कल सुबह 27 मार्च 2026, नवमी और राम नवमी के दिन, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ‘मिशन शक्ति 6.0’ के अंतर्गत कन्या पूजन करेंगे। नौ देवियों का रूप मानी जाने वाली छोटी-छोटी बच्चियों की पूरे भक्ति-भाव से पूजा होगी, उन्हें प्रसाद खिलाया जाएगा और ढेरों आशीर्वाद के साथ विदा किया जाएगा।
हज़ारों साल पुरानी हमारी भारतीय सभ्यता की यही तो पहचान है। और हर साल की तरह, योगी जी के कार्यकाल में भी ये सब उनके निजी/मठ के खर्चे से ही होगा। टैक्सपेयर का एक रुपया भी इसमें नहीं लगेगा। किसी सरकारी अफ़सर को ज़बरदस्ती नहीं बुलाया जाएगा। बस एक मुख्यमंत्री, अपनी निजी आस्था से, नारी शक्ति का सम्मान कर रहा होगा।
और इस बार तो योगी जी ने राज्य के हर एक ज़िले में ‘कन्या सुमंगला योजना’ के प्रचार के लिए कन्या पूजन करने के आदेश दिए हैं।
अब हमारा सीधा सा सवाल है- अगर एक मुख्यमंत्री अपनी जेब से पैसे खर्च करके छोटी बच्चियों को देवी मानकर पूजता है, तो इससे दिक्कत किसे है? और ये वही लोग क्यों हैं जो दशकों तक सरकारी पैसे से होने वाली इफ्तार पार्टियों में जाते रहे? इस सवाल का जवाब भारत के सबसे बड़े पाखंड में छिपा है- और वो है दिखावे की धर्मनिरपेक्षता!
कन्या पूजन- जहाँ एक छोटी बच्ची भी साक्षात देवी है और शायद यही बात वामपंथियों को सबसे ज़्यादा चुभती है
इस पूरे बवाल को समझने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है की कन्या पूजन असल में होता क्या है। क्योंकि आलोचक जानबूझकर इस पर पर्दा डालते हैं। कन्या पूजन (या कंजक पूजा) नवरात्र की अष्टमी या नवमी को किया जाने वाला एक बेहद पुराना हिंदू अनुष्ठान है।
इसमें दो से दस साल तक की बच्चियों को बड़े आदर से घर या मंडप में बुलाया जाता है। उनके पैर धोए जाते हैं। उन्हें पूरे सम्मान के साथ बैठाकर हलवा, पूरी और चने का भोग लगाया जाता है।
हम उन्हें साक्षात मां दुर्गा के नौ रूपों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री- का जीवित रूप मानकर पूजते हैं।
ज़रा सोचिए इस बात को। एक ऐसी परंपरा जहां छोटी-छोटी बच्चियों के पैर धोए जाते हैं, उनके सामने सिर झुकाया जाता है, उन्हें सिर्फ बच्ची नहीं बल्कि साक्षात देवी माना जाता है। पूरी दुनिया में महिलाओं के सम्मान का इससे गहरा और दार्शनिक रूप शायद ही कहीं और मिले!
जिस देश में कुछ लोग दिन-रात हिंदुओं को ‘पुरुष प्रधानता’ पर लेक्चर पिलाते रहते हैं, वहीं एक ऐसी परंपरा ज़िंदा है जो एक छोटी बच्ची को- बिना उसकी जाति, बैकग्राउंड या परिवार देखे- सबसे ऊंचे आसन पर बिठाती है और देवी मान कर पूजती है।
कल 27 मार्च को योगी आदित्यनाथ ठीक यही करने जा रहे हैं। और वामपंथी इकोसिस्टम- यानी हमारा लेफ्ट-लिबरल खेमा- अभी से इस पर हर बार की तरह छाती पीट रहा है।
ऐसे में पूछना तो बनता है- आपकी असल तकलीफ़ है क्या? क्या बच्चियों की पूजा होने से दिक़्क़त है? या खुलेआम किसी हिंदू अनुष्ठान के होने से? या फिर इस बात से की एक मुख्यमंत्री पब्लिक में डंके की चोट पर हिंदू दिखने की हिम्मत कैसे कर रहा है?
