गोरखपुर स्टेशन से बस कुछ ही कदम की दूरी पर महाराणा प्रताप मार्ग है। वहीं एक साधारण सी दो मंजिला इमारत है। बंद दरवाज़े के ठीक ऊपर योगी आदित्यनाथ का एक धुंधला सा पोस्टर आज भी टंगा है। आस-पास के दुकानदार बताते हैं की पहले रोज़ सुबह कोई न कोई आकर इस दफ्तर को खोलता था। आज यह खामोश इमारत यू.पी. की सियासत के सबसे बड़े और असरदार फैसले की गवाह बनकर खड़ी रह गयी है। यह फैसला था हिंदू युवा वाहिनी (HYV) को पूरी तरह भंग करने का। जी हां, वही संगठन जिसने गोरखपुर के एक युवा संन्यासी को देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया।
अप्रैल 2002 में बनी हिंदू युवा वाहिनी असल में गोरखपुर के तत्कालीन युवा सांसद योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व का ‘यूथ इंजन’ थी। पूरे बीस सालों तक इस संगठन ने पूर्वी यूपी में योगी की राजनीतिक ज़मीन के लिए एक वैचारिक रीढ़ और सड़क पर उतरने वाली ‘मसल पावर’ का काम किया। इसने हिंदू युवाओं को इकट्ठा किया, ज़ोर-शोर से गौ-रक्षा अभियान चलाए, घर वापसी (धर्मांतरण रोककर वापस हिंदू बनाना) के प्रोग्राम किए, और हिंदू संस्कृति को बचाने के नाम पर पूरे के पूरे ज़िलों में एक भौकाल कायम कर दिया। इसी वाहिनी ने योगी को वो सियासी ताक़त दी जिसके आगे बीजेपी के दिल्ली वाले आलाकमान को भी झुकना पड़ा।
वैसे, 3 अगस्त 2022 को योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर आकर ऐलान कर दिया की अब हिंदू युवा वाहिनी भंग की जा रही है। हर राज्य, क्षेत्रीय और ज़िला इकाई रातों-रात खत्म कर दी गई। जो लोग अंदर की सियासत नहीं समझते, उन्हें लगा की, जिस संगठन ने उन्हें नेता बनाया, उसी के साथ धोखा हो गया! लेकिन सच कहूं तो, जो इस सियासी बिसात को समझते थे, वो जानते थे की ये योगी का अब तक का सबसे मास्टरस्ट्रोक था।
यह आर्टिकल बस किसी संगठन के खत्म होने की कहानी नहीं है, बल्कि उसके जन्म, संघ और बीजेपी से उसकी खटपट, 2017 के बाद की अंदरूनी कलह और फिर एक विचार के बड़े हो जाने का पूरा घटनाक्रम है।
हिंदू युवा वाहिनी के पीछे का चेहरा और सी.एम. बनने से पहले वाले योगी आदित्यनाथ
हिंदू युवा वाहिनी को समझना है तो पहले उस ज़मीन को समझना होगा जहां से योगी आदित्यनाथ निकले। 5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पंचूर गांव में अजय मोहन सिंह बिष्ट का जन्म हुआ। एक फॉरेस्ट रेंजर के घर पैदा हुए इस लड़के का शुरुआती जीवन देखकर कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था की आगे चलकर क्या होने वाला है। गणित में डिग्री लेने के बाद 90 के दशक की शुरुआत में वो अयोध्या राम मंदिर आंदोलन की तरफ खिंचे चले आए और गोरखपुर के गोरक्षनाथ मठ के महंत अवैद्यनाथ की छत्रछाया में आ गए।
