जिस देश में हिंदुओं ने हमेशा भारत माता को सबसे ऊपर रखा है- चाहे वो आज़ादी की लड़ाई हो, बॉर्डर पर जंग हो या देश का निर्माण- वहीं भारतीय मुसलमानों का एक अजीब सा बर्ताव दिखता है। फलस्तीन, हमास, तुर्किये, सीरिया, बांग्लादेश या अब ईरान… जैसे ही दुनिया के किसी भी कोने में मुस्लिम जगत पर कोई आंच आती है, यहां के अधिकतर मुसलमान सड़कों पर उतर आते हैं, चंदा इकट्ठा करने लगते हैं और उनके हक में गला फाड़कर नारे लगाते हैं।
लेकिन ज़रा सोचिए, जब खुद भारत पर कोई खतरा मंडराता है, देश की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनते हैं, या पड़ोसी मुल्कों में हिंदुओं पर ज़ुल्म ढाया जाता है, तब यही आवाज़ें या तो एकदम चुप्पी साध लेती हैं, या फिर सीधे देश के ही खिलाफ विरोध-प्रदर्शन और दंगे-फसाद पर उतर आती हैं।
इसकी सबसे ताज़ा मिसाल कल 23 मार्च 2026 को ही देखने को मिली। कश्मीर के बडगाम और बारामुला में शिया समुदाय ने ईद के फौरन बाद ‘युद्ध की मार झेल रहे’ ईरान की मदद के लिए घर-घर जाकर चंदा मांगा। लोगों ने अपने सोने-चांदी के जेवर, तांबे के बर्तन, मवेशी, पैसे, और तो और बच्चों ने भी अपने गुल्लक तक दान कर दिए।
भारत में बैठे ईरान के दूतावास ने इस एहसान के लिए “भारतीयों” का शुक्रिया भी अदा किया और इसे न भूलने वाली बात कहा। ख़बरों की मानें तो एक ही दिन में सैकड़ों करोड़ रुपये जमा हो गए थे। सच कहूं तो ये कोई मामूली चैरिटी-वैरिटी नहीं थी, ये एक विदेशी मुस्लिम ताकत के साथ सीधी एकजुटता थी। और विडंबना देखिए, कश्मीर के इन्ही मुसलमानों ने आर्टिकल 370 हटने के बाद भी भारत के साथ पूरी तरह से घुलने-मिलने में कभी इतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई।
ये कोई इकलौती घटना नहीं है। इसके पीछे एक बहुत गहरी मानसिकता काम कर रही है- ‘उम्माह’ यानी ग्लोबल मुस्लिम भाईचारे का कॉन्सेप्ट अक्सर भारत राष्ट्र के प्रति वफादारी पर भारी पड़ जाता है। इसके उलट, हिंदू अपनी मातृभूमि को ही पवित्र मानते हैं। वे सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का जश्न मनाते हैं और बिना किसी मज़हबी छूट की मांग किए देश को मजबूत करने वाले हर फैसले के साथ डटकर खड़े रहते हैं।
दूसरी तरफ, भारत सरकार उन मुस्लिम गुटों को पालने-पोसने, घर देने और सब्सिडी बांटने में लगी है, जिनके लिए देश से बड़ा उनका धर्म है। और ये सब उस हिंदू टैक्सपेयर के पैसे से हो रहा है, जो इस देश के कार्यबल और टैक्स बेस की असली रीढ़ है।
ज़रा आंकड़ों पर नज़र डालें तो 1951 में देश में मुसलमानों की आबादी 9.8% (करीब 3.54 करोड़) थी, जो 2011 तक बढ़कर 14.2% (17.2 करोड़) हो गई- यानी हिंदुओं की तुलना में कहीं ज्यादा तेज़ी से बढ़ी। आगे के अनुमान भी यही इशारा करते हैं। आबादी का यह बदलाव और ऊपर से बांग्लादेश और म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या घुसपैठिए, सार्वजनिक संसाधनों पर भयानक बोझ डाल रहे हैं।
