मोरारजी देसाई ने फोन पर PAK को बताया था न्यूक्लियर राज, बदले में मिला निशान-ए-पाकिस्तान, मारे गए थे कई रॉ एजेंट

मोरारजी देसाई ने फोन पर PAK को बताया था न्यूक्लियर राज, बदले में मिला निशान-ए-पाकिस्तान, मारे गए थे कई रॉ एजेंट

देश की सुरक्षा और संप्रभुता की फिक्र करने वाले हर हिंदुस्तानी के ज़ेहन में एक तस्वीर हमेशा के लिए छप चुकी है। भारत का एक पूर्व प्रधानमंत्री, एक ऐसा आदमी जो कभी इस देश की सबसे बड़ी संवैधानिक कुर्सी पर बैठा था, वो पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ ले रहा है। ये सम्मान किसी विदेशी राजनयिक या शांति कराने वाले किसी निष्पक्ष बिचौलिए को नहीं, बल्कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री- मोरारजी देसाई को दिया गया था।

पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा सम्मान ऐसे ही खैरात में नहीं बांटता। ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ सिर्फ उन लोगों को मिलता है जिन्होंने इस्लामाबाद की नज़रों में पाकिस्तान के हितों और उसके मंसूबों के लिए कोई बहुत बड़ी सेवा की हो। जब पाकिस्तान आपके सीने पर वो मेडल लगाता है, तो उसका सीधा सा मतलब होता है: इस इंसान ने हमारे लिए कुछ बड़ा किया है। इसने हमारा काम आसान किया है।

तो ऐसे में हर हिंदुस्तानी को एक सीधा सा जवाब जानने का पूरा हक़ है: आखिर मोरारजी रणछोड़जी देसाई ने पाकिस्तान के लिए ऐसा क्या किया था? 

जब हम 1977 से 1979 के बीच उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की गहराई से जांच करते हैं, तो जो सच सामने आता है वो महज़ विचलित वाला नहीं है, बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाला है। 

इसमें खुफिया जानकारी लीक करने की ग़द्दारी, भारत की अंडरकवर ताकत को तबाह करने की साजिश, पाकिस्तान में मौजूद RAW के पूरे जासूसी नेटवर्क को खत्म करवाना और पाकिस्तान के न्यूक्लियर हथियारों के प्रोग्राम को हमेशा के लिए रोकने वाली ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को नामंज़ूर करना शामिल है। 

आज हम इन सब पर बेबाकी से बात करेंगे- बिना किसी लिहाज़ के और उस चुप्पी को तोड़ते हुए जो भारतीय राजनीति ने बरसों से इस आदमी के लिए ओढ़ रखी है।

मोरारजी देसाई कौन थे? इस बनी-बनाई इमेज के पीछे का इंसान

मोरारजी रणछोड़जी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को बॉम्बे प्रेसीडेंसी (आज के गुजरात) के भदेली गांव में हुआ था। एक ब्राह्मण परिवार से आने वाले मोरारजी ने अंग्रेज़ी तालीम ली और अपनी पीढ़ी के कई पढ़े-लिखे भारतीयों की तरह, ब्रिटिश राज के तहत इंडियन सिविल सर्विस में चले गए। वो गुजरात में एक कॉलोनियल एडमिनिस्ट्रेटर थे, जिसके बाद 1930 के दशक में गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन ने उन्हें राजनीति की तरफ खींच लिया।

उन्होंने दशकों तक अपनी एक ऐसी पब्लिक इमेज बनाई जो सादगी, कड़े अनुशासन और सख्त उसूलों पर टिकी थी। ना वो शराब पीते थे, ना सिगरेट। करप्शन के सख्त खिलाफ बोलते थे और हमेशा इस तरह का बर्ताव करते थे जैसे उनसे ज़्यादा सच्चा इंसान दुनिया में कोई और है ही नहीं। उनके समर्थक इसे उसूल कहते थे और आलोचक इसे उनकी ज़िद मानते थे। वो कांग्रेस में सीढ़ियां चढ़ते गए और बाद में बॉम्बे स्टेट के मुख्यमंत्री भी रहे।

