2022 में ब्राह्मण वोट मांगने वाली सपा का असली चेहरा बेनकाब? छात्र को जाति पूछकर मारा थप्पड़

2 अप्रैल 2026 की सुबह बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) में रोज़ की तरह ही शुरू हुई थी। लड़के-लड़कियां अपने-अपने डिपार्टमेंट की तरफ जा रहे थे, क्लास शुरू होने वाली थीं और कैंपस में पढ़ाई-लिखाई का वही पुराना माहौल था। लेकिन हिंदी विभाग में कुछ ऐसा होने वाला था जो बेहद शर्मशार करने वाला था। 

प्रशांत मिश्रा, जो सेकंड ईयर के मास्टर डिग्री का स्टूडेंट है, अपनी क्लास में पहुंचा ही था की उसका सामना एक ऐसे आदमी से हुआ जिसका वहां पढ़ाई-लिखाई से कोई लेना-देना ही नहीं था। उसका नाम था हिमांशु यादव। कोई आम स्टूडेंट नहीं, बल्कि समाजवादी छात्र सभा (अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की स्टूडेंट विंग) की BHU इकाई का अध्यक्ष।

प्रशांत ने पुलिस को जो शिकायत दी है, उसके मुताबिक हिमांशु का पहला सवाल पढ़ाई या यूनिवर्सिटी से जुड़ा नहीं था। उसने सीधा पूछा: ‘तेरी जाति क्या है?’ प्रशांत ने जब पूछा की क्लासरूम के अंदर ये सब क्यों पूछा जा रहा है, तो हिमांशु अड़ गया। 

बात तुरंत बिगड़ गई- गालियां दी गईं, प्रशांत की ब्राह्मण जाती को नीच बोला गया, चेहरे पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ा गया। और बात जान से मारने की धमकियों तक पहुंच गई। ये पूरी घटना CCTV में कैद हो गई और वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया। शाम होते-होते बनारस पुलिस ने हिमांशु को गिरफ्तार कर लिया। भेलूपुर के ACP गौरव कुमार ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा की आगे की कानूनी कार्रवाई चल रही है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने तुरंत इसकी कड़ी निंदा की और इसे ‘बेहद शर्मनाक’ बताया। उनके वाराणसी इकाई के अध्यक्ष पल्लव सुमन का कहना था की कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े असामाजिक तत्व लंबे समय से कैंपस में गुंडागर्दी कर रहे हैं, और ये हमला उसी कल्चर का सबसे ताज़ा और बेशर्म नमूना है।

वैसे इस लेख का मानना है की ये कल्चर अचानक कहीं से टपक नहीं पड़ा है। ये असल में उस पार्टी की देन है जिसका ब्राह्मणों (और सवर्णों) के साथ रिश्ता हमेशा से सिर्फ चुनावी इस्तेमाल का रहा है, सच्चे सम्मान का नहीं। 

अगर आप ये समझना चाहते हैं की एक सपा छात्र नेता को किसी छात्र से उसकी जाति पूछने और फिर थप्पड़ मारने की हिम्मत कहाँ से मिलती है, तो आपको यह समझना होगा की समाजवादी पार्टी आखिर है क्या, इसका इतिहास क्या रहा है, और चुनाव न होने पर ये पार्टी क्या करती है।

ब्राह्मण वोटों की खातिर अखिलेश यादव का रचा गया परशुराम तमाशा और मुंह के बल गिरता फरसा

थोड़ा पीछे चलते हैं। बात 2 जनवरी 2022 की है। यूपी के अहम विधानसभा चुनाव में बस कुछ ही हफ्ते बचे थे। अखिलेश यादव को ये बात अच्छे से पता थी की सत्ता में वापसी के लिए उनका पुराना मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक काफी नहीं है। इसलिए वे ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे, क्योंकि यूपी में ब्राह्मण आबादी करीब 12% है और कई सीटों पर हार-जीत तय करती है।

