिम वोटों को लुभाने के लिए अपने ही हिंदू सांस्कृतिक एजेंडे को हल्का करने लगी है- बिल्कुल वही चुनावी गणित जो कांग्रेस किया करती थी और जिसका बीजेपी कभी चीख-चीखकर विरोध करती थी। 2014 के चुनावी वादों और 2026 की असलियत के बीच जो फर्क है, वह उस आम हिंदू के लिए (जो किसी मंदिर का ट्रस्टी या बड़ा बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि नासिक बीपीओ में काम करने वाली एक आम महिला है) उम्मीद और धोखे के बीच का फर्क है।

आज की बीजेपी सच में एक नई कांग्रेस बन गई है: वह हिंदू गौरव की भाषा तो बोलती है, लेकिन सरकार ऐसे चलाती है जैसे उसे अपने ही उसूलों पर खड़े होने से डर लगता हो।

हिंदुओं के दर्द को नकारकर खुलेआम मुस्लिम कट्टरपंथियों की ढाल और नई ‘मुस्लिम लीग’ बन चुकी आज की कांग्रेस

कांग्रेस, वो पार्टी जिसके राज में बंटवारा हुआ और जिसने दशकों तक तुष्टिकरण की राजनीति की, अब अपना ट्रांसफॉर्मेशन पूरा कर चुकी है। आज ये नई मुस्लिम लीग की तरह काम करती है- हिंदुओं के दर्द से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और चरमपंथी मुस्लिम हरकतों को ये तुरंत डिफेंड करने या छुपाने आ जाते हैं।

जब भी हिंदुओं को धर्म के नाम पर टारगेट किया जाता है, कांग्रेस के नेता अक्सर उस मुद्दे को सिर्फ एक “क्राइम” बताकर रफा-दफा करने की कोशिश करते हैं। वो उसमें से जिहादी या कन्वर्जन वाले एंगल को पूरी तरह गायब कर देते हैं, या फिर सवाल उठाने वालों को ही “कम्युनल” कह देते हैं। माइनॉरिटी वोट-बैंक की इनकी पुरानी राजनीति आज भी जारी है: ग्रूमिंग पैटर्न पर एकदम सन्नाटा, सख्त एंटी-कन्वर्जन कानूनों का विरोध, और एक ऐसा माइंडसेट जो मुस्लिम कट्टरपंथियों के बजाय हिंदुओं की आवाज़ उठाने को ही असली खतरा मानता है।

TCS नासिक में हुए घिनौने कांड- जहाँ धार्मिक गालियों के साथ सेक्सुअल शोषण हुआ- या लेंसकार्ट में हुए सिंबॉलिक अपमान की निंदा करने में कांग्रेस नेताओं की हिचकिचाहट उनकी प्राथमिकताओं को साफ कर देती है। उन्हें हिंदुओं की इज़्ज़त की कोई परवाह नहीं है। ऐसे एलिमेंट्स को सपोर्ट देकर या उन्हें बचाकर, कांग्रेस उन रेडिकल्स की हिम्मत बढ़ा रही है जो हिंदू औरतों को जीतने की चीज़ और हिंदू प्रतीकों को अपने दबदबे के रास्ते का रोड़ा मानते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथ को कुचलने और हिंदुओं को बचाने के लिए अब सिर्फ खोखले गुस्से से नहीं बल्कि कड़े प्रहार से काम लेना होगा

TCS और Lenskart स्कैंडल एक बहुत बड़े सभ्यता के संकट की वॉर्निंग हैं। शहरी भारत के प्रोफेशनल स्पेसेस में, डेमोग्राफिक शिफ्ट और मुस्लिम कट्टरपंथी सोच मिलकर ऐसी जगहें बना रहे हैं जहाँ हिंदू- मेजॉरिटी में होने के बावजूद- सॉफ्ट टारगेट बन रहे हैं। इस्लामी ग्रूमिंग के हथकंडे, चाहे वो समाज में “लव जिहाद” हो या इसका कॉर्पोरेट वर्ज़न, ये सब पुलिस, कॉर्पोरेट HR और पॉलिटिकल इच्छाशक्ति की कमज़ोरियों का पूरा फायदा उठाते हैं।

