यूपी में कुछ महीनो में CM पद के लिए चुनाव होने वाले हैं, और अखिलेश यादव फिर से अपना पुराना सियासी नाटक खेल रहे हैं। ब्राह्मण समाज को लुभाने के लिए बड़े-बड़े भाषण और एकजुटता के ड्रामे हो रहे हैं। कैमरे चालू हैं, नारे उछाले जा रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच… कन्नौज ज़िले में मुनीश मिश्रा नाम का एक आदमी आज भी उस दर्द को लेकर बैठा है, जिसे 22 साल का वक्त भी रत्ती भर कम नहीं कर पाया।
उसके भाई का कटा हुआ सिर कभी परिवार को वापस नहीं मिला। उनके पास कोई कब्र तक नहीं है जहाँ जाकर वो रो सकें। बची है तो बस एक ऐसे नौजवान की याद, जिसने 5 मई 2004 को एक पोलिंग बूथ पर सीना तानकर कहा था- “नहीं। तुम ये चुनाव इस तरह नहीं लूट सकते।” और इस बेखौफ आवाज़ की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
जिस आदमी पर इस आवाज़ को हमेशा के लिए शांत करने और खून मांगने का आरोप है, वो बाद में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना, समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना और आज खुद को ‘सामाजिक सद्भाव’ का मसीहा बताता है। इस बेशर्मी की कोई हद नहीं है।
सवाल बड़ा सीधा सा है: जिस आदमी का नाम एक पीड़ित परिवार, एक मुख्यमंत्री और कई पत्रकारों ने सीधे तौर पर एक ब्राह्मण बीजेपी कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या और उसका सिर काटने से जोड़ा हो… क्या वो सच में ब्राह्मणों का हितैषी होने का दावा कर सकता है? हकीकत जानेंगे, तो जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएगा।
“मेरे भाई का सिर काटने के पीछे अखिलेश ही है।”
– मुनीश मिश्रा (मारे गए बीजेपी बूथ एजेंट नीरज मिश्रा के भाई, ओपइंडिया को दिया गया बयान, दिसंबर 2025)
2004 का कन्नौज जहां अखिलेश की ताजपोशी के लिए सपा ने सरेआम घोंटा था लोकतंत्र का गला
नीरज मिश्रा के मर्डर को समझने के लिए आपको पहले 2004 के कन्नौज का सियासी माहौल समझना होगा। मुलायम सिंह यादव उस वक्त यूपी के मुख्यमंत्री थे। उनका बेटा अखिलेश- जो अभी ताज़ा-ताज़ा ही ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई पूरी करके लौटा था- पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहा था। कन्नौज उनकी सीट थी। यादव खानदान के लिए ये कोई आम चुनाव नहीं था, ये उनकी पुश्तैनी गद्दी थी जिसे उन्हें हर हाल में हथियाना था। सामने बीजेपी के कैंडिडेट थे रामानंद यादव।
उस दौर में समाजवादी पार्टी के पॉलिटिकल कल्चर में बूथ कैप्चरिंग, वोटरों को डराना-धमकाना और बाहुबल का इस्तेमाल एकदम आम बात थी। कोई ढकी-छुपी बात नहीं थी ये- सिस्टम ही यही था। मुलायम सरकार के अधीन काम करने वाली पुलिस कोई न्यूट्रल फोर्स नहीं रह गई थी, वो तो सत्ताधारी पार्टी की चुनावी मशीन का एक पुर्जा मात्र थी।
उस दौर को करीब से देखने वाले आज भी बताते हैं की सपा के गढ़ में वोटिंग का दिन कोई लोकतांत्रिक त्योहार नहीं, बल्कि किसी राजा की ताजपोशी का जुलूस होता था- जहाँ विरोध करने वालों को सिर्फ चुनाव ही नहीं, अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ सकता था।
इसी खौफनाक माहौल के बीच, 5 मई 2004 की सुबह नीरज मिश्रा घर से निकला। वो कन्नौज के छिबरामऊ इलाके के कसवा गांव में बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज पोलिंग स्टेशन पर बीजेपी का बूथ एजेंट था। एकदम नौजवान लड़का। एक ब्राह्मण। एक ऐसा कट्टर पार्टी वर्कर जो शायद थोड़ी मासूमियत में ये मान बैठा था की लोकतंत्र के प्रति उसकी ड्यूटी किसी भी चीज़ से बड़ी है।