लेकिन उनकी सबसे बड़ी लालसा थी- प्रधानमंत्री की कुर्सी। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद वो इसके बेहद करीब पहुंच चुके थे, लेकिन कांग्रेस ने उनके बजाय इंदिरा गांधी को चुन लिया। 1967 और 1969 में भी वो चूक गए और इंदिरा गांधी ने हर बार उन्हें मात देकर सत्ता की पूरी चाबी अपने हाथों में ले ली। 

मोरारजी और इंदिरा के बीच की ये दुश्मनी कोई विचारधारा की लड़ाई नहीं थी- ये एक गहरी, कड़वी और बेहद पर्सनल ईगो की लड़ाई थी। एक ऐसा आदमी जिसे लगता था की किस्मत ने उसके साथ धोखा किया है, और एक ऐसी औरत जो किसी भी कीमत पर रास्ता छोड़ने को तैयार नहीं थी। आगे जो कुछ भी हुआ, उसे समझने के लिए इस निजी खुन्नस को समझना बहुत ज़रूरी है।

आख़िरकार कब मिली मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री की कुर्सी? जनता पार्टी का वो एक्सपेरिमेंट (1977–1979)

जून 1975 में इंदिरा गांधी का इमरजेंसी लगाना- जहां नागरिक आज़ादी छीन ली गई, विरोधियों को जेल में ठूंस दिया गया और भारत को एक तानाशाही स्टेट बना दिया गया- यही वो मौका था जिसने मोरारजी की राजनीति में जान फूंक दी। हज़ारों लोगों के साथ वो भी जेल गए और जब 1977 में बाहर आए, तो उनके सिर पर लोकतंत्र के ‘शहीद’ का ताज था। इमरजेंसी के उन 21 महीनों ने उन्हें वो दे दिया था जो उनकी दशकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं दे पाई थी: लोगों की सच्ची हमदर्दी।

जब इंदिरा गांधी ने 1977 की शुरुआत में चुनाव का ऐलान किया, तो अलग-अलग विचारधाराओं वाले विपक्ष- जयप्रकाश नारायण का मूवमेंट, समाजवादी गुट, जनसंघ और बागी कांग्रेसी- सबने मिलकर ‘जनता पार्टी’ का जुगाड़ बिठा लिया। ये एक अजीबोगरीब गठबंधन था जिसके अंदर भारी मतभेद थे। इन्हें जोड़ने वाली बस एक ही चीज़ थी- इंदिरा गांधी और इमरजेंसी से नफरत। खैर, जनता पार्टी जीत गई और 81 साल की उम्र में मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बन गए।

लेकिन इसके बाद जो दो साल गुज़रे, वो सत्ता में नाकामी की एक खौफ़नाक मिसाल थे। जनता गठबंधन के अंदर के झगड़े मामूली नहीं थे; वो बुनियादी तौर पर एक-दूसरे के उल्टे थे। RSS से जुड़े जनसंघ के नेता कट्टर समाजवादियों और गांधीवादियों के बगल में बैठे थे। चौधरी चरण सिंह को पावर चाहिए थी। जगजीवन राम को पावर चाहिए थी। हर किसी को सत्ता की मलाई खानी थी। और ऐसे माहौल में मोरारजी का अड़ियल और रूखा रवैया उन्हें गठबंधन चलाने के लिए एकदम नाकाबिल बनाता था। 

अपनी ही सरकार में तालमेल बिठाने की बजाय, वो बस दूसरों को नैतिकता का ज्ञान देते और उन्हें नाराज़ करते रहे। नतीजा ये हुआ की सरकार ने ना कोई बड़ा आर्थिक सुधार किया, ना कोई विज़न दिखाया। आख़िरकार जुलाई 1979 में फ्लोर टेस्ट से पहले ही देसाई ने हार मानकर इस्तीफा दे दिया। 1980 में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से वापस लौट आईं- ये इस बात का सीधा सबूत था की जनता पार्टी के राज ने आम हिंदुस्तानी को कितना निराश किया था।

