चंदन गुप्ता से लेकर कन्हैया लाल तक, सड़कों पर आम हिंदू का ही खून बह रहा है। और दूसरी तरफ उनके ‘राजनीतिक ठेकेदार’ अपने बच्चों को विदेश में हार्वर्ड, लीड्स और पेनसिल्वेनिया की यूनिवर्सिटीज़ में भेज रहे हैं- उन सारे ताम-झाम से एकदम दूर, जिनका सामना करने के लिए वे दूसरों को उकसाते हैं।
आख़िर कब तक आम हिंदू मरता रहेगा? कब तक उसकी जान जाती रहेगी? कब तक उसका खून उन सियासी वादों की कीमत चुकाता रहेगा जो कभी पूरे ही नहीं होते? मंच से बड़े-बड़े भाषण गूंजते रहेंगे और पीछे परिवार खामोशी से मातम मनाते रहेंगे, उस इंसाफ के इंतज़ार में, जो या तो सालों बाद आता है… या फिर कभी आता ही नहीं?
ऐसा तो है नहीं की ये सवाल पहली बार पूछा जा रहा है। कासगंज की रोती-बिलखती माताओं ने, अमरावती में बर्बाद हुए परिवारों ने और उदयपुर में उस दर्जी के अनाथ बच्चों ने भी यही सवाल पूछा था। पर होता क्या है? चुनाव आते हैं, ब्रेकिंग न्यूज़ चलती है और ये सारे सवाल कहीं दबकर रह जाते हैं। एक ऐसा सियासी तन्त्र इन्हें निगल जाता है, जिसने बिना कोई जवाबदेही तय किए, दुख जताने की कला में महारत हासिल कर ली है।
इस आर्टिकल में जिन लोगों के नाम आप पढ़ेंगे, वे कोई हवा-हवाई बातें नहीं हैं। चंदन गुप्ता 22 साल का एक कॉमर्स स्टूडेंट था, जिसे अपने देश से इतना प्यार था की गणतंत्र दिवस पर उसने अपने हाथों में शान से तिरंगा उठा रखा था। उमेश कोल्हे 54 साल के एक केमिस्ट थे, जिन्होंने बस एक वॉट्सऐप मैसेज फॉरवर्ड किया था।
कन्हैया लाल तेली एक दर्जी था, जिसने सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट किया और फिर अपनी जान का खतरा भांपकर सीधा पुलिस के पास गया था। पर उसे कोई सुरक्षा नहीं मिली। वीडियो कैमरे के सामने उसका गला रेत दिया गया।
यही हैं “जागो हिंदू जागो” के असल चेहरे। यही वो लोग हैं जो सच में ‘जाग’ गए थे। और यही वो लोग हैं, जो मारे गए। और जब इनकी जान जा रही थी, तब इस नारे को गढ़ने वाले अपने बच्चों के लिए कुछ अलग ही इंतज़ाम कर रहे थे। ये इंतज़ाम तिरंगा यात्राओं या वायरल वॉट्सऐप फॉरवर्ड वाले नहीं थे। उनके इंतज़ाम थे- स्टूडेंट वीज़ा, आइवी लीग के बड़े-बड़े कैंपस और यूके में रजिस्टर्ड हेज फंड।
सच कहूं तो, यह लेख उसी खाई के बारे में है- वो गहरी खाई जो हिंदू जागरण के बड़े-बड़े दावों और हिंदुओं को उनके हाल पर छोड़ दिए जाने की कड़वी सच्चाई के बीच मौजूद है।
यह उस सिस्टम के बारे में है, जो इतना सड़ चुका है की कैमरे के सामने किसी का मर्डर हो जाता है और उसके परिवार को इंसाफ के लिए सालों कोर्ट के धक्के खाने पड़ते हैं। यह एक ऐसी बेशर्म सियासी क्लास की हकीकत है, जो एक हाथ से ‘धर्म’ की दुहाई देती है और दूसरे हाथ से यूके वीज़ा का फॉर्म भरती है।
चलिए, शुरू करते हैं।
तुम्हारे लिए धर्म, हमारे लिए वीज़ा- ‘हिन्दुओं को जगाने वालों’ के अपने बच्चे
इससे पहले की हम मरने वालों की गिनती करें, ज़रा उन लोगों की गिनती कर लेते हैं जिनका एडमिशन पक्का हो चुका है।
राजनाथ सिंह भारत के रक्षा मंत्री हैं। 140 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा का ज़िम्मा उनके कंधों पर है। उनके बेटे नीरज सिंह ने यूनाइटेड किंगडम (UK) की लीड्स यूनिवर्सिटी से अपना MBA पूरा किया। भारत की किसी यूनिवर्सिटी से नहीं। किसी ऐसे संस्थान से नहीं जहां उन्हें उन ज़मीनी हकीकतों का सामना करना पड़े, जिन्हें सुधारने की ज़िम्मेदारी उनके पिता के मंत्रालय की है।