गोरक्षनाथ मठ कोई आम मंदिर नहीं है। 40 के दशक से ही पूर्वांचल की कट्टर हिंदू राजनीति का ये सेंटर रहा है। महंत दिग्विजय नाथ (अवैद्यनाथ से पहले वाले महंत) तो इतने कट्टर थे की उन्होंने मुसलमानों की वोटिंग राइट्स सस्पेंड करने तक की बात कह दी थी और गांधी के हत्यारे की तारीफ तक कर डाली थी। इसी पुरानी भगवा सियासत की विरासत को युवा अजय बिष्ट ने संभाला, नाम बदलकर योगी आदित्यनाथ रखा और मठ के वारिस बन बैठे।
1998 में महज़ 26 साल की उम्र में वो गोरखपुर से सांसद बन गए। लेकिन शुरुआत से ही उनकी यूपी बीजेपी के नेताओं के साथ तनातनी चलती रही। उन्हें लगता था की बीजेपी गठबंधन की राजनीति के चक्कर में हिंदुत्व के मुद्दे पर नरम पड़ रही है। बात 2002 के यूपी विधानसभा चुनावों तक इतनी बिगड़ गई की योगी ने बागी तेवर अपनाते हुए हिंदू महासभा के कैंडिडेट उतार दिए।
और तो और, उनके उतारे हुए डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने गोरखपुर शहर से बीजेपी के ही एक सिटिंग कैबिनेट मंत्री को हरा दिया! संदेश एकदम साफ़ था: योगी का अपना एक अलग रुतबा है, और वो इसे इस्तेमाल करने से डरने वाले नहीं हैं।
बस, इसी रुतबे को बीजेपी से अलग और ताकतवर बनाने के लिए उन्हें एक गाड़ी की ज़रूरत थी- और वो गाड़ी बनी हिंदू युवा वाहिनी।
हिंदू युवा वाहिनी का जन्म और राम नवमी अप्रैल 2002 का वो ऐतिहासिक दिन
इस संगठन के बनने की टाइमिंग कोई इत्तेफाक नहीं थी। अप्रैल 2002 में हिंदू राजनीति अपने उफान पर थी। कुछ ही हफ्ते पहले देश ने गुजरात के दंगे देखे थे, जिसने पूरे भारत की राजनीति का नक्शा बदल कर रख दिया था। हिंदी पट्टी के तमाम युवा लड़कों के अंदर एक कट्टरपन आ गया था; उन्हें लगने लगा था की ये जो सेक्युलर सिस्टम है, ये हिंदुओं के हक की रक्षा कभी नहीं कर पाएगा।
इसी गरमागरम माहौल के बीच 6 अप्रैल 2002 को, ठीक राम नवमी के दिन योगी आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी की नींव रखी। राम नवमी का दिन यूं ही नहीं चुना गया था, इसके पीछे भगवान राम, मंदिर आंदोलन और हिंदू अस्मिता को जोड़ने की गहरी सोच थी। कागज़ों पर तो ये छुआछूत मिटाने और हिंदू समाज को एक करने वाला एक ‘सामाजिक-सांस्कृतिक’ संगठन था।
लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही थी। असल में ये युवा और जोशीले लड़कों की एक ऐसी फौज थी जो किसी मिलिट्री की तरह काम करती थी, योगी के एक इशारे पर मरने-मारने को तैयार रहती थी और पूर्वी यूपी के गांव-देहात और कस्बों में गहराई तक घुस चुकी थी।
इसमें जुड़ने वाले ज़्यादातर लड़के गोरखपुर और उसके आस-पास के ज़िलों (देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बस्ती) से आते थे। ये वही किसान परिवारों के, लोअर-मिडिल-क्लास के पढ़े-लिखे लेकिन बेरोज़गार या कम पगार वाले नौजवान थे।
वाहिनी ने इन्हें सिर्फ एक विचारधारा नहीं दी, बल्कि भगवा झंडे के नीचे एक पहचान, एक ‘भाईचारा’ और जीवन का एक मकसद दिया। योगी खुद इसके ‘मुख्य संरक्षक’ थे, और हर पोस्टर पर उनका ही चेहरा चमकता था।
