पंडित केशव बलिराम हेडगेवार की विचारधारा आज की RSS से कितनी विपरीत? क्या संघ अपने ही संस्थापक से दूर हो चुका है?

नागपुर में 1 अप्रैल 1889 को एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार साधारण था- देशस्थ ब्राह्मण परंपरा से जुड़ा, जिसकी जड़ें आज के तेलंगाना के कंदाकुर्थी गांव तक जाती थीं। उस बच्चे का नाम केशव बलिराम हेडगेवार था। तब किसी ने शायद सोचा भी नहीं होगा की यही लड़का आगे चलकर भारत के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नींव रखेगा, जिसकी स्थापना नागपुर में विजयादशमी के दिन, 1925 में हुई।

हेडगेवार कोई आरामकुर्सी पर बैठकर राष्ट्रवाद की बातें करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे सीधे तौर पर आज़ादी की राजनीति में सक्रिय थे। एक समय उनका जुड़ाव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उस दौर के कई क्रांतिकारी समूहों के साथ भी रहा। उनकी सोच पर बाल गंगाधर तिलक के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का गहरा असर था।

लेकिन जब उन्होंने आरएसएस की कल्पना की, तो वह न कोई राजनीतिक पार्टी थी, न चुनाव जीतने की मशीन, और न ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का औज़ार। उनके लिए यह एक ऐसा मंच था जहाँ युवाओं का चरित्र गढ़ा जाए- अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभाव से भरे स्वयंसेवक तैयार किए जाएँ।

आज सौ साल बाद आरएसएस एक विशाल नेटवर्क बन चुका है। राजनीति, शिक्षा, मीडिया, ट्रेड यूनियन, सामाजिक संगठनों, हर जगह इसकी शाखाएँ हैं। प्रभाव भी पहले से कहीं ज्यादा है। लेकिन विडंबना यह है की जैसे-जैसे संगठन ताकतवर हुआ है, वैसे-वैसे वह अपने संस्थापक की मूल सोच से दूर होता चला गया है।

हमारा आज का यह लेख इसी विरोधाभास को आईना दिखाने की एक कोशिश है। हम बिना किसी लाग-लपेट के यह देखेंगे की 2026 का RSS, पंडित केशव बलिराम हेडगेवार के बनाए RSS से कितना अलग हो चुका है। इस फर्क को समझने के लिए हम चार अहम मुद्दों पर बात करेंगे: मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा, मुस्लिम लीग का ऐतिहासिक विरोध, और आरक्षण व यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (UGC) के मुद्दे पर मारी गई अवसरवादी पलटी।

1923 के नागपुर दंगे जिसमें तपकर निकला था संघ 

हेडगेवार को समझना है तो पहले 1923 को समझना होगा। उस साल नागपुर में जो सांप्रदायिक दंगे भड़के, वो हेडगेवार के लिए सिर्फ कोई ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का मसला नहीं थे. वो पूरी सभ्यता की एक बीमारी का सबूत थे। उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि कैसे इलाके में बहुसंख्यक होने के बावजूद हिंदू समाज ने उस हिंसा के आगे पूरी तरह बिखराव, घबराहट और लाचारी दिखाई। इस नज़ारे ने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया।

वो कोई चुपचाप तमाशा देखने वाले इंसान तो थे नहीं। काम करने की अपनी इच्छाशक्ति वो पहले ही दिखा चुके थे. वो एक क्रांतिकारी रह चुके थे, कांग्रेस वर्कर थे, देश के लिए जेल जाने का जोखिम उठा चुके थे। लेकिन 1923 ने उनके सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया जिसका जवाब कोरी विचारधारा के पास नहीं था: अगर कोई समाज अपने ही शहर की सड़कों पर खुद को बचा नहीं सकता, तो फिर उस राजनीतिक आज़ादी का अचार डालना है?