शिवराज सिंह चौहान– जो पंद्रह साल से ज़्यादा तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, फिलहाल केंद्रीय कृषि मंत्री हैं, और जिनकी पूरी पब्लिक इमेज ही ‘हिंदुत्व के मार्ग-दर्शक’ वाली है- उन्होंने अपने बेटे कार्तिकेय चौहान को कानून (LLM) की पढ़ाई के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया भेजा।
एस. जयशंकर, भारत के विदेश मंत्री, वो इंसान जो संयुक्त राष्ट्र, G20 और दुनिया के हर बड़े मंच पर भारत की आवाज़ बनते हैं। उनके बेटे, ध्रुव जयशंकर ने वॉशिंगटन डीसी की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और अब वहीं एक फॉरेन पॉलिसी एनालिस्ट हैं। वे अमेरिका में ही रहते हैं और वहीं काम करते हैं। देखा जाए तो वे एकदम सेटल और कामयाब प्रोफेशनल हैं। पर कहाँ? विदेश में!
पीयूष गोयल एक सीनियर कैबिनेट मंत्री हैं, जिन्होंने रेलवे से लेकर वाणिज्य तक कई मंत्रालय संभाले हैं। उनके बच्चे, ध्रुव और राधिका गोयल, अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़े हैं। हार्वर्ड। जी हां, वही हार्वर्ड जो उसी वेस्टर्न-एजुकेटेड ग्लोबल एलीट को पैदा करता है, जिसे कोसने में हमारी सत्ताधारी पार्टी के ही कुछ लोग ज़रा भी देर नहीं लगाते।
और फिर आते हैं अजित डोभाल– हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA)। भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का सबसे ताकतवर चेहरा। थ्योरी के हिसाब से देखें, तो हर खतरे के खिलाफ हिंदू सभ्यता के सबसे बड़े रक्षक। उनके बेटे, विवेक डोभाल एक चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट हैं, यूके के नागरिक हैं, और सिंगापुर से ‘GNY एशिया फंड’ नाम का एक हेज फंड चलाते हैं। एक ब्रिटिश नागरिक। एक हेज फंड मैनेजर। उस इंसान का बेटा, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की नीतियां तय करता है।
क्या धर्म युद्ध सिर्फ उन्हीं के लिए है जो यूके वीज़ा का खर्च नहीं उठा सकते?
2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस वक्त मोदी कैबिनेट के 56 में से कम से कम 12 मंत्रियों ने अपने बच्चों को विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ने भेजा था। यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं है। यह तो एक पैटर्न है। यह एक ऐसी अनकही पॉलिसी है जो हर चुनाव में चुपचाप चलती रहती है।
एक बात एकदम साफ कर दूं: किसी भी युवा भारतीय के विदेश जाकर पढ़ने में कोई बुराई नहीं है। दिक्कत वीज़ा से नहीं है। दिक्कत इस दोगलेपन से है। दिक्कत उस नेता से है जो एक तरफ तो अपने भाषणों में भारत के युवाओं को पश्चिमी सभ्यता के असर से बचने की चेतावनी देता है, और दूसरी तरफ उसी ‘वेस्टर्न’ पढ़ाई की भारी-भरकम फीस भरता है। दिक्कत उस ईकोसिस्टम से है जो यूपी के गांवों में बांटने के लिए “जागो हिंदू जागो” के पर्चे छपवाता है, और ठीक उसी वक्त अपने खुद के इस्तेमाल के लिए विदेशी पढ़ाई के ब्रोशर खंगाल रहा होता है।