इफ्तार पार्टी- दशकों तक हमारे टैक्स के पैसों से कैसे पोसा गया ‘वोट-बैंक का मज़हब’
अब ज़रा इस दोगलेपन की गहराई को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। वैसे बहुत पीछे जाने की ज़रूरत भी नहीं है। भारत में ‘पॉलिटिकल इफ्तार’ पार्टियों की शुरुआत हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी। वो रमज़ान के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में इफ्तार रखते थे। शुरुआत में ये सब बहुत निजी सा था। नेहरू बस अपने मुस्लिम दोस्तों को बुलाकर इफ्तार करते थे।
लेकिन नेहरू के बाद इन इफ्तार पार्टियों का रंग-रूप पूरी तरह बदल गया। 1970 के दशक में जब इंदिरा गांधी का दौर आया, तब तक ये दोस्तों का आपसी मिलना-जुलना नहीं रह गया था। ये एक सोचे-समझे पॉलिटिकल तमाशे में बदल गया- बड़े-बड़े वीआईपी गेस्ट, शानदार दावतें, और प्रभावशाली मुस्लिमों, नेताओं, राजनयिकों और पत्रकारों को लुभाने का पूरा इंतज़ाम।
इफ्तार अब वोट-बैंक की राजनीति का एक हथियार बन चुका था, जिसका खर्च भारत सरकार उठा रही थी, जो सरकारी बंगलों पर हो रहा था, और जिसमें सरकारी कर्मचारी और सरकारी बजट का इस्तेमाल हो रहा था।
और ये सिलसिला दशकों तक, हर सरकारी स्तर पर चलता रहा। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल… सब के सब पब्लिक के पैसों से इफ्तार पार्टियां दे रहे थे। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने तो 2017 तक ये परंपरा निभाई।
कांग्रेस पार्टी ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में 2015 तक बड़ी-बड़ी इफ्तार दावतें दीं। राज्य सरकारों की तो बात ही छोड़िए, ख़ासकर यूपी में पिछली समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान तो रमज़ान का इस्तेमाल पूरी तरह से सरकारी खर्चे पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए होता था।
ज़रा इन आंकड़ों पर नज़र डालिए। हज सब्सिडी (जो मुस्लिम धार्मिक आस्था पर सरकारी पैसा खर्च करने का एक और उदाहरण था) 1994 में 10.51 करोड़ रुपये थी, जो 2012-13 तक बढ़कर 836.56 करोड़ रुपये हो गई! एक आरटीआई से पता चला की यूपीए सरकार के दौरान मुस्लिम तीर्थयात्रियों की हवाई यात्रा सब्सिडी पर करीब 7,697 करोड़ रुपये फूंके गए।
अकेले 2016 में ये आंकड़ा लगभग 408 करोड़ रुपये था। आख़िरकार 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने माना की हज सब्सिडी न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि खुद कुरान की शिक्षाओं के भी खिलाफ है। इसके बाद अदालत ने इसे धीरे-धीरे खत्म करने का आदेश दिया, जिसे मोदी सरकार ने 2018 में पूरा किया।
तो ये रहा पूरा हिसाब-किताब आपके सामने- मुस्लिम धार्मिक सब्सिडी पर टैक्सपेयर के हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। राष्ट्रपति भवन, पीएम आवास और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बंगलों पर सरकारी इफ्तार हुए।
इस सबको ‘सेकुलरिज्म’ का नाम देकर खूब तालियां पीटी गईं। और आज जब एक सीएम अपनी जेब से पैसे खर्च करके कन्या पूजन कर रहा है- तो वो ‘सांप्रदायिक’ हो गया? अगर ये दोगलापन नहीं है, तो फिर शब्दकोष में इसके लिए कोई शब्द ही नहीं बना है।
दिवाली पर ‘ज्ञान’, होली पर ‘डर’ और ईद पर सरकारी जश्न का खेल
