ही-मैन ऑफ़ हार्ट्स: धर्मेन्द्र सिंह देओल की कहानी

मैंने धर्मेन्द्र को पहली बार 1995 में लोफर में देखा था। सिनेमा समझने की उम्र नहीं थी, पर इतना ज़रूर था कि जब वे पर्दे पर आए, तो मेरे भीतर कुछ बदल गया—बिना प्रयास के प्रभावशाली, सहज, और अजीब-सी आत्मीयता लिए हुए… जैसे कोई अपना ही हो। उस फ़िल्म ने मुझे सिर्फ़ एक अभिनेता से नहीं मिलवाया, बल्कि बॉलीवुड में मेरा सबसे प्रिय इंसान दे दिया।

उसके बाद अनगिनत सितारे उभरे और मिट गए—नए चेहरे ज़ोरदार संवादों और चमकदार अंदाज़ से नायक बनने की कोशिश करते रहे, पर कोई भी उनके पास नहीं आया। धर्मेन्द्र केवल एक कलाकार नहीं थे; वे एक उपस्थिति थे। लोफर के उस दिन से वे मेरे लिए वह आदर्श बन गए, जिसके सामने आज भी हर दूसरा सितारा छोटा पड़ जाता है।

दुनिया उन्हें पहचाने उससे बहुत पहले, धर्मेन्द्र में कुछ ऐसा था जो लोगों को ठहरने पर मजबूर कर देता था—दुकानदार, शिक्षक, या रास्ता चलते अनजान लोग। वे ध्यान के पीछे नहीं भागते थे, लेकिन ध्यान उनका पीछा करता था। यह केवल सुंदरता नहीं थी; यह एक शांत दृढ़ता, एक कोमलता, वह दुर्लभ आत्मविश्वास था—जो साबित नहीं करता, बल्कि स्वाभाविक रूप से महसूस होता है। वर्षों बाद सिनेमा ने वही सिद्ध किया जिसकी झलक जीवन पहले ही दिखा चुका था।

धर्मेन्द्र केवल कृष्ण सिंह देओल—भारत भर में बस धर्मेन्द्र कहे जाने वाले—24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गए और भारतीय सिनेमा की सबसे असाधारण विरासतों में से एक पीछे छोड़ गए। छह दशकों से ज़्यादा समय तक वे मजबूत व्यक्तित्व और गहरी भावनात्मक सच्चाई की जीवित मिसाल बने रहे।

‘ही-मैन ऑफ बॉलीवुड’ और ‘गरम धरम’  जैसे उपनाम उनकी पहचान बन गए। 300 से ज़्यादा फ़िल्मों के साथ वे क्लासिक रोमांस और आधुनिक मनोरंजन के बीच की कड़ी बनकर उभरे—और अनगिनत पीढ़ियों तक सिनेमा की राह तय करते रहे।

यह श्रद्धांजलि उनके सफ़र—ग्रामीण पंजाब से सुपरस्टारडम की ऊँचाइयों तक—उनके सांस्कृतिक प्रभाव और उनकी उस विरासत को समर्पित है, जो आज भी उनके परिवार और उनकी फ़िल्मों के माध्यम से जीवित है।

प्रारंभिक वर्ष: सादगी से उठी वह शुरुआत, जो अमर हो गई

8 दिसंबर 1935 को लुधियाना ज़िले के नसरीली गाँव में जन्मे धर्मेन्द्र एक सरल, आर्य समाज मूल्यों वाले पंजाबी हिंदू जाट परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता केवल कृष्ण सिंह देओल स्कूल शिक्षक थे, और माँ सतवंत कौर ने उनमें शांत दृढ़ता और अपनापन भरा।

उन्होंने बचपन सहनेवाल और लालटन कलां में बिताया, स्थानीय सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की, और फिर रामगढ़िया कॉलेज, फगवाड़ा में इंटरमीडिएट किया। पंजाब विश्वविद्यालय में दाख़िला मिला, पर पढ़ाई से अधिक किसी और पुकार ने उन्हें आकर्षित किया। किशोरावस्था में वे अक्सर कक्षाएँ छोड़कर स्थानीय थिएटरों में फ़िल्में देखने चले जाते—अनजान कि एक दिन उसी पर्दे पर जगमगाता चेहरा उनका अपना होगा।