“अगर हिंदू मज़बूत होंगे, तो मुस्लिम समाज का ‘गुंडा तत्व’ उन पर हमला करने की जुर्रत ही नहीं करेगा। सिर्फ तभी सच्चा और पक्का भाईचारा कायम हो सकता है।”

हेडगेवार के इस मशहूर बयान को अक्सर कांटेक्स्ट से काटकर पेश किया जाता है, वो भी जो उन्हें ‘हिंदू योद्धा-संत’ साबित करना चाहते हैं, और वो भी जो उन्हें ‘कट्टरपंथी’ कहकर गरियाते हैं। लेकिन ज़रा ध्यान से पढ़ो, इसमें एक बहुत ही कड़वा और गहरा सच छिपा है। हेडगेवार यह नहीं कह रहे थे की सारे मुसलमान दुश्मन हैं। वो बस इतना कह रहे थे की सांप्रदायिक अस्थिरता की असली जड़ हिंदुओं की कमज़ोरी है। और दो समुदायों के बीच सच्ची शांति सिर्फ ताकत की बुनियाद पर टिक सकती है- तुष्टिकरण या भाईचारे के खोखले दिखावे से नहीं

1923 के दंगों ने उन्हें इस बात का पक्का यकीन दिला दिया की हिंदू समाज की समस्या यह नहीं है की उनके अंदर दूसरों के लिए सद्भावना की कमी है। दिक्कत मनोवैज्ञानिक थी: एक ऐसा बहुसंख्यक समाज जो पूरी तरह बिखरा हुआ है, सदियों की गुलामी ने जिसकी लड़ाकू रगों को सुखा दिया है, अंग्रेज़ी पढ़ाई ने जिसे चुपचाप सब सह लेना सिखा दिया है, और जो जात-पात व क्षेत्रवाद में बुरी तरह बंटा है। 

हेडगेवार के दिमाग में RSS ठीक इसी बीमारी का इकलौता इलाज था। एक ऐसा तरीका जिससे हिंदू समाज अपनी खोई हुई रीढ़ वापस पा सके।

जब हम आज के RSS को देखते हैं, तो ये शुरुआती बातें बहुत मायने रखती हैं। जो संगठन हेडगेवार का वारिस होने का दावा करता है, वो आज कई अहम नीतियों में ठीक उसी दिशा में जा रहा है जिसका हेडगेवार ने ताउम्र विरोध किया: यानी जातियों में बंटना, तुष्टिकरण करना, और अपने सभ्यतागत मिशन से ज़्यादा चुनाव के गणित को अहमियत देना।

RSS की शुरुआत के वो उसूल जिन पर समझौता नहीं हो सकता

1925 की विजयादशमी को हेडगेवार ने जो RSS बनाया, वो तीन स्तम्भों पर खड़ा था: शारीरिक अनुशासन, दिमागी मज़बूती और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। रोज़ लगने वाली शाखा, ड्रिल और कसरत का हर सेशन, हिंदू सभ्यता की बौद्धिक विरासत का पाठ- सब कुछ इसी एक मकसद के लिए था।

हेडगेवार इस बात को लेकर एकदम साफ थे की RSS कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। चुनावी राजनीति को लेकर उनके मन में गहरी शंकाएं थीं। उनका मानना था कि जो संगठन वोटों पर निर्भर हो जाते हैं, वो सत्ता की भूख में बर्बाद हो जाते हैं। उनका साफ असेसमेंट था कि राजनीतिक पार्टियां गठबंधन, वोट-बैंक और चुनावी गणित के चक्कर में आखिरकार अपने उसूलों से समझौता कर ही लेती हैं। RSS को इससे अलग होना था- एक ऐसा लंबा सांस्कृतिक प्रोजेक्ट जो किसी भी सरकार या राजनीतिक समीकरण से ज़्यादा टिके।

वैसे, 1927 का वो किस्सा याद है? हेडगेवार ने एक मस्जिद के सामने से डंके की चोट पर ज़ोर-ज़ोर से ढोल बजाते हुए एक गणेश जुलूस निकाला था। उस वक्त मस्जिदों के पास बाजा बंद करने का रिवाज़ था, और हेडगेवार ने सीधे तौर पर उसे चुनौती दी थी। यह कोई राह चलते किया गया भड़कावा नहीं था। यह एक सोची-समझी ज़िद थी।

हेडगेवार का मानना था कि हिंदू समाज को सार्वजनिक जगहों पर अपने धर्म का पालन करने का पूरा हक है, और इसके लिए किसी कट्टरपंथी डर के आगे झुकने या माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है। एक तरह से वो बस अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके उन्हें साबित कर रहे थे- खुलेआम, आवाज़ उठाकर, और इस बात को पूरी तरह जानते हुए कि इस पर ज़बरदस्त बवाल मचेगा।