असल एजेंडा और ज़मीन पर वाहिनी के काम करने का तरीका
ये संगठन कई मोर्चों पर एक साथ काम करता था, और हर मोर्चा पूर्वी यूपी के हिंदुओं के किसी न किसी डर या परेशानी से जुड़ा था।
गौ रक्षा: ये इनका सबसे हिट प्रोग्राम था। पूर्वी यूपी, खासकर नेपाल बॉर्डर और मुस्लिम बहुल इलाकों में गायों की तस्करी का पुराना खेल था। वाहिनी के लड़कों ने बाकायदा ‘गौ रक्षा दल’ बना लिए। ये लोग हाईवे पर पहरा देते, मंडियों पर नज़र रखते और तस्करों से सीधे भिड़ जाते थे। चूंकि गांव-देहात में गाय से पैसा और धर्म दोनों जुड़े हैं, इसलिए इस काम ने वाहिनी को पब्लिक का ज़बरदस्त सपोर्ट दिलाया।
लव जिहाद के खिलाफ हल्ला-बोल: ‘लव जिहाद’ शब्द को पॉलिटिकल टूल की तरह इस्तेमाल करने वाले सबसे शुरुआती संगठनों में वाहिनी का ही नाम आता है। इनके लड़के ऐसे ज़िलों में बकायदा सर्विलांस करते थे जहां अलग-अलग धर्मों के लड़के-लड़कियां साथ दिख जाएं। फिर परिवारों को भड़काना और कई बार तो सीधे घुसकर बवाल काटना इनका रोज़ का काम था।
लोग इसे मोरल पुलिसिंग कहते, लेकिन इनके लिए ये ‘हिंदू रक्षा’ थी। मज़े की बात ये है की दशकों बाद यही नैरेटिव बीजेपी की मुख्य राजनीती का हिस्सा बना और 2021 में यूपी का धर्मांतरण कानून इसी आधार पर पास हुआ।
घर वापसी: वाहिनी ने खूब ज़ोर-शोर से ‘घर वापसी’ के कार्यक्रम चलाए, जहां इस्लाम या ईसाई धर्म अपना चुके लोगों को वापस हिंदू बनाया जाता था। इन इवेंट्स में खूब तामझाम होता था जिससे नेशनल मीडिया की भी अटेंशन मिलती थी।
हिंदू कल्चरल मोबिलाइजेशन: इसके अलावा ये एंटी-रोमियो स्क्वाड चलाते थे जो पार्कों में जा-जाकर ‘संदिग्ध’ लड़कों को खदेड़ते थे। सबसे बड़ी बात, इन्होंने इलाके के बाहुबलियों- खासकर मुख्तार अंसारी (जिसका मऊ और गाज़ीपुर में भारी खौफ था)- के खिलाफ खुद को एक काउंटर-फोर्स की तरह खड़ा कर दिया। अक्टूबर 2005 के मऊ दंगों ने तो सब कुछ साफ कर दिया।
जब बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय का मर्डर हुआ, तो वाहिनी ने ही हिंदुओं को सड़क पर उतारा। लगभग एक महीने तक मऊ में कर्फ्यू लगा रहा। इस घटना ने वाहिनी की इमेज एकदम ‘दबंग’ वाली बना दी, की जब हिंदुओं पर आंच आएगी तो ये पीछे नहीं हटेंगे।
कैसे हिंदू युवा वाहिनी ने योगी आदित्यनाथ का सियासी साम्राज्य खड़ा किया
हिंदू युवा वाहिनी कोई महज़ सांस्कृतिक क्लब नहीं था। सच कहूं तो ये चुनाव जिताने की एक धाकड़ मशीन थी। इसका सुबूत आपको खुद योगी जी के वोटों के मार्जिन में दिख जाएगा।
1998 और 1999 में योगी की जीत बहुत कम वोटों से हुई थी। लेकिन 2004 आते-आते (जब वाहिनी को बने दो साल हो चुके थे), कांग्रेस की भारी लहर के बावजूद योगी ने 1.42 लाख से ज़्यादा वोटों से जीत दर्ज़ की। 2009 में भी मार्जिन वैसा ही रहा और 2014 में तो ये 3 लाख के पार चला गया। ये नंबर किसी लहर के नहीं थे, ये उस ‘लोकल किले’ के नंबर थे जिसे वाहिनी ने ईंट-दर-ईंट खड़ा किया था।