मोरारजी देसाई और पाकिस्तानी जनरल मोहम्मद ज़िया-उल-हक़ का वो ‘कहूटा फोन कॉल’ जो है देश के साथ गद्दारी का सबसे बड़ा सबूत

अब हम आपको ‘कहूटा फोन कॉल’ मामले के बारे में बताते हैं जो सीधे तौर पर तबाही का मंज़र था: एक ऐसी हरकत जिसने पाकिस्तान की सबसे संवेदनशील न्यूक्लियर फैसिलिटी के अंदर बैठे भारत के पूरे खुफिया नेटवर्क की धज्जियां उड़ा दीं।

रावलपिंडी के पास मौजूद कहूटा रिसर्च लेबोरेटरीज, पाकिस्तान के खुफिया न्यूक्लियर हथियारों के प्रोग्राम का अड्डा था। डॉ. अब्दुल कादिर खान- जिसने खुद यूरोप के URENCO से न्यूक्लियर सेंट्रीफ्यूज के ब्लूप्रिंट चुराए थे- उसी के निर्देशन में कहूटा में पाकिस्तान हथियार बनाने लायक यूरेनियम तैयार कर रहा था। वैसे तो सबको इसकी भनक थी, लेकिन इसके अंदर क्या चल रहा है, ये पाकिस्तान की मिलिट्री का सबसे बड़ा राज़ था।

1970 के दशक में RAW ने कहूटा पर नज़र रखने के लिए सालों की मेहनत से एक ज़बरदस्त जासूसी नेटवर्क खड़ा किया था। ये कोई छोटी-मोटी निगरानी नहीं थी- इसमें ह्यूमन सोर्सेज (जासूसों) को प्लांट करना और वहां से सीधी जानकारी निकालने का पूरा जुगाड़ शामिल था। ये RAW के इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे ज़रूरी ऑपरेशन था।

खुफिया इतिहासकारों और RAW के पूर्व अफसरों के मुताबिक, पाकिस्तान के मिलिट्री तानाशाह जनरल मोहम्मद ज़िया-उल-हक़ से फोन पर बात करते-करते मोरारजी देसाई ने ये राज़ उगल दिया (चाहे जानबूझकर या अपनी बेवकूफी में) की भारत को कहूटा के खुफिया न्यूक्लियर प्रोग्राम के बारे में सब पता है। 

इस बातचीत का असली टेप दोनों देशों ने कभी सार्वजनिक नहीं किया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो बेहद खौफ़नाक था: पाकिस्तान की ISI ने चुन-चुनकर कहूटा के आस-पास काम कर रहे RAW के पूरे नेटवर्क को उखाड़ फेंका। इसमें कई RAW एजेंट्स मारे गए और बहुतों को अगवा कर लिया गया। सालों की मेहनत और जासूसों की पूरी फौज एक झटके में खत्म हो गई।

चाहे देसाई ने ऐसा पड़ोसी के साथ ‘गांधीवादी ट्रांसपेरेंसी’ दिखाने के नाम पर किया हो, या अंडरकवर ऑपरेशंस से अपनी नफरत के चलते किया हो, या फिर ये कोई सोची-समझी ग़द्दारी थी- नतीजा एक ही निकला। 

भारत ने पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर रखी अपनी आंखें हमेशा के लिए खो दीं। पाकिस्तान का बम बनाने का काम बिना किसी रुकावट के चलता रहा। और भारत आज तक उस खुफिया नाकामी की कीमत चुका रहा है- एक ऐसे परमाणु हथियार वाले दुश्मन के रूप में जो दशकों से आतंकवाद को ढाल बनाकर बैठा है।