इफ्तार वाला मुद्दा तो सिर्फ एक नमूना है। ज़रा देखिए की हमारा ये पूरा ‘पॉलिटिकल मीडिया इंटेलेक्चुअल इकोसिस्टम’ साल भर आने वाले बड़े हिंदू त्योहारों के साथ कैसा बर्ताव करता है।
दिवाली को तो बस किसी तरह बर्दाश्त किया जाता है। दशकों तक किसी सेकुलर सरकार ने आधिकारिक तौर पर दिवाली मनाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। उलटा, जैसे ही दिवाली आती है, प्रदूषण, पटाखों और ‘जिम्मेदारी से त्योहार मनाने’ के ज्ञान वाले लेखों की बाढ़ आ जाती है।
दुनिया भर में सौ करोड़ से ज़्यादा लोग जो त्योहार मनाते हैं, उस पर ये लोग पर्यावरण का ऐसा लेक्चर पिलाते हैं की पूछिए मत। लेकिन यही ज्ञानियों की फौज बकरा ईद पर जानवरों के अधिकारों के नाम पर एकदम मौन व्रत धारण कर लेती है।
होली को भी बस झेल ही लिया जाता है। सेकुलर मीडिया में होली के आते ही पानी की बर्बादी, हुड़दंग और ‘बुरा न मानो होली है’ की आड़ में होने वाली बदतमीज़ियों की खबरें हावी हो जाती हैं। लेकिन क्या होली को कभी वैसा गर्मजोशी भरा संस्थागत प्यार मिला, जैसा विपक्ष के नेता हर साल ईद को देते हैं? होली खेलने के महत्व पर कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती। सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक दावत नहीं होती।
नवरात्र- नौ दिन का उपवास, भक्ति, गरबा और शक्ति की पूजा- शायद इसका सबसे सटीक उदाहरण है। गुजरात से लेकर बंगाल और हिमाचल से लेकर तमिलनाडु तक, करोड़ों भारतीय इन नौ दिनों में पूरे उल्लास के साथ पूजा-पाठ करते हैं।
लेकिन इसके जवाब में हमारा ‘सेकुलर’ विपक्ष क्या करता है? ज्यादा से ज्यादा एक सूखा सा सोशल मीडिया पोस्ट। ज़्यादातर तो नवरात्र का इस्तेमाल जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि बीजेपी शासित राज्यों में महिला सुरक्षा पर सवाल उठाने के लिए किया जाता है।
वामपंथीयो की असली तकलीफ़ किसी पॉलिसी से नहीं, बल्कि डंके की चोट पर ‘हिंदू’ दिखने से है
जब हम वामपंथी कहते हैं, तो इसका मतलब सिर्फ रजिस्टर्ड कम्युनिस्ट पार्टियों से नहीं होता (हालांकि वे भी इसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं)। यह असल में एक राजनीतिक ढांचा है- इसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के विपक्षी नेता शामिल हैं।
इसमें पुरानी मीडिया संस्थाओं में बैठे पत्रकार हैं। यूनिवर्सिटीज़ और एनजीओ (NGO) में घुसे अकादमिक कार्यकर्ता हैं। और इन सबके मैसेज को वायरल करने वाली एक बहुत बड़ी सोशल मीडिया आर्मी है। ये सब मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाते हैं जिसका भारत की पब्लिक की सोच पर हमेशा से ज़बरदस्त कब्ज़ा रहा है।
नवरात्र और हिंदू त्योहारों के दौरान इनका काम करने का तरीका एकदम फिक्स होता है।
स्टेप 1- मजबूरी में त्योहार की बधाई का एक ट्वीट कर दो। (वो भी ऐसे जैसे ट्रैफिक चालान भर रहे हों)
स्टेप 2- तुरंत आलोचना पर उतर आओ- महिला सुरक्षा के आंकड़े, क्राइम डेटा, और ‘यूपी में होने वाले दुष्कर्म का क्या?’ वाला पुराना राग
स्टेप 3- ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ पर सवाल उठाते हुए बड़े-बड़े विज्ञापन छाप दो और बीजेपी सरकार की तुलना दुनिया भर के तानाशाहों से कर दो।
स्टेप 4- सीधा सीएम योगी पर निशाना साधो और उनके निजी धार्मिक अनुष्ठान को एक राजनीतिक थोप-थाप साबित कर दो।