तरीका क्या चुना गया? लखनऊ के बाहरी इलाके में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के किनारे महुराकलां गांव में भगवान परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति लगा दी गई। अखिलेश यादव ने बड़े तामझाम के साथ वहां पहुंचकर पूजा-अर्चना की और मंदिर का उद्घाटन किया। मूर्ति बनवाने वाले सपा नेता और पूर्व विधायक संतोष पांडेय ने बड़े गर्व से ऐलान कर दिया कि अबकी बार ब्राह्मण समाज एकतरफा सपा को वोट देगा।

इस पूरे इवेंट की जान था 68 फुट ऊंचा ‘फरसा’ (भगवान परशुराम का हथियार)। इसे मंदिर के ठीक सामने ऐसे लगाया गया था ताकि एक्सप्रेसवे से गुज़रने वाले हर इंसान की नज़र इस पर पड़े। इसे एक तरह से सपा के ‘ब्राह्मण प्रेम’ का परमानेंट सिंबल बनाने की कोशिश की गई थी।

लेकिन हुआ क्या? आठ दिन बाद ही फरसा ज़मीन पर आ गिरा। राजनीतिक फायदे के लिए जल्दबाज़ी में बनाया गया ये कमज़ोर ढांचा टिक नहीं पाया। गिरे हुए फरसे का वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। बीजेपी ने भी मज़ा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने साफ कह दिया की सपा बीजेपी की नकल कर रही है- और वो भी बहुत खराब तरीके से। तुरंत ही रीता बहुगुणा जोशी और बीजेपी के कई नेताओं ने लखनऊ के ही हसोवीर इलाके में राजस्थान से मंगवाई गई एक मजबूत मूर्ति का उद्घाटन कर डाला। ये अखिलेश के उस खोखले दिखावे का सीधा और करारा जवाब था।

फरसे का गिरना सिर्फ एक फजीहत नहीं था, सच कहूं तो ये एक इशारा था। जो पार्टी दशकों से ब्राह्मणों को सिर्फ ‘वोट बैंक’ समझती आई हो, वो अचानक सम्मान दिखाने की होड़ में लग गई, और उसमें भी बुरी तरह फेल हो गई। ये विडंबना इतनी सटीक थी कि इसे नज़रअंदाज़ किया ही नहीं जा सकता था।

MY (मुस्लिम-यादव) फॉर्मूला और समाजवादी पार्टी की ब्राह्मणों को किनारे लगाने वाली कड़वी सच्चाई

सपा का ब्राह्मणों के साथ कैसा रिश्ता रहा है, इसे समझने के लिए हमें पार्टी की जड़ों को देखना होगा। 1992 में जब मुलायम सिंह यादव ने पार्टी बनाई, तो उसका पूरा दारोमदार ‘मुस्लिम-यादव’ (MY) गठजोड़ पर टिका था। राजनीति को समझने वाला हर इंसान जानता है की यूपी में ये फॉर्मूला हिट होने पर कितनी सीटें दिला सकता है।

लेकिन ब्राह्मण वोटरों के नज़रिए से देखें तो इस फॉर्मूले में ही खोट है। जब किसी पार्टी की पूरी पहचान ही दो जातियों के इर्द-गिर्द सिमटी हो, तो बाकी समाज अपने आप हाशिए पर चला जाता है। उनके पास तभी जाया जाता है जब ज़रूरत हो। यूपी के 12% ब्राह्मणों ने इस चीज़ को बहुत करीब से झेला है। 

चुनाव आते ही सपा नेताओं को परशुराम मंदिर याद आने लगते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद सरकार के कामकाज- जैसे नौकरियां, पुलिस पोस्टिंग, सरकारी ठेके या कैबिनेट में जगह की कहानी एकदम अलग होती है।

2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार थी, तब पुलिस और प्रशासन में यादवों को खूब तरजीह देने के आरोप लगे थे। सवर्णों और खासकर ब्राह्मणों में इस बात को लेकर भारी गुस्सा था की उन्हें नौकरियों और ट्रांसफर में जानबूझकर किनारे किया जा रहा है। 

ये एक ऐसा पैटर्न है जिसे राजनीति के जानकारों ने यूपी में कई बार देखा है: जब भी कोई पार्टी ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ के दम पर बनती है, वो सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल इन्हीं दोनों को मज़बूत करने में लगा देती है, और सवर्ण (जो पहले प्रशासन में अच्छी पकड़ रखते थे) खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

