उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन आज यह शराब और खामोशी के बाज़ार जैसा महसूस होता है। जब मंदिरों से ज़्यादा तेज़ी से शराब की दुकानें खुलें और अंकिता भंडारी की नृशंस हत्या आज भी अधूरे सच और बंद फाइलों के पीछे छिपी रहे, तो परतें अपने-आप उतरने लगती हैं।
यह देवताओं की भूमि नहीं लगती — यह वह जगह बनती जा रही है जहाँ राजस्व, न्याय से ऊपर है और सत्ता, सच्चाई से ज़्यादा ताक़तवर।
जो राज्य अपनी बेटियों की रक्षा नहीं कर सकता, जो ताक़तवरों को सज़ा नहीं दे पाता और जो विवेक के बजाय पैसे को चुनता है । वह पवित्र कहलाने का नैतिक अधिकार खो देता है। अब सवाल यह नहीं है कि गलती कहाँ हुई, सवाल यह है कि यह विश्वासघात कब तक सहा जाएगा?
अंकिता भंडारी हत्याकांड: अपराध, प्रभाव और न्याय की तलाश
अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले के डोभ–श्रीकोट गांव की 19 वर्षीय युवती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया और देश-भर का ध्यान इस मामले पर गया। ऋषिकेश के पास वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम कर रही अंकिता की मौत ने कार्यस्थल पर शोषण, राजनीतिक संबंधों, सबूत मिटाने और न्याय में देरी जैसे गंभीर सवाल खड़े किए।
हालांकि मई 2025 में तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई, लेकिन जनवरी 2026 में वीआईपी से जुड़े नए आरोपों और केंद्रीय जांच की सिफारिश के बाद यह मामला फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ गया।
संघर्ष, आत्मसम्मान और गरिमा
अंकिता का जन्म 11 नवंबर 2003 को हुआ था। वे सेवानिवृत्त सुरक्षा कर्मी वीरेंद्र सिंह भंडारी और सोनी देवी की बेटी थीं। उन्होंने देहरादून में होटल मैनेजमेंट कोर्स में दाख़िला लिया था, लेकिन कोविड-19 के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
28 अगस्त 2022 को उन्होंने ₹10,000 मासिक वेतन पर वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम शुरू किया। रिसॉर्ट के एकांत स्थान पर होने के कारण उन्हें वहीं रहना पड़ता था। काम के दौरान अंकिता पर कथित रूप से मेहमानों को “विशेष सेवाएँ” देने का दबाव बनाया गया। उन्होंने दोस्तों से साफ़ कहा था कि वे किसी भी हालत में अपनी गरिमा से समझौता नहीं करेंगी — चाहे गरीबी ही क्यों न हो।
गुमशुदगी और हत्या
18 सितंबर 2022 को अंकिता रिसॉर्ट मालिक से हुए एक विवाद के बाद लापता हो गईं। यह विवाद कथित तौर पर एक वीआईपी मेहमान से जुड़ी मांगों को ठुकराने के कारण हुआ था। बाद में गवाहों ने बताया कि उस रात फोन पर अंकिता के रोने और मदद की गुहार लगाने की आवाज़ें सुनी गई थीं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, विवाद सुलझाने के बहाने अंकिता को रिसॉर्ट से बाहर ले जाया गया। इसके बाद झड़प हुई, जिसमें उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें चिल्ला बैराज के पास गंगा प्रणाली से जुड़ी नहर में धक्का दे दिया गया। 24 सितंबर 2022 को उनका शव राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल द्वारा बरामद किया गया।
एम्स ऋषिकेश में हुए पोस्टमार्टम में सिर पर गंभीर चोटों की पुष्टि हुई और डूबने को मृत्यु का कारण बताया गया। 2023 में अंकिता के माता-पिता ने हत्या से पहले यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, जिसे फोरेंसिक रिपोर्ट ने नकारा और परिवार ने उस पर आपत्ति दर्ज कराई।
आरोपी और शुरुआती कार्रवाई
23 सितंबर 2022 को तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया:
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पुलकित आर्य — रिसॉर्ट मालिक और पूर्व भाजपा नेता विनोद आर्य का पुत्र
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सौरभ भास्कर — रिसॉर्ट मैनेजर