हिंदू टैक्सपेयर का पैसा मदरसों, अल्पसंख्यक स्कॉलरशिप, वक्फ बोर्ड और तमाम वेलफेयर स्कीमों में जा रहा है। पहले की हज सब्सिडी (जिसे मौजूदा सरकार ने बंद कर दिया लेकिन जो तुष्टिकरण की जीती-जागती मिसाल थी) और आज घुसपैठियों को मिल रहा मुफ्त राशन, इलाज और शिक्षा- ये सब मिलकर सरकारी खजाने को खाली कर रहे हैं।
और बदले में देश को क्या मिलता है? इसी आबादी का एक हिस्सा उस CAA के खिलाफ आगजनी करता है जिससे भारतीय मुसलमानों का कोई लेना-देना ही नहीं है, हिंदुओं के खिलाफ दंगे करता है और विदेशी मुस्लिमों की जीत का जश्न मनाता है।
अब इन बातों को बिना किसी लाग-लपेट के सीधे-सीधे समझने का वक़्त आ गया है। सवाल यह है:- आखिर कब तक यह हिंदू भारत उन लोगों को “फ्री का खिलाता” रहेगा, जो देश से ज्यादा ‘उम्माह’ से प्यार करते हैं?
ग्लोबल उम्माह का असल चेहरा- फलस्तीन, हमास, तुर्किये, सीरिया, बांग्लादेश और ईरान के लिए भारत के मुसलमानों का प्रदर्शन
जब भी दुनिया के किसी भी मुस्लिम बहुल इलाके में कोई चिंगारी सुलगती है, भारत की सड़कें आग बबूला हो जाती हैं। फलस्तीन और हमास का मुद्दा इसका पक्का सुबूत है। अक्टूबर 2023 में इजराइल पर हमास के क्रूर हमले और उसके बाद गाजा में हुई कार्रवाई के बाद पूरे भारत- कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद, लखनऊ से लेकर कश्मीर तक- विशाल रैलियां निकाली गईं।
हाथों में फलस्तीन के झंडे लिए लोगों ने नारे लगाए और भारत सरकार को इजराइल का साथ देने के लिए कोसा। जमीयत उलमा-ए-हिंद और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों ने झट से बयान दाग दिए। इजराइल से जुड़े भारतीय बिजनेस के बायकॉट की मुहीम छेड़ दी गई। लेकिन हमास ने जो दरिंदगी की थी- महिलाओं के साथ दरिंदगी, सिर काटना, मासूमों को बंधक बनाना- उस पर इन गुटों के मुंह से निंदा का एक शब्द तक नहीं निकला।
तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन भारत के खिलाफ ज़हर उगलते हैं, और कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ देते हैं। फिर भी वे यहां के कई मुसलमानों के हीरो हैं। सीरिया के गृहयुद्ध में भी यही चयनात्मक गुस्सा दिखा- जब सुन्नी या आम मुसलमानों पर आंच आई तो खूब बवाल कटा, लेकिन जब असद ने विद्रोहियों को कुचला तो सब चुप।
बांग्लादेश का मामला तो दोगलेपन की हद है- जब म्यांमार में रोहिंग्या (मुसलमानों) का मुद्दा गरमाया, तो भारतीय मुसलमानों ने जमकर प्रदर्शन किए। लेकिन 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद, जब बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ भयानक हिंसा भड़की- मंदिर जला दिए गए, हिंदुओं का रेप और हत्याएं हुईं, घर-दुकानें लूट ली गईं- तब क्या हुआ?