आम हिंदू से कहा जाता है की “जागो”, “धर्म के लिए लड़ो”, झंडे उठाओ, सोशल मीडिया पर पोस्ट करो और अपनी ताकत दिखाओ। पर जैसा की हम आगे देखने वाले हैं, इस ‘जागरण’ का अंजाम एक ताबूत भी हो सकता है। वहीं इन नेताओं के बच्चों के लिए, उनकी अलग राह का अंजाम है एक एलीट विदेशी यूनिवर्सिटी की डिग्री और विदेश में एक सुकून भरी ज़िंदगी। इन दो अलग-अलग अंजामों के बीच का फासला टैलेंट या मेहनत का नहीं है। यह फासला पावर और उस पावर से मिलने वाली सुरक्षा का है।
चंदन गुप्ता- तिरंगा थामे वो लड़का, जिसे इंसाफ के लिए सात साल इंतज़ार करना पड़ा
26 जनवरी 2018, गणतंत्र दिवस का दिन। 22 साल का कॉमर्स स्टूडेंट चंदन गुप्ता यू.पी. के कासगंज में ‘तिरंगा यात्रा’ में शामिल था। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था, बस शान से तिरंगा उठा रखा था।
रैली एक मुस्लिम बहुल इलाके से गुज़री, बवाल हुआ और चंदन को गोली मार दी गई। इसके बाद वही हुआ जो हमेशा होता है- नेता लोग आए, खूब कैमरे चमकाए, बड़े-बड़े वादे किए और फिर अपना फायदा देखकर चलते बने।
उसके बाद शुरू हुई एक थका देने वाली कानूनी लड़ाई। दिन-दहाड़े, सैकड़ों गवाहों के सामने हुए इस मर्डर को सुलझाने में यूपी की आम मशीनरी फेल हो गई और आखिर में मामला NIA (आतंकवाद-रोधी एजेंसी) को सौंपना पड़ा।
पूरे सात साल बाद- जनवरी 2025 में- NIA कोर्ट ने 28 लोगों को दोषी ठहराया। देखने में लगेगा कि चलो, सिस्टम ने काम तो किया। पर सच कहूं तो सात साल बाद मिला इंसाफ, खैरात में मिले इंसाफ जैसा होता है। जिसके लिए एक जवान लड़के के मां-बाप को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट-काटकर अपने बाल सफेद करने पड़े।
ज़रा सोचिए, चुनाव के मौसम में जिस राजनीतिक पार्टी ने चंदन के नाम का सबसे ज़्यादा फायदा उठाया, उसका एक भी नेता सात साल तक कोर्ट में साथ नहीं खड़ा था।
वहां सिर्फ उसका परिवार बैठा था- बिना पैसे, बिना किसी सहायता के। सिस्टम तो वक्त ऐसे बर्बाद करता है जैसे उसकी कोई कीमत ही न हो, क्योंकि बरसों का यह भारी जुर्माना आखिर में सिर्फ पीड़ितों के परिवारों को ही भरना पड़ता है।
उमेश कोल्हे- एक वॉट्सऐप फॉरवर्ड के लिए मौत के घाट उतार दिए गए
अगर समझना हो की इस देश में हिन्दुओं की जान लेने का बहाना कितना सस्ता हो गया है, तो अमरावती के उमेश कोल्हे का केस देख लीजिए।
54 साल के उमेश कोल्हे कोई नेता या एक्टिविस्ट नहीं थे। बस एक आम इंसान थे जो मेडिकल की दुकान चलाते थे। जून 2022 के नूपुर शर्मा विवाद के वक्त, उन्होंने एक वॉट्सऐप ग्रुप में सिर्फ उनके सपोर्ट का एक पोस्टर शेयर कर दिया था।
और इसी एक फॉरवर्ड किए गए मैसेज ने उनकी मौत का फरमान लिख दिया।
21 जून की रात जब वो दुकान से घर लौट रहे थे, तो बीच रास्ते में चाकुओं से गोदकर उनकी हत्या कर दी गई। पूरी घटना सीसीटीवी में कैद हुई। और फुटेज से जो सच सामने आया, वो रोंगटे खड़े करने वाला था- हमलावर लगातार उनकी रेकी कर रहे थे। ये कोई गुस्से में अचानक हुआ झगड़ा नहीं था, बकायदा प्लान बनाकर उनका शिकार किया गया था।
सोचिए, महज़ एक वॉट्सऐप फॉरवर्ड के लिए! बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस में जमानत खारिज करते हुए साफ कहा की इस मर्डर का मकसद “आम जनता में खौफ पैदा करना” था। पर हमारे नेताओं ने क्या किया? उन्होंने इसे बस एक ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया।