आलोचक इसे भड़काऊ कहते हैं। समर्थक इसे बहादुरी मानते हैं। लेकिन दोनों ही पक्ष इसके पीछे के वैचारिक लॉजिक को मिस कर जाते हैं। हेडगेवार के लिए, जो समाज दबाव में आकर अपनी सार्वजनिक धार्मिक पहचान को सरेंडर कर देता है, वो असल में खुद को ही खत्म कर रहा होता है।

वो जुलूस एक तरह का टेस्ट था- यह दिखाने के लिए कि RSS का स्वयंसेवक अब पीछे नहीं हटेगा। हेडगेवार 1927 के इसी जज़्बे को संगठन की रग-रग में बसाना चाहते थे। और सच कहूं तो, आज का RSS ‘राजनीतिक तौर पर शरीफ’ दिखने के चक्कर में ठीक इसी जज़्बे का सौदा कर चुका है।

मुस्लिम लीग के खिलाफ हेडगेवार की राजनीतिक दूरदर्शिता

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को लेकर हेडगेवार का विरोध एकदम दो-टूक, लगातार और उस वक्त की मुख्यधारा की राजनीति से बहुत आगे का था। जहां गांधी और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस लीग के साथ समझौते की नीति अपना रही थी- उसे मुस्लिम हितों का जायज़ नुमाइंदा मान रही थी, उसके नेताओं से मोलभाव कर रही थी, और देश की एकता बचाने की उम्मीद में बार-बार राजनीतिक रियायतें दे रही थी- वहीं हेडगेवार की सोच एकदम अलग थी।

उनके लिए मुस्लिम लीग कोई भारत के भीतर मुसलमानों की जायज़ राजनीतिक पहचान की आवाज़ नहीं थी। वो एक अलगाववादी संगठन था जिसका पूरा लॉजिक ही इस बात पर टिका था की मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं। अगर इस बात को मान लिया जाता, तो एकजुट भारत का विचार ही खत्म हो जाता। हेडगेवार इसे इस्लाम के किसी धार्मिक नज़रिए के तौर पर नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चाल की तरह देखते थे, और उन्होंने लीग से इसके अलावा किसी और रूप में बात करने से ही साफ इनकार कर दिया था।

इसलिए, लीग का उनका विरोध असल में मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी का विरोध नहीं था। यह एक ऐसे संगठन को वैधता देने से इनकार करना था जिसका मकसद ही भारत के टुकड़े करना था। उनका साफ कहना था कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति- हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर लीग की हर मांग के आगे घुटने टेकना- सिर्फ बेअसर ही नहीं, बल्कि नुकसानदायक भी है। हेडगेवार के एनालिसिस के मुताबिक, हर एक रियायत लीग के अलगाववादी एजेंडे को सही ठहराती थी और उसकी मांगों को और हवा देती थी।

उनके उस दौर के कई नेताओं को उनका यह एनालिसिस बहुत ‘एक्स्ट्रीम’ लगता था। लेकिन 1947 में जब लीग की ‘टू-नेशन थ्योरी’ ने पाकिस्तान की शक्ल ली, और मानव इतिहास का सबसे खौफनाक सांप्रदायिक कत्लेआम हुआ, तो उनकी हर बात सच साबित हो गई। हेडगेवार ने यह सब पहले ही देख लिया था। उन्होंने इसे साफ-साफ कहा भी था।

लेकिन राजनीतिक व्यवस्था- यानी कांग्रेस और उसके सहयोगियों- ने उनकी सुनने से ही इनकार कर दिया था। आज का RSS, जो खुद को हेडगेवार की विरासत का रक्षक बताता है, उसे यह याद रखना चाहिए कि इस मुद्दे पर उसके संस्थापक की स्पष्टता कोई कमज़ोरी नहीं थी। वो एक भविष्यवाणी थी।

कैसे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच है हेडगेवार के विचारों के साथ ठीक उल्टा बर्ताव

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) RSS से जुड़ा एक संगठन है जो 2002 में बना। कहने को तो इसका मकसद मुसलमानों की एक ऐसी पहचान को बढ़ावा देना है जो PFI या AIMIM जैसी संस्थाओं के ‘पॉलिटिकल इस्लाम’ के बजाय भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़ी हो। उनका घोषित लक्ष्य मुसलमानों को RSS के ‘भारतीय विजन’ की मुख्यधारा में लाना है- यह साबित करना की इस्लाम भारतीय राष्ट्रवाद के साथ चल सकता है और जो मुसलमान अलगाववादी इस्लाम को नकारते हैं, उनके लिए संघ परिवार में पूरी जगह है।