उसके पास कोई हथियारबंद बॉडीगार्ड नहीं थे। कोई बड़ा नेता उसका आका नहीं था। उसके पास बस अपनी ज़मीर की आवाज़ थी- और उस दिन कन्नौज में इससे खतरनाक चीज़ और कोई हो ही नहीं सकती थी।
अखिलेश की गुंडागर्दी से एक निहत्थे ब्राह्मण लड़के की वो बगावत जिसने लिख दी मौत की स्क्रिप्ट
मुनीश मिश्रा ने दिसंबर 2025 में ओपइंडिया के पत्रकार अर्पित त्रिपाठी को ऑन-रिकॉर्ड जो तफसील से बताया, उसके मुताबिक 5 मई 2004 की घटनाएं बहुत ही भयानक तरीके से आगे बढ़ीं। दिन की शुरुआत में ही बटेला, जाफराबाद और आस-पास के कई पोलिंग बूथों को सपा के गुंडों ने सरेआम लूट लिया था।
पूरी सीट पर बूथ कैप्चरिंग का नंगा नाच चल रहा था। फिर, दोपहर के वक्त अखिलेश यादव कसवा बूथ पर पहुंचे- किसी एक कार में नहीं, बल्कि 25-30 गाड़ियों के पूरे काफिले के साथ। मैसेज एकदम साफ़ था: ये कोई आम कैंडिडेट नहीं था जो चुनाव का जायज़ा लेने आया हो। ये अपना खौफ दिखाने का तरीका था।
मुनीश बताते हैं की बूथ पर मौजूद एक अधिकारी के साथ बदतमीजी की गई। अपनी सत्ता की हनक दिखाते हुए अखिलेश ने कथित तौर पर एक आदमी को थप्पड़ जड़ दिया। बस एक ही उसूल था- जो झुकेगा नहीं, वो पीटा जाएगा।
ठीक इसी वक्त नीरज मिश्रा- वो बीजेपी बूथ एजेंट, वो ब्राह्मण लड़का जो सिर्फ अपनी ड्यूटी करने आया था- आगे आया और उसने इसका कड़ा विरोध किया। उसने सरेआम इस गुंडागर्दी को चुनौती दे डाली।
मुनीश के मुताबिक, बस यही वो पल था जिसने उसके भाई की मौत पर मुहर लगा दी। यूपी की राजनीति के इस ‘युवराज’ को टोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी। युवराज की ईगो हर्ट हो गई थी। मुनीश याद करते हैं की गुस्से से आग-बबूला हुए अखिलेश ने तुरंत अपने पिता, मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को फोन मिलाया और कहा: “मुझे नीरज मिश्रा चाहिए। ज़िंदा या मुर्दा।”
वहां इंस्पेक्टर उमाशंकर यादव भी मौजूद था। हर नागरिक की हिफाज़त करने की कसम खाने वाली पुलिस… वहां चुपचाप खड़ी तमाशा देखती रही और नीरज मिश्रा को बचाने के लिए एक उंगली तक नहीं उठाई।
“अखिलेश, बटेला, जाफराबाद और आस-पास के इलाकों में पोलिंग बूथ लूटने के बाद 25-30 गाड़ियों के काफिले के साथ कसवा पहुंचा… मेरे भाई ने विरोध किया, जिसके बाद विवाद हो गया।”
– मुनीश मिश्रा
दोपहर से लेकर शाम तक हालात और बिगड़ते गए। मुनीश बताते हैं की वोटिंग खत्म होने के बाद सपा के गुंडों ने पूरे इलाके में हमला बोल दिया। एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना में, उन्होंने मिश्रा परिवार के खेत पर काम करने वाले एक बीएसपी कार्यकर्ता के घर तोड़-फोड़ की। अंदर उसकी बूढ़ी मां थी। उन गुंडों ने उस बुजुर्ग महिला के साथ जो हैवानियत की, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता- ये सिर्फ एक वहशियाना और खौफनाक आतंक था, ताकि उस दिन उनका विरोध करने वाले हर इंसान तक ये मैसेज पहुंच जाए।
इसके बाद हुई हिंसा में एक सपा कार्यकर्ता भी मारा गया- एक ऐसी फायरिंग में जिसमें, मुनीश पूरे यकीन के साथ कहते हैं, नीरज का कोई लेना-देना ही नहीं था। फिर भी टारगेट नीरज को ही बनाया गया। सपा के गुंडों को किसी की तो बलि चाहिए थी, और जिस आदमी ने सरेआम बूथ पर अखिलेश से पंगा लिया था, उससे बेहतर शिकार उनके लिए और कौन हो सकता था?
