हर साल, जैसे ही 1 जनवरी करीब आती है, सरकारी दफ्तरों से नोटिफिकेशन निकलने लगते हैं, टीवी चैनलों पर काउंटडाउन शुरू हो जाता है और पूरे देश से कहा जाता है की आओ, नया साल मनाएं। आतिशबाजी होती है। नेता ट्वीट करते हैं। प्रधानमंत्री देशवासियों को संबोधित करते हैं। लेकिन ज़रा खुद से ठहरकर पूछिए- आख़िर ये नया साल है किसका? कौन से कैलेंडर के हिसाब से ये नई शुरुआत है?
इसका जवाब थोड़ा चुभने वाला है। ये कैलेंडर तो पोप ग्रेगरी XIII, रोमन देवता जानूस और मध्य युग के ईसाइयत की देन है। हमारी पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता के इतिहास में, ये कैलेंडर एक दिन के लिए भी हमारा नहीं था!
जबकि ठीक आज 19 मार्च के दिन, यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन- चैत्र का पहला दिन, जब वसंत पूरी तरह से खिल उठता है, किसान अपनी फसल काट चुके होते हैं और पूरा ब्रह्मांड एक ऐसी स्थिति में आ जाता है जिसकी हमारे ऋषियों ने बेहद सटीक गणना की थी- तब करोड़ों हिंदू अपने सच्चे नए साल का जश्न मनाते हैं। इसे हिंदू नव वर्ष कहा जाता है।
महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा कहते हैं, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादी, कश्मीर में नवरेह, सिंधी समाज में चेटी चंड, और मणिपुर में सजिबु नोंगमापानबा। नाम अलग-अलग हैं, पर हमारी सभ्यता की आत्मा एक ही है। लेकिन विडंबना देखिए की ‘सरकारी’ भारत इसे पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है।
ये कोई इत्तेफ़ाक नहीं है। ये एक इंसान की विचारधारा का थोपा हुआ फैसला है। जब आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास हमारी सभ्यता का गौरव लौटाने का ऐतिहासिक मौका था, तब उन्होंने देश के राजकाज, कानून, प्रशासन और बैंकिंग के लिए अंग्रेजों के ग्रेगोरियन कैलेंडर को चुन लिया।
और ऐसा करके, उन्होंने हिंदू नव वर्ष को महज़ ‘धार्मिक कर्मकांड’ बना के छोड़ दिया। उसकी सारी आधिकारिक पहचान छीन ली। सच तो ये है की कैलेंडर सिर्फ दिन गिनने का कोई साधन नहीं होता, ये किसी भी सभ्यता की एक पहचान होता है। और नेहरू का पक्ष एकदम साफ़ था- आज़ाद भारत की घड़ी अंग्रेज़ों वाली ही रहेगी।
विक्रम संवत आख़िर बना कैसे? एक सभ्यता का अपना समय
हमने असल में क्या खोया है, ये समझने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है की विक्रम संवत आख़िर है क्या और ये बना कैसे। क्योंकि दशकों से, नेहरूवादी शिक्षा व्यवस्था ने इसे महज़ परीक्षा में आने वाला एक छोटा सा सवाल बनाकर छोड़ दिया है।
विक्रम संवत एक चंद्र-सौर कैलेंडर है जो पिछले दो हज़ार सालों से लगातार भारतीय उपमहाद्वीप की धड़कन रहा है। इसका नाम उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर रखा गया है- एक ऐसे राजा जिन्हें सिर्फ उनकी सैन्य ताकत के लिए नहीं, बल्कि न्याय, ज्ञान को बढ़ावा देने और उनके दरबार के ‘नवरत्नों’ (जिनमें महान कवि कालिदास भी थे) के लिए जाना जाता है।
