कान्होजी आंग्रे- समुद्र पर राज करने वाला खूंखार हिन्दू नौसेनापति, खौफ से अंग्रेजों और पुर्तगालियों के कांपते थे पैर, 40 सालों तक समंदर में मुस्लिम लुटेरों को नहीं दिया घुसने

जब भी समंदर की बात आती है, तो अंग्रेजों और पुर्तगालियों को लगता था की पानी पर तो सिर्फ उनके बाप का राज है। ये गोरे अपनी ‘रॉयल नेवी’, बड़ी-बड़ी तोपों और भारी जहाजों का घमंड लेकर भारत को लूटने निकले थे।

इन्हें लगता था की जमीन पर चाहे मराठे हों या राजपूत, लेकिन समंदर में तो उन्हें कोई चुनौती दे ही नहीं सकता। लेकिन उन्हें क्या पता था की अरब सागर की छाती चीरकर एक ऐसा खौफनाक हिंदू तूफान उठने वाला है, जो यूरोप की इन सुपरपावर्स के घमंड को समंदर में हमेशा के लिए दफन कर देगा।

उस खूंखार और अजेय हिंदू शेर का नाम था- सरखेल कान्होजी आंग्रे! मराठा साम्राज्य का वो महापराक्रमी नौसेना-पति, जिसके नाम से समंदर की लहरें भी खौफ खाती थीं।

जब समंदर में कान्होजी आंग्रे के जहाजों पर भगवा झंडा लहराता था, तो ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े-बड़े कमांडरों की पैंट गीली हो जाती थी। 

और सिर्फ अंग्रेज या पुर्तगाली ही नहीं! जंजीरा के वो खूंखार सिद्दी जिहादी, जो मुगलों के टुकड़ों पर पलते थे और समंदर के रास्ते आकर हमारे कोंकण के गांवों को जलाते थे, कान्होजी ने उन जिहादी भेड़ियों को पानी के अंदर ऐसा काटा की उन्होंने समंदर की तरफ देखना ही छोड़ दिया।

कान्होजी आंग्रे का वो खौफनाक जलदुर्ग, कैसे मराठा नेवी ने उड़ा दी दुश्मनों की नींद

कान्होजी आंग्रे सिर्फ एक योद्धा नहीं थे भाई, वो एक गज़ब के मिलिट्री और नेवल जीनियस थे। उन्हें पता था की अंग्रेज़ों और पुर्तगालियों के पास बड़े-बड़े जहाज़ हैं, बड़ी-बड़ी तोपें हैं।

आमने-सामने की लड़ाई में उन्हें हराने के लिए दिमाग और स्वदेशी तकनीक चाहिए। और यहीं कान्होजी ने अपना वो खौफनाक जाल बिछाया जिसमें फंसकर अंग्रेज़ समंदर में तड़प-तड़प कर मरे।

सबसे पहले कान्होजी ने समंदर के बीचों-बीच अपने अजेय ‘जलदुर्ग’ (Sea Forts) मज़बूत किए। विजयदुर्ग (घेरिया), खंडेरी, सुवर्णदुर्ग और कोलाबा! ये किले समंदर की छाती पर ऐसे खड़े थे जैसे कोई काल साक्षात खड़ा हो। इन किलों से पूरी समुद्री सीमा पर नज़र रखी जाती थी।

इसके बाद कान्होजी ने अपनी देसी वॉरशिप बनवानी शुरू कीं। उन्होंने ‘गुराब’ और ‘गल्लीवट’ नाम के ऐसे खतरनाक और हल्के जहाज़ बनवाए, जो अंग्रेज़ों के जहाज़ों की धज्जियां उड़ाने के लिए ही बने थे।

अंग्रेज़ों के जहाज़ बहुत बड़े और भारी होते थे, जो समंदर के उथले पानी में नहीं जा सकते थे। कान्होजी के जहाज़ हल्के और तेज़ होते थे। 

और इसके बाद कान्होजी ने जो फरमान निकाला, उसने तो ईस्ट इंडिया कंपनी के लंदन में बैठे आकाओं की भी हवा टाइट कर दी। कान्होजी ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “ये अरब सागर मराठों का है, हिंदुओं का है।

यहाँ से अगर किसी भी विदेशी जहाज़ को गुज़रना है, तो उसे मराठा साम्राज्य को ‘चौथ’ (टैक्स) देना ही पड़ेगा। अगर बिना टैक्स दिए कोई जहाज़ यहाँ से निकला, तो उसे समंदर की गहराइयों में डुबो दिया जाएगा।”