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अंकित गुप्ता — रिसॉर्ट कर्मचारी
गिरफ्तारी के बाद विनोद आर्य और सार्वजनिक पद पर बैठे एक अन्य परिजन को भाजपा से निष्कासित कर दिया गया। एफ़आईआर दर्ज करने में देरी के लिए ज़िम्मेदार राजस्व अधिकारी को निलंबित किया गया और बाद में गिरफ़्तार भी किया गया।
गिरफ्तारियों के तुरंत बाद प्रशासनिक आदेश पर रिसॉर्ट को ध्वस्त कर दिया गया, जिससे सबूत नष्ट किए जाने के आरोप लगे। अगले दिन वहां आग लगने की घटना ने संदेह को और गहरा कर दिया।
जांच और मुकदमा
लगातार जनदबाव के बाद मामला नियमित पुलिस को सौंपा गया और विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया। दिसंबर 2022 में SIT ने 500 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाख़िल की, जिसमें हत्या, अपहरण, आपराधिक साज़िश, छेड़छाड़, सबूत नष्ट करना और अनैतिक देह व्यापार से जुड़े प्रावधान शामिल थे। बाद में गैंगस्टर एक्ट भी जोड़ा गया।
मुकदमा पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार स्थित फास्ट-ट्रैक अदालत में चला। अभियोजन पक्ष ने 47 गवाह पेश किए और व्हाट्सऐप चैट सहित डिजिटल सबूतों पर ज़ोर दिया। 30 मई 2025 को अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कठोर कारावास की सज़ा सुनाई और अंकिता के परिवार को ₹4 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, हालांकि इस फ़ैसले को अहम माना गया, लेकिन परिवार ने इसे अपर्याप्त बताते हुए मृत्युदंड की मांग की और इसे “दुर्लभतम दुर्लभ” श्रेणी का अपराध बताया।
जन आक्रोश और राजनीतिक प्रभाव
इस हत्या के बाद पूरे उत्तराखंड में लगातार विरोध प्रदर्शन हुए। महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और आपराधिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दे केंद्र में आ गए। मामला ज़मीन, बाहरी प्रभाव और पहाड़ी राज्य के शासन से जुड़े व्यापक सवालों से भी जुड़ गया।
पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने बार-बार केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग की और आरोप लगाया कि SIT ने “वीआईपी एंगल” की गहराई से पड़ताल नहीं की। लगातार आंदोलनों और कानूनी याचिकाओं के चलते यह मामला आज भी सार्वजनिक विवेक में जीवित है।
जनवरी 2026 में हुए घटनाक्रम
दोषसिद्धि के बावजूद, मामले में पर्दा डालने के आरोप लगातार सामने आते रहे। 9 जनवरी 2026 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले के अनसुलझे पहलुओं—विशेष रूप से कथित “वीआईपी एंगल”—की जाँच के लिए सीबीआई जांच की सिफ़ारिश की।
10 जनवरी 2026 को एक प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता की शिकायत पर उत्तराखंड पुलिस ने एक “अज्ञात वीआईपी” के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज की। इस एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की वे धाराएँ शामिल की गईं, जो सबूत नष्ट करने, झूठी जानकारी देने और आपराधिक साज़िश से संबंधित हैं। इसी दौरान विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की। राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया, जिसमें भागीदारी मिली-जुली रही, लेकिन विरोध प्रदर्शनों को नया बल मिला।
क़ानूनी फ़ैसला, लेकिन अधूरा न्याय
जनवरी 2026 तक अंकिता भंडारी मामला क़ानूनी रूप से दोषसिद्धि के साथ समाप्त हो चुका है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर इसे अब भी अधूरा माना जा रहा है। दोषी ठहराए गए लोगों को सज़ा मिल चुकी है, फिर भी प्रभाव, सबूतों से छेड़छाड़ और जवाबदेही से जुड़े सवाल आज भी जनचेतना को बेचैन करते हैं।
यह मामला न्याय व्यवस्था के सामने आने वाली उन चुनौतियों का स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ अपराध सत्ता, विशेषाधिकार और कमजोर पीड़ितों से टकराता है—और जहाँ क़ानूनी फ़ैसले और वास्तविक न्याय के बीच का अंतर साफ़ दिखाई देता है।