ऊपर से देखने पर तो यह RSS के उसी घोषित स्टैंड का हिस्सा लगता है की भारत में पैदा हुआ हर इंसान, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, एक ही सांस्कृतिक विरासत का बच्चा है। एम.एस. गोलवलकर से लेकर बाद के कई संघचालकों ने समय-समय पर यह कहा भी है की RSS भारतीय मुसलमानों को दुश्मन नहीं मानता। संस्थागत तौर पर देखा जाए तो MRM इसी बात का जीता-जागता सबूत लगता है।

“हेडगेवार ने जो RSS बनाया था, वो मुस्लिम वोट बटोरने के लिए नहीं बना था। वो इसलिए बना था ताकि हिंदू समाज फिर कभी इतना कमज़ोर न पड़े कि अपने पैरों पर खड़ा ही न हो सके।”

लेकिन असली दिक्कत यही है! यहीं पर आज का RSS केशव बलिराम हेडगेवार के विजन से बुनियादी तौर पर पूरी तरह कट जाता है। हेडगेवार ने कभी भी मुसलमानों को राजनीतिक या संस्थागत तौर पर RSS में शामिल करने की कोशिश नहीं की। हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को लेकर उनकी सोच कोई ‘सद्भावना दूत’ भेजने पर नहीं टिकी थी।

उनकी सोच इस बात पर टिकी थी की एक मज़बूत हिंदू समाज ही शांति से साथ रहने के हालात पैदा करता है-और यह ताकत खुद के अंदर से बनानी होगी, बिना इस बात पर निर्भर हुए की दूसरा समुदाय इसमें शामिल हो।

इसके उलट, MRM पूरी तरह से एक पब्लिक रिलेशन (PR) की कवायद है। यह RSS की ताकत से नहीं, बल्कि उसकी घबराहट से पैदा हुआ है- इस राजनीतिक हकीकत की घबराहट की भारत में लगभग 25 करोड़ मुस्लिम वोटर हैं जो राष्ट्रीय और राज्य चुनावों का पासा पलट सकते हैं। MRM हेडगेवार के सभ्यतागत आत्मविश्वास की उपज नहीं है। यह BJP के चुनावी गणित की पैदाइश है। ये दोनों बातें बिल्कुल अलग हैं, और इन्हें एक समझना वैचारिक बेईमानी है जिसे RSS की शुरुआती पीढ़ी कभी बर्दाश्त नहीं करती।

हेडगेवार का संगठन मुस्लिम वोटरों को लुभाने या मुस्लिम सहयोगी बनाने के लिए नहीं गढ़ा गया था। इसका मकसद बस इतना था की हिंदू समाज कभी भी इतना कमज़ोर, इतना बिखरा हुआ या इतना डरा हुआ न रहे की खुद की रक्षा भी ना  कर सके।

आरक्षण के खिलाफ हेडगेवार का कड़ा रुख और UGC से खो रही वो एकता  

आरक्षण को 200 साल तक बढ़ाने की मांग- एक ऐसा आंकड़ा जो संघ परिवार और उसके आस-पास के खेमों से ही राजनीतिक विमर्श में उछाला गया है। यह जाति को एक कानूनी और राजनीतिक श्रेणी के तौर पर हमेशा के लिए पक्का कर देने जैसा है, जिसे आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भारत के ढांचे में जड़ दिया गया है। हेडगेवार जो चाहते थे, यह ठीक उसका उल्टा है: जाति को खत्म करने की दिशा में काम करने के बजाय, यह सुनिश्चित कर रहा है कि आने वाले भविष्य में भारतीय संस्थाओं का पूरा ढांचा जाति पर ही टिका रहे।

हेडगेवार हिंदू समाज को अंदर से बांटने वाली हर चीज़ के सख्त खिलाफ थे। वो जाति व्यवस्था को भारत के पतन की सबसे खतरनाक वजह मानते थे। खासकर छुआछूत तो उनके लिए सिर्फ एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के लिए सीधा खतरा था: उनका मानना था कि जो समाज अपने ही करोड़ों लोगों के साथ जानवरों की तरह बर्ताव  करता हो, वो कभी भी इतनी एकजुटता नहीं बना सकता जो बाहरी खतरों से लड़ने, खुद पर राज करने या आधुनिक दुनिया में टिकने के लिए ज़रूरी हो।