भारतीय हिंदुओं ने तो आवाज़ उठाई, लेकिन मुख्यधारा के मुस्लिम संगठनों ने नाममात्र की चिंता जताई। कुछ ने तो बड़ी बेशर्मी से इसे “राजनीतिक मामला” बताकर पल्ला झाड़ लिया।
2026 के ईरान वाले वाकये ने तो ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजराइली कार्रवाई के बीच, कश्मीर के बडगाम और बारामुला में शियाओं ने सोना, मवेशी और बच्चों की गुल्लकें तक दान कर दीं। अहमदाबाद, लखनऊ और श्रीनगर में ईद के दिन काली पट्टियां बांधकर मातम मनाया गया। ईरान के झंडे लहराए गए।
और ये सब तब हो रहा था जब भारत इजराइल के साथ अपने रणनीतिक संबंध निभा रहा है और अपनी ऊर्जा की ज़रूरतों का प्रबंध कर रहा है। इसके उलट, क्या आपने कभी देखा है की श्रीलंका के तमिलों या नेपाल के मुद्दों के लिए हिंदुओं ने कभी धर्म के नाम पर पूरे देश में चक्का जाम किया हो? हिंदू उसे राष्ट्रीय नज़रिए से देखते हैं, मज़हबी नज़रिए से नहीं।
ज़रा हिंदुओं के बर्ताव से इसकी तुलना कीजिए। उरी और पुलवामा के बाद जब भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की, तो हिंदुओं ने बिना किसी ‘धार्मिक एकजुटता’ की मांग के सेना का पूरा साथ दिया। वे ISRO की कामयाबी या ओलंपिक मेडल को ‘राष्ट्रीय गर्व’ मानते हैं, ‘हिंदू प्राइड’ नहीं।
जब विदेश में (जैसे पाकिस्तान या बांग्लादेश में) हिंदुओं को सताया जाता है, तो भारत का हिंदू एक वैश्विक ‘हिंदू उम्माह’ के जिहाद के तौर पर नहीं, बल्कि एक सभ्यता को बचाने वाले भारतीय के तौर पर आवाज़ उठाता है। फर्क बिल्कुल साफ है- हिंदुओं के लिए उनकी जन्मभूमि सर्वोपरि है; जबकि मुसलमानों के लिए उनका उम्माह।
यह चयनात्मक सक्रियतावाद भारत को अंदर से खोखला कर रहा है। इससे वफादारी पर सवाल उठते हैं, समाज का ताना-बाना बिगड़ता है और हमारी विदेश नीति पर दबाव पड़ता है। भारत ऐसे नागरिकों का बोझ नहीं उठा सकता जो हमास जैसे दुश्मनों या प्रॉक्सी आतंकियों की जीत पर तालियां पीटें (जिनके तार पाकिस्तान समर्थित गुटों से जुड़े हैं)।
टैक्सपेयर की कमर टूट रही है- हिंदुओं के पैसे पर मुफ्त की रेवड़ियां, सब्सिडी और घुसपैठिए
हिंदू टैक्सपेयर- जो देश की आबादी का लगभग 80% हिस्सा हैं और डायरेक्ट टैक्स भरने में सबसे आगे हैं- एक ऐसे सिस्टम का खर्च उठा रहे हैं जो अक्सर ‘उम्माह-फर्स्ट’ वाली मानसिकता वालों की ही जेबें भरता है।
2018 से पहले की हज सब्सिडी पर ही हर साल करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते थे। इसे “माइनॉरिटी वेलफेयर” का नाम दिया गया, जबकि कैलाश मानसरोवर जैसी हिंदू यात्राओं (जिसमें चीन भी अड़ंगे लगाता है) के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं थी।
मदरसों को सरकारी ग्रांट मिलती है, जबकि वहां का सिलेबस कई बार अलगाववाद को हवा देता है। वक्फ बोर्डों ने बेशुमार संपत्तियों पर कब्ज़ा जमा रखा है, जिन पर अक्सर विवाद होता है और पारदर्शिता के नाम पर वहां बड़ा शून्य है। इसके ऊपर से माइनॉरिटी स्कॉलरशिप और तमाम योजनाएं अलग से।
अवैध घुसपैठ ने तो इस बोझ को और भी जानलेवा बना दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, 1970 के दशक से अब तक लाखों बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमान भारत में घुस चुके हैं, ख़ासकर असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली में। ढीले-ढाले कानून का फायदा उठाकर ये राशन कार्ड और वोटर आईडी बनवा लेते हैं, और आम टैक्स के पैसों से चलने वाले स्कूलों, अस्पतालों और फ्री राशन का मज़ा लूटते हैं।