खैर, अब कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना ज़रूरी हो गया है: ऐसी हरकतों में शामिल कट्टरपंथी मुस्लिम एलिमेंट्स एक ऐसी घिनौनी और नफरत से भरी सोच दिखाते हैं जिसकी किसी भी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। हैरेसमेंट, ब्लैकमेलिंग और ज़बरदस्ती के ज़रिए हिंदू औरतों को कन्वर्जन की चीज़ समझना पूरी तरह से बर्बर है और भारत की आत्मा के खिलाफ है। हिंदू-विरोधी वो कट्टर लोग जो हमारे देवताओं का अपमान करते हैं और हमारी बहनों को टारगेट करते हैं, उन्हें कानून और समाज की तरफ से कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिए- इसमें कोई बहाना या छूट नहीं चल सकती।

हिंदू सिर्फ BJP जैसी पॉलिटिकल पार्टियों के भरोसे नहीं बैठ सकते। लेंसकार्ट जैसे ब्रांड्स का बॉयकॉट एक बहुत बड़ा मैसेज देता है। लीगल एक्टिविज्म, पीड़ितों के लिए सपोर्ट नेटवर्क, कॉर्पोरेट्स को अकाउंटेबल ठहराने की मांग, और कल्चरल री-असर्शन (गर्व से बिंदी, तिलक और कलावा पहनना) आज बेहद ज़रूरी है। आख़िरकार, हिंदुओं को ऐसे पैरेलल इंस्टीट्यूशंस और लीडरशिप तैयार करनी होगी जो झूठे सेक्युलर दिखावे से ऊपर उठकर धर्म और सेफ्टी को प्राथमिकता दे।

वरना इसका दूसरा रास्ता सिर्फ बर्बादी है- हमारा कल्चर कमज़ोर पड़ जाएगा, मुस्लिमों की दरिंदगी के ज़रिए डेमोग्राफी बदल दी जाएगी, और हम अपनी पूर्वजों की पहचान खो देंगे। भारत का भविष्य अब सिर्फ हिंदुओं के डंके की चोट पर खड़े होने पर टिका है- एकदम बेबाक, संगठित और सनातन की ताक़त से जुड़ा हुआ।

बीजेपी अब नई कांग्रेस बन गई है, और कांग्रेस नई मुस्लिम लीग। यही कड़वा सच है जो बताता है की क्यों TCS जैसे ग्रूमिंग हॉरर और लेंसकार्ट जैसे पहचान मिटाने की कोशिशें हिंदुओं के खिलाफ आज भी जारी हैं।

हिंदुओं को दोनों तरफ के इस धोखे को सिरे से खारिज करना होगा। अब और चुप नहीं रहना है। ज़बरन धर्मांतरण और वर्कप्लेस पर कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा हो रही इस धार्मिक टारगेटिंग के खिलाफ ऐसे कड़े कानूनों की मांग कीजिए जो सच में काम करें। BJP, कांग्रेस जैसी पार्टियों को उनकी औकात याद दिलाइए। हिंदू औरतों की इज़्ज़त को बचाना अपना सबसे पवित्र फर्ज़ मानिए। हर जगह, हर फील्ड में गर्व से अपनी हिंदू पहचान का डंका बजाइए।

भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई अब शुरू हो चुकी है। हिंदू लड़ेंगे- किसी नफरत के साथ नहीं, बल्कि धर्म के पक्के इरादे के साथ- ताकि अपनी ही सभ्यता में, एक प्राउड और सुरक्षित मेजॉरिटी के तौर पर अपनी सही जगह वापस ले सकें।

जय श्री राम। हर हर महादेव।

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