“अंकिता फ़ाइल्स”: आरोप, सत्ता और नए सवाल
“अंकिता फ़ाइल्स” शब्द हाल के समय में सार्वजनिक और सोशल मीडिया विमर्श में उभरा है। यह सितंबर 2022 में हुई अंकिता भंडारी की हत्या से जुड़े कथित लीक ऑडियो, संदेशों और आरोपों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाने लगा।
इस शब्द की तुलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित “एपस्टीन फ़ाइल्स” से की गई, जो इस आशंका को दर्शाती है कि कहीं प्रभावशाली लोगों को बचाया तो नहीं गया और अहम जानकारियाँ छिपा दी गईं।
हालाँकि, एपस्टीन मामले के विपरीत—जहाँ सील किए गए अदालती दस्तावेज़ आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए गए थे—तथाकथित “अंकिता फ़ाइल्स” किसी भी आधिकारिक जांच रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं हैं।
ये 2025 के अंत से सोशल मीडिया पर सामने आई कुछ अपुष्ट और अनौपचारिक सामग्रियों का संग्रह हैं, जिन्होंने जवाबदेही और गहन जांच की मांग को फिर से तेज़ कर दिया।
“अंकिता फ़ाइल्स” की कहानी कैसे सामने आई
यह नया विवाद वायरल ऑडियो-वीडियो क्लिप्स, व्हाट्सऐप संदेशों और सोशल मीडिया पर साझा किए गए बयानों से शुरू हुआ।
इन सामग्रियों में आरोप लगाया गया कि वनंतरा रिसॉर्ट में अंकिता पर एक वीवीआईपी मेहमान को “विशेष सेवाएँ” देने का दबाव डाला गया, उन्होंने इससे इनकार किया और इसके बाद उनकी हत्या कर दी गई।
हालांकि अदालत में इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनवरी 2026 में हुए नए क़ानूनी घटनाक्रमों के साथ इनका सामने आना, स्वतंत्र जांच की मांग को और तेज़ कर गया।
आरोपों का केंद्र: इनकार और हत्या
अंकिता के परिवार द्वारा बार-बार लगाए गए आरोपों और कथित लीक संवादों के अनुसार, 17–18 सितंबर 2022 की रात उन्हें एक प्रभावशाली मेहमान से जुड़ी मांगें मानने के लिए पैसे का लालच दिया गया था।
उन्होंने इससे इनकार किया और अपनी परेशानी एक मित्र से साझा की। बाद में अभियोजन पक्ष ने यह स्थापित किया कि उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें चिल्ला नहर में धकेल दिया गया, जहाँ से 24 सितंबर 2022 को उनका शव बरामद हुआ।
वीआईपी एंगल और कथित दबाव
लीक सामग्रियों में यह संकेत दिया गया कि उत्पीड़न एक ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़ा था, जिसकी पहचान की कभी आधिकारिक जांच नहीं हुई। आलोचकों का कहना है कि रिसॉर्ट को ध्वस्त किया जाना, उसके बाद लगी आग और शुरुआती प्रक्रियात्मक देरी, सबूत नष्ट किए जाने की ओर इशारा करती हैं।
जनवरी 2026 में “अज्ञात वीआईपी” के खिलाफ़ दर्ज एफआईआर के साथ ये चिंताएँ एक बार फिर सामने आईं।
सार्वजनिक रूप से घूमते नाम
सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ तथाकथित “खुलासों” में कुछ राजनीतिक हस्तियों के नाम लिए गए, जो कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग पर आधारित थे। इन दावों के जवाब में कानूनी नोटिस और प्रतिशिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन अब तक किसी भी न्यायिक प्रक्रिया में इनकी पुष्टि नहीं हुई है।
फिलहाल, अंकिता की हत्या के मामले में केवल वही तीन लोग दोषी ठहराए गए हैं, जिन्हें शुरू से आरोपी बनाया गया था।
डिजिटल लीक
ऑनलाइन प्रसारित ऑडियो रिकॉर्डिंग और स्क्रीनशॉट्स में अपराध के बाद की घटनाओं और वीआईपी की कथित भूमिका पर चर्चा होने का दावा किया गया।
इन सामग्रियों की प्रामाणिकता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही इनके आधिकारिक प्रतिलेख जारी किए गए हैं। फिर भी, इन्होंने जनदबाव को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनवरी 2026 के प्रमुख घटनाक्रम