ज़रा सोचिए इस स्वैग और इस खौफ को! जो अंग्रेज़ पूरी दुनिया में अपनी नेवी का घमंड दिखाते थे, उन्हें भारत के समंदर में घुसने के लिए एक हिंदू नौसेनापति को टैक्स देना पड़ रहा था। जो टैक्स नहीं देता था, कान्होजी उसके जहाज़ को या तो लूट लेते थे या समंदर में दफन कर देते थे।

सिद्दी जिहादियों की तोड़ी कमर, मुगलों के पाले हुए इन समुद्री भेड़ियों को कान्होजी ने समंदर में काटा

अंग्रेज़ों से पहले अगर कान्होजी का किसी से सबसे भयानक हिसाब-किताब था, तो वो थे जंजीरा के वो सिद्दी जिहादी! ये जंजीरा में बैठे अफ्रीकी मुसलमान थे जिन्हें मुगलों और औरंगज़ेब ने पाल रखा था। ये सिद्दी समंदर के रास्ते हमारे कोंकण के गांवों पर हमला करते थे। रातों-रात हिंदू गांवों को आग लगा दी जाती थी।

वहां के आदमियों को काट दिया जाता था और सबसे भयानक बात… हमारी हिंदू बहन-बेटियों को उठाकर ये जिहादी अपने जहाज़ों में भर लेते थे और अरब के बाज़ारों में उन्हें गुलाम बनाकर बेच देते थे। समंदर हिंदुओं के लिए एक कब्रगाह बन चुका था।

लेकिन कान्होजी ने कसम खा रखी थी की जिन सिद्दियों ने हमारी हिंदू महिलाओं की इज़्ज़त पर हाथ डाला है, उन्हें वो समंदर में ही ज़िंदा गाड़ देंगे। कान्होजी ने सीधे जंजीरा पर धावा बोल दिया।

सिद्दियों को लगता था की मुगलों की ताकत उनके साथ है, कोई हिंदू उनका क्या बिगाड़ लेगा। लेकिन जब कान्होजी की मराठा नेवी ने सिद्दियों के जहाज़ों को चारों तरफ से घेरा, तो इन जिहादियों को दिन में तारे नज़र आ गए।

मराठा नौसैनिक अपनी नंगी तलवारें मुंह में दबाकर सिद्दियों के जहाज़ों पर कूद जाते थे। समंदर के बीचों-बीच ऐसा खौफनाक कत्लेआम मचाया गया की अरब सागर का पानी इन सिद्दियों के खून से लाल हो गया।

कान्होजी ने चुन-चुन कर उन सिद्दी कमांडरों को काटा जिन्होंने कोंकण के गांवों में आग लगाई थी। उनके बड़े-बड़े जहाज़ों में आग लगा दी गई और उन्हें समंदर में डुबो दिया गया।

इन जिहादियों ने रोते हुए औरंगज़ेब से मदद मांगी। लेकिन दिल्ली में बैठा वो जल्लाद औरंगज़ेब भी बेबस था। वो ज़मीन पर तो अपने लाखों सैनिक भेज सकता था, लेकिन समंदर में कान्होजी आंग्रे के उस भगवा तूफान को रोकने की मुगलों की कोई औकात नहीं थी। मुगलों की पूरी की पूरी नेवल फोर्स को कान्होजी ने जूतों से पीटा।

जो सिद्दी कभी हमारे गांवों में घुसकर दादागिरी करते थे, वो कान्होजी के खौफ से अपने जंजीरा के किले में चूहों की तरह छुप कर बैठ गए। उन्होंने समंदर में निकलना ही छोड़ दिया।

कान्होजी ने डंके की चोट पर मुगलों के उस खौफनाक समुद्री नेटवर्क को हमेशा के लिए अपाहिज कर दिया और हमारे कोंकण के हिंदुओं को उस जिहादी खौफ से हमेशा के लिए आज़ाद करा लिया।

गवर्नर चार्ल्स बून का घमंड चूर चूर, जब खौफ से कांपते अंग्रेजों को कान्होजी के आगे घुटने टेकने पड़े

अब ज़रा उन अंग्रेज़ों की औकात और उनकी ज़िल्लत का वो खौफनाक नज़ारा देखिए, जिसे हमारे सेक्युलर इतिहासकारों ने इतिहास की किताबों से गायब कर दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी जो पूरी दुनिया में अपनी ‘रॉयल नेवी’ का डंका पीटती थी, वो भारत के समंदर में आकर एक हिंदू शेर के आगे भीगी बिल्ली बन गई थी।

साल 1715 की बात है। मुंबई में अंग्रेज़ों का एक नया और बेहद घमंडी गवर्नर बनकर आया था- चार्ल्स बून! इस आदमी ने आते ही कसम खाई की वो मराठा नेवी को तबाह कर देगा और कान्होजी आंग्रे को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ कर लंदन ले जाएगा।