इन्होंने हर ब्लॉक और बूथ लेवल तक अपनी कमेटियां बना ली थीं। आम दिनों में भगवा गमछा डालने वाले ये लड़के चुनाव आते ही घर-घर जाकर योगी के नाम पर वोट मांगते थे।
2007 में तो वाहिनी ने अपना सबसे बड़ा सियासी दांव चला। योगी ने धमकी दे डाली की वो बीजेपी के खिलाफ अपने 70 कैंडिडेट उतारेंगे। उन्होंने कुछ सीटों पर ऐसा किया भी, और उनमें से दो जीत भी गए! दिल्ली के बीजेपी हेडक्वार्टर तक मैसेज पहुंच गया की भाई, योगी आदित्यनाथ को तुम अनदेखा नहीं कर सकते।
वाहिनी अब पूर्वी यूपी में एक ‘पैरेलल सरकार’ (समानांतर सत्ता) बन चुकी थी। पुलिस थाने हों या कचहरी, वाहिनी के लड़कों का कहा माना जाने लगा था। जो काम अधिकारी बीजेपी दफ्तर से नहीं होते थे, वो महाराणा प्रताप मार्ग वाले इस दफ्तर से होने लगे थे।
अंदरूनी खटपट के बीच वाहिनी के बढ़ते कद से संघ और बीजेपी की बेचैनी
ये बात कोई छुपी हुई नहीं थी की RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और बीजेपी के साथ हिंदू युवा वाहिनी का रिश्ता हमेशा खटास भरा रहा। और इसके पीछे बड़ी वाजिब सी वजह थी।
RSS का पूरा सिस्टम कड़े अनुशासन पर चलता है। उनके अपने संगठन हैं- VHP, बजरंग दल, ABVP- और ये सब संघ के एक छतरी के नीचे काम करते हैं। लेकिन वाहिनी? वाहिनी संघ के प्रति नहीं, बल्कि सिर्फ एक इंसान (योगी) के प्रति वफादार थी। संघ को ऐसे ‘पर्सनैलिटी कल्ट’ (व्यक्ति पूजा) से हमेशा चिढ़ रही है क्योंकि ऐसी चीज़ें अक्सर कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं।
उधर, बजरंग दल और VHP वाले भी इस बात से परेशान थे की पूर्वांचल में उनके हिस्से के लड़के वाहिनी में जा रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है, वाहिनी उन्हें सिर्फ विचारधारा नहीं दे रही थी, बल्कि सीधे योगी के ‘पावर सिस्टम’ और रसूख की चाबी दे रही थी।
बीजेपी आलाकमान को ये डर सताता रहता था की योगी इस वाहिनी का इस्तेमाल कभी भी पार्टी से बगावत करने के लिए कर सकते हैं। लेकिन 2017 में गेम पूरी तरह पलट गया। बीजेपी ने योगी को यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया। यानी उन्हें वो सब दे दिया जो वो चाहते थे। अब बारी योगी की थी। संघ और बीजेपी को अब बदले में एक ही चीज़ चाहिए थी- उस आज़ाद पावर के ढाँचे को बदलना जिसने योगी को इतना बड़ा बनाया था। वाहिनी के भंग होने की असली कहानी इसी ‘लेन-देन’ की डील से शुरू होती है।
2017 की जीत का जश्न और फिर कैसे शुरू हुआ हिंदू युवा वाहिनी का पतन
मार्च 2017 में जब योगी सीएम बने, तो वाहिनी के लड़कों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। सालों तक पुलिस के डंडे खाने, केस झेलने और विरोधी सरकारों से लड़ने के बाद अब उनका अपना ‘गॉडफादर’ देश के सबसे बड़े सूबे का बॉस था। उन्हें लगा की अब लखनऊ पर भगवा लहराएगा।