सपा के दरिंदों का खूनी खेल और सूटकेस में अखिलेश तक पहुँचाया गया एक ब्राह्मण का सिर
इसके बाद जो कुछ भी हुआ, वो आज के उत्तर प्रदेश के इतिहास में राजनीतिक हत्या का सबसे खौफनाक सुबूत है। खतरे को भांपकर नीरज अपने घर से निकलकर खेतों में एक ट्यूबवेल की तरफ भागा। वो बिल्कुल अकेला था। निहत्था था। उसके पास भागने का कोई रास्ता ही नहीं बचा था।
मुनीश की गवाही के मुताबिक, पुलिस- हां, वही पुलिस जिसका काम उसे बचाना था- उसने उसे घेर लिया। उसे अपनी कस्टडी में सुरक्षित रखने के बजाय, एक नागरिक और चुनाव अधिकारी की जान बचाने के बजाय… उन्होंने उसे सीधा उन सपा के गुंडों के हवाले कर दिया जो खून के प्यासे होकर उसे ढूंढ रहे थे।
उसी पल नीरज मिश्रा की मौत तय हो गई थी। उसे घसीटते हुए पास के यादव बाहुल्य गांव की तरफ ले जाया गया। मुनीश जब ये सब बताते हैं, तो उनकी आँखों में उस बेबस भाई का दर्द साफ़ झलकता है जिसने 22 साल तक अपने भाई के कातिलों को खुलेआम घूमते देखा है: नीरज को घसीटते-घसीटते बुरी तरह पीटा गया। उस पर जानवरों की तरह टूट पड़े वो लोग। और फिर उसे मार डाला गया।
मुनीश मिश्रा ने उन लोगों के नाम भी लिए हैं जिन्हें वो इस हत्या का ज़िम्मेदार मानते हैं: अशोक यादव, अवनीश यादव, राम शरण उर्फ मुन्नू सिंह, पप्पू सिंह, सुनील यादव और राम विलास यादव। ये नाम सालों से पब्लिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। कन्नौज का बच्चा-बच्चा इन चेहरों को जानता है। समाजवादी पार्टी से इनके जो भी रिश्ते हैं, वो किसी से छुपे नहीं हैं।
लेकिन हत्या के बाद जो हुआ, वो सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। नीरज मिश्रा को सिर्फ मारा नहीं गया था। उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया था। और मुनीश मिश्रा के मुताबिक- उसके भाई का कटा हुआ सिर एक सूटकेस में रखा गया और अखिलेश यादव को भिजवा दिया गया। गुंडाराज की भाषा में कहें तो ये एक ‘ट्रॉफी’ थी। एक मैसेज की बॉस से पंगा लेने का हश्र क्या होता है।