अब ज़रा ध्यान दीजिए की इस पूरी स्क्रिप्ट से क्या गायब है? इफ्तार के वक्त यही सारा लॉजिक हवा हो जाता है! जब कोई मुस्लिम नेता इफ्तार पार्टी देता है या उसमें शामिल होता है, तब कोई मुस्लिम बहुल इलाकों में क्राइम, हिंसा या आर्थिक पिछड़ेपन की बात नहीं करता। ये भेदभाव इतना साफ, इतना लगातार और इतना जानबूझकर किया जाता है की इसे महज़ इत्तेफाक नहीं कहा जा सकता। ये इनकी पक्की पॉलिसी है।
असल में इस इकोसिस्टम को किसी पॉलिसी से दिक्कत नहीं है। इनकी असली दिक्कत है पॉलिटिकल स्पेस में हिंदू संस्कृति के डंके की चोट पर दिखने से। ये लोग उस भारत में सुखी थे जहां हिंदू नेता बंद कमरों में तो पूजा करते थे, लेकिन पब्लिक में ‘सेकुलरिज्म’ का नाटक करते थे। अपने धर्म के लिए माफ़ी मांगते थे, मंदिरों से दूरी बनाए रखते थे, और खुद को ‘समावेशी’ साबित करने के लिए इफ्तार पार्टियों में हाज़िरी लगाते थे।
योगी आदित्यनाथ इस ड्रामे का हिस्सा बनने से साफ इनकार करते हैं। वो खुलेआम, बिना किसी झिझक के और पूरे गर्व के साथ हिंदू हैं। वो कन्या पूजन करते हैं और पूरी दुनिया को उसे देखने के लिए बुलाते हैं। और यही वो बात है जिसे ये लोग आज तक हज़म नहीं कर पाए हैं।
‘महिला सुरक्षा’ के घड़ियाली आंसू- जिन बच्चियों की पूजा हो रही है, विपक्ष उन्हीं का इस्तेमाल अपनी घटिया राजनीति के लिए कर रहा है
नवरात्र के दौरान सीएम योगी पर सबसे ज्यादा उछाला जाने वाला घिसा-पिटा तर्क यही है- ‘आप मां दुर्गा की पूजा करते हैं, लेकिन यूपी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं।’
पहली बात, योगी राज में यूपी के क्राइम के आंकड़े विपक्ष की मनगढ़ंत कहानियों से कहीं बेहतर हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) का डेटा साफ बताता है की पिछली समाजवादी पार्टी सरकार की तुलना में योगी के कार्यकाल में लॉ एंड ऑर्डर में काफी सुधार हुआ है।
अखिलेश यादव के जिस दौर को आज ये लोग विकल्प के तौर पर पेश करते हैं, उस दौर की पहचान ही बड़े-बड़े दंगे, गैंगस्टर्स को मिलने वाला संरक्षण और अपराधियों को मिलने वाली वो राजनीतिक छूट थी, जिसके चलते वे खुलेआम गुंडागर्दी करते थे।
दूसरी बात, इन आलोचकों का अपना रिकॉर्ड देखकर तो हंसी आती है। यूपी में मुख्य विपक्ष यानी समाजवादी पार्टी हमेशा गंभीर सवाल उठते रहे हैं। उन पर पीड़ितों को न्याय न मिलने देने और एक ऐसा कल्चर बनाने के आरोप रहे हैं जहां पुलिस की मदद भी अक्सर इंसान का समुदाय देखकर मिलती थी।
ये वही पार्टियां हैं जो कन्या पूजन के वक्त योगी को महिला सुरक्षा पर ज्ञान देती हैं, जबकि इनके खुद के नेताओं के चुनावी हलफनामे क्रिमिनल रिकॉर्ड्स से भरे पड़े हैं।
इसके अलावा, क्राइम की खबरों को चुनने में भी इनका दोगलापन साफ दिखता है। यूपी में योगी राज में कोई केस होता है तो नेशनल मीडिया उसे लपक लेता है, संसद ठप कर दी जाती है और कैंडल मार्च निकलने लगते हैं।
लेकिन कांग्रेस शासित राजस्थान, महाविकास अघाड़ी (MVA) के समय के महाराष्ट्र, या तृणमूल कांग्रेस के राज वाले पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ इससे भी खतरनाक अपराध होते हैं, तो वो प्राइम-टाइम डिबेट से ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग।
सीधी सी बात है- इन्हें महिलाओं की चिंता नहीं है, इन्हें बस बीजेपी से दिक्कत है!