बॉर्डर वाले राज्यों की तो डेमोग्राफी ही बदल गई है- पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी का हिस्सा तेज़ी से बढ़ा है, जिसका सीधा कनेक्शन इसी घुसपैठ से है। और विडंबना देखिए, बांग्लादेश से अपनी जान बचाकर भागने वाले हिंदुओं को यहां दर-दर भटकना पड़ता है।
ये घुसपैठिए हमारे सिस्टम को दीमक की तरह चाट रहे हैं। बॉर्डर इलाकों के सरकारी स्कूलों में पैर रखने की जगह नहीं है; अस्पतालों का बजट चरमरा गया है; कानून-व्यवस्था राम भरोसे है। और बदले में ये क्या करते हैं? इनमें से कई हिंदुओं के खिलाफ दंगों और साजिशों में शामिल होते हैं।
पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है: वहां बांग्लादेशी मुसलमानों पर हिंदुओं के खिलाफ दंगों और ज़मीन कब्ज़ाने के आरोप आम हैं। संसाधनों को लेकर लड़ाई-झगड़े, गौ-तस्करी और लव जिहाद के मामले आए दिन सामने आते हैं।
हसीना के तख्तापलट के बाद जब बंगाल के हिंदुओं ने प्रदर्शन किया, तो टीएमसी राज में उन पर पुलिस ने लाठियां भांजी, जबकि घुसपैठियों को पूरा राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। मुर्शिदाबाद और बाकी इलाकों में होने वाली हिंसा के तार सीधे तौर पर सीमा पार बैठे कट्टरपंथियों से जुड़े हैं।
सुरक्षा के लिए भारी खतरा (कट्टरपंथी गुटों से साठगांठ) होने के बावजूद, रोहिंग्याओं को कई राज्यों में पनाह मिली हुई है। इनकी सुरक्षा और सुख-सुविधाओं का सारा बिल हमारे टैक्सपेयर फाड़ रहे हैं। वोट-बैंक की गंदी राजनीति के चलते इन्हें वापस भेजने का काम कछुए की चाल से चल रहा है। वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से सताए हुए बेचारे हिंदू आज भी राहत की भीख मांग रहे हैं।
“फ्री का खिलाने” वाली बात आज के टैक्सपेयर को बुरी तरह चुभती है- एक आम हिंदू खेतों, फैक्ट्रियों और आईटी कंपनियों में खून-पसीना एक करके जीएसटी और इनकम टैक्स भरता है; और देश का एक तबका उसी पैसे पर पलकर या तो विदेशी झंडे लहराता है या अपने ही देश में दंगे करता है।
घुसपैठ के ज़रिए की जा रही यह ‘डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग’ वोटिंग पैटर्न को बदल रही है, तुष्टिकरण की राजनीति को पाल रही है और राष्ट्रीय पहचान को मिटा रही है। असम के NRC ने लाखों ऐसे संदिग्ध नागरिकों की पोल खोली थी, जिनमें ज़्यादातर घुसपैठिए थे।
अगर आज सख्त एक्शन नहीं लिया गया, तो भारत को दूसरा लेबनान या यूरोप बनने से कोई नहीं रोक पाएगा- एक ऐसा देश जिसका सिस्टम उन लोगों का बोझ उठाते-उठाते ढह जाएगा जिनकी वफ़ादारी बाहरी मुल्कों के लिए धड़कती है।
CAA प्रदर्शन और घरेलू देशद्रोह- देश से ऊपर मज़हब को चुनते हैं भारत के मुसलमान
2019 में आए नागरिकता संशोधन कानून (CAA) ने इस दोगलेपन का पूरी तरह से पर्दाफाश कर दिया। CAA का मकसद सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से मज़हब के नाम पर सताए गए गैर-मुस्लिमों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) को जल्द नागरिकता देना था- वो लोग जो ईशनिंदा कानूनों, जबरन धर्मान्तरण और मंदिर तोड़े जाने के शिकार थे।