माना जाता है की 57 ईसा पूर्व (BCE) में शकों को हराने की खुशी में ये संवत शुरू किया गया था। संवत का ये ‘ज़ीरो ईयर’ हमारी सभ्यता की एक बहुत बड़ी जीत का प्रतीक है- एक विदेशी हमलावर की हार और अपने स्वदेशी राज की वापसी। कितनी अजीब बात है की जिस कैलेंडर की शुरुआत ही एक विदेशी को भगाने से हुई, बाद में नेहरू के भारत ने उसी कैलेंडर को हटाकर एक दूसरा विदेशी सिस्टम अपना लिया।
इस कैलेंडर की खगोलीय सटीकता और बनावट ही कमाल की है। यह चांद की गतियों और सूरज के राशि-चक्र दोनों को एक साथ मापता है। साल को बारह महीनों में बांटा गया है- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
हर महीने को आगे दो पक्षों में बांटा जाता है- शुक्ल पक्ष (चांद के बढ़ने का समय) और कृष्ण पक्ष (चांद के घटने का समय)। इसमें समय को किसी कच्ची-पक्की तारीख़ में नहीं, बल्कि ‘तिथि’ में नापा जाता है- जिसका गहरा खगोलीय मतलब होता है और जो हिंदुओं के लगभग हर धार्मिक और खेती-बाड़ी के काम का आधार है।
चांद और सूरज के साल को मिलाए रखने के लिए लगभग हर बत्तीस महीने में एक ‘अधिक मास’ (या पुरुषोत्तम मास) जोड़ा जाता है। ये इतना शानदार और वैज्ञानिक तरीका है की आज के मॉर्डन खगोलशास्त्री भी इसका लोहा मानते हैं।
फ़िलहाल हम विक्रम संवत 2083 (जो 2026 CE से शुरू हो रहा है) में जी रहे हैं। इसका मतलब है की भारत का अपना कैलेंडर पिछले दो हज़ार सालों से बिना रुके साल दर साल गिन रहा है। कई साम्राज्य आए और गए, कई विदेशी शासक आए, लेकिन विक्रम संवत मुगलों के दौर में भी ज़िंदा रहा, अंग्रेजों के राज में भी टिका रहा और बंटवारे का दर्द भी झेल गया। अगर ये किसी चीज़ के सामने नहीं टिक पाया, तो वो थी जवाहरलाल नेहरू की ‘सेक्युलर’ महत्वाकांक्षाएं।
हिंदू नव वर्ष- प्रकृति और ब्रह्मांड का असली नया साल जिसे सरकारी फाइलों ने कभी अपना नहीं माना
चैत्र शुक्ल पक्ष का पहला दिन यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा कैलेंडर पर महज़ कोई तारीख भर नहीं है। हिंदू परंपरा के अनुसार, इसी दिन सृष्टि की शुरुआत हुई थी। ब्रह्म पुराण कहता है की भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से ब्रह्मांड की रचना शुरू की थी। यानी इसी दिन से समय की शुरुआत हुई- और हाँ, ये कोई मनगढ़ंत कहानी या धार्मिक रूपक नहीं है, बल्कि एक खगोलीय हकीकत है।
वसंत विषुव- जब दिन और रात एकदम बराबर होते हैं और प्रकृति में हर तरफ हरियाली छाने लगती है, वह इसी तारीख़ के आस-पास पड़ता है। हमारे जिन ऋषियों ने ये कैलेंडर बनाया था, उन्होंने इस दिन को यूं ही हवा में नहीं चुन लिया था। उन्होंने इसे इसलिए चुना क्योंकि खुद ब्रह्मांड ने इसे चुना था।
वाल्मीकि रामायण की मानें तो, चौदह साल के वनवास और रावण को हराने के बाद भगवान राम इसी चैत्र के महीने में अयोध्या लौटे थे। बहुत सी परंपराओं में, नवरात्रि- जो स्त्री शक्ति के नौ दिनों का उत्सव है- उसकी शुरुआत भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होती है।
