पटरियों पर पड़ा एक शव: क्या इंदिरा गांधी के दौर ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को न्याय देने में असफलता दिखाई?

कुछ मौतें दुखद होती हैं। कुछ संदिग्ध होती हैं और कुछ ऐसी होती हैं, जो किसी राष्ट्र की दिशा बदल देती हैं।

11 फरवरी 1968 को दीनदयाल उपाध्याय का शव पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के पास रेलवे पटरियों के किनारे मिला। वे केवल 51 वर्ष के थे। उस दिन भारत ने सिर्फ भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष को नहीं खोया, बल्कि स्वतंत्रता के बाद की राजनीति के एक महत्वपूर्ण विचारक को भी खो दिया—एक ऐसे व्यक्ति को, जो देश की सोच को नई दिशा दे रहे थे।

उपाध्याय सत्ता के पीछे भागने वाले राजनेता नहीं थे। वे एक विचारक, अनुशासित संगठनकर्ता और एकात्म मानववाद के प्रवर्तक थे। इस विचार ने पश्चिमी पूँजीवाद और सोवियत समाजवाद दोनों को चुनौती दी। उन्होंने इसके बजाय भारत की संस्कृति से जुड़ी और आत्मनिर्भरता पर आधारित सोच रखी। उस समय कांग्रेस का राजनीति पर पूरा प्रभाव था और विपक्ष बिखरा हुआ था। ऐसे में उन्होंने जनसंघ को स्पष्ट विचार और मजबूत दिशा दी। और फिर अचानक वे नहीं रहे।

सुबह की ठंडी रोशनी में उनका शरीर अकेला पड़ा था। कोई साफ कारण नहीं। कोई स्पष्ट कहानी नहीं। केवल सवाल—जो आधी सदी से अधिक समय से बने हुए हैं। क्या यह दुर्घटना थी? लूटपाट? राजनीतिक हत्या? या विश्वासघात? जवाब न मिलने से उनकी मृत्यु एक साधारण घटना नहीं रही, बल्कि एक स्थायी राजनीतिक रहस्य बन गई।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—उनकी मृत्यु ने उनके विचारों को समाप्त नहीं किया। उलटे, उनके विचार और मजबूत हुए। अनसुलझी परिस्थितियों ने उन्हें राष्ट्रवादी राजनीति में एक प्रतीक बना दिया। उनके विचारों ने जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी की दिशा को प्रभावित किया। शासन, अर्थनीति और सांस्कृतिक सोच पर उनका असर लंबे समय तक बना रहा।

यह लेख केवल उस सुबह के रहस्य को नहीं देखता, बल्कि उस क्षण के महत्व को समझने की कोशिश करता है—एक उभरती हुई सोच, जो अपने शिखर पर अचानक रुक गई। क्योंकि कभी-कभी किसी देश के वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत के अनुत्तरित सवालों को देखना जरूरी होता है।

दीनदयाल उपाध्याय: जीवन और विचार

दीनदयाल उपाध्याय स्वतंत्रता के बाद के भारत के एक राजनीतिक दार्शनिक, संगठनात्मक रणनीतिकार और प्रमुख वैचारिक व्यक्तित्व थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक थे—वही संगठन, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बना। उपाध्याय एकात्म मानववाद के सिद्धांत के प्रवर्तक के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, जिसने समकालीन केंद्र-दक्षिणपंथी राजनीति के वैचारिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया।

25 सितंबर 1916 को जन्मे और 11 फरवरी 1968 को रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाए गए उपाध्याय का जीवन बौद्धिक गहराई और अनुशासित संगठनात्मक कार्य का संगम था। उन्होंने कभी उच्च कार्यकारी पद नहीं संभाला, किंतु उनका प्रभाव सत्ता के प्रयोग से अधिक विचारों के निर्माण में निहित था।

प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण

उपाध्याय का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा के निकट नगला चंद्रभान में हुआ। बाल्यावस्था में ही वे अनाथ हो गए—दो वर्ष की आयु में पिता और आठ वर्ष की आयु में माता का निधन हो गया। आर्थिक कठिनाइयों के बीच रिश्तेदारों ने उनका पालन-पोषण किया। इन प्रारंभिक संघर्षों ने उनके भीतर सामाजिक न्याय और नैतिक शासन के प्रति गहरी संवेदनशीलता विकसित की।

उन्होंने राजस्थान में शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया। आगे की पढ़ाई आगरा और इलाहाबाद में की, किंतु अंततः उन्होंने पारंपरिक करियर के बजाय सार्वजनिक जीवन का मार्ग चुना। उन्होंने विवाह नहीं किया और स्वयं को पूर्णतः वैचारिक तथा सामाजिक कार्य के लिए समर्पित कर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव

1937 में छात्र जीवन के दौरान ही, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और शीघ्र ही पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। संगठन निर्माण में उनकी अनुशासित और व्यवस्थित कार्यशैली ने उन्हें उत्तर प्रदेश में संघ के विस्तार का प्रमुख आधार बना दिया।

1940 और 1950 के दशक में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ जैसे वैचारिक पत्रों का संपादन किया। उनके लेख ऐतिहासिक चिंतन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संतुलित संयोजन थे।

1951 में उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना में भूमिका निभाई। मुखर्जी की मृत्यु के बाद उपाध्याय पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरे। वे एक दशक से अधिक समय तक महासचिव रहे और 1967 में अध्यक्ष बने।

एकात्म मानववाद की आधारशिला

1965 में उपाध्याय ने व्याख्यानों की एक श्रृंखला के माध्यम से “एकात्म मानववाद” की रूपरेखा प्रस्तुत की। यह दर्शन पश्चिमी पूँजीवाद और समाजवाद दोनों का विकल्प प्रस्तुत करता था, जिन्हें वे सांस्कृतिक संदर्भ से अलग होने के कारण अधूरा मानते थे।

इसके प्रमुख सिद्धांत थे—

समग्र मानव विकास: व्यक्ति को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व के रूप में देखना।

धर्म-आधारित शासन: सार्वजनिक नीति को केवल भौतिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य के आधार पर निर्देशित करना।

अंत्योदय: समाज के सबसे वंचित वर्गों के उत्थान को प्राथमिकता देना।

स्वदेशी और विकेंद्रीकरण: आत्मनिर्भरता और ग्राम-केंद्रित विकास पर बल देना।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: राष्ट्र को साझा सभ्यतागत विरासत पर आधारित समुदाय के रूप में देखना।

एकात्म मानववाद का उद्देश्य भौतिक प्रगति और नैतिक-सांस्कृतिक निरंतरता के बीच संतुलन स्थापित करना था। यह व्यक्तिवाद और सामूहिकतावाद के बीच एक संतुलित मध्य मार्ग प्रस्तुत करता था।

राजनीतिक नेतृत्व और अंतिम वर्ष

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