आज भी इस केस का ट्रायल रेंग ही रहा है। केस NIA के पास है, खुद सिस्टम इसे आतंकी घटना मान चुका है, फिर भी सुनवाई तेज़ करने के लिए कोई फास्ट-ट्रैक कोर्ट नहीं बनी। सच कहूं तो, कातिल वो खौफनाक मैसेज हर उस हिंदू तक पहुंचाने में कामयाब रहे जो सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने की सोचता है। और वो मैसेज एकदम साफ है: एक वॉट्सऐप फॉरवर्ड आपकी जान ले सकता है, और आपका परिवार इंसाफ के लिए सालों तक बस कोर्ट के धक्के ही खाता रह जाएगा।
कन्हैया लाल तेली- वो दर्जी, वो चेतावनी, और वो वीडियो जिससे पूरा देश नज़रें नहीं चुरा पाया
इस आर्टिकल में ज़िक्र किए गए सभी मामलों में, 28 जून 2022 को उदयपुर में हुआ कन्हैया लाल तेली का मर्डर सबसे अलग है। ऐसा इसलिए नहीं की यह अपराध बाकियों से ज़्यादा खौफनाक था- हालांकि उसकी क्रूरता बयां करने लायक नहीं है- बल्कि इसलिए क्योंकि इसमें एक ऐसा सच छिपा है, जो सिस्टम के हर बहाने की धज्जियां उड़ा देता है: उसने पुलिस को पहले ही चेता दिया था।
कन्हैया लाल तेली एक दर्जी था। वह राजस्थान के उदयपुर में एक छोटी सी दुकान चलाता था। नुपूर शर्मा के बयान पर मचे बवाल के बाद, उसने भी सोशल मीडिया पर उनके सपोर्ट में कुछ पोस्ट कर दिया। उसे जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। और उन तमाम लोगों के उलट जो ऐसी धमकियां मिलने पर खामोश रह जाते हैं, कन्हैया लाल ने एकदम सही काम किया। वह पुलिस के पास गया। उसने उन धमकियों की रिपोर्ट लिखवाई। उसने पुलिस से सुरक्षा मांगी।
कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने दोनों पक्षों के बीच ‘समझौता’ करा दिया और मान लिया की मामला “सुलझ” गया है। उसे कोई सुरक्षा नहीं दी गई। कन्हैया लाल वापस अपनी दुकान पर आ गया।
28 जून, 2022 को दो आदमी- मोहम्मद रियाज़ अटारी और मोहम्मद गौस- ग्राहक बनकर उसकी दुकान में घुसे। वे अपने साथ हथियार लाए थे। उन्होंने उसकी हत्या कर दी। और सबसे बड़ी बात, उन्होंने इसका बाकायदा वीडियो बनाया। ये सब कोई छुपकर या गलती से नहीं हुआ- उन्होंने जानबूझकर, पूरी प्लानिंग के साथ इस खौफनाक मंज़र को रिकॉर्ड किया और इसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।
यह सिर्फ एक मर्डर नहीं था। यह कैमरे पर मर्डर का ‘परफॉर्मेंस’ था, जिसे इसलिए शूट किया गया था ताकि लोग इसे देखें। इसका मक़सद डराना था, भारत के हर हिंदू को यह बताना था की: देख लो, ऐसा होता है अंजाम।
चंद घंटों में यह वीडियो पूरे देश में आग की तरह फैल गया। लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। NIA को जांच सौंप दी गई। आनन-फानन में गिरफ्तारियां हुईं- मोहम्मद रियाज़ अटारी और मोहम्मद गौस को हत्या के कुछ ही घंटों के भीतर पकड़ लिया गया और वे तब से जेल में ही हैं।
पर जैसे-जैसे गुस्सा शांत हुआ और चुनावी कैलेंडर ने फिर से अपनी जगह बनाई, कहानी उलझनी शुरू हो गई। इस मामले के एक और आरोपी- मोहम्मद जावेद, जिस पर कातिलों के लिए लोकेशन की रेकी करने का चार्ज था- उसे सितंबर 2024 में राजस्थान हाई कोर्ट ने ज़मानत दे दी। NIA और कन्हैया लाल के अपने बेटे ने इस ज़मानत का विरोध किया। वे सुप्रीम कोर्ट गए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत रद्द करने से इनकार कर दिया।
