मौत का समुद्री गलियारा! ‘बाब-अल-मंडेब’ से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को धमकाते यमन के आतंकी, ड्रोन्स और मिसाइलों के साये में फंसा भारत, चीन, अमेरिका और यूरोप का व्यापार

ज़रा सोचिए, महज़ 29 किलोमीटर चौड़ा समंदर का एक छोटा सा टुकड़ा पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दे, तो आप उसे क्या कहेंगे? आज से कुछ साल पहले तक अगर कोई कहता की हवाई चप्पल पहने और मुंह पर कपड़ा बांधे कुछ जिहादी आतंकी पूरी ग्लोबल इकॉनमी का चक्का जाम कर सकते हैं, तो शायद आप हंस देते।

लेकिन आज, 2026 में, ये कोई मज़ाक नहीं बल्कि एक खौफनाक हकीकत है। लाल सागर के पास में बसा ‘बाब-अल-मंडेब’ (Bab-el-Mandeb Strait) आज दुनिया का सबसे बड़ा बारूदी अखाड़ा बन चुका है। ईरान के पाले हुए हूती (Houthi) आतंकी इस संकरे से रास्ते पर बैठकर भारत, अमेरिका, यूरोप, चीन और पूरी दुनिया के व्यापार की नाक में दम करके बैठे हैं।

कमाल की बात तो ये है की खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाले पश्चिमी देश और उनके हाई-टेक जंगी जहाज़ इस जिहादी नंगे नाच के सामने सिर्फ तमाशबीन बने हुए हैं। उनके पास हथियार तो बहुत हैं, लेकिन शायद वो जज़्बा और हिम्मत ही नहीं बची जो ऐसे आतंकियों को उनके बिल में घुसकर खत्म कर सके।

ये कोई समुद्री डकैती नहीं है, दोस्तों। ये सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की शह-रग पर रखा गया जिहादी खंजर है। एक ऐसा फंदा, जिसे यमन से ऑपरेट किया जा रहा है, लेकिन जिसकी घुटन दिल्ली से लेकर वाशिंगटन और पेरिस से लेकर बीजिंग तक महसूस की जा रही है।

तो चलिए, आज ज़रा गहराई में उतरते हैं और समझते हैं की कैसे एक छोटे से समुद्री चोकपॉइंट ने सुपरपावर्स की हवा टाइट कर दी है।

खौफ में घुटता बाब-अल-मंडेब का समुद्री रास्ता, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर यमन के आतंकियों का खंजर

अब बात करते हैं इस बवाल की जड़ यानी ‘बाब-अल-मंडेब’ की। अरबी भाषा में ‘बाब-अल-मंडेब’ का मतलब होता है “आंसुओं का द्वार”। इतिहास में इसे ये नाम इसलिए मिला था क्योंकि यहाँ जहाजों का नेविगेशन बहुत मुश्किल होता था और अक्सर नाविकों की जान चली जाती थी।

लेकिन आज इस नाम का मतलब पूरी तरह बदल चुका है। आज ये द्वार उन ग्लोबल कंपनियों, निवेशकों और आम जनता के आंसू निकाल रहा है, जिनका तेल, राशन और ज़रूरी सामान यहाँ आतंकियों के ड्रोन्स और मिसाइलों की भेंट चढ़ रहा है।

भूगोल के हिसाब से देखें तो ये रास्ता लाल सागर (Red Sea) को हिंद महासागर (Indian Ocean) और अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसी रास्ते से जहाज़ आगे बढ़कर मिस्त्र (Egypt) की स्वेज़ नहर (Suez Canal) में घुसते हैं और यूरोप पहुँचते हैं।

यानी एशिया और यूरोप के बीच व्यापार का ये सबसे छोटा और सबसे ज़रूरी शॉर्टकट है। अगर हम 2023 के शुरुआती आंकड़ों की बात करें, तो दुनिया का लगभग 12 से 15 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी 29 किलोमीटर के गलियारे से होकर गुज़रता था।

ज़रा तेल के गणित को समझिए। मिडिल ईस्ट का कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी रास्ते से यूरोप और बाकी दुनिया तक पहुँचती है। 2023 के मध्य तक रोज़ाना लगभग 9.3 मिलियन बैरल तेल यहाँ से बड़े-बड़े टैंकरों में लदकर गुज़रता था।