2017 के चुनाव नतीजों ने सब कुछ साफ कर दिया। बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर आंधी ला दी। ब्राह्मणों ने एकतरफा बीजेपी को वोट दिया, क्योंकि उन्हें लगने लगा था की सपा सरकार उनके हितों के खिलाफ काम कर रही है। अखिलेश की सपा महज़ 47 सीटों पर सिमट गई। ब्राह्मण वोटर का फैसला एकदम साफ था।

खैर, 2022 के चुनाव आते-आते सपा ने फिर वही पुराना पैंतरा आजमाया। ‘ब्राह्मण सम्मेलन’ शुरू हो गए, ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में शामिल किया जाने लगा और आखिर में परशुराम जी की मूर्ति भी लगा दी गई। फिर आठ दिन में फरसा गिरा। और 2022 में यूपी के वोटरों ने- जिसमें ब्राह्मणों का एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल था-  बीजेपी को दोबारा सत्ता सौंप दी।

“जो पार्टी ब्राह्मणों को लुभाने के लिए मूर्तियां तो बनवाती है लेकिन एक फरसा तक सीधा खड़ा नहीं रख सकती- क्या उस पर ब्राह्मणों की इज़्ज़त, सुरक्षा या हिस्सेदारी बचाने का भरोसा किया जा सकता है?”

यूपी में समाजवादी पार्टी की जातिवादी राजनीति ने बोए हैं नफरत के सबसे गहरे बीज

देखिए, यूपी में जाति की राजनीति समाजवादी पार्टी ने शुरू नहीं की थी। लेकिन पिछले तीन दशकों में इन्होंने इसे इतना खतरनाक रूप दे दिया है की जाति सिर्फ चुनाव जीतने का ज़रिया नहीं रही, बल्कि सरकार चलाने का एक तरीका बन गई है। जब-जब सपा सत्ता में रही है, MY गठजोड़ से बाहर के लोगों ने इसके गंभीर नतीजे भुगते हैं।

सबसे बड़ी शिकायत हमेशा यही रही है कि सपा राज में यादव अपराधियों और बाहुबलियों को संरक्षण मिला। मध्य और पूर्वी यूपी के ज़िले दर ज़िले से ऐसी खबरें आती रहीं की कैसे ब्राह्मण और सवर्ण परिवारों के खिलाफ हुए अपराधों की जांच ही नहीं होती थी, FIR दर्ज करने से मना कर दिया जाता था, और अगर कोई पुलिसवाला किसी रसूखदार यादव के खिलाफ कार्रवाई करता, तो उसका तुरंत ट्रांसफर हो जाता था। 

अब ये कोई सोची-समझी पॉलिसी थी या कुछ लोगों की नाकामी, इस पर तो बहस हो सकती है, लेकिन 2017 आते-आते ये एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा ज़रूर बन गया था।

समझने वाली बात ये है की समाजवादी पार्टी ने सालों में एक ऐसा पॉलिटिकल कल्चर पैदा किया है जहाँ जाति महज़ एक पहचान नहीं, बल्कि समाज में आपका रुतबा तय करती है। ऊपर बैठे नेताओं से जो मैसेज छनकर नीचे आता है- वो पार्टी के हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता के दिमाग में बैठ जाता है। 

तो अब जब 2026 में कोई सपा छात्र नेता क्लास में घुसकर किसी स्टूडेंट की जाति पूछता है और उसी हिसाब से उसे ट्रीट करता है, तो वो कोई अपवाद नहीं है। वो बस उसी कल्चर को फॉलो कर रहा है जिसे उसकी पार्टी ने सालों से पाला-पोसा है।

इसके अलावा, सपा नेताओं के वो बयान भी हैं जो समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ओबीसी वोटों को पक्का करने के चक्कर में पार्टी के कई नेताओं ने सवर्णों और ब्राह्मणों के खिलाफ खूब ज़हर उगला है। ऐसे मामलों में पार्टी का रवैया हमेशा वही ‘खानापूर्ति’ वाला रहा है- थोड़ी बहुत निंदा कर दी, लेकिन कोई सख्त एक्शन नहीं लिया। ये बात खुद चीख-चीख कर बता देती है कि पार्टी की असली प्राथमिकताएं क्या हैं।