उगादी और गुड़ी पड़वा के दिन मराठा झंडा शान से फहराया जाता है और ज़िंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों को अपनाने के प्रतीक के तौर पर नीम की ताज़ी पत्तियां खाई जाती हैं। कश्मीर में नवरेह बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है, जहाँ चावल, ताज़ी सब्ज़ियों और पंचांग से सजी एक थाली को दरवाज़े की चौखट पर रखा जाता है। ये हमारी सभ्यता का ये बताने का तरीका है कि नए साल की शुरुआत ज्ञान, प्रकृति और पोषण- इन तीनों के साथ होनी चाहिए।
कावेरी के किनारों से लेकर कश्मीर की वादियों तक, और सिंध के तटों से लेकर महाराष्ट्र के खेतों तक, इन सभी क्षेत्रीय त्योहारों की जड़ें एक ही हैं: हमारा हिंदू चंद्र-सौर कैलेंडर। नामों और रिवाज़ों का ये अलग-अलग रूप तो बस ये बताता है कि हमारी ये परंपरा भौगोलिक रूप से कितनी विशाल है।
इसके बावजूद, जब भारत एक गणतंत्र बना, तो इनमें से कुछ भी हमारे ‘आधिकारिक’ कैलेंडर का हिस्सा नहीं बन पाया। न कोई राष्ट्रीय अवकाश घोषित हुआ, न सरकार ने कोई आदेश निकाला। जो भारत की सभ्यता का असली नया साल था, उसे सिर्फ लोगों के घरों और निजी ज़िंदगी तक समेट कर छोड़ दिया गया।
ईसाई धर्म और ब्रिटिश राज का वो ग्रेगोरियन कैलेंडर कैलेंडर जिसे आज़ाद भारत ने आंख मूंदकर अपना लिया
ग्रेगोरियन कैलेंडर को फरवरी 1582 में पोप ग्रेगरी XIII ने ‘इंटर ग्रेविसिमास’ नाम के एक आदेश के ज़रिए लागू किया था। इसका इकलौता मकसद पुराने जूलियन कैलेंडर की कमियों को दूर करना था ताकि ‘ईस्टर’ (जो ईसाइयों का सबसे पवित्र दिन है) सही मौसम में आ सके। सीधी सी बात है, ग्रेगोरियन कैलेंडर को पूरी तरह से और सिर्फ ईसाई धर्म के प्रशासन को चलाने के लिए बनाया गया था।
इसके महीनों के नाम रोमन सम्राटों (जूलियस सीज़र के नाम पर जुलाई, ऑगस्टस सीज़र के नाम पर अगस्त) और रोमन देवताओं (जानूस पर जनवरी, मार्स पर मार्च, मैया पर मई) के नाम पर रखे गए हैं। इसके साल की गिनती- AD, जिसका मतलब होता है ‘ईश्वर के वर्ष में’- साफ-साफ ईसा मसीह के जन्म से शुरू होती है।
ग्रेगोरियन कैलेंडर में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे ‘यूनिवर्सल’, सेक्युलर या वैज्ञानिक कहा जा सके। ये पूरी तरह से एक धार्मिक दस्तावेज़ है जिसे बस प्रशासनिक कपड़ों में लपेट कर पेश कर दिया गया है।
ब्रिटिश राज को अपनी पूरी दुनिया पर राज करने के लिए एक ‘प्रशासनिक कैलेंडर’ चाहिए था, इसलिए उन्होंने इसे अपनी औपनिवेशिक नौकरशाही का स्टैंडर्ड बना दिया। जहां-जहां ब्रिटिश झंडा फहराया, वहां-वहां ये ग्रेगोरियन कैलेंडर भी थोप दिया गया- इसलिए नहीं की वहां के आम लोगों ने इसे चुना था, बल्कि इसलिए क्योंकि अंग्रेजों के ‘सिस्टम’ को इसकी ज़रूरत थी।
भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। 1947 में आज़ादी मिलने तक हमारे सारे सरकारी रिकॉर्ड, अदालती कामकाज, टैक्स और प्रशासन इसी ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से चलने लगे थे। उस वक़्त नेहरू और संविधान सभा के सामने एक बड़ा सीधा सा सवाल था- क्या हम अंग्रेजों की दी हुई इस गुलामी की निशानी को ही ढोते रहेंगे, या अपनी विरासत वापस अपनाएंगे?