इसमें मुस्लिमों को साफ़ तौर पर इसलिए बाहर रखा गया क्योंकि ये तीनों घोषित इस्लामिक देश हैं, जो खुद अपने अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म करते हैं। इससे भारत के किसी भी मुसलमान पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला था- न किसी की नागरिकता छिन रही थी, न कोई नया टेस्ट हो रहा था।
फिर भी, मुसलमानों की अगुवाई में पूरे देश में आग लगा दी गई। दिल्ली का शाहीन बाग इसका चेहरा बन गया- मुस्लिम औरतों ने वामपंथी-इस्लामी नेटवर्क की शह पर महीनों तक सड़कें जाम कर दीं।
“जिन्ना वाली आज़ादी” और “ला इलाहा इल्लल्लाह” जैसे मज़हबी नारों के साथ भारत-विरोधी ज़हर घोला गया। नतीजा? ट्रेनें फूंकी गईं, सरकारी संपत्तियों को तहस-नहस किया गया (जिसका हर्जाना बाद में दंगाइयों को नोटिस भेजकर वसूला गया), और पुलिस पर पथराव हुआ।
फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में दर्जनों लोग मारे गए; हालांकि नुकसान दोनों तरफ हुआ, लेकिन इसकी जड़ें CAA की इसी ज़हरीली आग में थीं। जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में जमकर बवाल कटा।
आखिर उस कानून का विरोध क्यों किया गया जो उन सताए हुए हिंदुओं की जान बचा रहा था, जिनके देश में जाने से इन प्रदर्शनकारियों के ही पूर्वजों ने 1947 में मना कर दिया था? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि CAA ने “मुस्लिम विक्टिमहुड” (मुस्लिमों के पीड़ित होने के नैरेटिव) की हवा निकाल दी थी और इस सच को सामने ला दिया था की इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों का किस कदर शिकार किया जाता है।
प्रदर्शनकारियों ने CAA + NRC को “मुस्लिम विरोधी” बताकर जमकर प्रोपेगेंडा चलाया, यह भूलकर की NRC का मकसद सिर्फ अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालना है (जिससे खुद असली नागरिकों का ही भला होगा)। शाहीन बाग के धरने ने आम नौकरीपेशा लोगों की ज़िंदगी हराम कर दी और अर्थव्यवस्था को करोड़ों का चूना लगाया। संविधान बचाने के इस नाटक के पीछे असल मकसद राष्ट्रीय नीतियों पर अपना मज़हबी ‘वीटो’ ठोकना था।
यही राष्ट्र-विरोधी रवैया आर्टिकल 370 हटने, तीन तलाक बैन, या हिजाब विवाद के दौरान भी देखने को मिला, जहां एक समान कानून को “अधिकारों” के नाम पर चुनौती दी गई। हिंदुओं ने तो इन बदलावों को देश की संप्रभुता और समानता के लिए खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। लेकिन मुस्लिम प्रदर्शन अक्सर हिंसक या अलगाववादी मोड़ ले लेते हैं, और बात-बात पर “सर तन से जुदा” के खौफनाक नारे गूंजने लगते हैं।
यह पूरा खेल- विदेशों में उम्माह का समर्थन और अपने ही देश में बगावत- सीधे तौर पर हिंदुओं की पीठ पर बोझ डालता है। दंगों में हुआ नुकसान, पुलिस और पैरामिलिट्री का खर्च, और धरनों से हुआ आर्थिक नुकसान- यह सब उसी हिंदू टैक्सपेयर की जेब से जा रहा है। बंटवारे के गहरे ज़ख्म सहने के बावजूद हिंदू समाज आगे बढ़ गया और देश के साथ कदम से कदम मिलाकर चला।
लेकिन इसके बिल्कुल उलट, मुस्लिम समाज का एक तबका हमेशा “अल्पसंख्यक” होने का रोना रोता है, जबकि उसकी असल वफ़ादारी बाहर एक्सपोर्ट होती रहती है।