अखिलेश यादव के सेक्युलरिज्म का असली मतलब है सिर्फ तुष्टिकरण और यूपी के ब्राह्मणों की घोर अनदेखी

अगर ब्राह्मणों के साथ सपा का रिश्ता सिर्फ मतलब निकालने वाला रहा है, तो वहीं मुसलमानों के साथ उनका रिश्ता खुल्लम-खुल्ला तरफदारी वाला रहा है। ये सब कुछ ‘सेक्युलरिज्म’ के झंडे तले किया जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में ये सीधा-सीधा वोट-बैंक की राजनीति है, जो कई बार खतरनाक तुष्टिकरण की हदें पार कर जाती है।

2013 के मुज़फ्फरनगर दंगे सपा सरकार की साम्प्रदायिक नीतियों पर सबसे बड़ा धब्बा हैं। पश्चिमी यूपी में एक छोटी सी कहासुनी ने भयंकर दंगों का रूप ले लिया। 60 से ज़्यादा लोग मारे गए, हज़ारों लोगों (जिनमें ज़्यादातर हिंदू थे) को अपने घर छोड़ने पड़े और पूरे के पूरे गांव खाक हो गए। 

अखिलेश सरकार पर आरोप लगे की उन्होंने कानून-व्यवस्था संभालने से ज़्यादा मुस्लिम वोट बैंक बचाने पर ध्यान दिया। मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक ने चिंता जताई। क्या विपक्ष, क्या मीडिया और क्या सिविल सोसाइटी- सबने माना की सरकार हर मोर्चे पर फेल रही।

फिर बात आती है आज़म खान की। ये आदमी सालों तक सपा का सबसे ताकतवर नेता रहा। उसने महिलाओं, हिंदुओं और राजनीतिक विरोधियों को लेकर लगातार ऐसी भड़काऊ बातें कहीं, जिन्हें पार्टी नेतृत्व हमेशा या तो डिफेंड करता रहा या चुपचाप सुनता रहा। 

मुज़फ्फरनगर दंगों को लेकर, हिंदू महिलाओं को लेकर खान ने जो ज़हर उगला, उस पर कई FIR हुईं, लेकिन सपा आलाकमान चुप ही रहा। पार्टी ने उनसे किनारा तब किया जब उनके कानूनी पचड़ों के चलते खुद पार्टी की फजीहत होने लगी।

वक्फ बोर्ड, मदरसों की नीतियां, और मुस्लिम बहुल इलाकों में पुलिस की कार्रवाई रोकने जैसे मामलों पर सपा का ट्रैक रिकॉर्ड किसी से छिपा नहीं है। जब भी मुसलमानों और हिंदुओं के हितों में टकराव हुआ, सपा का पलड़ा हमेशा पहले की तरफ झुका रहा। इसलिए नहीं की वो सेक्युलरिज्म के पक्के पैरोकार थे, बल्कि इसलिए क्योंकि यही उनके वोट बैंक का गणित था।

सच कहूं तो ये सेक्युलरिज्म कतई नहीं है। असली सेक्युलरिज्म में हर धर्म का बराबर सम्मान होता है और कानून सबके लिए एक होता है। सपा ने जो किया वो एक सौदा था- मुसलमानों का वोट लो और बदले में उन्हें खुली छूट दो। और इस सौदे की कीमत बार-बार ब्राह्मणों समेत उन सभी समुदायों ने चुकाई है जो सपा के इस सांप्रदायिक गणित में फिट नहीं बैठते।

“सेक्युलरिज्म का मतलब है सबके लिए एक कानून। सपा जो दे रही है वो एक सीधा सौदा है: मुस्लिम वोटों के बदले मुस्लिमों को तरजीह। इसमें ब्राह्मणों के लिए कोई जगह नहीं है।”