बिना सिर वाली वो लाश अगले दिन मिली। अपने बेटे की ऐसी बर्बरता से हुई मौत देखने के बाद उनकी माँ भी चल बसी। नीरज मिश्रा का कटा हुआ सिर आज तक नहीं मिला। आज तक, मिश्रा परिवार के पास कोई कब्र नहीं है जहाँ बैठकर वो अपना दुख हल्का कर सकें। लाश तो है, लेकिन सिर नहीं है। इस परिवार का ये घाव शायद ज़िंदगी भर नहीं भर सकता, क्योंकि मर्डर का वो सबसे बर्बर सुबूत तो कातिलों और उन्हें बचाने वाले आकाओं ने ही ग़ायब कर दिया।
दो दशकों का खौफनाक सन्नाटा और ब्राह्मण के कातिलों की सबसे बड़ी ढाल बनी सपा सरकार
किसी भी ढंग के लोकतंत्र में इस मर्डर के तुरंत बाद एफआईआर (FIR) होती, गिरफ्तारियां होतीं, केस चलता और सज़ा मिलती। लेकिन समाजवादी पार्टी के राज वाले उत्तर प्रदेश में सत्ता की हनक कैसे एक मर्डर को भी गायब कर सकती है, ये उसका जीता-जागता सुबूत था। जिन आरोपियों के नाम सामने आए, वो खुलेआम घूमते रहे।
जिन पुलिसवालों ने नीरज को कातिलों के हाथों सौंपा, उनसे एक सवाल तक नहीं पूछा गया। और जिस आदमी का नाम इस पूरे मामले के केंद्र में था- अखिलेश यादव- वो आराम से कन्नौज सीट जीत गए, सांसद बने और आगे चलकर 2012 से 2017 तक यूपी के मुख्यमंत्री भी बन बैठे।
अखिलेश के उन पांच सालों के राज में सिस्टम के लिए नीरज मिश्रा का केस जैसे कोई मायने ही नहीं रखता था। कोई नई जांच-वांच नहीं हुई। कोई नई एफआईआर नहीं। परिवार से मिलने कोई नहीं गया। किसी ने ये तक नहीं माना कि ऐसा कुछ हुआ भी था। राजनीतिक हिंसा में अपना बेटा और भाई खोने वाला मिश्रा परिवार बिल्कुल अकेला पड़ गया था। लेकिन मुनीश मिश्रा लड़ते रहे, आवाज़ उठाते रहे, कातिलों के नाम लेते रहे। और इस हिम्मत की उन्हें बहुत भारी कीमत भी चुकानी पड़ी।
सपा सरकार ने मुनीश मिश्रा को सिर्फ नज़रअंदाज़ नहीं किया- उन्हें बकायदा टारगेट किया गया। उनके खुद के मुताबिक, उन्हें लगातार धमकियां मिलती रहीं। उन पर कई झूठे केस ठोक दिए गए- जो यूपी की राजनीति का पुराना हथकंडा है गवाहों को डराने का। उन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर कटवाए गए। वो हर झूठे केस से लड़े। उन्होंने चुप रहने से साफ इनकार कर दिया। लेकिन अकेले आदमी की हिम्मत आखिर उस सिस्टम से कैसे जीत सकती है जो खुद इंसाफ़ देने को तैयार न हो?