उसका परिवार पुलिस के पास गया। पुलिस ने कहा की मामला सुलझ गया है। कैमरे के सामने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। और फिर… उसका मर्डर चुनाव का एक नारा बन गया।
मुख्य आरोपियों पर मुकदमा अभी भी चल रहा है। एक ऐसी हत्या जिसका बाकायदा वीडियो बनकर इंटरनेट पर डाला गया- एक ऐसा केस जिसमें सबूतों की कोई कमी नहीं है, जहां कोई शक की गुंजाइश नहीं है- वहां दो साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी फैसला नहीं आया है। NIA इस मामले को ‘UAPA’ (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत लड़ रही है। UAPA कानून बनाया ही इसलिए गया था ताकि टेरर के मामलों में सरकार और सिस्टम तेज़ी से काम कर सके। और फिर भी… नतीजा आपके सामने है।
इसी बीच, दिसंबर 2023 में बीजेपी ने राजस्थान चुनाव जीत लिया। चुनाव प्रचार के दौरान कन्हैया लाल का नाम रैलियों में खूब गूंजा था। पूरे राज्य में मंचों से उसके मर्डर का ज़िक्र किया गया था। पर जीत के बाद, उसके परिवार ने खुले तौर पर कहा की वे इस कानूनी लड़ाई में खुद को बिल्कुल अकेला महसूस कर रहे हैं। जिस राजनीतिक सपोर्ट का वादा कैमरों के सामने इतने ज़ोर-शोर से किया गया था, वो अब कहीं नज़र नहीं आता।
आज के भारत में एक आम हिंदू पीड़ित की यही पूरी कहानी है। नवंबर में वो एक चुनावी पोस्टर होता है। दिसंबर आते-आते वो सिर्फ एक आंकड़ा बन जाता है। और जनवरी की सर्द सुबह में, वो कोर्टरूम में एकदम अकेला खड़ा होता है।
नूपुर शर्मा- वो राष्ट्रीय प्रवक्ता जिसे मोर्चे पर भेजकर BJP ने ही अकेला छोड़ दिया
अगर देखना हो की BJP अपने ही लोगों के साथ कैसा सुलूक करती है, तो नूपुर शर्मा का केस देख लीजिए। ध्यान रहे, वो कोई ऐरी-गैरी सिरफिरी नेता नहीं थीं। वो नेशनल टीवी पर पार्टी का ऑफिशियल चेहरा और राष्ट्रीय प्रवक्ता थीं।
मई 2022 की एक टीवी डिबेट में, भगवान शिव के अपमान का जवाब देते हुए उन्होंने पैगंबर मुहम्मद पर एक टिप्पणी कर दी। इसके बाद जो बवाल कटा, वो सबको पता है। अरब देशों ने आंखें दिखाईं, कतर-कुवैत ने धमकियां देनी शुरू कर दीं।
और तब BJP ने क्या किया? जिस पार्टी ने उन्हें टीवी पर हिंदुत्व का बचाव करने के लिए बतौर ‘हथियार’ उतारा था, उसी ने 5 जून को उन्हें सस्पेंड कर दिया। पार्टी ने अपनी ही राष्ट्रीय प्रवक्ता को “फ्रिंज एलिमेंट” (असामाजिक तत्व) बताकर पल्ला झाड़ लिया।
कल तक जो नेता फोन पर कह रहे थे की “पार्टी तुम्हारे साथ मज़बूती से खड़ी है,” वे रातों-रात गायब हो गए। नूपुर को जान से मारने की धमकियां मिलीं, कई राज्यों में FIR हुईं। हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट ने कन्हैया लाल (उदयपुर) के मर्डर का ठीकरा भी उन्हीं के सिर फोड़ दिया- वही कोर्ट जिसने आज तक कन्हैया लाल के असली कातिलों को सज़ा नहीं सुनाई है।
आज दो साल बाद भी वो गुमनामी में जी रही हैं। “विवाद न हो जाए” इसलिए उन्हें चुनाव का टिकट तक नहीं दिया गया।
अब सीधा सा सवाल है: जब इंटरनेशनल प्रेशर पड़ने पर पार्टी अपनी ही पढ़ी-लिखी राष्ट्रीय प्रवक्ता को भेड़ियों के आगे फेंक सकती है, तो वो उस आम हिंदू का क्या करेगी जो “जागो हिंदू” का नारा सुनकर सच में ज़मीन पर उतर आता है?