निजी पैसा बनाम सरकारी खजाना- वो तर्क जिसका इनके पास कोई जवाब नहीं
अब बात करते हैं इस पूरी बहस के सबसे अहम बिंदु की, जिसे जानबूझकर हमेशा किनारे कर दिया जाता है। सीएम योगी आदित्यनाथ कन्या पूजन का पूरा खर्च अपनी खुद की जेब से उठाते हैं। यह उनके निजी/मठ के संसाधनों से होता है, न कि सरकारी खजाने से। और सिर्फ यही एक सच्चाई, सरकारी खर्चे पर होने वाली इफ्तार पार्टियों से इसकी तुलना को न सिर्फ बेबुनियाद, बल्कि आलोचकों के लिए शर्मनाक बना देती है।
भारत का संविधान ये बिल्कुल नहीं कहता की हमारे चुने हुए नेताओं को नास्तिक होना चाहिए। अनुच्छेद 25 (Article 25) हर नागरिक को- जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं- अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का मौलिक अधिकार देता है।
अगर कोई सीएम अपने पैसों से अपना निजी धार्मिक अनुष्ठान कर रहा है, तो वो बस अपना वही संवैधानिक हक इस्तेमाल कर रहा है जो देश के हर नागरिक को मिला है। इसमें कुछ भी अनोखा नहीं है, बस इतनी सी बात है की एक हिंदू नेता खुलेआम हिंदू होने का पालन कर रहा है। और हमारा सेकुलर इकोसिस्टम हमेशा से इसे एक ‘अलिखित नियम’ का उल्लंघन मानता आया है।
अब इसकी तुलना ज़रा इफ्तार की परंपरा से कीजिए। राष्ट्रपति भवन और पीएम आवास जैसे सरकारी बंगलों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इफ्तार दावतें दिया करते थे। सरकारी कर्मचारी इन इवेंट्स को मैनेज करते थे। सरकारी बजट से इन दावतों का बिल चुकाया जाता था। ये कोई निजी आस्था के काम नहीं थे। ये एक धार्मिक समुदाय के त्योहार पर सरकार की मुहर थी, जिसका खर्च हर धर्म का टैक्सपेयर उठा रहा था।
अगर सरकारी बंगले और फंड का इस्तेमाल करके रमज़ान की पार्टियां देना ‘सेकुलरिज्म’ है, तो फिर एक सीएम का नवरात्र पर अपनी जेब से पैसा खर्च करना क्या कहलाएगा?
लेफ्ट वाले दोनों हाथों में लड्डू नहीं रख सकते। ऐसा नहीं हो सकता की आप मुस्लिम नेताओं के खुलेआम धर्म निभाने, उनके जालीदार टोपी पहनने, दरगाहों पर जाने और इफ्तार की दावतें देने पर तो खूब तालियां बजाएं, लेकिन हिंदू नेताओं से कहें की वो अपनी पहचान छुपा कर रखें।
या तो हर नेता को अपनी निजी आस्था का हक है, या फिर किसी को नहीं। इस तरह की सुविधा वाली धर्मनिरपेक्षता असल में सेकुलरिज्म नहीं, बल्कि सेकुलरिज्म का चोला ओढ़े हुए एक गहरा पक्षपात है।
राम नवमी 2026 एक ऐसा संगम है जिसने इनका नैरेटिव हिला दिया
इस साल की नवमी कुछ ज़्यादा ही खास है, जिसने लेफ्ट की बेचैनी को और बढ़ा दिया है। 2026 में, नवमी और राम नवमी (भगवान राम का जन्मदिन) एक ही दिन पड़ रही हैं। और वो भी उस राज्य में जहां अयोध्या है, जहां दशकों लंबे संघर्ष के बाद जनवरी 2024 में पूरे देश के जश्न के बीच राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी। ऐसे में इस संगम का महत्व बहुत गहरा हो जाता है।
राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान भी हमने देखा था की लेफ्ट किस तरह इतिहास के साथ खिलवाड़ करता है। उन्होंने इसका बॉयकॉट किया। इसकी अहमियत कम करने की कोशिश की। इसकी तुलना राजनीतिक रैलियों से कर डाली। उन्होंने वो हर पैंतरा आज़माया जिससे करोड़ों हिंदुओं को मिलने वाले उस ऐतिहासिक न्याय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को गलत ठहराया जा सके।