दुनिया के कई देशों ने इस सवाल का जवाब पूरे आत्मविश्वास के साथ दिया। जापान ने ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ अपनी पारंपरिक शाही प्रणाली को भी बनाए रखा- आज भी जापान अपने घरेलू सरकारी कामकाज में ‘रीवा’ (Reiwa) युग (जो 2019 से शुरू हुआ) का इस्तेमाल करता है।
ईरान अपना नया साल ‘नवरोज़’ (जो वसंत विषुव पर आता है) के रूप में मनाता है और उनका आधिकारिक कैलेंडर ‘सौर हिजरी’ है। इज़राइल में हिब्रू कैलेंडर चलता है, जिसके हिसाब से अभी 5785 वां साल चल रहा है। सऊदी अरब आधिकारिक रूप से इस्लामिक हिजरी कैलेंडर का इस्तेमाल करता है।
थाईलैंड में बौद्ध युग का कैलेंडर (फिलहाल BE 2568) चलता है। ये कोई पिछड़े हुए या कटे-फटे देश नहीं हैं। ये वो आज़ाद सभ्यताएं हैं जिन्होंने अपनी जड़ों का सम्मान करना चुना, और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्रेगोरियन स्टैंडर्ड के साथ भी तालमेल बिठाकर रखा। दुनिया की तमाम पुरानी सभ्यताओं में बस अकेला भारत ही ऐसा निकला, जिसने अपने समय की चाबियां चुपचाप विदेशियों के हाथ में थमा दीं।
1952 का वो दिखावा जब एक हिंदू राजा के नाम से घबराकर नेहरू ने विक्रम संवत को कैलेंडर के रूप में नकार दिया गया
नेहरू ने नवंबर 1952 में मशहूर खगोलशास्त्री डॉ. मेघनाद साहा की अध्यक्षता में एक ‘कैलेंडर सुधार समिति’ बनाई थी। इस समिति का काम भारत भर में इस्तेमाल हो रहे अलग-अलग कैलेंडरों की स्टडी करके एक अकेला, स्टैंडर्ड नेशनल कैलेंडर सुझाना था।
1955 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसकी खोजबीन कमाल की थी- इसने देश भर में चल रहे तीस से ज़्यादा अलग-अलग कैलेंडरों का दस्तावेजीकरण किया, जिनमें विक्रम संवत से लेकर शालिवाहन शक तक और तमिल सौर कैलेंडर से लेकर बंगाली चंद्र-सौर सिस्टम तक सब शामिल थे।
अब सवाल है की समिति ने सिफारिश क्या की? उन्होंने शालिवाहन शक कैलेंडर के सुधारे हुए रूप को भारत के ‘राष्ट्रीय पंचांग’ (National Calendar) के तौर पर अपनाने की सिफारिश की। शक संवत, जिसका पहला साल 78 CE से शुरू होता है, उसे ही आधार चुना गया। 22 मार्च 1957 (चैत्र 1, 1879 शक संवत) को इसे आधिकारिक तौर पर अपना लिया गया। तय हुआ की सरकारी काम-काज, भारत के राजपत्र (Gazette) और सरकारी प्रकाशनों में इसी का इस्तेमाल होगा।
पर असली धोखा तो यहीं से शुरू हुआ। भारत के अपने युग, शक संवत, पर आधारित एक राष्ट्रीय कैलेंडर लागू तो कर दिया गया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसे कभी ढंग से अपनाया ही नहीं गया। सारे सरकारी दफ्तर उसी ग्रेगोरियन कैलेंडर पर चलते रहे। कोर्ट-कचहरी की तारीखें ग्रेगोरियन सिस्टम में ही मिलती रहीं।
बैंकों का कामकाज उन्हीं अंग्रेज़ी महीनों पर चलता रहा। स्कूलों के अकैडमिक साल भी उसी हिसाब से तय हुए और तो और, सैलरी भी उसी ग्रेगोरियन शेड्यूल पर मिलती रही। ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ सिर्फ सरकारी पन्नों के हेडर पर छपने वाली एक शो-पीस चीज़ बनकर रह गया जिसे असल ज़िंदगी में तुरंत नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था।
इससे भी बड़ी बात यह है की समिति की बातचीत एक ऐसा सवाल खड़ा करती है जिसका आज तक कोई सही जवाब नहीं मिला- विक्रम संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर क्यों नहीं चुना गया? जबकि यह उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला कैलेंडर था, और करोड़ों हिंदू अपनी खेती-बाड़ी, पूजा-पाठ और सामाजिक कामों के लिए इसी पर निर्भर थे।