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9 जनवरी 2026: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता के परिवार से मुलाक़ात के बाद सीबीआई जांच की सिफ़ारिश की और अनसुलझी चिंताओं को स्वीकार किया।
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10 जनवरी 2026: उत्तराखंड पुलिस ने “अज्ञात वीआईपी” के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज की, जिसमें सबूतों से छेड़छाड़ और आपराधिक साज़िश से जुड़ी धाराएँ शामिल की गईं।
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11 जनवरी 2026: राज्य में विरोध प्रदर्शन और बंद का आयोजन हुआ, जिसमें भागीदारी मिली-जुली रही। विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग दोहराई।
यदि मामला सीबीआई को सौंपा जाता है, तो उससे वीआईपी एंगल की दोबारा जांच, कथित रूप से नष्ट किए गए सबूतों की समीक्षा और पूरी घटना-श्रृंखला के पुनर्निर्माण की अपेक्षा की जा रही है।
सवाल जो अब भी जवाब चाहते हैं
“अंकिता फ़ाइल्स” ने उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा, राजनीतिक प्रभाव और संस्थागत जवाबदेही पर बहस को और गहरा कर दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केवल दोषसिद्धि पर्याप्त नहीं है, यदि प्रभावशाली लोग जांच के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
अदालती दस्तावेज़ों के औपचारिक रूप से सार्वजनिक होने के विपरीत, “अंकिता फ़ाइल्स” अब भी बिखरी हुई, विवादित और अनौपचारिक हैं। इसी कारण, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले स्वतंत्र और निष्पक्ष सत्यापन को अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।
वर्तमान स्थिति-सज़ा के बाद भी भरोसे की कमी
जनवरी 2026 तक, अंकिता भंडारी मामला क़ानूनी रूप से दोषसिद्धि के साथ समाप्त हो चुका है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर यह अब भी अधूरा महसूस किया जाता है। तथाकथित “अंकिता फ़ाइल्स” का सामने आना इस व्यापक जनभावना को दर्शाता है कि सत्ता और संरक्षण से जुड़े कई अहम सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।
अंततः यह पूरा प्रसंग एक मूल चिंता को उजागर करता है—न्याय तब तक पूर्ण नहीं माना जा सकता, जब तक लोगों को यह भरोसा न हो कि पद, प्रभाव या रसूख़ की परवाह किए बिना, पूरी सच्चाई की जाँच हुई है और उसे सामने लाया गया है।
उत्तराखंड में शराब की दुकानों के खिलाफ़ आंदोलन: देवभूमि में सामुदायिक प्रतिरोध
देवभूमि के नाम से पूजे जाने वाले उत्तराखंड में शराब की दुकानों के खिलाफ़ समय-समय पर व्यापक जनआंदोलन देखने को मिले हैं, खासकर पहाड़ी इलाक़ों और तीर्थ मार्गों पर। इन आंदोलनों की अगुवाई ज़्यादातर स्थानीय निवासियों, महिला समूहों (मातृ शक्ति) और धार्मिक व सामुदायिक संगठनों ने की है। विरोध की जड़ में शराबखोरी बढ़ने, घरेलू हिंसा, सड़क हादसों, पवित्र स्थलों के आसपास अव्यवस्था और पहाड़ी संस्कृति के क्षरण जैसी चिंताएँ रही हैं।
महिलाएँ इन आंदोलनों में लगातार अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। उनका कहना है कि शराब की दुकानों का सीधा असर परिवारों की स्थिरता और सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ता है। आंदोलनों में धरना, रैली, सड़क जाम, नारेबाज़ी और प्रशासन को ज्ञापन सौंपना जैसे तरीके अपनाए गए। मांगें मुख्यतः शराब की दुकानों को बंद करने या दूसरी जगह स्थानांतरित करने को लेकर रहीं। 2025 में लंबे जनदबाव के बाद राज्य सरकार को कुछ नीतिगत हस्तक्षेप करने पड़े। हालाँकि 2026 की शुरुआत अपेक्षाकृत शांत रही, लेकिन यह मुद्दा आज भी गहरे भावनात्मक और राजनीतिक महत्व रखता है।
2025 के प्रमुख आंदोलन मुनिकीरेती (टिहरी गढ़वाल): अक्टूबर–नवंबर 2025