जवाब एकदम साफ है- कुछ नहीं।
बंगाल में BJP कार्यकर्ताओं की वो भूली-बिसरी लाशें
BJP नेताओं से बात करो, तो वे ‘ज़मीनी कार्यकर्ताओं’ की देश के लिए कुर्बानियों पर लंबे-चौड़े भाषण पिला देंगे। पर ज़रा 2021 के बंगाल चुनाव के बाद मारे गए उन BJP कार्यकर्ताओं का नाम लेकर देखिए- वहां सिर्फ एक खौफनाक सन्नाटा छा जाएगा।
2 मई 2021 को जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) तीसरी बार सत्ता में लौटी, तो पूरे बंगाल में हिंसा भड़क उठी। बंगाल में चुन-चुनकर BJP वालों का शिकार किया गया। 35 साल के अभिजीत सरकार को दिन-दहाड़े घर से घसीटा गया और उसके तीन कुत्तों के साथ उसे भी पीट-पीटकर मार डाला गया। जमालपुर में बूथ अध्यक्ष आशीष क्षेत्रपाल के घर में घुसकर हमला हुआ और बचाने आई उसकी मां को काट डाला गया।
डायमंड हार्बर में बूथ अध्यक्ष राजा सामंतो को पीट-पीटकर मार डाला गया। सोनारपुर में निर्मल मंडल की हत्या हुई। खानाकुल में घनश्याम राणा को घर के बाहर पहले गोली मारी गई और फिर चाकुओं से गोद दिया गया। ऐसे सैकड़ों मर्डर हुए।
अमित शाह और जे.पी. नड्डा ने खुद माना की 300 से ज़्यादा कार्यकर्ता मारे गए और एक लाख से ज़्यादा लोगों को घर-बार छोड़कर रिफ्यूजी कैंपों में भागना पड़ा।
पर इसके बाद हुआ क्या?
भारत सरकार BJP की है। CBI, NIA, पुलिस और पूरा गृह मंत्रालय उनके पास है। फिर भी तीन साल बाद CBI ने 52 मर्डर केस में से सिर्फ 10 में चार्जशीट दाखिल की।
हद तो तब हो गई जब एक अंदरूनी मीटिंग में, पिटे हुए कार्यकर्ताओं ने अपने ही सीनियर नेताओं के मुंह पर साफ कह दिया- “जब हम पर हमला हुआ, तो हमारी स्टेट लीडरशिप हमें बचाने नहीं आई। आपने हमें लावारिस छोड़ दिया।”
सबसे नया किस्सा अभी कुछ दिन पहले 11 मार्च का है, जिसमें 66 साल के BJP के कार्यकर्ता त्रिलोकेश्वर ढाली को सुबह-सुबह बाइक में जा रहे दो अज्ञात युवकों ने गोली मार दी। उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है, जहाँ उनकी हालत नाजुक है।
बात यहां कांग्रेस या TMC की नहीं है। बात उस पार्टी की है जो हर हिंदू से कहती है की उठो, धर्म के लिए लड़ो और अपना सब कुछ दांव पर लगा दो। पर जब उस लड़ाई का अंजाम लाशों और उजड़े हुए घरों के रूप में सामने आता है, तो ये नेता सिर्फ दौरे करते हैं, कैमरे पर संवेदना जताते हैं और अगले चुनाव की तैयारी में लग जाते हैं।
अकबरुद्दीन ओवैसी- दस साल बाद बरी, और फिर स्पीकर की कुर्सी का ईनाम
दिसंबर 2012 की बात है। आंध्र प्रदेश के निर्मल और निजामाबाद में जनसभाएं चल रही थीं। AIMIM विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने एक भड़काऊ भाषण दिया, जिसे रिकॉर्ड करके खूब बांटा गया। उस वीडियो में उसने सामने खड़ी भीड़ से साफ-साफ कहा था कि अगर सिर्फ पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा ली जाए, तो मुसलमान हिंदुओं को खत्म कर सकते हैं- उसने बकायदा दोनों समुदायों की आबादी के अनुपात का ज़िक्र करते हुए ये धमकी दी थी।
वीडियो वायरल हो गया। केस दर्ज हुए। उसकी गिरफ्तारी हुई और ज़मानत मिलने से पहले उसने चालीस दिन न्यायिक हिरासत (जेल) में काटे। मामला जांच के लिए CID को सौंप दिया गया। चार्जशीट फाइल हुई। सालों तक चली कार्यवाही में 41 गवाहों से पूछताछ हुई। एक सरकारी संस्था, सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) ने वीडियो की जांच की और इस बात की पुष्टि की कि रिकॉर्डिंग में आवाज़ “बहुत हद तक” अकबरुद्दीन ओवैसी की ही थी।