मुनीश मिश्रा ने साफ आरोप लगाया था की बूथ पर मौजूद पुलिसवालों ने खुद नीरज को कातिलों को सौंपा था, लेकिन इसकी कभी कोई जांच नहीं हुई। मुनीश ने जिस इंस्पेक्टर उमाशंकर यादव का नाम लिया था, सपा राज में उस पर कोई इन्क्वायरी तक नहीं बैठी। सिस्टम बिल्कुल भी न्यूट्रल नहीं था। उन सालों में यूपी का सरकारी अमला तो बस समाजवादी पार्टी की गुंडागर्दी की ढाल बना हुआ था।
यहां बड़ी तस्वीर को समझना बहुत ज़रूरी है। 1993-95, 2003-07 और 2012-17 तक यूपी में सपा के राज का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है की अपराधियों को राजनीतिक पनाह दी गई, विपक्षी कार्यकर्ताओं में खौफ पैदा किया गया और पुलिस-प्रशासन में खुलेआम यादव और अल्पसंख्यक समुदायों को फायदा पहुंचाया गया, जबकि ब्राह्मणों, सवर्णों और बाकी तबकों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।
ये कोई इत्तेफाक नहीं था। ये जानबूझकर बनाया गया सिस्टम था। सपा का जो ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) वोटबैंक है, वो इसी शर्त पर टिका था कि उन्हें हर गुनाह की खुली छूट मिलेगी, जबकि इस गठजोड़ से बाहर के लोगों को कानून का डंडा झेलना पड़ेगा।
जब भरी विधानसभा में सीएम योगी की एक दहाड़ ने बेनकाब कर दिया अखिलेश का 16 साल पुराना पाप
पूरे सोलह साल तक राज्य सरकार नीरज मिश्रा को भुलाए बैठी रही। फिर 2020 में, यूपी विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खड़े होकर उसका नाम लिया। योगी ने भरी विधानसभा में खुलेआम कहा कि 2004 में अखिलेश यादव ने नीरज मिश्रा का कटा हुआ सिर मुख्यमंत्री आवास में मंगवाया था।
जिस बात को मिश्रा परिवार इतने सालों से दर-दर भटक कर कह रहा था, उसे सूबे के सबसे बड़े सदन में साफ-साफ कह दिया गया था। यूपी की राजनीति में ये किसी भूचाल से कम नहीं था। मुनीश मिश्रा और उनके परिवार के लिए ये पहली बार था जब किसी मुख्यमंत्री ने पर्दा डालने के बजाय ज़िम्मेदारी तय करने के लहज़े में उनके भाई का नाम लिया था।
अगस्त 2020 में ABP गंगा ने रिपोर्ट किया की योगी सरकार नीरज मिश्रा मर्डर केस में नए सिरे से जांच (शायद CBI या SIT जांच) करने पर विचार कर रही है। जिस परिवार ने 16 साल तक अपनी फाइलों पर धूल जमते देखी थी, उनके लिए ये उम्मीद की एक बड़ी किरण थी। बीजेपी सरकार सिर्फ इस मर्डर को स्वीकार ही नहीं कर रही थी- बल्कि ये संकेत भी दे रही थी कि अब अपराधियों को मिलने वाली खुली छूट का दौर खत्म हो रहा है।
सीएम योगी ने मुनीश मिश्रा के लिए एक और बहुत ज़रूरी कदम उठाया: उन्हें सुरक्षा दी। मुनीश सालों से लगातार मौत के साये में जी रहे थे- धमकियां कोई हवा-हवाई नहीं थीं, उन पर लगे झूठे केस और गवाहों को डराने का सपा का पुराना इतिहास इसका सुबूत था। योगी सरकार ने उन्हें एक सरकारी गनर दे दिया।
एक बड़े सरकारी चश्मे से देखें तो ये बहुत छोटी बात लग सकती है, लेकिन मुनीश मिश्रा के लिए ये बिना डरे अपनी बात कहने और हमेशा के लिए खामोश कर दिए जाने के बीच का सबसे बड़ा फर्क था।