अखिलेश यादव की शह पर समाजवादी छात्र सभा कर रही है ब्राह्मण छात्रों पर खुलेआम जातिगत हमले

कोई भी पार्टी अंदर से कैसी है, ये उसकी छात्र इकाई को देखकर समझ आ जाता है। पार्टी का असली रूप- मारपीट पर उनका स्टैंड, संस्थाओं को लेकर उनका नज़रिया और जातियों से उनका असली रिश्ता- अक्सर उनकी छात्र इकाई के बर्ताव में साफ झलकता है, क्योंकि वहाँ चुनाव हारने का डर थोड़ा कम होता है और गुंडागर्दी खुलकर बाहर आती है।

पूरे यूपी की यूनिवर्सिटियों में समाजवादी छात्र सभा का डराने-धमकाने का पुराना रिकॉर्ड रहा है। सपा के छात्र नेताओं द्वारा धमकियां देना, मारपीट करना, और अपना दबदबा कायम करने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाना कोई नई बात नहीं है। अप्रैल 2026 की BHU वाली घटना इसी कड़ी का सबसे ताज़ा मामला है, कोई अचानक हुई बात नहीं।

लेकिन BHU वाली घटना ने कुछ अलग ही हकीकत बयां कर दी है। ये कोई आम छात्र राजनीति की लड़ाई नहीं थी, न ही छात्र संघ चुनाव का कोई विवाद था। ये पूरी तरह से जाति के नाम पर की गई गुंडागर्दी थी: पहले एक स्टूडेंट से उसकी जाति पूछना, और फिर ‘गलत’ जाति का होने पर उसे मारना। 

और सबसे बड़ी बात, ये सब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में हुआ- जो भारत के सबसे ऐतिहासिक और हिंदू संस्कृति को सहेजने वाले संस्थानों में से एक है। इस बात ने इस शारीरिक हमले को एक अलग ही स्तर की हिंसा में बदल दिया है।

अब सवाल ये है की जब किसी पार्टी की छात्र इकाई का अध्यक्ष क्लास में घुसकर जाति के नाम पर थप्पड़ मारने की जुर्रत करता है, तो आखिर पार्टी ने ऐसा क्या माहौल बनाया है की उसे ये करने की हिम्मत मिली? 

इसका सीधा सा जवाब है- पार्टी ने पिछले 30 सालों में अपने राजकाज और भाषणों के ज़रिए यही तो सिखाया है की समाज और राजनीति में आपकी औकात आपकी जाति से तय होती है। उनके छात्र नेता ने बस उसी बात को अमली जामा पहना दिया।

इस पूरी घटना पर सपा के बड़े नेताओं ने एकदम चुप्पी साध रखी है। न अखिलेश यादव ने कोई बयान दिया, न आरोपी को पार्टी से निकाला गया, और न ही कोई पीड़ित का हालचाल पूछने गया। 

ज़रा इसकी तुलना उस फुर्ती से कीजिए जब पार्टी के अपने कार्यकर्ताओं पर आंच आती है-अखिलेश यादव खुद अपने मीडिया सेल के एक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी पर सीधे DGP हेडक्वार्टर पहुँच गए थे। ये दोहरा रवैया अपने आप में बहुत कुछ कह देता है की पार्टी की सच्ची हमदर्दी किसके साथ है।

यूपी का ब्राह्मण समाज और समाजवादी पार्टी द्वारा दिया गया दशकों का गहरा ज़ख्म

सपा के ब्राह्मण विरोधी रवैये को समझने के लिए आपको ये देखना होगा की पिछले तीन दशकों में यूपी में ब्राह्मणों ने किस कदर अपनी राजनीतिक हैसियत खोई है। कांग्रेस के दौर में ब्राह्मण सरकार, प्रशासन और पार्टी के भीतर अच्छी खासी दखल रखते थे। लेकिन 90 के दशक में मंडल कमीशन और सपा-बसपा जैसी ओबीसी केंद्रित पार्टियों के उभार ने पूरा खेल पलट कर रख दिया।