लेकिन जब वो पल आया, जब 14 करोड़ लोगों ने टीवी पर प्राण-प्रतिष्ठा देखी, जब शहर-शहर दीये जले, जब पीढ़ियों से इस दिन का इंतज़ार करने वालों की आंखों से आंसू छलक पड़े, तब यही सेकुलर इकोसिस्टम शर्मिंदगी के मारे एकदम खामोश हो गया था।
2026 की राम नवमी पर एक मुख्यमंत्री के हाथों हो रहा कन्या पूजन उसी सांस्कृतिक आत्मविश्वास को आगे बढ़ा रहा है। लेफ्ट तो वो भारत चाहता था जहां हिंदू भावनाएं हमेशा बैकफुट पर रहें, हमेशा माफ़ी मांगती हुई, हमेशा सफाई देती हुई, हमेशा बहुसंख्यक होने के ‘अपराध’ का प्रायश्चित करती हुई।
लेकिन अब वो भारत बदल रहा है। यूपी भर में नवरात्र का जो ज़बरदस्त जश्न दिखा, मंदिरों में जो करोड़ों की भीड़ उमड़ी, और सरकार ने पूरे गर्व के साथ जो चार दिन की छुट्टी दी, ये सब उसी सांस्कृतिक दावे का सुबूत है, जिसे पचा पाना इस सेकुलर इकोसिस्टम के बस की बात नहीं है।
असली सेकुलरिज्म और ‘तुष्टीकरण की दुकान’- 80% हिंदुओं वाले देश में बहुसंख्यक होना कब से अपराध हो गया?
अगर पूरी ईमानदारी से बात करें तो सेकुलरिज्म के मूल रूप से दो ही मतलब होते हैं: या तो राज्य सरकार सभी धर्मों से बराबर दूरी बनाकर रखे और किसी को फंड या फेवर न दे; या फिर राज्य सभी धर्मों का बराबर सम्मान करे और सबके साथ एक जैसी गर्मजोशी दिखाए। दोनों ही परिभाषाएं अपने आप में एकदम सही हैं और किसी भी लोकतांत्रिक देश में आराम से काम कर सकती हैं।
लेकिन दशकों तक कांग्रेस के राज में भारत ने इनमें से किसी भी परिभाषा को नहीं माना। यहां एक नकली सेकुलरिज्म चल रहा था। जिसमें बहुसंख्यक धर्म (हिंदुओं) को लगातार नीचा दिखाया जाता था, उनके सार्वजनिक रूप से धर्म निभाने को शक्की नज़रों से देखा जाता था, जबकि अल्पसंख्यक धर्मों को सरकारी फंडिंग, संस्थागत सुरक्षा और ज़बरदस्त राजनीतिक लाड़-प्यार मिलता था। इसे सेकुलरिज्म नहीं कहते।
पॉलिटिकल साइंस की भाषा में इसे ‘प्रतिस्पर्धी तुष्टीकरण’ कहा जाता है। हज सब्सिडी बढ़कर 836 करोड़ रुपये हो जाती है, लेकिन चारधाम या अमरनाथ जाने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए कोई सब्सिडी नहीं होती।
वक्फ बोर्ड सरकारी सपोर्ट से बेहिसाब संपत्तियों पर कब्ज़ा जमाए बैठता है, जबकि कई राज्यों में हिंदू मंदिर आज भी सरकारी कंट्रोल में हैं और उनकी कमाई हड़पी जा रही है।
राष्ट्रपति भवन में इफ्तार पार्टियां होती हैं, लेकिन कभी आधिकारिक तौर पर दिवाली नहीं मनाई जाती।
बराबरी का ये तर्क एकदम सीधा है और इसका कोई जवाब नहीं है: अगर सरकार हज सब्सिडी दे सकती है (जो उसने 6 दशकों तक दी), वक्फ बोर्ड को मेंटेन कर सकती है, अल्पसंख्यक कल्याण निगमों को फंड कर सकती है, और आधिकारिक स्तर पर क्रिसमस और ईद मना सकती है- तो फिर आधिकारिक स्तर पर नवरात्र और कुंभ मनाना भी उतना ही सेकुलर है।
नियम तो सबके लिए एक ही होने चाहिए! और सबसे बड़ी बात- भारत एक ऐसा देश है जहां 80 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी हिंदू है। ये कौन सी दुनिया का ‘सेकुलरिज्म’ है की चुनी हुई सरकार अल्पसंख्यकों के त्योहारों पर तो उछल-उछल कर जश्न मनाए, लेकिन बहुसंख्यकों के त्योहारों पर शर्माने लगे?