फ़िल्मों में अप्रत्याशित प्रवेश: एक संयोग जिसने सिनेमा को उसका ही-मैन दिया

धर्मेन्द्र का मुंबई तक का सफ़र न किसी संपर्क से शुरू हुआ, न किसी औपचारिक प्रशिक्षण से—बल्कि 1957 के फ़िल्मफ़ेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट से, जिसने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। बिकानेर में एक अमेरिकी ड्रिलिंग कंपनी में काम करने के बाद उन्होंने जोखिम उठाया—और बंबई का रुख किया।

उनका डेब्यू दिल भी तेरा हम भी तेरे (1960) से हुआ, जिसे अर्जुन हिंगोरानी ने बनाया था। फ़िल्म अधिक नहीं चली, पर युवा अभिनेता की सच्चाई और सरलता ने सबका ध्यान खींचा। शुरुआती वर्षों में अस्वीकृति और ‘मृदुभाषी रोमांटिक हीरो’ की टाइपकास्टिंग का सामना करना पड़ा, लेकिन शोला और शबनम (1961) और अनपढ़ (1962) ने उनके आगमन को स्पष्ट कर दिया।

उस दौर में, जहाँ राज कपूर और देव आनंद जैसे शहरी नफ़ासत वाले नायक छाए हुए थे—धर्मेन्द्र की मिट्टी से जुड़ी मर्दानगी और शांत तीव्रता ने हिंदी सिनेमा को एक बिल्कुल नया नायक दिया।

परदे की बुलंदियों तक — एक अनन्त नायक का सफर

1960 और 70 के दशक ने धर्मेन्द्र को एक फ़िल्मी घटना बना दिया। आई मिलन की बेला (1964) और फूल और पत्थर (1966) जैसी रोमांटिक सफलताओं ने उन्हें शीर्ष सितारों की श्रेणी में पहुँचा दिया। फूल और पत्थर ने न सिर्फ़ उन्हें पहला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता नामांकन दिलाया, बल्कि उनकी लोकप्रियता को भी मज़बूत किया।

1970 का दशक उनके करियर का स्वर्णकाल बन गया:

  • मेरा गाँव मेरा देश (1971) ने उन्हें एक नए तरह के एक्शन-विजिलांटे हीरो के रूप में स्थापित किया

  • रमेश सिप्पी जैसे निर्देशकों और हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन जैसे सह-कलाकारों के साथ सहयोग ने उनके अभिनय-विस्तार को और गहरा किया

  • और फिर आई शोले (1975) — भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे प्रतिष्ठित फ़िल्मों में से एक, जिसमें ‘वीरू’ के रूप में धर्मेन्द्र की भूमिका लोककथाओं का हिस्सा बन गई

1972 से 1975 के बीच उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर कई बार शीर्ष स्थान हासिल किया और लगातार सुपरहिट फ़िल्में दीं—ऐसी उपलब्धि जो दशकों बाद भी दुर्लभ मानी जाती है।

करियर का अगला दौर और नई दिशा

1980 का दशक उन्हें एक अजेय एक्शन स्टार के रूप में स्थापित करता है—हुकूमत (1987) उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट रही। 1990 के दशक में उनकी भूमिका अग्रणी नायक से निर्माता और मार्गदर्शक की ओर बदली।

अपने बैनर विजेता फ़िल्म्स के तहत उन्होंने अपने बेटों—सनी देओल (बेताब, 1983) और बॉबी देओल (बरसात, 1995)—को लॉन्च किया, जो दोनों ही सफल अभिनेता बने।

एक शांत अवधि के बाद धर्मेन्द्र ने नई पीढ़ी के दर्शकों को अपने अभिनय से फिर प्रभावित किया:

  • लाइफ़ इन ए… मेट्रो (2007)

  • अपने (2007) और यमला पगला दीवाना श्रृंखला

  • रॉकी और रानी की प्रेम कहानी (2023), जिसमें उनकी कोमलता और सहजता ने देशभर में प्रेम बटोरा

उनकी अंतिम रिलीज़, इक्कीस (2025)—जो उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई—में उन्होंने एक सैनिक की भूमिका निभाई, जो साहस, अनुशासन और भावनात्मक शक्ति का प्रतीक थी। यह उनके करियर के लिए एक उपयुक्त विदाई थी।