लेकिन ये खुमारी ज़्यादा दिन नहीं टिकी। कुछ ही महीनों में वाहिनी के कल्चर और एक सरकार चलाने की ज़िम्मेदारियों के बीच का संघर्ष खुलकर सामने आ गया। सीएम का नाम लेकर वाहिनी के लड़के अब खुद को कानून से ऊपर समझने लगे थे। लखनऊ में घर में घुसकर मारपीट, बुलंदशहर में मॉब लिंचिंग का मामला, और 2018 में बागपत के कोर्ट रूम में एक कपल की पिटाई… ये सब घटनाएं योगी सरकार के लिए भारी फजीहत बन रही थीं।
योगी खुद की इमेज एक सख्त लॉ-एंड-ऑर्डर वाले नेता की बना रहे थे। ऐसे में उनकी अपनी ही एक प्राइवेट ‘गुंडा फौज’ सड़कों पर आतंक मचाए, ये बात उनके ब्रांड के बिल्कुल खिलाफ थी। संघ और बीजेपी ने भी साफ कर दिया की वो योगी को एक स्वतंत्र और बागी पावर-बेस बनाए रखने की इजाज़त नहीं देंगे। उन्होंने योगी को सीएम बनाकर एक एक्सेप्शन (छूट) दिया था, अब उन्हें बदले में संस्थागत वफादारी चाहिए थी, ना की कोई प्राइवेट आर्मी।
2017 के आखिर से ही वाहिनी को चुपचाप किनारे लगाना शुरू कर दिया गया। लखनऊ की यूनिट भंग कर दी गई। बलरामपुर, मऊ, आज़मगढ़ जैसी जगहों पर सैकड़ों वर्करों ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा था। लड़कों से कहा गया की अपनी बाइकों से ‘योगी सेवक’ वाले स्टिकर हटा लें।
सबसे बुरा हाल तो वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह का हुआ, जिसे कभी ‘योगी का हनुमान’ कहा जाता था। सरकार बनने के बाद उसे वाहिनी से निकाल फेंका गया। बेचारा सुनील सिंह, जिसने वाहिनी के ज़रिए खूब पावर और सरकारी ठेके एन्जॉय किए थे, बाद में समाजवादी पार्टी में जाकर शामिल हो गया। ये वाहिनी की उस पूरी पीढ़ी का मोहभंग था जिन्हें लगा था की योगी के सीएम बनने से उनके दिन भी रातों-रात बदल जाएंगे।
3 अगस्त 2022 को वाहिनी भंग करने का वो आखिरी और बड़ा फैसला
आख़िरकार 3 अगस्त 2022 को फाइनल शटर गिर गया। योगी अपने होम-ग्राउंड गोरखपुर में थे, और तभी ये ऐलान हुआ। वाहिनी के यूपी प्रभारी (और बीजेपी विधायक) राघवेंद्र प्रताप सिंह ने एक फॉर्मल स्टेटमेंट जारी किया की हिंदू युवा वाहिनी की सारी राज्य, क्षेत्रीय और ज़िला इकाइयां तत्काल प्रभाव से भंग की जाती हैं।
इस ऐलान के साथ एक ‘कवर स्टोरी’ भी दी गई की इसे बंद नहीं किया जा रहा है, बल्कि ‘री-स्ट्रक्चर’ किया जा रहा है। कहा गया की इसे नए सिरे से बनाया जाएगा, क्रिमिनल रिकॉर्ड वालों को बाहर किया जाएगा और 2024 के चुनाव के लिए इसे पश्चिमी यूपी तक फैलाया जाएगा।
यहां एक बात बिल्कुल क्लीयर साफ़ दूं: ये कोई सरकारी बैन नहीं था। पुलिस या कोर्ट का कोई ऑर्डर नहीं आया था। ये योगी आदित्यनाथ का खुद का लिया हुआ, अपनी मर्ज़ी का एक सोचा समझा फैसला था। इसे ‘बैन’ कहना सरासर गलत होगा; ये तो एक सोची-समझी ‘सेल्फ-डिज़ॉल्यूशन’ (खुद को खत्म करने की प्रक्रिया) थी।