कैसे मोरारजी देसाई ने इज़राइल का प्रस्ताव ठुकरा कर पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को तबाह करने से मना कर दिया 

एक और बात जो बहुत कम लोग जानते हैं- लेकिन जिसका ज़िक्र भारतीय खुफिया और स्ट्रैटेजिक बहस में अक्सर होता है- वो ये है की देसाई के वक्त इज़राइल ने भारत के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा था जो साउथ एशिया का पूरा नक्शा ही बदल देता। इज़राइल चाहता था की भारत उसे अपने एयरबेस इस्तेमाल करने दे ताकि इज़राइली फाइटर जेट्स वहां फ्यूल भर कर पाकिस्तान के कहूटा रिएक्टर पर वैसी ही एयरस्ट्राइक कर सकें जैसी उन्होंने 1981 में इराक के ओसिराक रिएक्टर पर की थी।

ये एकदम सटीक प्लानिंग थी। अगर कहूटा पर स्ट्राइक कामयाब होती, तो पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्रोग्राम जड़ से खत्म हो जाता। पाकिस्तान कभी परमाणु बम नहीं बना पाता। और बिना एक भी भारतीय सैनिक की जान दांव पर लगाए, भारत का इस पूरे इलाके पर दबदबा कायम हो जाता।

लेकिन मोरारजी देसाई ने अपनी गांधीवादी ‘अहिंसा’ की दुहाई देते हुए साफ मना कर दिया। ऊपर से देखने पर ये बात बड़ी आदर्शवादी लग सकती है। लेकिन जब बात 70 करोड़ हिंदुस्तानियों की सुरक्षा की हो, तो ये गांधीवादी शांति कोई महान काम नहीं है- ये सीधा-सीधा एक ऐसा धोखा है जिसे उसूलों के कपड़े पहनाए गए थे। आज भी हम इसके अंजाम भुगत रहे हैं: पाकिस्तान ने बम बनाया, 1998 में टेस्ट किया, और उसी न्यूक्लियर बम की आड़ में वो दशकों से भारत के खिलाफ आतंकवाद फैला रहा है।

और सबसे खौफ़नाक बात तो ये है की देसाई ने सिर्फ इज़राइल को मना ही नहीं किया- ऐसी भी खबरें हैं की उन्होंने जनरल ज़िया-उल-हक़ को इसके बारे में चेतावनी तक दे दी थी की इज़राइल ने भारत से ऐसा कुछ कहा है। अगर ये सच है, तो ये ग़द्दारी की इंतहा है, जहां आप दुश्मन को उसी के सबसे बड़े राज़ पर होने वाले हमले से पहले आगाह कर रहे हों!

मोरारजी देसाई पर अमेरिका की CIA के लिए जासूसी करने का वो सनसनीखेज़ आरोप

अब बात करते हैं 1983 की। देसाई के सत्ता से हटने के चार साल बाद, अमेरिका के मशहूर जर्नलिस्ट सीमौर हेर्ष ने ‘The Price of Power’ नाम से एक किताब छापी। अमेरिकी खुफिया विभाग के गहरे सूत्रों के आधार पर लिखी गई इस किताब में एक ऐसा दावा था जिससे दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भूचाल आ जाना चाहिए था।

सीमौर के मुताबिक, 1960 के दशक से ही मोरारजी देसाई अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के पेरोल पर थे- यानी उनके एक खरीदे हुए एजेंट। मोरारजी को CIA के लिए जासूसी करने के लिए साल के बीस हज़ार अमेरिकी डॉलर्स मिलते थे। ये आरोप बेहद सटीक और खौफ़नाक था: देसाई ने कथित तौर पर CIA को भारतीय खुफिया एजेंट्स की जानकारी दी थी। उन्होंने भारत की कैबिनेट मीटिंग्स और सोवियत-इंडिया सम्बन्धों की भी जानकारी अमेरिका को दी थी। 