परिवार, रिश्ते और विरासत

धर्मेन्द्र ने 1954 में प्रकाश कौर से विवाह किया और 21 वर्ष की उम्र में पिता बने। उनके बच्चे—सनी, बॉबी, विजेता और अजीता—देओल परिवार की पहली पीढ़ी बने।
हेमा मालिनी के साथ उनके संबंध और 1980 में हुआ विवाह शुरुआती वर्षों में सार्वजनिक चर्चा का केंद्र रहा, लेकिन समय के साथ यह बॉलीवुड की सबसे स्थायी साझेदारियों में बदल गया। उनकी दो बेटियाँ—ईशा और अहाना—इस परिवार का विस्तार हैं।

आज देओल परिवार तीन पीढ़ियों में फैला है—पोतों करण और राजवीर देओल ने भी सिनेमा में प्रवेश किया है, जिससे रचनात्मक विरासत आगे बढ़ रही है।

राजनीतिक अध्याय: मंच बदला, व्यक्तित्व वही रहा

2004 में धर्मेन्द्र ने बीकानेर से भाजपा सांसद के रूप में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया, हालांकि सीमित संसद उपस्थिति को लेकर आलोचना हुई, लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका हमेशा उनकी कलात्मक पहचान से पीछे रही, और धीरे-धीरे वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।

स्वास्थ्य में गिरावट और अंतिम विदाई

जीवन के अंतिम वर्षों में धर्मेन्द्र को बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिनमें 2024–2025 के दौरान श्वास संबंधी चुनौतियाँ भी शामिल थीं। बीच-बीच में अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद, वे संदेशों और उपस्थितियों के माध्यम से प्रशंसकों और उद्योग से जुड़े रहे।

24 नवंबर 2025 को वे मुंबई स्थित अपने निवास पर, परिवार की उपस्थिति में शांतिपूर्वक इस संसार से विदा हो गए।
उनके निधन पर देशभर से श्रद्धांजलियाँ उमड़ीं—वयोवृद्ध कलाकारों जैसे अमिताभ बच्चन से लेकर उन युवा सितारों तक, जो उन्हें देखकर बड़े हुए थे।

पुरस्कार, मान्यता और सांस्कृतिक प्रभाव

प्रतिस्पर्धी अभिनय पुरस्कारों में उन्हें अपेक्षित सम्मान भले न मिला हो, लेकिन उनके योगदान को कई प्रतिष्ठित सम्मानों ने स्वीकार किया, जिनमें शामिल हैं:

  • पद्म भूषण (2012)

  • फ़िल्मफ़ेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1997)

  • IIFA और अप्सरा गिल्ड सम्मान

  • अंतरराष्ट्रीय सम्मान, जिनमें न्यू जर्सी सीनेट का प्रशस्ति-पत्र (2020) उल्लेखनीय है

लेकिन धर्मेन्द्र के प्रभाव को केवल पुरस्कारों से नहीं मापा जा सकता। उनकी स्क्रीन-उपस्थिति ने भारतीय मर्दानगी की परिभाषा ही बदल दी—जहाँ शक्ति के साथ संवेदनशीलता, हास्य के साथ संयम, और नायकत्व के साथ विनम्रता सहजता से जुड़ती थी।

विरासत: एक युग का समापन

धर्मेन्द्र का करियर भारतीय सिनेमा के विकास का आईना रहा—श्वेत-श्याम मेलोड्रामा से लेकर बहु-शैली ब्लॉकबस्टर्स और आधुनिक एंसेंबल फ़िल्मों तक। 70 से अधिक सुपरहिट फ़िल्मों के साथ वे बॉलीवुड इतिहास के सबसे सफल प्रमुख अभिनेताओं में गिने जाते हैं।

उनकी स्थायी लोकप्रियता केवल स्टारडम का परिणाम नहीं थी; वह संबद्धता से आती थी। वे अपने ही शब्दों में “दिल से किसान” थे—और पंजाब की मिट्टी की महक हर भूमिका में उतर आती थी।

उनकी मृत्यु एक ऐसा अध्याय बंद करती है, जिसने सिनेमा में ईमानदारी, सादगी और सहज करिश्मे का दौर गढ़ा था, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है—उनकी फ़िल्मों में, उन पीढ़ियों में जिन्हें उन्होंने प्रेरित किया, और उस सांस्कृतिक स्मृति में, जिसने उन्हें पर्दे पर देखते हुए खुद को भी देखा।