90 और 2000 के दशक में जैसे-जैसे सपा का ‘MY’ फॉर्मूला मज़बूत हुआ, ब्राह्मण राजनीति में खुद को अकेला महसूस करने लगे। मायावती की बसपा ने ‘दलित-ब्राह्मण (सर्वजन)’ फॉर्मूला आज़माया, जिसका मिला-जुला असर दिखा। फिर धीरे-धीरे बीजेपी ब्राह्मणों की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरी। 2017 में जब योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी, तो सवर्णों को लगा की अब राज्य के प्रशासन में उनका भी कुछ रुतबा वापस लौट रहा है।

2022 के चुनावों में सपा ने इसे पलटने की भरपूर कोशिश की। बड़े-बड़े ब्राह्मण सम्मेलन हुए, नेताओं को जोड़ा गया और परशुराम जी की मूर्तियां लगाई गईं। लेकिन ये सब फेल हो गया। ब्राह्मण समाज ने सपा का राज देखा था, उन्हें अच्छे से पता था की सपा के जीतने पर क्या होता है- कैसे एकतरफा पोस्टिंग होती हैं, कैसे मनमर्ज़ी से कानून चलता है और कैसे यादव गुंडों का नेक्सस बिना किसी डर के काम करता है। उन्हें 108 फुट की मूर्ति से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता था। नतीजे ये रहे कि सपा 2022 में महज़ 111 सीटों पर सिमट गई और बीजेपी ने फिर से अपना दबदबा कायम रखा।

दशकों की सपा राजनीति से ब्राह्मण समाज ने एक ही सबक सीखा है- पार्टी को आपका वोट चाहिए, आपका भला नहीं। चुनाव से पहले ये लोग आपके लिए मंदिर बनवाएंगे और चुनाव खत्म होते ही आपके आत्मसम्मान को कुचल देंगे। BHU वाला कांड उसी सच्चाई का ताज़ा और भद्दा सबूत है, जिसे यूपी का ब्राह्मण वोटर बहुत पहले ही समझ चुका है।

फरसे का गिरना और ब्राह्मण छात्र का थप्पड़ खाना समाजवादी पार्टी पर भरोसे की सबसे खौफनाक मौत है

इस लेख में ज़िक्र की गई दोनों घटनाओं के बीच एक अजीब सा, लेकिन दर्दनाक कनेक्शन है। जनवरी 2022 में अखिलेश यादव परशुराम मंदिर के आगे 68 फुट का फरसा लगाते हैं और पूरी दुनिया के सामने ब्राह्मणों के प्रति अपना प्यार जताते हैं। आठ दिन बाद वो फरसा गिर जाता है। 

फिर आता है अप्रैल 2026, चुनावी वादों और नौटंकियों के चार साल बाद, उसी पार्टी की छात्र सभा का अध्यक्ष क्लास में घुसता है, एक ब्राह्मण लड़के से उसकी जाति पूछता है और सरेआम उसके मुंह पर थप्पड़ जड़ देता है।

इन दोनों घटनाओं के बीच का फासला ही सपा के ‘ब्राह्मण प्रेम’ की असली सच्चाई है। सच्चाई ये है की: जब वोट चाहिए होते हैं तो मंदिर बन जाते हैं और फरसे तन जाते हैं। और जब चुनाव नहीं होते, तो लड़कों को उनके सरनेम के नाम पर थप्पड़ मारे जाते हैं।

ये कोई इत्तेफाक नहीं है की चुनाव से पहले तो पुचकारना और बाद में दुत्कारना। ये समाजवादी पार्टी के काम करने का असल तरीका है। उनकी कोर पहचान MY गठजोड़ ही है। बाकी जिन भी जातियों को वो लुभाने की कोशिश करते हैं, वो सिर्फ एक दिखावा है, कोई सच्चा उसूल नहीं। 

और ऐसी राजनीति का पर्दा अक्सर सबसे खराब मौकों पर फाश होता है- जैसे जब पार्टी का ही कोई छात्र नेता भूल जाता है की उसे ब्राह्मणों से हमदर्दी का नाटक करना है, और वो अपनी पार्टी के असली संस्कार दिखा बैठता है।