मिश्रा परिवार के प्रति सपा के रवैये और योगी सरकार के रवैये में ज़मीन-आसमान का फर्क है। एक राजनीतिक दल ने वो हत्या करवाई- या कम से कम ये तय किया की कातिलों को कोई सज़ा न मिले। वहीं दूसरे ने ज़िंदा बचे भाई को वो सम्मान और सुरक्षा दी जिसकी उसे आवाज़ उठाते रहने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। ये कोई छोटा-मोटा फर्क नहीं है। यूपी के ब्राह्मणों के लिए इन दो राजनीतिक विजन के बीच किसी एक को चुनना ही असली फैसला है।
समाजवादी पार्टी का वो मुस्लिम यादव समीकरण जिसकी वेदी पर सरेआम चढ़ाई गई ब्राह्मणों की बलि
नीरज मिश्रा का मर्डर कोई इकलौता मामला नहीं था। ये समाजवादी पार्टी- पहले मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव के राज में- पनपे उस राजनीतिक कल्चर का सबसे खौफनाक और भयानक रूप था, जिसमें कुछ खास जातियों को तो बचाकर रखा जाता था, लेकिन बाकियों की जान की कोई कीमत ही नहीं थी।
सपा को सत्ता में लाने वाला ये मुस्लिम-यादव वोटबैंक सिर्फ एक चुनावी गणित नहीं है। ये एक ऐसा खतरनाक सिस्टम बनाता है जिसमें ब्राह्मणों और बाकी सवर्णों के हितों, सुरक्षा और सम्मान को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है- या उससे भी बुरा, उनकी सरेआम बलि चढ़ा दी जाती है।
सपा के राज में ये एक सेट पैटर्न था। सपा की गुंडागर्दी का विरोध करने वाले विपक्षी कार्यकर्ताओं- खासकर ब्राह्मणों- को सीधे तौर पर हिंसा झेलनी पड़ती थी और उन्हें पुलिस सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। सपा के दबदबे वाले इलाकों में इंसाफ़ मांगने वाले ब्राह्मणों के लिए सिस्टम के दरवाज़े हमेशा बंद ही मिलते थे।
सपा के राज में यूपी की राजनीति का अपराधीकरण कोई अचानक हुई चीज़ नहीं थी- ये एक खास वोटबैंक को फायदा पहुंचाने के लिए था, और इसकी कीमत बाकी समाज को चुकानी पड़ी। नीरज मिश्रा का मर्डर इस कीमत का सबसे घिनौना रूप था। लेकिन वो हर ब्राह्मण किसान जिसकी ज़मीन हड़प ली गई, वो हर ब्राह्मण टीचर जिसे बात न मानने पर पीटा गया, वो हर ब्राह्मण कार्यकर्ता जिसे झूठे केस में जेल में डाल दिया गया- ये सब उसी एक कहानी का हिस्सा हैं।
सपा का जो ये नया-नया ब्राह्मण प्रेम जागा है, उसे इसी बैकग्राउंड में समझने की ज़रूरत है। उनका कोई हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है। ये उस पार्टी का अपना नफा-नुकसान का गणित है जिसे दिख रहा है की ब्राह्मण वोट खिसक कर कहीं और (खासकर बीजेपी की तरफ) जा रहा है, और वो उसमें से कुछ हिस्सा वापस झटकना चाहते हैं।
अखिलेश यादव ने कभी सपा राज में ब्राह्मणों के साथ हुए अत्याचारों को स्वीकारा ही नहीं। जिस कल्चर को उनकी पार्टी ने पैदा किया और पाला-पोसा, उसके लिए उन्होंने कभी माफ़ी नहीं मांगी। उन्होंने नीरज मिश्रा के केस पर आज तक एक शब्द नहीं बोला है। इसके बजाय, वो सम्मेलनों में भाषण पेल रहे हैं और ब्राह्मण नेताओं के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। ये कोई सुलह-वुलह नहीं है। ये ‘सबका साथ’ का नाटक है, जिसे पहनकर मौकापरस्ती का खेल खेला जा रहा है।
नीरज मिश्रा की वो चीख जो अखिलेश की सियासत से आज भी मांग रही है अपना कटा हुआ सिर