लेकिन हूती आतंकियों के खौफ का आलम ये है की 2024-2025 आते-आते ये आंकड़ा गिरकर आधे से भी कम, महज़ 4.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया। बड़ी-बड़ी शिपिंग कंपनियों जैसे मेर्स्क (Maersk), हापाग-लॉयड (Hapag-Lloyd) और एमएससी (MSC) ने इस रास्ते से तौबा कर ली है।

और इस पूरे खेल में सबसे ज़्यादा बैंड बजी है मिस्त्र की। स्वेज़ नहर से होने वाली कमाई मिस्त्र की इकॉनमी की रीढ़ की हड्डी है। लेकिन जहाज़ों के इस रूट को छोड़ने की वजह से मिस्त्र को हर महीने लगभग 800 मिलियन डॉलर का सीधा चूना लग रहा है।

एक तरफ मिस्त्र कंगाली की कगार पर खड़ा है, तो दूसरी तरफ यमन में बैठे हूती आतंकी छाती चौड़ी करके दुनिया को ब्लैकमेल कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे ग्लोबल सप्लाई चेन की नसों में खून की जगह खौफ दौड़ रहा हो।

ये स्थिति कोई रातों-रात नहीं बनी है। इसके पीछे एक बहुत गहरी और सोची-समझी जिहादी साजिश है, जिसे ईरान से फंडिंग और हथियारों की खेप मिल रही है।

यमन के आतंकियों के सस्ते ड्रोन्स के आगे अमेरिका और यूरोप जैसे सुपरपावर पस्त

वैसे, जब इन आतंकियों ने समंदर में आने वाले जहाज़ों पे हमले शुरू किये तो अमेरिका और यूरोप ने बड़ी-बड़ी डींगें हांकी थीं। अमेरिका ने बकायदा एक भारी-भरकम नाम वाला मिशन लॉन्च किया- ‘ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्जियन’ (Operation Prosperity Guardian), और उसके पीछे-पीछे यूरोपियन यूनियन ने ‘एस्पाइड्स’ (Aspides) नाम का अपना बेड़ा उतार दिया।

इनका दावा था की ये समंदर में मर्चेंट जहाजों को एस्कॉर्ट करेंगे और आतंकियों को उनकी औकात दिखाएंगे।

लेकिन असलियत क्या है? असलियत ये है की ये तथाकथित सुपरपावर पूरी तरह से पस्त हो चुके हैं। यहाँ जो युद्ध लड़ा जा रहा है, वो दुनिया के इतिहास का सबसे बेतुका और खर्चीला ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ है।

ज़रा इसके अर्थशास्त्र को समझिए। ईरान अपने पाले हुए हूतियों को जो ड्रोन देता है, जैसे ‘शहीद-136’ (Shahed-136), उसकी कीमत बमुश्किल 20 हज़ार डॉलर (करीब 16 लाख रुपये) होती है। ये ड्रोन्स बस एक उड़ने वाले स्कूटर की तरह हैं जिनमें बारूद भरा होता है।

अब इस 20 हज़ार डॉलर के कबाड़ को समंदर में मार गिराने के लिए अमेरिकी नौसेना क्या करती है? वो अपने डिस्ट्रॉयर्स से ‘SM-2’ या ‘SM-6’ जैसी गाइडेड मिसाइलें फायर करती है।

आपको पता है एक SM-2 मिसाइल की कीमत क्या है? लगभग 2.1 मिलियन डॉलर (करीब 17.5 करोड़ रुपये)! और SM-6 तो 4 मिलियन डॉलर से भी ऊपर की आती है।

यानी अमेरिका 16 लाख रुपये के ड्रोन को गिराने के लिए 17-18 करोड़ रुपये हवा में फूंक रहा है। ये कोई बहादुरी नहीं है, ये बेवकूफी है। हूती और ईरान यही तो चाहते हैं! वो बिना कोई बड़ा खर्चा किए अमेरिका का खजाना खाली करवा रहे हैं और उसे समंदर में थका रहे हैं।