ऋषिकेश के पास मुनिकीरेती में खरस्रोत क्षेत्र में अंग्रेज़ी शराब की दुकान खोले जाने का स्थानीय लोगों ने ज़ोरदार विरोध किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि यह दुकान विवादित ज़मीन पर खोली गई है, जिस पर ग्राम सभा और वन विभाग दोनों का दावा है।
31 अक्टूबर 2025 से शुरू हुए प्रदर्शन नवंबर तक जारी रहे, जिनमें प्रशासन और आबकारी विभाग के खिलाफ़ नारे लगाए गए।
दुकान के पास एक स्थानीय निवासी की हत्या के बाद जनआक्रोश और बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने इस घटना को शराब से जुड़ी हिंसा से जोड़ा। दुकान की सुरक्षा में भारी पुलिस तैनाती को लेकर भी आलोचना हुई, जिससे यह धारणा बनी कि प्रशासन समुदाय की बजाय विक्रेताओं को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि आधिकारिक समीक्षा में विभागीय चूक मानी गई, लेकिन तत्काल बंदी की पुष्टि नहीं हुई।
कौसानी (अल्मोड़ा ज़िला): 2025
सुंदर पहाड़ी कस्बे कौसानी में “यूथ फ़ॉर ट्रुथ” नामक युवाओं के समूह ने शराब की दुकानों के खिलाफ़ लंबे समय तक आंदोलन चलाया।
प्रदर्शनकारियों ने इसे सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र बताते हुए नैतिक पतन और सामाजिक नुकसान की बात उठाई।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस आंदोलन को जनआधारित प्रयास बताते हुए खुला समर्थन दिया। अल्मोड़ा ज़िले के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के आंदोलनों के चलते कई दुकानों को बंद करने की मांग उठी।
देहरादून और अन्य ज़िले: 2025
देहरादून और आसपास के इलाक़ों में भी कई विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए। सहस्रधारा रोड पर एक शराब की दुकान के खिलाफ़ ज़्यादा कीमत व सार्वजनिक अव्यवस्था के आरोप लगे। अप्रैल 2025 में पहाड़ी समुदायों के समन्वित आंदोलनों के चलते राज्य सरकार को नई शराब दुकानों के उद्घाटन पर रोक लगानी पड़ी।
मई तक, प्रशासन ने देहरादून और अल्मोड़ा में कुछ ऐसी दुकानों को स्थायी रूप से बंद करने का आदेश दिया, जिनका हर साल विरोध होता रहा था। कुछ मामलों में लाइसेंस शुल्क भी लौटाया गया, जिससे प्रशासन द्वारा जनदबाव को स्वीकार किए जाने के संकेत मिले।
सरकारी प्रतिक्रिया और नीतिगत कदम
संशोधित आबकारी नीति (मार्च 2025)
उत्तराखंड सरकार ने 2025–26 के लिए नई आबकारी नीति को मंज़ूरी दी, जिसके तहत मंदिरों, तीर्थ मार्गों और धार्मिक स्थलों के पास स्थित शराब की दुकानों को बंद करने का प्रावधान किया गया।
सरकार ने इसे राजस्व और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास बताया।
न्यायिक हस्तक्षेप (जुलाई 2025)
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार और ऋषिकेश में 2025 की शुरुआत में लागू की गई शराब दुकानों पर पूर्ण प्रतिबंध को रद्द कर दिया।
इस फ़ैसले के बाद लाइसेंस प्राप्त दुकानों को दोबारा खोलने की अनुमति मिली, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि जनभावना के बावजूद कार्यपालिका पर क़ानूनी सीमाएँ लागू रहती हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही
जुलाई 2025 में एक आबकारी अधिकारी को निलंबित किया गया, क्योंकि उसने विरोध झेल रही एक दुकान के स्थानांतरण आदेश पर कार्रवाई नहीं की थी। इसे विभागीय स्तर पर जवाबदेही का संकेत माना गया।
पहले का संदर्भ: 2024 के आंदोलन
यमुनोत्री (जून 2024)
यमुनोत्री मंदिर के पास स्थित एक शराब की दुकान के खिलाफ़ सैकड़ों महिलाओं ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि दुकान की निकटता मंदिर की पवित्रता का उल्लंघन करती है और तीर्थ पर्यटन को नुकसान पहुँचाती है। आबकारी विभाग को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा और दुकान हटाने की मांग को व्यापक समर्थन मिला।
आंदोलन का असर और आज की स्थिति