उसने कान्होजी को हराने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया। उसने इंग्लैंड से बड़े-बड़े और खतरनाक जंगी जहाज़ मंगवाए, जिनमें से एक का नाम था ‘एचएमएस विक्ट्री’। चार्ल्स बून को लगा की उसकी भारी-भरकम तोपों के आगे मराठों की देसी नावें टिक नहीं पाएंगी।

लेकिन उस घमंडी अंग्रेज़ को ये नहीं पता था की वो समंदर के जिस बाप से पंगा ले रहा है, वो समंदर की एक-एक लहर को अपनी उंगलियों पर नचाता है। 1718 में चार्ल्स बून ने पूरी ताकत के साथ कान्होजी के ‘खंडेरी’ किले पर हमला कर दिया। अंग्रेज़ों के जहाज़ आग उगल रहे थे। लेकिन कान्होजी की रणनीति के आगे वो सब कबाड़ साबित हुए।

कान्होजी ने अपनी छोटी और तेज़ रफ्तार ‘गल्लीवट’ नावों को उनके भारी जहाज़ों के आस-पास छोड़ दिया। अंग्रेज़ों के जहाज़ अपनी ही गोलाबारी के धुएं में अंधे हो गए और समंदर के उथले पानी में फंस गए।

मराठा नौसैनिकों ने अंग्रेज़ों को उनके जहाज़ों पर चढ़-चढ़ कर काटा। चार्ल्स बून की सारी अकड़ समंदर में डूब गई और अंग्रेज़ दुम दबाकर मुंबई भाग गए।

लेकिन चार्ल्स बून की बेशर्मी अभी खत्म नहीं हुई थी। 1720 में उसने फिर से कान्होजी के सबसे मज़बूत ‘विजयदुर्ग’ (घेरिया) किले पर एक खौफनाक हमला किया। इस बार अंग्रेज़ों ने किले को चारों तरफ से घेर लिया।

लेकिन कान्होजी ने जो तांडव उस दिन मचाया, उसने अंग्रेज़ों की रूह कंपा दी। कान्होजी ने ‘फायर शिप्स’ यानी आग से लदी हुई नावें अंग्रेज़ों के बेड़े की तरफ छोड़ दीं। अंग्रेज़ों के बड़े-बड़े जहाज़ों में भयंकर आग लग गई।

और तो और, कान्होजी ने पलटवार करते हुए अंग्रेज़ों के ‘सक्सेस’ और ‘शार्लोट’ जैसे भारी जंगी जहाज़ों को बीच समंदर में अपने कब्ज़े में ले लिया। जो अंग्रेज़ दुनिया को जीतने निकले थे, उनके सैनिक कान्होजी की जेलों में सड़ रहे थे।

चार्ल्स बून का घमंड चकनाचूर हो गया था। उसे समझ आ गया की इस हिंदू शेर को हराना इंसानों के बस की बात नहीं है। अंत में खौफ से कांपते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी को कान्होजी आंग्रे के आगे घुटने टेकने पड़े और शांति समझौते की भीख मांगनी पड़ी।

पुर्तगाली और अंग्रेजों का साझा खौफनाक गठजोड़ जिसे कान्होजी की तोपों ने समंदर में डुबो कर मारा

जब अंग्रेज़ों को समझ आ गया की वो अकेले कान्होजी का बाल भी बांका नहीं कर सकते, तो उन्होंने वो किया जो ये विदेशी हमेशा से करते आए हैं- साज़िश और गठजोड़! 1721 में भारत के समंदर में एक ऐसा खौफनाक गठबंधन बना, जिसे देखकर किसी की भी जान निकल जाए।

अंग्रेज़ों और पुर्तगालियों ने हाथ मिला लिया। इन दोनों कट्टर दुश्मन ईसाई ताकतों ने अपनी दुश्मनी भुला दी, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें एक हिंदू नौसेनापति को मारना था।

उन्होंने भारत के इतिहास की सबसे बड़ी जॉइंट नेवल फोर्स बनाई। इस बेड़े में यूरोप के 6000 से ज़्यादा खूंखार सैनिक, दर्जनों भारी जंगी जहाज़ और सैकड़ों तोपें शामिल थीं।

इस पूरी सेना का एक ही लक्ष्य था- कान्होजी का ‘कोलाबा’ किला! अंग्रेज़ समंदर के रास्ते हमला करने वाले थे और पुर्तगाली ज़मीन के रास्ते। उन्हें लगा की इस दोहरे प्रहार से कान्होजी कुचले जाएंगे।