1947 के बंटवारे का ‘लॉयल्टी टेस्ट’ और भारतीय मुसलमानों का आज़ादी के बाद का रवैया
इस दोहरी वफ़ादारी की जड़ें असल में 1947 के बंटवारे से ही जुड़ी हैं। जिन्ना की ‘टू-नेशन थ्योरी’ के तहत पाकिस्तान बन तो गया, लेकिन जो मुसलमान भारत में रुक गए, उनमें से एक बड़े तबके का रवैया हमेशा सवालों के घेरे में रहा।
पाकिस्तान बना और वहां लाखों हिंदू और सिख कत्लेआम, अपहरण और जबरन धर्मान्तरण का शिकार होकर जान बचाकर भागे। बंटवारे की उस खौफनाक हिंसा में जहां हिंदू और सिख दर-बदर की ठोकरें खा रहे थे, वहीं भारत में बचे हुए मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा या तो पाकिस्तान को सपोर्ट कर रहा था या फिर चुप था।
1947 के बाद भी यही पैटर्न दिखा। कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान से दिली हमदर्दी दिखी, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में पीछे छूट गए हिंदुओं की चीखों पर सबने कानों में रुई डाल ली।
1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन आज भी एक रिसता हुआ घाव है। पाकिस्तान की शह पर इस्लामी आतंकवादियों ने फरमान सुनाया- “कन्वर्ट हो जाओ, भाग जाओ या मरो।” मंदिर तोड़ दिए गए, पंडितों के घर लूट लिए गए, औरतों के साथ दरिंदगी हुई और हत्याएं की गईं। करीब 3 से 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं को अपनी ही ज़मीन से बेदखल कर दिया गया, जो आज वहां मुट्ठी भर ही बचे हैं। तब कश्मीर के मुस्लिम नेताओं और वहां की आम जनता ने या तो इस बगावत का साथ दिया या फिर खामोश तमाशाई बने रहे।
तब भारत के बाकी मुसलमानों ने पंडितों को इंसाफ दिलाने के लिए कोई देशव्यापी आंदोलन नहीं किया। उल्टे, “कश्मीरियत” के नाम पर इस नरसंहार की सच्चाई को छुपाया जाता रहा।
अब ज़रा 2019 को याद कीजिए। जब आर्टिकल 370 और 35A को उखाड़ फेंका गया, तो हिंदू, डोगरा और लद्दाख के बौद्धों ने आतंकवाद के अंत के तौर पर इसका जश्न मनाया। वहां विकास हुआ, चुनाव हुए, टूरिज्म बढ़ा, पत्थरबाजी बंद हुई।
लेकिन, कश्मीर के कई मुसलमानों और देश भर में बैठे उनके समर्थकों ने इसका भारी विरोध किया। कुछ ने तो इसे “कब्ज़ा” तक कह दिया। बड़ी मुस्लिम संस्थाओं ने इस राष्ट्रीय अखंडता का कोई स्वागत नहीं किया। यहीं वो चयनात्मक वफ़ादारी साफ दिख जाती है- आर्टिकल 370 हटने का मातम, लेकिन विदेशी मुस्लिम मुद्दों के लिए सीना-पीटना।
योगी आदित्यनाथ मॉडल- देशद्रोह को कुचलने और वफ़ादारी सिखाने का इकलौता कारगर तरीका
जब-जब ‘उम्माह’ को भारत से ऊपर रखने वाले इन गुटों को इंसानियत और संविधान का पाठ पढ़ाने की कोशिश की गई है, बात पूरी तरह बेअसर साबित हुई है। लेकिन देश के एक राज्य ने यह साबित कर दिया है की अगर सरकार की नीयत साफ हो और डंडा सख्त हो, तो दंगे, घुसपैठ और पत्थरबाजी जैसी हरकतों को रातों-रात ज़मीन सुंघाई जा सकती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में उत्तर प्रदेश आज इस बात की सबसे बड़ी मिसाल बन गया है की कैसे एक मजबूत हिंदू नेतृत्व उन ताकतों को रास्ते पे ला सकता है जो मज़हब को देश से ऊपर रखते हैं। बिना किसी तुष्टिकरण के हिंदू टैक्सपेयर के हितों की रक्षा कैसे की जाती है और सामाजिक सौहार्द कैसे बहाल होता है, यह कोई योगी से सीखे!