दस साल बाद, अप्रैल 2022 में, एक स्पेशल सेशंस कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। कोर्ट का तर्क क्या था? की पुलिस उनके सामने “पुख्ता सबूत” पेश करने में नाकाम रही। CFSL की रिपोर्ट होने के बावजूद। वीडियो होने के बावजूद। 41 गवाहों के होने के बावजूद। कोर्ट ने ओवैसी को यह भी हिदायत दी कि वो “भविष्य में भड़काऊ भाषण देने से बचें”- एक ऐसी हिदायत जिसे लागू करवाने का कोई तरीका ही नहीं है, बस हवा में तीर छोड़ने जैसी बात।
कहानी उसके बरी होने पर खत्म नहीं होती। नवंबर 2023 में, अकबरुद्दीन ओवैसी ने तेलंगाना विधानसभा चुनाव में चंद्रयानगुट्टा सीट से लगातार छठी बार जीत हासिल की। और दिसंबर 2023 में- ठीक उसी महीने जब बीजेपी कन्हैया लाल की यादों के सहारे राजस्थान जीत रही थी- अकबरुद्दीन ओवैसी को तेलंगाना विधानसभा का प्रोटेम स्पीकर बना दिया गया।
प्रोटेम स्पीकर। एक ऐसा आदमी जिसने भीड़ के सामने कैमरे पर हिंदुओं के सफाए की बात कही थी (की पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लो)- उसी आदमी ने कुछ वक्त के लिए ही सही, एक राज्य की विधानसभा की अध्यक्षता की। उसी संस्था में बैठकर उसने फैसले सुनाए, जिसकी ज़िम्मेदारी बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक की रक्षा करना है।
यासीन मलिक- 35 साल गुज़र गए, और वायुसेना के चार जवानों के परिवार आज भी इंतज़ार में हैं
25 जनवरी 1990 की बात है- गणतंत्र दिवस की ठीक एक शाम पहले। श्रीनगर के बाहरी इलाके रावलपोरा में इंडियन एयरफोर्स (IAF) के करीब 30-40 जवान अपनी ट्रांसपोर्ट बस का इंतज़ार कर रहे थे। तभी एक मोटरसाइकिल पर तीन लोग आए। उन्होंने कलाश्निकोव (एके-47) से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। वायुसेना के चार जवान मौके पर ही शहीद हो गए। बाईस लोग घायल हुए। और कातिल फरार हो गए।
बाद में CBI ने अपनी जांच में पाया की उन शूटर्स में से एक यासीन मलिक था- जो उस वक्त ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ का चीफ था। दशक बीत गए। केस भारत के लीगल सिस्टम की चक्की में पिसता रहा। अब 2025 में आकर, जम्मू की एक स्पेशल टाडा (TADA) कोर्ट के सामने, एयरफोर्स के एक रिटायर्ड जवान ने- जो उस दिन वहां मौजूद था और मारे गए जवानों का साथी था- गवाही दी और यासीन मलिक को मुख्य शूटर के रूप में पहचान लिया। कोर्ट ने इसे एक “बड़ी कामयाबी” बताया। एक ऐसे केस में जो अब 35 साल पुराना हो चुका है।
यासीन मलिक अभी आज़ाद नहीं है। मई 2022 में, वो दिल्ली की एक अदालत में पेश हुआ था और उसने UAPA के तहत आपराधिक साज़िश, टेरर फंडिंग और दूसरे आरोपों में अपना गुनाह कबूल कर लिया था। उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है और फिलहाल वो तिहाड़ जेल में अपनी सज़ा काट रहा है।
लेकिन टेरर फंडिंग के लिए उम्रकैद की सज़ा मिलना, उन चार एयरफोर्स जवानों के लिए इंसाफ नहीं है, जिन्हें 1990 में एक बस स्टॉप पर गोलियों से भून दिया गया था। जेल में बंद करने की जगह ऐसे लोगों को आखिर फांसी की सजा क्यों नहीं होती?