शक संवत ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण ज़रूर था, लेकिन विक्रम संवत के मुकाबले इसका दायरा काफी सीमित था। भारतीय उपमहाद्वीप में ज़्यादातर हिंदुओं के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का मुख्य आधार तो विक्रम संवत ही था।
ऐसा लगता है की शक संवत को विक्रम संवत पर तरजीह सिर्फ इसलिए दी गई ताकि किसी हिंदू राजा- विक्रमादित्य- के स्पष्ट नाम और उससे जुड़े सांस्कृतिक प्रतीकों से बचा जा सके। यही थी नेहरूवादी सेक्युलरिज्म की असली शक्ल- सभी परंपराओं के प्रति तटस्थ रहना नहीं, बल्कि जो बहुसंख्यक हिंदू परंपरा थी, उसे ही सिस्टमैटिक तरीके से दबा देना।
नेहरू का वो विदेशी चश्मा जिसे अपना वैज्ञानिक हिंदू पंचांग महज़ एक अंधविश्वास लगा
नेहरू ने जो फैसले लिए, उन्हें समझने के लिए उस इंसान के दिमाग की बनावट को समझना होगा। नेहरू की पढ़ाई-लिखाई हैरो और कैंब्रिज में हुई थी, और खुद उन्हीं की मानें तो, भारत लौटने पर वो इलाहाबाद के मंदिरों से ज़्यादा लंदन के ड्रॉइंग रूम की आबोहवा में सहज महसूस करते थे।
उनकी आत्मकथा ‘टुवार्ड फ्रीडम’ और उनकी मशहूर किताब ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ को पढ़कर साफ पता चलता है की उनका दिमाग भारतीय सभ्यता से आकर्षित तो था, लेकिन इसके धार्मिक और सांस्कृतिक तौर-तरीकों से उन्हें गहरी बेचैनी होती थी।
नेहरू भारत को बस एक ‘आइडिया’ के रूप में- एक दार्शनिक या ऐतिहासिक चीज़ के रूप में- पसंद करते थे, लेकिन भारत की जो असली, जीती-जागती और भक्ति में डूबी हुई सभ्यता थी, उसे लेकर उनके मन में हमेशा एक शक बना रहता था।
‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में नेहरू ने भारतीयों के अंदर ‘साइंटिफिक टेम्पर’ (वैज्ञानिक सोच) विकसित करने की बात लिखी थी- यही शब्द बाद में नेहरूवादी शिक्षा नीति की नींव बन गया। दिक्कत विज्ञान या खोज से कभी नहीं थी; दिक्कत इस बात से थी की नेहरू ‘विज्ञान’ किसे मानते थे।
उनके लिए ‘वैज्ञानिक मनोवृत्ति’ का मतलब पश्चिमी सोच की नकल करना और उनके ढांचों को अपनाना था, न की भारत के अपने विज्ञान की परंपराओं को आगे बढ़ाना। उन्हें हिंदू कैलेंडर, पंचांग और तिथि का सिस्टम आधुनिकता के रास्ते का रोड़ा लगता था।
वो इन्हें किसी पुराने ज़माने का अंधविश्वास मानते थे, जबकि सच तो ये था की ये बेहद शानदार और सटीक खगोलीय प्रणालियां थीं जो हज़ारों सालों से भारतीय सभ्यता का काम चला रही थीं। हालांकि ये रवैया सिर्फ नेहरू का नहीं था; ये उस पूरी वेस्टर्नाइज्ड (पश्चिमी रंग में रंगी) उच्च वर्ग की निशानी थी जिसे अंग्रेज़ों की शिक्षा नीति ने बड़ी फुर्सत से तैयार किया था और जिसने मानसिक गुलामी को ही आधुनिकता मान लिया था।
नेहरू के मामले में जो बात सबसे ज़्यादा चौंकाती है, वो है उनके ‘धर्मनिरपेक्ष आधुनिकतावाद’ का दोगलापन। उन्होंने अंग्रेजी को सह-आधिकारिक भाषा बनाए रखा- जो की सरासर गुलामी की निशानी थी। उन्होंने 1860 में मैकाले द्वारा लिखे गए इंडियन पीनल कोड (IPC) को लगभग ज्यों का त्यों लागू कर दिया। उन्होंने वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल और ब्रिटिश संवैधानिक परंपराओं को ढोना जारी रखा।
ज़िला प्रशासन का सिस्टम, इंडियन सिविल सर्विस (जिसे बस नाम बदलकर IAS कर दिया गया), पुलिस का ढांचा और न्यायपालिका- सब कुछ अंग्रेजों वाला ही रखा। इनमें से किसी भी चीज़ पर नेहरू ने एक पल के लिए भी रुककर ये नहीं सोचा की क्या ये संस्थाएं एक हिंदू बहुसंख्यक सभ्यता के लिए सांस्कृतिक रूप से सही हैं?