लेकिन जाति सुधार को लेकर उनका तरीका सरकारी कोटे या संस्थागत आरक्षण वाला बिल्कुल नहीं था। हेडगेवार अंदर से होने वाले सामाजिक सुधार में यकीन रखते थे- यानी शिक्षा के ज़रिए सवर्ण हिंदुओं का नज़रिया बदलना, शाखा में रोज़ाना के भाईचारे के ज़रिए बदलाव लाना (जहां हर जाति के लोग एक साथ बैठते, कसरत करते और खाते थे), और एक ऐसी हिंदू पहचान बनाना जो जाति और वर्ण से कहीं ऊपर हो।

शुरुआती दिनों से ही RSS की शाखा अपने काम-काज में पूरी तरह जाति-मुक्त थी: एक ब्राह्मण स्वयंसेवक और एक दलित स्वयंसेवक ज़मीन पर एकदम बराबर थे, बिना किसी सरकारी डंडे या कानूनी मजबूरी के।

उनका मानना था की जातिगत भेदभाव को मिटाने का असली तरीका यह है की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जाति का कोई मतलब ही न रह जाए- और शाखा इसी बदलाव का एक घर था।

इस बात का लॉजिक उन सभी चीज़ों से मेल खाता है जिनके लिए हेडगेवार खड़े थे। जैसे उनका मानना था की सांप्रदायिक शांति का आधार राजनीतिक तुष्टिकरण नहीं बल्कि ‘हिंदू ताकत’ है, वैसे ही उनका मानना था की हिंदू समाज में सामाजिक न्याय का रास्ता कानूनी कोटे से नहीं बल्कि ‘आंतरिक सामाजिक सुधार’ से निकलेगा।

दोनों ही मामलों में उनकी सोच अंदर से चीज़ें बनाने की थी, ऐसे गुण और काबलियत पैदा करने की थी जिससे बाहर के किसी ‘उपाय’ की ज़रूरत ही न पड़े। यह एक बहुत ही सख्त और बिना किसी समझौते वाली सोच थी- और सच कहूं तो, आज का RSS इस विजन को पूरी तरह कूड़ेदान में डाल चुका है।

हायर एजुकेशन में UGC की आरक्षण नीतियां, जिन्हें RSS के आशीर्वाद वाली सरकारें पूरी तरह लागू कर रही हैं, इसी का एक बड़ा उदाहरण हैं। यूनिवर्सिटी सिस्टम- यानी उस सभ्यता का बौद्धिक इंजन जिसे हेडगेवार मज़बूत करना चाहते थे- अब जातियों के हकों की लड़ाई का अखाड़ा बन चुका है। कोटे की हर नई श्रेणी कॉलेज और यूनिवर्सिटी को और ज़्यादा टुकड़ों में बांट रही है।

जिन संस्थाओं को हेडगेवार के लॉजिक के हिसाब से एक एकजुट और मेरिट पर टिकी राष्ट्रीय मेधा तैयार करनी चाहिए थी, वहां सांप्रदायिक और जातिगत पहचान को और गहरा किया जा रहा है।

अब इस यू-टर्न के पीछे की वजह समझना कोई रॉकेट साइंस तो है नहीं। भारतीय लोकतंत्र का चुनावी गणित मांग करता है की BJP को OBC, SC और ST समुदायों के साथ-साथ उन सभी बड़े गुटों के वोट मिलें, जिनका सपोर्ट काफी हद तक आरक्षण सिस्टम को बनाए रखने और उसे बढ़ाने पर टिका है। 

RSS, जो BJP का वैचारिक बाप और संगठनात्मक रीढ़ है, उसने बड़ी ही खामोशी से इस चुनावी मजबूरी को एडजस्ट कर लिया है। इस विरोधाभास पर कोई खुली बौद्धिक बहस नहीं होती, बस एक ‘रणनीतिक चुप्पी’ साध ली जाती है- एक ऐसी चुप्पी जिसे हेडगेवार (जो ज़रूरी मुद्दों पर कभी चुप नहीं रहते थे) निहायत ही घटिया और घिनौनी मानते।