हिंदू भावनाओं का ‘बिज़नेस मॉडल’
एक वजह है की “जागो हिंदू जागो” महज़ एक नारा है, कोई पॉलिसी नहीं।
नारे की कोई जवाबदेही नहीं होती। पॉलिसी की होती है। ज़मीन पर कुछ बदले या न बदले, एक नारे को अगले चुनाव में फिर से भुनाया जा सकता है। पर किसी पॉलिसी को तो रिज़ल्ट के पैमाने पर तौला जाएगा- की कितने परिवारों को समय पर इंसाफ मिला, सीसीटीवी सबूत वाले कितने केस एक तय समय में सुलझे, या वीडियो पर हिंदुओं को काटने की धमकी देने वाला आदमी एक दशक तक कोर्ट में रहने के बाद बरी कैसे हो गया?
आज के भारत में हिंदू दर्द और शिकायतों को ‘मैनेज’ करना सबसे शातिर पॉलिटिकल ऑपरेशंस में से एक बन गया है। यह चक्र लगातार और एकदम तय स्क्रिप्ट की तरह चलता है: किसी हिंदू को मारा या धमकाया जाता है; लोगों में गुस्सा भड़कता है; पीड़ित का नाम चुनाव में वोट बटोरने का काम आता है; चुनाव जीत लिया जाता है; केस अदालत में चलता रहता है, जिसे परिवार के अलावा सब भूल जाते हैं; और फिर अगले चुनाव के लिए एक नए मुद्दे की तैयारी शुरू हो जाती है।
ऐसा नहीं है की यह किसी एक पार्टी तक सीमित है। अभी बीजेपी इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल कर रही है, पर उससे पहले कांग्रेस ने भी अपने हिसाब से यही सब किया था। लेकिन आज के दौर में जो बात सबसे ज़्यादा चुभती है, वो है कथनी और करनी के बीच का भारी अंतर- मंचों से ‘धर्म’ की बड़ी-बड़ी बातें तो खूब होती हैं, पर सिस्टम सुधारने के नाम पर सब खामोश हैं।
1947 से लेकर आज तक, किसी भी सरकार ने हिंदुओं के खिलाफ होने वाली साम्प्रदायिक हिंसा के लिए कोई खास फास्ट-ट्रैक अदालती रूपरेखा नहीं बनाई। किसी भी सरकार ने ऐसा कोई कानून पास नहीं किया जिसमें सीसीटीवी या वीडियो सबूत होने पर एक तय समय के भीतर ट्रायल पूरा करना अनिवार्य हो। किसी ने भी ऐसे नियम नहीं बनाए की अगर ओवैसी जैसे नेताओं को “भड़काऊ भाषणों से बचने” की अदालती हिदायत दी जाए, तो उसे न मानने वालों को कड़ी सज़ा हो।
इसके बजाय, हमारे पास जो सिस्टम है, वो इतना सुस्त है की इंसाफ को ही थका दे; इतना खोखला है की पैसे और पावर वाले आराम से बरी हो जाएं; और राजनीतिक रूप से इतना फायदेमंद है की इसे बदलना किसी की भी असली प्राथमिकता है ही नहीं।
और सबसे बड़ी बात, जवाबदेही तब दिखेगी, जब आम हिंदुओं को खड़े होने और लड़ने के लिए उकसाने वाले उन नेताओं के अपने बच्चे भी उन्हीं सड़कों पर खड़े हों और उसका अंजाम भुगतने को तैयार हों।
जब तक वो हिसाब बराबर नहीं होता, यह साइकिल ऐसे ही चलती रहेगी। नए नाम जुड़ते रहेंगे। कैंडल मार्च निकलते रहेंगे। उन्हीं गलियों और मुहल्लों में फिर से नारे गूंजेंगे, जहां आम हिन्दू एक बार फिर यह सोचकर बेवकूफ बनेंगे की शायद इस बार कुछ अलग होगा।