लेकिन जब बात कैलेंडर की आई- जहां हमारे पास अपना खुद का, सदियों से परखा हुआ और पूरी तरह से वैज्ञानिक विकल्प मौजूद था- तो अचानक नेहरू का मॉर्डनिज्म जाग उठा और उन्हें लगने लगा की भारत को इंटरनेशनल (यानी पश्चिमी) स्टैंडर्ड के हिसाब से ही चलना चाहिए।
ये किसी भी मानसिक रूप से गुलाम बौद्धिक वर्ग की सबसे बड़ी पहचान होती है- ये मान लेना कि जो कुछ ‘पश्चिमी’ है वही पूरी दुनिया के लिए सही है, और जो ‘देसी’ है वो संकीर्ण या पिछड़ा हुआ है। नेहरू ने कोई जानबूझकर गुलामी नहीं चुनी थी- उन्हें तो सच में यही लगता था की वो आधुनिकता चुन रहे हैं। लेकिन अंजाम तो वही हुआ। आज़ाद भारत की नींव उसी औपनिवेशिक ढांचे पर रखी गई, उसे तिरंगे में लपेटा गया और लोगों के हाथों में थमा कर कह दिया गया की लो भाई, आ गई आज़ादी।
कैलेंडर तो इस पूरी बड़ी तस्वीर का बस एक छोटा सा हिस्सा है- लेकिन ये सबसे ज़्यादा पोल खोलने वाला हिस्सा है, क्योंकि ये रोज़मर्रा की ज़िंदगी से बड़े गहरे से जुड़ा है। आप नए साल के रूप में क्या मनाते हैं, यही तय करता है की आप खुद को क्या मानते हैं।
विदेशी कैलेंडर वाली वो खामोश गुलामी जिसने आज की पीढ़ी को अपनी ही जड़ों से काट दिया
ग्रेगोरियन कैलेंडर को भारत के राजकाज का उपयोगी ढांचा बनाने के जो नतीजे निकले, वो बड़े गहरे रहे हैं और हर गुज़रती पीढ़ी के साथ ये नुकसान बढ़ता ही जा रहा है।
इसका सबसे पहला और सीधा असर ये हुआ की एक सांस्कृतिक आयोजन के तौर पर हिंदू नव वर्ष की अहमियत कम हो गई। जब सरकारी कैलेंडर ही चीख-चीख कर कहता है की नया साल 1 जनवरी को है, तो सारा का सारा सरकारी तामझाम- सरकारी घोषणा, स्कूल एडमिशन, वित्तीय वर्ष का हिसाब-किताब, अख़बारों के एडिटोरियल- सब उसी तारीख़ के इर्द-गिर्द घूमने लगता है।
इसके उलट, चैत्र नव वर्ष को ऐसा कोई सरकारी रुतबा नहीं मिलता। कोई राष्ट्रीय अवकाश नहीं होता। भारत के प्रधानमंत्री चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर देश को संबोधित नहीं करते। नेशनल टीवी पर कोई खास प्रोग्राम नहीं आते। इस देश में बड़े हो रहे हर हिंदू बच्चे को बड़ा सीधा सा मैसेज मिलता है- तुम्हारा नया साल बस तुम्हारे घर का एक निजी और धार्मिक मामला है। असली नया साल तो वही है जो 1 जनवरी को आता है और जिसे पूरा देश मनाता है।
इसका लोगों के दिमाग पर बहुत गहरा असर पड़ा है। भारतीयों की कई पीढ़ियाँ अपने खुद के सभ्यता वाले कैलेंडर से पूरी तरह कट कर बड़ी हुई हैं। आज के किसी शहरी युवा से पूछकर देखिए की विक्रम संवत 2082 का क्या मतलब है, वो बस आपका मुंह ताकता रह जाएगा।
उसी इंसान से पूछिए की अभी कौन सा साल चल रहा है, वो बिना पलक झपकाए 2026 बोल देगा। ग्रेगोरियन कैलेंडर लोगों के दिमाग में फिट हो गया है, जबकि संवत बस एक ‘अजीब सी चीज़’ बनकर रह गया है। और ये कोई अपने-आप नहीं हुआ है। ये पिछले पचहत्तर सालों से पूरी तरह ग्रेगोरियन घड़ी पर सरकार चलाने का सीधा नतीजा है।