2022 का फरसा इसलिए टूटा क्योंकि उसे खराब तरीके से बनाया गया था। 2026 का थप्पड़ भी उसी की एक बानगी है- ये थप्पड़ पार्टी की वैचारिक और नैतिक बुनियाद के खराब होने का सबूत है। जब आप अपनी पूरी राजनीति ही इस सोच पर खड़ी करेंगे की कुछ जातियां बाकी जातियों से ऊपर हैं, तो फिर ये देखकर हैरान मत होइएगा की आपके छात्र नेता उसी सोच को क्लासरूम में लागू कर रहे हैं।

चुनावी नौटंकी से बाहर निकलकर अखिलेश यादव को देना होगा यूपी के ब्राह्मणों को जवाब

यूपी में जाति की राजनीति करने वाली सपा अकेली पार्टी नहीं है। भारत की हर बड़ी पार्टी कहीं न कहीं जातियों का गणित सेट करती ही है। लेकिन सपा के मामले में जो बात सबसे अलग है, वो है उनकी बातों और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर। ये अंतर इतना बड़ा है और बार-बार खुलकर सामने आता है की अब इसका सीधा-सीधा हिसाब होना चाहिए।

BHU में प्रशांत मिश्रा के साथ जो हुआ, वो महज़ एक अपराध नहीं है- हालांकि अपराध तो वो है ही और दोषी को सख्त से सख्त सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन ये एक बीमारी का लक्षण भी है। उस पार्टी की बीमारी, जिसने अपने खास वोट बैंक के अलावा बाकी किसी भी समुदाय को कभी दिल से बराबरी का दर्ज़ा दिया ही नहीं, बल्कि उन्हें हमेशा सिर्फ वोट छापने की मशीन समझा। 

अखिलेश यादव ने जब जनवरी 2022 में परशुराम मंदिर का उद्घाटन किया था, तब वो कोई भक्ति नहीं कर रहे थे। वो तो बस एक सौदा कर रहे थे। जब वो सौदा फेल हो गया- यानी जब ब्राह्मणों ने भर-भर कर वोट नहीं दिया- तो सपा अपनी पुरानी औकात पर आ गई।

मीडिया अक्सर परशुराम मंदिर के उद्घाटन और फरसा गिरने की खबरों को बस एक चुनावी चटखारे के तौर पर पेश करके छोड़ देता है। लेकिन इन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। ये इस बात का सबूत हैं की कैसे एक राजनीतिक दल किसी पुराने समुदाय के देवताओं को महज़ एक ‘प्रॉप’ समझता है, और उसके छात्रों को जातिगत गुंडागर्दी का आसान शिकार।

यूपी के वोटरों के लिए और खासकर उस ब्राह्मण समाज के लिए जिसे सपा हर चुनाव से पहले लुभाने निकल पड़ती है- इन दोनों घटनाओं का एक ही सीधा सा मतलब है। जिस पार्टी का छात्र नेता एक ब्राह्मण स्टूडेंट से उसकी जाति पूछकर उसे थप्पड़ मार दे, वो पार्टी कभी आपकी दोस्त नहीं हो सकती। 

जो पार्टी 68 फुट का फरसा बनवाए और वो आठ दिन में गिर जाए, वो आपकी भक्त नहीं है। और वो पार्टी जिसका अध्यक्ष अपने मीडिया वर्कर के पकड़े जाने पर सीधा पुलिस हेडक्वार्टर जा पहुंचे, लेकिन अपने ही छात्र नेता द्वारा एक ब्राह्मण छात्र को पीटे जाने पर एक शब्द न बोले- उसने बिल्कुल साफ कर दिया है की उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं।

टूटा हुआ फरसा सिर्फ एक रूपक था। BHU का हमला एकदम नंगी हकीकत है। इन दोनों को मिला दें तो सपा के ‘ब्राह्मण प्रेम’ का सबसे सच्चा बयान सामने आता है। अगर आप उन मूर्तियों, नारों और चुनाव के टाइम वाली पूजा-पाठ को हटा दें, तो सच बस इतना ही है की ये सब महज़ एक फरेब था, अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को ब्राह्मणों से कोई लेना देना नहीं है।

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