धर्मेन्द्र सिंह देओल: जीवन के अनकहे पहलू

धर्मेन्द्र—जो 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हुए—अपनी स्क्रीन करिश्माई छवि के कारण अमर हैं, लेकिन परदे से परे उनका जीवन कहीं अधिक परतदार, संवेदनशील और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा था। गौरव, शोहरत और पारिवारिक विरासत के पीछे वे संघर्षों, निजी जुनूनों और अनकही कहानियों को भी संजोए हुए थे।

यहाँ उनके जीवन के कुछ कम-ज्ञात पहलू प्रस्तुत हैं:

1. बीकानेर में एक श्रमिक जीवन से शुरुआत

रोशनी और कैमरों से दूर, धर्मेन्द्र ने अपने शुरुआती दिनों में राजस्थान के बिकानेर में एक अमेरिकी ड्रिलिंग कंपनी में कठोर श्रम किया।
तनख्वाह मामूली थी, पर इस अनुभव ने उनके भीतर वह ज़मीन से जुड़ी विनम्रता और स्थिरता पैदा की—जो आगे चलकर उन्हें एक चमकदार दुनिया में भी अलग पहचान देती रही।

2. स्कूल था उनकी सबसे कम पसंदीदा जगह

एक सख़्त स्कूल हेडमास्टर के बेटे होने के कारण धर्मेन्द्र को पढ़ाई कभी रास नहीं आई। पिता पक्षपात से बचने के लिए उन्हें और भी सख़्ती से रखते थे। यही वजह थी कि वे अक्सर स्कूल से भागकर फ़िल्में देखने चले जाते—अनजाने में ही अपने भविष्य की तैयारी करते हुए।

3. टैलेंट हंट जीतकर भी कोई गारंटी नहीं मिली

1957 में फ़िल्मफ़ेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतने के बाद भी उनके सामने आसान रास्ते नहीं थे। जीत का मतलब केवल निर्माताओं से परिचय भर था। वह सीमित पैसे लेकर बंबई पहुँचे, अस्वीकृति झेली, संघर्ष किया—और केवल विश्वास और दृढ़ता के सहारे टिके रहे, जब तक सफलता ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया।

4. स्टारडम के लिए अपना नाम बदलने से इंकार

1960 की पहली फ़िल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे के समय निर्माताओं ने सुझाव दिया कि वे कोई “हीरो-जैसा” नाम रख लें। धर्मेन्द्र ने साफ़ मना कर दिया और अपने असली नाम पर अडिग रहे। फ़िल्म चली नहीं, लेकिन उनका आत्मविश्वास और पहचान के प्रति सच्चाई ने आगे चलकर उनके करियर की नींव मज़बूत की।

5. एक्शन-हीरो छवि के पीछे छिपा एक संवेदनशील कवि

बहुत कम लोग जानते हैं कि धर्मेन्द्र एक उत्कृष्ट कवि भी थे—हिंदी और पंजाबी में कविताएँ लिखते थे। शूटिंग के बीच वे अक्सर अपनी डायरी में पंक्तियाँ लिखते रहते। 1970 के दशक में उनकी कविता-संग्रह मेरा दिल और मेरी आँख प्रकाशित हुई, लेकिन जनता उन्हें केवल ‘माचो’ भूमिकाओं से जोड़ती रही, इसलिए उनकी कविता को वह ध्यान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।

6. कुछ ऐसी फ़िल्में ठुकराईं जो बॉलीवुड को बदल गईं

भारतीय सिनेमा की कई ऐतिहासिक भूमिकाएँ लगभग उनके हाथों में आ चुकी थीं, लेकिन समय-सारणी और व्यक्तिगत निर्णयों के कारण उन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया:

  • ज़ंजीर (1973) — जिसने अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार बना दिया

  • दीवार (1975) — angry-young-man युग की निर्णायक फ़िल्म

उस समय वे परिवार-केंद्रित और ग्रामीण विषयों वाली फ़िल्मों की ओर अधिक आकर्षित थे, और आने वाले बदलावों का अनुमान नहीं लगा पाए।

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