5 मई 2004 को जब नीरज मिश्रा कसवा गांव के बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज पोलिंग स्टेशन के अंदर गया, तब उसकी उम्र मुश्किल से 22 साल के आस-पास रही होगी। वो एक ब्राह्मण था, बीजेपी का वर्कर था। वो अकेले उस आदमी के सामने तनकर खड़ा हो गया जिसके पीछे पूरी सत्ता की ताकत थी, एक सत्ताधारी पार्टी की गुंडागर्दी थी और 30 गाड़ियों का भारी-भरकम काफिला था। उसने ये सब अकेले किया। निहत्थे किया। और इसकी कीमत उसे अपना सिर देकर चुकानी पड़ी- बिलकुल सच में।
उसकी कहानी सिर्फ सपा राज में राजनीतिक हिम्मत दिखाने के खतरों की चेतावनी भर नहीं है। ये उस पूरी की पूरी राजनीतिक जमात और उनके काम करने के तरीकों पर एक तमाचा है। ये अखिलेश यादव के उस “मॉडर्न, प्रोग्रेसिव और सबको साथ लेकर चलने वाले नेता” वाले चेहरे के सामने रखा वो आईना है- जो असलियत में कुछ और ही खौफनाक तस्वीर दिखाता है।
इस केस से उठने वाली मांगें कोई किसी एक पार्टी की मांगें नहीं हैं। ये एक ज़िंदा लोकतंत्र की सबसे बुनियादी मांगें हैं।
पहला: नीरज मिश्रा के मर्डर और 5 मई 2004 की घटनाओं की पूरी, निष्पक्ष और एक तय समय सीमा के अंदर जांच हो- चाहे सीबीआई (CBI) करे या कोई भरोसेमंद एसआईटी (SIT)।
दूसरा: नामज़द आरोपियों- अशोक यादव, अवनीश यादव, राम शरण उर्फ मुन्नू सिंह, पप्पू सिंह, सुनील यादव और राम विलास यादव- जो पिछले दो दशकों से बिना किसी डर के घूम रहे हैं, उनकी जवाबदेही तय हो।
तीसरा: इंस्पेक्टर उमाशंकर यादव समेत वहां मौजूद उन सभी पुलिसवालों के खिलाफ पूरी इन्क्वायरी हो, जिन्होंने नीरज को कथित तौर पर कातिलों के हवाले कर दिया था।
और चौथा: अखिलेश यादव खुद सामने आकर ईमानदारी से जवाब दें- अगर उन्हें सच में ब्राह्मणों के वोट चाहिए, तो पहले वो इस ब्राह्मण परिवार के दुख का हिसाब दें।
यूपी के ब्राह्मण वोटरों को, और हर उस नागरिक को जो ये मानता है की राजनीतिक हिंसा का अंजाम तो भुगतना ही चाहिए, मैसेज एकदम साफ़ है: मिश्रा परिवार के 22 साल के इस असहनीय दर्द को सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बनकर मत रह जाने दो।
नीरज मिश्रा की हत्या को उस आदमी के इस नकली ब्राह्मण प्रेम के ड्रामे में मत धुलने दो, जिसके खिलाफ नीरज का भाई 20 सालों से चीख-चीख कर आरोप लगा रहा है। जब कोर्ट-कचहरी से उम्मीद टूट जाती है, तो हमारी ‘याददाश्त’ ही इंसाफ़ का सबसे बड़ा हथियार होती है।
नीरज मिश्रा को कम से कम एक कब्र नसीब होनी चाहिए। उसके परिवार को इंसाफ़ मिलना चाहिए। यूपी सच जानने का हकदार है।
और हर वो नेता जो एक ब्राह्मण की हत्या का दाग सिर पर लेकर ब्राह्मणों से वोट मांगने निकलता है, उससे कम से कम ये सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए- वो सवाल जो आज तक किसी मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकार ने कैमरे पर, या कोर्ट में गीता पर हाथ रखवाकर अखिलेश यादव से पूछने की हिम्मत नहीं की: “नीरज मिश्रा के सिर का आखिर हुआ क्या?”
जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता, समाजवादी पार्टी का ब्राह्मणों से वोट मांगना कोई राजनीतिक रणनीति नहीं… बल्कि एक भद्दा मज़ाक और सीधा-सीधा मुंह पर तमाचा है।