और चीन की दोगली नीति तो देखिए। चीन की नौसेना भी पास ही में जिबूती (Djibouti) में अपना बड़ा सैन्य अड्डा बनाकर बैठी है। लेकिन वो इस पूरे बवाल से एकदम कन्नी काटे हुए है।

क्यों? क्योंकि पर्दे के पीछे चीन, ईरान और हूतियों के बीच एक नापाक डील हो चुकी है। हूतियों ने साफ कह दिया है की वो चीन और रूस के जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे।

नतीजा ये है की चीन के जहाज़ आराम से लाल सागर से गुज़र रहे हैं, जबकि दुनिया की बाकी कंपनियों को अफ्रीका का पूरा चक्कर काटना पड़ रहा है। चीन इसी ताक में बैठा है की पश्चिमी देश और बाकी इकॉनमी कमज़ोर हो, ताकि वो अपना दबदबा और बढ़ा सके।

सच कहूं तो, जब तक आतंकवाद को जड़ से नहीं मिटाया जाएगा, तब तक ये सब ड्रामेबाज़ी है। जब तक यमन में आतंकियों के लॉन्च पैड और उन्हें हथियार सप्लाई करने वाले ईरानी ठिकानों पर सीधे बम नहीं बरसाए जाते, तब तक ये सुपरपावर्स बस समंदर में हवा में तीर चलाते रहेंगे और हूती आतंकी ज़मीन पर बैठकर उन पर हंसते रहेंगे।

यमन के आतंकियों की आग से झुलस रही हमारी रसोई और तबाह होती वैश्विक अर्थव्यवस्था

अब आप सोचेंगे की यमन और समंदर में क्या हो रहा है, उससे दिल्ली, मुंबई या लंदन में बैठे आम आदमी को क्या फर्क पड़ता है? अरे भाई, फर्क पड़ता है, और बहुत तगड़ा पड़ता है!

लाल सागर की ये आग अब सिर्फ समंदर की लहरों तक सीमित नहीं है, इसकी तपिश आपकी रसोई, आपकी कार और आपके रोज़मर्रा के बजट तक पहुँच चुकी है।

जब शिपिंग कंपनियों ने देखा की बाब-अल-मंडेब से गुज़रने का मतलब है हूतियों की मिसाइलों का शिकार होना, तो उन्होंने अपनी जान और माल बचाने के लिए एक लंबा रास्ता चुना।

अब ज़्यादातर बड़े जहाज़ अफ्रीका के एकदम नीचे से, ‘केप ऑफ गुड होप’ (Cape of Good Hope) का पूरा चक्कर काटकर एशिया से यूरोप जा रहे हैं। सुनने में ये एक साधारण सा डाइवर्जन लग सकता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है की इस चक्कर से जहाजों की यात्रा में 6,000 से 8,000 मील का फासला जुड़ गया है।

इस अतिरिक्त दूरी का मतलब है- 10 से 15 दिन का एक्स्ट्रा सफर, लाखों गैलन एक्स्ट्रा फ्यूल (ईंधन), और इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा वसूला जाने वाला मुंहमांगा प्रीमियम। नतीजा? ग्लोबल फ्रेट रेट्स (यानी माल ढुलाई का भाड़ा) आसमान फाड़ चुके हैं।

हवा-हवाई बातों से हटकर अगर हम एकदम ताज़ा आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत पर नज़र डालें, तो पता चलता है की बाब-अल-मंडेब में बैठे यमन के इन आतंकियों ने दुनिया भर के व्यापार में कितनी गहरी चोट की है।

बात सिर्फ समंदर में मिसाइलें दागने तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर भारत के किसानों, निर्यातकों से लेकर अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों तक पहुँच चुका है।

सबसे पहले अपने देश भारत की ही बात कर लेते हैं। भारत का लगभग 50 प्रतिशत से ज़्यादा समुद्री निर्यात (खासकर यूरोप और पश्चिमी देशों को) लाल सागर के इसी रूट से होता था।

लेकिन 2024-2026 के ताज़ा आंकड़ों को देखें तो जिहादियों के इस खौफ की वजह से भारतीय निर्यातकों को भयानक नुकसान झेलना पड़ रहा है।