हिंदू युवा वाहिनी को खत्म करने के पीछे की असली सियासी कहानी और वजहें
कहने को तो कहा गया की 2024 के लिए नयी संरचना हो रही है, लेकिन असली वजहें कई परतों में छुपी थीं:
पहली वजह – संघ का अनुशासन: RSS किसी दूसरी पावर को बर्दाश्त नहीं करता। जब तक योगी आज़ाद थे, संघ ने वाहिनी को झेला। लेकिन 2022 आते-आते योगी यूपी के निर्विवाद नेता और बीजेपी सरकार के वफादार सदस्य बन चुके थे। अब इस ‘प्राइवेट फौज’ को ढोने का कोई सियासी मतलब नहीं बचा था।
दूसरी वजह – बुलडोज़र ब्रांड: योगी को अपनी ‘कड़क मुख्यमंत्री’ वाली इमेज बचानी थी। सड़कों पर मारपीट करने वाले लड़कों की वजह से उनके ‘लॉ एंड ऑर्डर’ वाले ब्रांड की हवा निकल रही थी।
तीसरी वजह – मिशन कम्प्लीट: सीधी सी बात है, वाहिनी का जो काम था, वो पूरा हो चुका था। इसे योगी को गोरखपुर का बॉस और फिर सीएम की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए बनाया गया था। जब मंज़िल मिल गई, तो गाड़ी को पीठ पर लादकर घूमने का क्या तुक है?
चौथी वजह – पार्टी में विलय: वाहिनी के जो सबसे काम के और तेज़-तर्रार नेता थे, वो 2022 तक बीजेपी के सिस्टम में सेट हो चुके थे। कई विधायक बन गए, कुछ ज़िला अध्यक्ष तो कुछ मंडल प्रभारी। जो बाहर सड़क पर बचे थे, वो सिर्फ दागी और बवाल काटने वाले लड़के थे। वाहिनी का खोल उतारकर फेंकने से बीजेपी को अच्छे कैडर मिल गए और कबाड़ पीछे छूट गया।
पांचवीं वजह – 2024 का चुनाव: बीजेपी को 2024 के लिए ग्राउंड-लेवल पर एक नई वर्कर-फौज चाहिए थी। पुरानी, अनियंत्रित वाहिनी को खत्म करके ही एक नई, पार्टी के हिसाब से चलने वाली टीम खड़ी की जा सकती थी।
20 साल में वाहिनी पीछे क्या छोड़ गई?
अगर आप यूपी की आज की राजनीति समझना चाहते हैं, तो वाहिनी के इन 20 सालों को बिल्कुल अनदेखा नहीं कर सकते।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर देखें तो, वाहिनी ने पूर्वी यूपी के हिंदुओं के अंदर से वो डरा-सहमा सा रहने वाला भाव खत्म कर दिया था। उन्हें पहली बार लगा की कोई उनका अपना संगठन है जो उनकी भाषा बोलता है और माफियाओं से उनके लिए भिड़ सकता है। ये जो ‘दबदबा’ वाला अहसास है ना, ये संगठन खत्म होने के बाद भी लोगों के ज़हन में बना हुआ है।
पॉलिसी की बात करें तो, वाहिनी ने जो ‘लव जिहाद’ और ‘गौ रक्षा’ का एजेंडा सड़कों पर शुरू किया था, वो आज बीजेपी सरकार की मेनस्ट्रीम पॉलिसी बन चुका है। 2021 का धर्मांतरण कानून और अवैध बूचड़खानों पर तगड़ा एक्शन- ये उसी वाहिनी के बोए हुए बीज हैं जिन्हें आज सरकार कानून बनाकर काट रही है।
और हां, वाहिनी ने कट्टर हिंदू कार्यकर्ताओं की एक पूरी नई जनरेशन तैयार कर दी जो आज यूपी की गांव-गांव की राजनीति में घुसी हुई है- चाहे वो बीजेपी के विधायक हों या गांव के प्रधान।
आगे चलकर क्या वापसी होगी या ये हमेशा के लिए विदाई है?