सीमौर ने मोरारजी पर सबसे बड़ा आरोप ये लगाया था की मोरारजी ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी की कैबिनेट की गुप्त बैठकों की सारी जानकारी अमेरिका को लीक कर दी थी।

इस आरोप पर भारत सरकार का रिएक्शन इतना ढीला था की देखकर शर्म आ जाए। थोड़ा-बहुत हंगामा हुआ, संसद में दो-चार सवाल उठे और फिर- एकदम सन्नाटा। ना कोई सरकारी जांच बिठाई गई, ना खुफिया एजेंसियों को रिव्यू करने का कोई ऑर्डर दिया गया। कानूनी कार्रवाई तो छोड़ ही दीजिए।

निशान-ए-पाकिस्तान- मोरारजी देसाई को मिला पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान

साल 1990 में पाकिस्तान सरकार ने मोरारजी देसाई को अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ दिया। 1957 में शुरू हुआ ये अवार्ड भारत के ‘भारत रत्न’ के ही बराबर है। अक्सर ये उन विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को दिया जाता है जिन्होंने पाकिस्तान के लिए कोई बहुत बड़ा काम किया हो।

अब ज़रा सोचिए- 1990 तक देसाई को सत्ता से बाहर हुए 11 साल बीत चुके थे। वो किसी पद पर नहीं थे। उनके पास कोई पावर नहीं थी। उनकी कोई पूछ नहीं थी। फिर भी पाकिस्तान ने उन्हें ये अवार्ड देने के लिए यही वक्त क्यों चुना? पाकिस्तान ने दुनिया को दिखाने के लिए वही रटी-रटाई बातें कहीं- शांति, दोस्ती और पुल बनाने की बात। लेकिन सच तो ये है की कोई भी देश महज़ ‘अच्छी भावनाओं’ के लिए अपना सबसे बड़ा सम्मान खैरात में नहीं बांटता। ये उसी को मिलता है जिसने सच में उनका कुछ फायदा कराया हो।

ज़रा सोचिए की 1990 तक पाकिस्तान को क्या-क्या पता चल चुका था। ISI की जांच से वो जान चुके थे की कहूटा की जानकारी भारत तक कैसे पहुंच रही थी। उन्हें पता था की उनका न्यूक्लियर प्रोग्राम अब एकदम सुरक्षित है। उन्हें ये भी पता था की इज़राइल का प्रपोज़ल भारत ने ठुकरा दिया था। RAW का नेटवर्क तबाह हो चुका था। और मजे़ की बात ये है कि भारत ने इस पूरे मामले की कभी कोई जांच तक नहीं बिठाई। इस नज़रिया से देखें तो ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ कोई शांति पुरस्कार नहीं था। ये एक रसीद थी- पाकिस्तान की तरफ से एक कर्ज़ चुकाने का ऐलान!

सबसे चुभने वाली बात ये है की भारत के किसी और प्रधानमंत्री को पाकिस्तान ने ये सम्मान नहीं दिया। ना नेहरू को (जिन्होंने सिंधु जल संधि कराई), ना राजीव गांधी को, और ना ही लाहौर बस यात्रा करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को। सिर्फ मोरारजी देसाई को मिला। पाकिस्तान को देसाई के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ खास दिखा जो इस सम्मान के काबिल था। और यही ‘खास बात’ ही अपने आप में सबसे बड़ा आरोप है।

मोरारजी देसाई के बेटे पर करप्शन के आरोप

मोरारजी देसाई की पूरी राजनीति का एक ही पिलर था: उनकी ईमानदारी। उनकी ‘एंटी-करप्शन’ इमेज ही उनकी वो यूएसपी थी जो उन्हें कांग्रेस के परिवारवाद से अलग दिखाती थी। लेकिन उनके अपने बेटे, कांतिलाल देसाई (जिन्हें सब कांति कहते थे) ने इसी इमेज की धज्जियां उड़ा दीं।