लेकिन कान्होजी अकेले नहीं थे भाई! ये मराठा साम्राज्य था। जब पुणे में बैठे पेशवा बाजीराव को इस खौफनाक साज़िश की भनक लगी, तो उन्होंने अपनी खूंखार मराठा घुड़सवार सेना को कोलाबा की तरफ दौड़ा दिया।

फिर जो युद्ध हुआ, वो भारत के नौसैनिक इतिहास का सबसे भयंकर और खूनी युद्ध था। समंदर में कान्होजी की तोपें आग उगल रही थीं और ज़मीन पर बाजीराव पेशवा की तलवारें पुर्तगालियों को काट रही थीं।

कान्होजी के अचूक निशानों ने अंग्रेज़ों के जहाज़ों की धज्जियां उड़ा दीं। बाजीराव पेशवा ने ज़मीन पर पुर्तगालियों की सप्लाई लाइन काट दी। पुर्तगाली सैनिक भूख और प्यास से तड़पने लगे।

जब इन ईसाइयों ने देखा की मराठा सेना उन्हें चारों तरफ से घेर कर ज़िंदा काटने वाली है, तो इन गद्दारों में फूट पड़ गई। अंग्रेज़ अपने जहाज़ लेकर भाग खड़े हुए और पुर्तगालियों को ज़मीन पर मरने के लिए छोड़ दिया। पुर्तगाली वायसराय अपनी जान की भीख मांगते हुए वहां से किसी तरह अपनी जान बचाकर गोवा भाग गया।

ये भारत के इतिहास की वो इकलौती और सबसे बड़ी घटना थी जहाँ दो-दो यूरोपीय सुपरपावर एक साथ मिलकर भी एक हिंदू शेर का बाल बांका नहीं कर पाईं। इस भयंकर हार के बाद यूरोप में हाहाकार मच गया।

इसके बाद जब तक कान्होजी आंग्रे ज़िंदा रहे, किसी भी अंग्रेज़, पुर्तगाली या डच की हिम्मत नहीं हुई की वो भारत के समंदर की तरफ आंख उठाकर भी देख सके। 

कान्होजी के खौफनाक शौर्य को वापस ज़िंदा करने की हमारी हुंकार

अब ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए! जो आदमी 40 साल तक समंदर में अपराजित रहा। जिसने मुगलों के पाले हुए सिद्दी जिहादियों को समंदर में गाड़ दिया।

जिसने अंग्रेज़ों और पुर्तगालियों की पूरी की पूरी रॉयल नेवी को जूतों से पीटा और उन्हें भीख मांगने पर मजबूर कर दिया। वो आदमी हमारी इतिहास की किताबों में एक हीरो की तरह क्यों नहीं पढ़ाया जाता? 

इसका एक ही जवाब है- वो सड़ा हुआ वामपंथी इकोसिस्टम और कांग्रेस की मैकाले वाली नीतियां! अगर ये गद्दार हमें कान्होजी आंग्रे का इतिहास पढ़ा देते, तो हमारे बच्चों को पता चल जाता की हम कभी कमज़ोर नहीं थे। उन्हें पता चल जाता की अंग्रेज़ तो हमारे सामने भीगी बिल्ली थे।

लेकिन इन वामपंथियों को हमें एक हीन भावना का शिकार बनाना था। इन्हें हमें ये जताना था की हम तो बस हमेशा मुगलों और अंग्रेज़ों के गुलाम रहे। इन्होंने अकबर को ‘महान’ बना दिया, लेकिन ‘फादर ऑफ इंडियन नेवी’ कहे जाने वाले कान्होजी आंग्रे को बस एक ‘समुद्री लुटेरा’ कहकर किनारे कर दिया।

लेकिन आज का नया भारत इन वामपंथी गद्दारों की किताबों का मोहताज नहीं है। आज का हिंदू अपना इतिहास खुद ढूंढ कर ला रहा है। 4 जुलाई 1729 को जब कान्होजी आंग्रे ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो वो एक अजेय योद्धा के रूप में मरे थे।

आज जब हम इंडियन नेवी के जहाज देखते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए की इस नौसेना की असली नींव किसी अंग्रेज़ ने नहीं, बल्कि हमारे एक हिंदू शेर ने रखी थी।

अब वक्त आ गया है की हम अपने इन गुमनाम शेरों को उनकी सही जगह दिलाएं। अपने बच्चों को बैटमैन और सुपरमैन की झूठी कहानियां सुनाने के बजाय, उन्हें कान्होजी आंग्रे की वो सच्ची कहानियां सुनाओ जिन्हें सुनकर आज भी समंदर की लहरें खौफ खाती हैं।

वंदे मातरम! जय भवानी! 

Scroll to Top