अगस्त 2022 के बाद सबको यही लगा था की कोई नई वाहिनी सामने आएगी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव निकल गए और ऐसा कुछ नहीं हुआ। हां, पुराने लड़के ज़रूर अब भगवा की जगह बीजेपी के झंडे लेकर पूर्वांचल की बूथ कमेटियों में काम करते दिखे।
2024 के चुनाव नतीजों ने सबको चौंकाया। बीजेपी ने पूर्वांचल में कई सीटें गंवा दीं। अब कुछ पॉलिटिकल पंडित ये बहस करते रहते हैं की अगर वाहिनी अपने पुराने वाले फॉर्म में होती, तो शायद नतीजे कुछ और होते।
खैर, योगी आदित्यनाथ के लिए ये एक बदलाव था। वो अब कोई बागी सांसद नहीं हैं जो अपनी प्राइवेट फौज के दम पर बीजेपी को ब्लैकमेल करे। वो अब देश के सबसे अहम राज्य के सीएम हैं, हिंदुत्व का सबसे बड़ा संस्थागत चेहरा हैं। वाहिनी उनके बीते कल का एक हिस्सा थी।
ये कोई अंत नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व का नया रूप है
कुल मिलाकर बात ये है की 3 अगस्त 2022 को इसका ख़त्म होना किसी हारे हुए आंदोलन की कहानी नहीं थी। बल्कि ये एक ऐसे मिशन की कहानी थी जो इतने शानदार तरीके से सफल हुआ की अब इमारत खड़ी होने के बाद बाहर की मचान को हटाने का वक़्त आ गया था।
वाहिनी की जो असली ‘आत्मा’ थी, वो मरी नहीं है। वो आज योगी सरकार के बनाए कानूनों में, उनके काम करने के बुलडोज़र वाले तरीके में और भारतीय राजनीती की मुख्य चर्चाओं में ज़िंदा है।
सियासत में संगठन बनते-बिगड़ते रहते हैं। लेकिन जो भूख 2002 में उन नौजवानों के अंदर थी- गोरखपुर की सड़कों पर भगवा झंडे फहराने की, देवरिया के गांवों में घर वापसी करवाने की, और दशकों से डराने वाले माफियाओं की आंखों में आंखें डालकर खड़े होने की- वो भूख 3 अगस्त 2022 को कहीं गायब नहीं हो गई। उसने बस अपने लिए नए सरकारी और सियासी ठिकाने ढूंढ लिए हैं।
ये वाहिनी तो बस एक गाड़ी थी। योगी आदित्यनाथ ने इसे वहां तक चलाया जहां तक उन्हें इसकी ज़रूरत थी। और फिर अपने उसी पुराने कड़क अंदाज़ में उन्होंने इस गाड़ी को साइड में पार्क कर दिया, क्योंकि अब उनके पास आगे के सफर के लिए एक नई और ज़्यादा ताक़तवार मशीन मौजूद है।
इस पूरे सियासी खेल को अगर आप समझ गए, तो आप समझ जाएंगे की कैसे यूपी जैसे सबसे अहम राज्य में हिंदुत्व सड़क के ‘धरने-प्रदर्शन’ से उठकर ‘सत्ता के शिखर’ तक पहुंच गया।