इसके नुकसान हमारी खेती-बाड़ी और इकोलॉजी (पर्यावरण) तक भी पहुंचे हैं। पारंपरिक भारतीय खेती पूरी तरह से इसी चंद्र-सौर कैलेंडर के हिसाब से चलती थी। बीज बोने से लेकर फसल काटने तक का समय, मेलों-बाज़ारों का वक़्त, और सौदे या लेन-देन के लिए शुभ दिन- ये सब तिथि सिस्टम और चंद्र महीनों के हिसाब से ही तय होता था।
लेकिन ग्रेगोरियन कैलेंडर की तारीखें तो फिक्स होती हैं, उनका चाँद या तारों की गति से कोई लेना-देना ही नहीं होता। इसकी वजह से हमारे पारंपरिक किसान बुरी तरह भ्रमित हो गए हैं। जब सरकार की खेती-बाड़ी की एडवायज़री, सब्सिडी की सारणी और लोन चुकाने की डेडलाइनें ग्रेगोरियन तारीखों पर चलती हैं, तो वो बेचारा किसान जो आज भी चांद के महीनों के हिसाब से सोचता है, वो सरकारी सिस्टम के सामने हमेशा घाटे में ही रहता है।
ज़रा पाकिस्तान का ही अजीबोगरीब केस देख लीजिए। एक ही उपमहाद्वीप, बँटवारे से पहले की एक ही सांस्कृतिक विरासत और एक ही औपनिवेशिक इतिहास साझा करने के बावजूद, पाकिस्तान सरकारी कामकाज के लिए ग्रेगोरियन के साथ-साथ इस्लामिक हिजरी कैलेंडर को आधिकारिक मान्यता देता है।
वहां ‘ईद’ एक नेशनल हॉलिडे है और इसकी तारीख उनके इस्लामिक चांद वाले कैलेंडर से तय होती है- सरकार इसकी घोषणा करती है, कोर्ट इसे मानते हैं और बाज़ार भी इसका सम्मान करते हैं। इसके ठीक उलट, हमारा ‘सेक्युलर’ भारत बहुसंख्यक समाज के कैलेंडर को कोई भी ‘आधिकारिक’ जगह देने से साफ़ इनकार कर देता है।
भारत जैसे गणराज्य में रहने वाले एक हिंदू को अपने पुश्तैनी कैलेंडर के लिए उतनी भी सरकारी मान्यता नहीं मिली है, जितनी इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान में रहने वाले एक मुस्लिम को मिली हुई है। यही तो है नेहरूवादी सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा विरोधाभास!
नेहरू के चमचों के बहाने और वो क्यों टिक नहीं पाते
नेहरू के इस कैलेंडर वाले फैसले को सही ठहराने वाले लोग आमतौर पर गिने-चुने कुछ बहाने ही देते हैं, और ज़रा सा कुरेदने पर वो सारे बहाने ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।
पहला बहाना ये की ग्रेगोरियन तो इंटरनेशनल स्टैंडर्ड है, और ग्लोबल व्यापार या डिप्लोमेसी के लिए भारत को भी उसी हिसाब से चलना ज़रूरी था।
कोई भी समझदार इंसान ये नहीं कह रहा है की अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए भारत ग्रेगोरियन कैलेंडर का इस्तेमाल करना बंद कर दे- बिल्कुल नहीं, दूसरे देशों के साथ व्यापार अनुबंध और कूटनीतिक चिट्ठी-पत्री तो एक साझा मानक पर ही होनी चाहिए।
लेकिन उस प्रैक्टिकल ज़रूरत का मतलब ये थोड़ी है की आप अपने घरेलू कामकाज से अपने स्वदेशी कैलेंडर को ही पूरी तरह मिटा दें! जापान, इज़राइल, ईरान और थाईलैंड- ये सब अंतरराष्ट्रीय कामों के लिए ग्रेगोरियन का इस्तेमाल करते हैं, पर अपने घरेलू और ऑफिशियल कामों के लिए उन्होंने अपना पारंपरिक कैलेंडर ही बचाकर रखा है। भारत भी बिल्कुल ऐसा कर सकता था- और सच कहूं तो उसे आज भी ऐसा ही करना चाहिए।