ज़रा याद कीजिए, 2017 से पहले का यूपी कैसा था? आए दिन सांप्रदायिक दंगे, अवैध घुसपैठ की बाढ़, लव जिहाद के खुलेआम मामले, गौ-तस्करी का सिंडिकेट और मदरसों में पलते अलगाववादी। 2007 से 2017 के बीच सैकड़ों दंगे हुए, जिनमें न जाने कितनी जानें गईं और जमकर सरकारी संपत्तियां फूंकी गईं, लेकिन किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ।
देशद्रोही तत्व वोट-बैंक की आड़ में सीना तानकर घूमते थे। हिंदू त्योहारों पर पाबंदियां लगती थीं, मंदिरों पर हमले होते थे, और बांग्लादेशियों-रोहिंग्याओं को बॉर्डर वाले जिलों और झुग्गियों में पनाह मिल रही थी। और इस सब का खर्च कौन उठा रहा था? वही हिंदू टैक्सपेयर!
योगी आदित्यनाथ ने आते ही पूरी तस्वीर पलट कर रख दी। उनकी सरकार की नीति एकदम साफ थी- ज़ीरो टॉलरेंस। अब यूपी में दंगे कुछ ही घंटों में कुचल दिए जाते हैं, दंगाइयों की संपत्तियों पर बुलडोज़र चल जाता है ताकि नुकसान की भरपाई हो सके, और अवैध धंधों पर पुलिस का सीधा एक्शन होता है।
NCRB के हालिया आंकड़े एक ऐतिहासिक बदलाव की गवाही दे रहे हैं- आज राज्य का क्राइम रेट 335.3 प्रति लाख है, जो 448.3 के राष्ट्रीय औसत से कहीं कम है। डकैती, लूट और हत्या जैसे खौफनाक अपराध पुरानी सरकारों के मुकाबले रसातल में जा चुके हैं। जो दंगे पहले हर साल सैकड़ों में होते थे, वो अब गायब हो गए हैं, और अगर कोई छोटी-मोटी घटना हो भी जाए तो 24 घंटे के अंदर उसे दबा दिया जाता है।
उनका “बुलडोज़र मॉडल” आज दहशत का दूसरा नाम बन गया है। 2019-2020 के CAA विरोध के दौरान जब मुस्लिम भीड़ ने कई राज्यों में ट्रेनें जलाईं और पुलिस को पीटा, तब योगी सरकार ने तुरंत एक्शन लिया। दंगाइयों के घरों पर रिकवरी नोटिस चस्पा कर दिए गए, उनकी प्रॉपर्टी सील कर दी गई या तोड़ दी गई-ताकि देशविरोधी बर्बरता का नुकसान हिंदू टैक्सपेयर को न उठाना पड़े।
शाहीन बाग की तरह जिन राज्यों में प्रदर्शन महीनों तक चले, उनके उलट यूपी ने एक कड़ा संदेश दिया- शांति से प्रदर्शन करना है तो करो, लेकिन अगर हिंसा की या सरकारी संपत्ति को छुआ, तो तुम्हारी आने वाली नस्लें भी हर्जाना भरेंगी। इस तरीके ने दंगाइयों को ऐसा ‘शांत’ किया कि यूपी में बाकी जगह जैसी अराजकता नहीं फैल पाई।
घुसपैठियों पर हुआ एक्शन भी इस मॉडल का लोहा मनवाता है। योगी ने घर-घर जाकर सर्वे करने, पहचान पुख्ता करने और डिटेंशन सेंटर बनाने के सख्त आदेश दे दिए हैं। अवैध रूप से रह रहे उन बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों पर चुन-चुनकर एक्शन लिया जा रहा है, जो क्राइम, दंगे या डेमोग्राफी बदलने में शामिल हैं।