सबका साथ, सबका विकास: असली मतलब हर हिंदू जाति का विकास, बिना किसी भेदभाव के

ज़रा इस मशहूर नारे की ही बात कर लेते हैं- ‘सबका साथ, सबका विकास’। आज के दौर में यह महज़ एक चुनावी जुमला या होर्डिंग पर छपने वाली टैगलाइन बनकर रह गया है। लेकिन अगर हेडगेवार के नज़रिए से देखें, तो इसके मायने बहुत गहरे और एकदम साफ थे।

उनके लिए ‘सबका साथ’ का मतलब जातियों के हिसाब से वोट बैंक जोड़ना या राजनीतिक समीकरण बिठाना नहीं था। उनके लिए इसका सीधा सा मतलब था- बिना किसी जात-पात या ऊंच-नीच के, हर हिंदू का विकास।

हेडगेवार कोई कागज़ी बातें नहीं करते थे। जब उन्होंने हिंदू समाज को एक करने की ठानी, तो उनके दिमाग में छुआछूत और जातिगत भेदभाव के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं थी। वो अच्छी तरह समझते थे की कोई भी समाज तब तक मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता, जब तक उसका एक हिस्सा खुद को दूसरे से नीचा या कटा हुआ समझे। शाखा का मैदान इसी ‘सबका विकास’ की असली प्रयोगशाला  था। वहां न कोई सवर्ण था, न कोई दलित। सब सिर्फ स्वयंसेवक थे।

सच कहूं तो, आज की पॉलिटिक्स ने इस नारे को जातियों के गुणा-भाग में उलझा कर रख दिया है। आज हर जाति को अलग-अलग कोटे और स्कीमों के नाम पर खुश करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन हेडगेवार का ‘विकास’ किसी सरकारी मेहरबानी या कोटे का मोहताज नहीं था।

उनका साफ मानना था की अगर हिंदू समाज को सच में ताकतवर बनना है, तो समाज के आखिरी पायदान पर खड़े इंसान को भी सीना तानकर चलने का बराबरी का हक देना ही होगा। एक ऐसा विकास जहाँ किसी के साथ उसकी जाति के नाम पर कोई भेदभाव-वैदभाव न हो। कोई जन्म से किसी से बड़ा या छोटा न हो।

हेडगेवार की आत्मा और आज का RSS जिसे वो पहचान भी नहीं पाते

21 जून 1940 को केशव बलिराम हेडगेवार इस दुनिया से विदा हो गए। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पंद्रह साल एक ऐसा संगठन बनाने में लगा दिए, जिसके बारे में उनका मानना था की यह हिंदू समाज को एक डरी हुई, बिखरी हुई और आसानी से दबने वाली भीड़ से निकालकर एक अनुशासित, जागरूक और अजेय सभ्यतागत ताकत में बदल देगा।

उन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था की यह करना आसान होगा। वो जानते थे की जो बदलाव वो देख रहे हैं, उसमें पीढ़ियां लग जाएंगी। उन्होंने RSS को इसलिए बनाया क्योंकि वो समझते थे की जो काम एक लंबा सांस्कृतिक आंदोलन कर सकता है, वो कोई एक नेता, कोई एक सरकार, या कोई एक राजनीतिक लहर कभी नहीं कर सकती।

आज जो RSS खड़ा है, अगर संस्थागत आंकड़ों की बात करें, तो वो 1925 या 1940 में हेडगेवार की कल्पना से भी कहीं ज़्यादा ताकतवर है। इसके पास लाखों एक्टिव स्वयंसेवक हैं। यह (सीधे या अपने सहयोगी संगठनों के ज़रिए) स्कूलों, अस्पतालों, सांस्कृतिक संस्थाओं और राजनीतिक निकायों का एक बहुत बड़ा नेटवर्क चलाता है।

इसकी पॉलिटिकल विंग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज कर रही है। संगठनात्मक विकास और राजनीतिक पकड़ के मामले में 21वीं सदी का RSS काफी सफल हो गया है।

लेकिन जिन चीज़ों से हेडगेवार को असल में फर्क पड़ता था- यानी वैचारिक स्पष्टता, सभ्यता का मकसद, और बिना किसी समझौते के हिंदू एकता और ताकत की तलाश- उन पैमानों पर इस संगठन ने अपने ही संस्थापक को बुरी तरह निराश किया है। और अब शायद यहां से वापसी भी मुमकिन नहीं है।

Scroll to Top