जब देसाई प्रधानमंत्री बने, तो इस बात का शोर मचने लगा की कांति पीएमओ में अपनी पहुंच का फायदा उठाकर अपनी जेबें भर रहे हैं और बिज़नेस में मुनाफ़ा कमा रहे हैं। शाह कमीशन और जनता सरकार के दौर की जांच से ये साफ हो गया था की कांति के कारनामों में दाल में बहुत कुछ काला है। एक तरफ पिता पूरे देश को धर्म और नैतिकता का ज्ञान बांट रहा था, और दूसरी तरफ उनका अपना बेटा सत्ता के गलियारों में सरेआम खेल कर रहा था। 

इससे जनता सरकार की इमेज को ऐसा बट्टा लगा जिससे देसाई की ‘सच्चाई’ और उनके अपने घर की हक़ीक़त का फर्क पूरी दुनिया के सामने आ गया।

इमरजेंसी के साल- शहीद या मौकापरस्त?

मोरारजी की वापसी का पूरा ताना-बाना इसी बात पर बुना गया था की वो इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के दौरान जेल गए थे। 1977 में वो एक ‘लोकतंत्र के रक्षक’ बनकर उभरे। लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। 

देसाई ने अपनी राजनीतिक ज़िंदगी का ज़्यादातर वक्त कांग्रेस सिस्टम से लड़ते हुए नहीं, बल्कि उसी की मलाई खाते हुए गुज़ारा था- कभी नेहरू के कैबिनेट मंत्री बनकर, कभी मुख्यमंत्री बनकर, तो कभी डिप्टी पीएम बनकर। पूरे तीन दशकों तक वो कांग्रेस सिस्टम के अंदर ही पले-बढ़े थे।

उनका ये अचानक ‘विद्रोही’ बन जाना महज़ इत्तेफाक नहीं था; ये तब हुआ जब उन्हें प्रधानमंत्री की वो कुर्सी बार-बार नहीं मिली जिसके वो भूखे थे। इंदिरा गांधी से उनकी दुश्मनी पूरी तरह से पर्सनल थी, किसी उसूल के चलते नहीं। 

इमरजेंसी ने उन्हें अपनी इमेज बदलने का एक शानदार मौका दिया- और उन्होंने तुरंत लपक लिया। उनके समर्थक आज तक इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए हैं की अगर 1966 में देसाई चुनाव जीत जाते, तो क्या तब भी वो ऐसे ही लोकतंत्र के रक्षक बने रहते? सत्ता में आने के बाद उनका जो बर्ताव रहा, उसे देखकर तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता।

RAW को कमज़ोर करना और जासूसी के विवाद

जनता सरकार के दो साल के राज का सबसे दर्दनाक और सबसे कम चर्चा वाला हिस्सा ये है की इन्होंने जानबूझकर भारत की बाहरी खुफिया ताकत को कमज़ोर किया। ये सब मोरारजी देसाई की अंडरकवर ऑपरेशंस से चिढ़ का नतीजा था।

1968 में आर.एन. काव के नेतृत्व में बनी ‘RAW’ 1970 के दशक के मध्य तक एक बेहद खतरनाक और ताक़तवर एजेंसी बन चुकी थी, जिसका पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में गहरा नेटवर्क था। 1971 की जंग में RAW ने ‘मुक्ति वाहिनी’ को सपोर्ट करके जो खुफिया ढांचा तैयार किया था, उसी के दम पर भारत वो ऐतिहासिक जीत दर्ज़ कर पाया था। लेकिन जनता सरकार आते ही RAW के पंख काट दिए गए, उसका बजट 30% से 40% कम कर दिया गया और इसके लीडर्स पर राजनीतिक दबाव डाला गया।

सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेताओं ने उस वक्त जनता सरकार की इस पॉलिसी को लेकर खतरे की घंटी भी बजाई थी, लेकिन किसी ने एक ना सुनी। 1977 से 1979 के बीच RAW को जो संस्थागत नुकसान हुआ, उसे ठीक होने में सालों लग गए- और इन्ही सालों में पाकिस्तानी और बाकी दुश्मन एजेंसियों ने भारत की नज़रों से बचकर अपना पूरा खेल कर लिया।

सत्ता से बेदखली और भागने का वो तरीका

जनता सरकार का अंत भी उतना ही शर्मनाक रहा जितना उनका कार्यकाल था। चौधरी चरण सिंह ने समर्थन खींच लिया और सरकार गिर गई। ऐसे में मोरारजी देसाई, जो ज़िंदगी भर उसूलों और संविधान की दुहाई देते थे, उन्होंने एक अजीबोगरीब डरपोक रवैया अपनाया: जुलाई 1979 में उन्होंने लोकसभा में फ्लोर टेस्ट का सामना करने की बजाय चुपचाप इस्तीफा देकर मैदान छोड़ दिया। 

जनवरी 1980 में जनता ने सब हिसाब बराबर कर दिया- इंदिरा गांधी आंधी की तरह वापस आईं, और देसाई का राजनीतिक करियर हमेशा के लिए दफ्न हो गया।

कैसे पाकिस्तान के सबसे चहेते भारतीय मोरारजी को भारत रत्न मिलना देश के साथ एक भद्दा मज़ाक है

अब इसे भारत का दुर्भाग्य ही कहेंगे की पाकिस्तान का ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ मिलने के ठीक एक साल बाद, 1991 में मोरारजी देसाई को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दे दिया गया! 1990 में दुश्मन देश का सबसे बड़ा अवार्ड, और 1991 में अपने देश का- आज़ाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा और भद्दा मज़ाक शायद ही कोई हो।

भारत रत्न उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने देश के लिए कुछ ऐसा किया हो जो मिसाल बन जाए। मोरारजी देसाई ने अपने दो साल के कार्यकाल में कौन सा ऐसा झंडे गाड़े थे? ना कोई बड़ा कानून, ना कोई बड़ी पॉलिसी। उनकी अपनी सरकार खुद के बोझे तले दबकर गिर गई थी। उनके ऊपर CIA से जुड़े होने, कहूटा फोन कॉल, इज़राइल को मना करने और RAW के नेटवर्क को तबाह करने के इतने संगीन आरोप थे- जिनकी कभी जांच तक नहीं हुई।

1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार द्वारा दिया गया ये भारत रत्न, असल में मोरारजी देसाई की फाइलों को हमेशा के लिए बंद करने का एक राजनीतिक पैंतरा था। पाकिस्तान ने उन्हें अवार्ड इसलिए दिया क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान के लिए काम किया था। लेकिन भारत ने उन्हें ये अवार्ड आख़िर किस बात के लिए दिया? इन दोनों अवार्ड्स के बीच का ये झोल आज भी कायम है, जो दिखाता है की हमारी राजनीतिक व्यवस्था असली जवाबदेही से कितना भागती है।

सबसे बड़ा सवाल- जवाबदेही, खामोशी और राष्ट्रीय सुरक्षा

इन सब बातों के बीच एक ऐसा सवाल है जो सबसे ज़्यादा चुभता है: भारत ने कभी इन मामलों की कोई जांच क्यों नहीं की? सिर्फ सीमौर हेर्ष के उस आरोप पर की ‘भारत का प्रधानमंत्री CIA का एजेंट था’- तुरंत एक संसदीय जांच बैठनी चाहिए थी। कहूटा फोन कॉल से RAW का जो पूरा नेटवर्क तबाह हुआ, उसका पूरा हिसाब मांगा जाना चाहिए था। लेकिन दोनों ही मामलों में सिर्फ सन्नाटा पसरा रहा।