नगर निगमों ने विदेशी नागरिकों की लिस्ट निकाल दी है, और लोगों से कहा गया है की किसी को भी नौकरी पर रखने से पहले उसकी पहचान चेक करें। इसने सीधे तौर पर उस “फ्री का खिलाने” वाली बीमारी पर प्रहार किया है- अब टैक्सपेयर का पैसा अवैध रूप से घुसे उन लोगों तक नहीं पहुंच रहा जो बाद में हिंदुओं के खिलाफ ही इस्तेमाल होते हैं (जैसा हमने बंगाल में देखा है)।
अब लेफ्ट और ‘सेक्युलर’ ईकोसिस्टम वाले छाती पीटते हैं की यह “मुसलमानों को टारगेट करना” है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। विपक्ष शासित जिन राज्यों में दंगे और तुष्टिकरण आम बात है, उनसे कहीं ज़्यादा सुरक्षित यूपी के अल्पसंख्यक महसूस करते हैं।
खुद योगी ने इसकी तुलना हालिया बांग्लादेश से की थी- की कैसे वहां एक हिंदू परिवार हज़ारों मुसलमानों के बीच खौफ के साए में जीता है, जबकि भारत के मजबूत शासन में किसी मुसलमान के साथ ऐसा नहीं होता। इस मॉडल में सच्चे सेक्युलरिज्म का मतलब है- देश की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं और कानून सबके लिए बराबर।
योगी मॉडल ने यह साबित कर दिया है की CAA के नाम पर हिंसा हो, भारत से ऊपर हमास या फलस्तीन का प्यार हो, ईरान को चंदा भेजना हो, या घुसपैठियों के दंगे हों- यह सब किसी “गरीबी” या “नाराज़गी” का नतीजा नहीं है। यह सीधे तौर पर उस अलगाववादी मानसिकता की उपज है जिसे कमज़ोर सरकारों ने पनपने दिया।
सख्त पुलिसिंग, दंगाइयों की जेब से हर्जाना वसूलना, डिपोर्टेशन ड्राइव और ‘उम्माह’ के नाम पर बवाल करने वालों पर ज़ीरो टॉलरेंस इस दुष्चक्र को तोड़ देता है। इस मॉडल ने जवाबदेही तय कर दी है- अगर तुम्हें भारत की डेमोक्रेसी और टैक्सपेयर के पैसों का मज़ा लेना है, तो सबसे पहले इस देश की संप्रभुता के आगे सिर झुकाना होगा।
जो राज्य घुसपैठ से जूझ रहे हैं (जैसे पश्चिम बंगाल, असम, बिहार) या जहां शहरी दंगे हो रहे हैं (जैसे दिल्ली, केरल), वे यूपी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। अगर भारत को देश से ऊपर मज़हब चुनने की इस बीमारी को जड़ से उखाड़ना है, तो योगी आदित्यनाथ का मॉडल- जो सख्त है, बेधड़क है और जिसका फोकस सिर्फ राष्ट्रीय हित पर है- सबसे परखा हुआ तरीका है।
तुष्टिकरण ने दशकों तक सिर्फ नाकामी ही दी है; फैसलाकुन एक्शन से ही नतीजे मिलते हैं। आज के हिंदू भारत को ऐसे ही नेताओं की दरकार है जो भारत माता को सर्वोपरि रखें और देश की मेहनती जनता के खर्चे पर इन गद्दार तत्वों को फ्री का खिलाना बंद करें।