वामपंथी मीडिया का खेल- फर्जी गुस्सा पैदा करना और सच को दबाना
योगी के कन्या पूजन पर ये वामपंथी मीडिया वाले जो गुस्सा दिखाते हैं, वो कोई अपने आप पैदा नहीं हुआ है। इसे उस मीडिया इकोसिस्टम द्वारा पैदा किया जाता है जिसने हमेशा से एकतरफा खेल खेला है। सिर्फ इनकी भाषा पर ही गौर कर लीजिए। जब बीजेपी के नेता हिंदू त्योहारों में हिस्सा लेते हैं, तो ये ऐसे भारी-भरकम शब्दों से डराने लगते हैं- ‘बहुसंख्यकवाद’, ‘ध्रुवीकरण’, ‘हिंदू राष्ट्रवाद’।
लेकिन जब विपक्ष के नेता इफ्तार दावतों में जाते हैं या दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं, तो उनकी भाषा एकदम से बदल जाती है: ‘सबको साथ लेकर चलना’, ‘सेक्युलर’, ‘सभी समुदायों से जुड़ना’।
शब्दों का ये भेदभाव इतने लंबे समय से और इतने लगातार किया जा रहा है की कई भारतीयों को ये बिल्कुल सामान्य लगने लगा है। लेकिन ये सामान्य नहीं है। ये एक सोच-समझकर गढ़ा गया नैरेटिव है, जिसे दशकों तक उन एडिटर्स, एंकरों और पत्रकारों ने ईंट-दर-ईंट चुना है जिनका एक खास वैचारिक चश्मा है- एक ऐसा चश्मा जिसमें हिंदू हमेशा शक के घेरे में रहता है और अल्पसंख्यक से सवाल पूछना पाप है।
बस बहुत हुआ ये पाखंड! हिम्मत है तो बिना घुमाए-फिराए बताओ की आख़िर एक हिंदू के हिंदू होने से तुम्हें दिक़्क़त क्या है?
तो चलिए, इस वामपंथी इकोसिस्टम का असली स्टैंड बिना किसी लाग-लपेट के साफ कर देते हैं, ताकि कोई भ्रम ही न रहे:
इफ्तार के लिए सरकारी पैसा = सेकुलरिज्म
कन्या पूजन के लिए सीएम का अपना पैसा = सांप्रदायिकता
इसमें कोई लॉजिक नहीं है। ये सिर्फ और सिर्फ एक ज़हर है। ये भारत के उन मीडिया संस्थानों पर दशकों से किए गए कब्ज़े का नतीजा है, जिनकी विचारधारा ने कभी भी सभी धर्मों की समानता में यकीन ही नहीं किया। ये हमेशा हिंदू बहुसंख्यकों को दबाने और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में लगे रहे, और बेशर्मी से खुद को सेकुलर कहते रहे।
कल 27 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के घर-घर में जो छोटी बच्चियां देवी रूप में बैठेंगी, वो इसका कतई हकदार नहीं हैं की उन्हें उन राजनीतिक पार्टियों द्वारा मोहरा बनाया जाए, जिन्होंने असल में महिला सशक्तिकरण के लिए धेले भर का काम नहीं किया।
जो परंपरा उन बच्चियों के पैर धोएगी, उन्हें प्रसाद खिलाएगी और उनके सामने शीश झुकाएगी, वो उन कमेंटेटरों की फब्तियों से कहीं ऊपर है जो शायद नवदुर्गाओं में से एक का भी नाम ठीक से न बता पाएं।
कल राम नवमी 2026 पर सीएम योगी आदित्यनाथ का कन्या पूजन करना कोई विवाद नहीं है। ये एक मुख्यमंत्री का अपने धर्म को निभाना है। ये नारी शक्ति का सम्मान करने वाली एक हिंदू परंपरा है।
ये पूरी तरह से एक निजी श्रद्धा का काम है, जिसका पैसा वो इंसान खुद भर रहा है जो इसे कर रहा है। इससे किसी का नुकसान नहीं होता, कोई इससे बाहर नहीं होता, और ये किसी भी संविधान के किसी भी नियम को नहीं तोड़ता।