हमारे देश में पूर्व प्रधानमंत्रियों को जो ‘वीआईपी इम्युनिटी’ मिली हुई है- यानी ये मान लेना की वो कुर्सी पर बैठ गए तो अब उन पर कोई सवाल नहीं उठ सकता- उसी ने मोरारजी के इन काले कारनामों को बचा लिया। ये कोई लोकतांत्रिक समझदारी नहीं है; ये राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ है। जिन खुफिया नाकामियों की जांच नहीं होती, वो इतिहास में बार-बार दोहराई जाती हैं।

बाकी कोई भी सच्चा लोकतंत्र अपने पूर्व नेताओं की ऐसी खुफिया ग़द्दारी बर्दाश्त नहीं करता। लेकिन भारत ने जांच करने के बजाय उन्हें ‘भारत रत्न’ पकड़ाकर अपनी आंखें मूंद लीं। इसकी कीमत- मारे गए जासूसों, एक परमाणु हथियार वाले पाकिस्तान और दशकों से चले आ रहे आतंकवाद के रूप में- इस देश के आम नागरिकों ने चुकाई है, ना कि उन राजनेताओं ने जिन्होंने ये सब होने दिया।

इतिहास को बिना किसी डर के फैसला सुनाना होगा

सच कहूं तो, लंबी उम्र जीने का मतलब ये नहीं होता की आपके गुनाह धुल गए। मोरारजी देसाई 99 साल जिए और 10 अप्रैल 1995 को दुनिया से चले गए। वो अपने आलोचकों से ज़्यादा लंबा जिए और ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ और ‘भारत रत्न’ दोनों अवार्ड लेकर गए- एक ऐसा कॉम्बिनेशन जो ना तो किसी और हिंदुस्तानी को मिला है, और ना ही किसी हिंदुस्तानी को कभी इसकी चाहत होनी चाहिए।

लेकिन जो सवाल उनके जीते जी अनसुलझे रह गए, उनके जवाब आज हमें चाहिए: क्या वो वाकई अपने राजनीतिक करियर के पीक पर CIA के एजेंट थे? क्या जनरल ज़िया से उनकी उस बातचीत ने RAW का वो नेटवर्क तबाह कर दिया जो पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर भारत की इकलौती आंख था? क्या उन्होंने इज़राइल को सिर्फ अपने गांधीवादी उसूलों के चलते मना किया था- या उन्होंने ज़िया को पहले ही अलर्ट कर दिया था? आख़िर पाकिस्तान को ऐसा क्यों लगा की इस भारतीय प्रधानमंत्री को ही उनका सबसे बड़ा सम्मान मिलना चाहिए?

1977 से 1979 तक की RAW, IB और PMO की फाइलों को डीक्लासिफाई करने का वक्त अब आ गया है। जनता सरकार के वक्त जो खुफिया खिलवाड़ हुआ, उसकी संसदीय जांच होनी ही चाहिए- ये कोई बदला नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान की बात है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के वो जांबाज़ लोग- जिन्होंने वो नेटवर्क बनाए और जो उन दो सालों की सनक में अपनी जान गवां बैठे- वो इस बात के हकदार हैं की दुनिया उनके बलिदान को जाने।

भारत एक ऐसा लोकतंत्र है जिसे अपने संविधान और मूल्यों पर बहुत गर्व है। लेकिन जो लोकतंत्र अपने ही पूर्व प्रधानमंत्रियों की जवाबदेही तय ना कर सके- जो सवालों के जवाब खोजने की बजाय उन्हें बड़े-बड़े अवार्ड पकड़ा दे- उसने असल में अभी तक खुद को ठीक से नहीं समझा है। जब कोई दुश्मन देश आपके पूर्व प्रधानमंत्री को सिर-आंखों पर बिठा रहा हो, तो कम से कम हमें इतनी तो हिम्मत दिखानी ही चाहिए की हम पूछ सकें- आख़िर क्यों? और जो सच सामने आए, उस पर एक्शन लेने की ईमानदारी भी हमारे अंदर होनी चाहिए।

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