दूसरा बहाना बड़ा अजीब है की विक्रम संवत तो एक ‘धार्मिक’ कैलेंडर है, इसलिए सेक्युलर देश के लिए ठीक नहीं है। ये शायद सबसे बड़ा झूठ है, क्योंकि ये हिंदू परंपराओं को तो उस पैमाने पर तौलता है जो ग्रेगोरियन पर कभी लागू ही नहीं किया गया। ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनी उत्पत्ति, अपनी बनावट और सालों की गिनती में पूरी तरह से और डंके की चोट पर धार्मिक है।
Anno Domini -AD- का तो शाब्दिक अर्थ ही है ‘ईश्वर के वर्ष में’, जो सीधे-सीधे ईसा मसीह की तरफ इशारा करता है। इस कैलेंडर के महीनों के नाम रोमन सम्राटों और मूर्तिपूजक देवताओं पर रखे गए हैं। ‘जनवरी’ जानूस के नाम पर है जो शुरुआत का देवता था। ‘मार्च’ मार्स के नाम पर है जो युद्ध का देवता था।
अगर किसी कैलेंडर के पीछे धार्मिक कनेक्शन होना ही उसे बाहर निकालने का पैमाना है, तो सबसे पहले तो इसी ग्रेगोरियन कैलेंडर को बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए था।
अपनी जड़ों की ओर वापसी और हिंदू नव वर्ष को उसका खोया हुआ सरकारी हक दिलाने की लड़ाई
अच्छी बात ये है की अब थोड़ी-बहुत हवा का रुख बदल रहा है। बीजेपी शासित कुछ राज्यों में चैत्र नव वर्ष को पब्लिक हॉलिडे घोषित किया गया है- ये अपनी सभ्यता को वापस पाने की दिशा में भले ही छोटा, पर प्रतीकात्मक रूप से एक बड़ा कदम है।
कई मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री ने हिंदू नव वर्ष की आधिकारिक बधाइयां दी हैं। पूरे देश में कई सांस्कृतिक संगठन विक्रम संवत को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं, पंचांग बांट रहे हैं और नव वर्ष के जश्न में अब शहरी मिडिल क्लास भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है।
संसद से लेकर आम पब्लिक तक, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ‘गज़ेटेड नेशनल हॉलिडे’ बनाने की मांग भी अब ज़ोर पकड़ने लगी है।
छुट्टी वाले सवाल से आगे बढ़कर देखें, तो अपनी सभ्यता को वापस पाने का एक कहीं ज़्यादा गहरा प्रोजेक्ट हमारा इंतज़ार कर रहा है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था को विक्रम संवत, तिथि सिस्टम और पंचांग की इस पूरी संस्कृति को वापस स्कूलों में लाना होगा- सिर्फ सांस्कृतिक गर्व के लिए नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ के लिए भी।
भारतीय कैलेंडर सिस्टम की खगोलीय सटीकता- जैसे चांद और सूरज के साल का कमाल का तालमेल, त्योहारों के पीछे छिपी खगोलीय पर्यवेक्षण, और खेती व प्रकृति के चक्रों से इसका गहरा नाता- ये ज्ञान का एक ऐसा खज़ाना है जिसे ग्रेगोरियन कैलेंडर की जगह नहीं, बल्कि उसके साथ-साथ हर स्कूल में पढ़ाया जाना चाहिए।
मकसद ग्रेगोरियन कैलेंडर को भारतीय ज़िंदगी से पूरी तरह मिटाना नहीं है। मकसद एक संतुलन बनाना है- ताकि भारतीयों की अगली पीढ़ी अपना ‘संवत’ साल भी जाने और ‘ग्रेगोरियन’ साल भी, ज़रूरत पड़ने पर दोनों को मनाए, और ये समझे की उनके पुरखों का समय गिनने का तरीका कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक विज्ञान था।
एक ‘दोहरी कैलेंडर प्रणाली’ (जैसी जापान, इज़राइल और ईरान करते हैं) भारत के लिए पूरी तरह से मुमकिन है। इसके लिए सिर्फ उस इच्छाशक्ति की ज़रूरत है जिसे 79 सालों के नेहरूवादी राजकाज ने जानबूझकर दबा कर रखा।