जो 40-फीट का कंटेनर भारत के जेएनपीटी (JNPT) पोर्ट से यूरोप के रॉटरडैम तक महज़ 650 डॉलर में पहुँच जाया करता था, आज उसका भाड़ा 477 प्रतिशत बढ़कर 3,750 डॉलर तक पहुँच गया है।

ज़रा सोचिए, हमारे देश से यूरोप जाने वाले मसालों और चाय की खेप अब 21 से 28 दिन की देरी से पहुँच रही है। और तो और, झींगा (Shrimp) और समुद्री जीवों का व्यापार करने वाले भारतीय व्यापारियों की कमर टूट गई है, क्योंकि माल ढुलाई का खर्च और इंश्योरेंस प्रीमियम 150 से 200 प्रतिशत तक बढ़ चुका है।

अर्थशास्त्रियों का ताज़ा अनुमान है की इस जिहादी आतंक और रास्ता बदलने की मजबूरी के चलते भारत के कुल निर्यात में करीब 30 अरब डॉलर तक का बट्टा लग सकता है। यानी हमारे देश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर इस आतंकी गुट की कीमत चुकानी पड़ रही है।

हद तो ये है की 2026 आते-आते भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। यमन के ये आतंकी आज भी दुनिया के 30 प्रतिशत से ज़्यादा कंटेनर ट्रैफिक को बंधक बनाए बैठे हैं।

जो पश्चिमी देश कल तक मानवाधिकार और डिप्लोमेसी का राग अलापते थे, आज उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाएं और फैक्ट्रियां पुर्जों और कच्चे माल के लिए तरस रही हैं।

और इस महंगाई का सीधा बोझ किस पर पड़ता है? ज़ाहिर सी बात है, एंड-कंज्यूमर यानी आप और हम पर। पेट्रोल-डीज़ल से लेकर, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, दवाइयां, कपड़े और खाने-पीने का सामान- सब कुछ महंगा हो रहा है।

ग्लोबल सप्लाई चेन नाम की जिस चीज़ पर पूरी दुनिया की इकॉनमी टिकी है, वो अब छिन्न-भिन्न हो चुकी है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के पास पार्ट्स नहीं पहुँच रहे। टेस्ला (Tesla) को जर्मनी में अपनी गीगाफैक्ट्री का काम रोकना पड़ा क्योंकि चीन से आने वाले बैटरी पार्ट्स समय पर नहीं पहुंचे।

स्वीडन की दिग्गज कंपनी वोल्वो (Volvo) को भी बेल्जियम में अपना प्रोडक्शन सस्पेंड करना पड़ा क्योंकि गियरबॉक्स की सप्लाई लाल सागर के संकट की वजह से अटक गई थी। जहाज़ तो छोड़िए, एक छोटा सा पुर्जा तक फैक्ट्रियों तक नहीं पहुँच पा रहा है।

ये सब सिर्फ एक लॉजिस्टिक फेल्योर नहीं है, बल्कि ये एक आतंकी इकॉनमिक टेररिज्म है। एक जिहादी गुट ने दुनिया को दिखा दिया है की अगर आप सही जगह पर (चोकपॉइंट पर) वार करें, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हाईजैक किया जा सकता है।

और जिस तरह से ग्लोबल मार्केट महंगाई की इस नई लहर से जूझ रहा है, वो इस बात का पक्का सबूत है की अगर इसका तुरंत और स्थायी इलाज नहीं किया गया, तो 2026 और उसके बाद के साल पूरी दुनिया के लिए आर्थिक मंदी का एक नया काल लेकर आएंगे।

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम का दोगलापन, जिहाद को ‘क्रांति’ की चादर में लपेटने वाले वामपंथी

अब ज़रा इस पूरे मसले पर उस दोगले वामपंथी इकोसिस्टम की बात कर लें, जिसके बिना कोई भी आतंकी साजिश पूरी नहीं होती। जब भी दुनिया में कोई जिहादी ताक़त आतंक मचाती है, तो ये वामपंथी मीडिया, ग्लोबल ह्यूमन राइट्स लॉबी और सो-कॉल्ड इंटेलेक्चुअल्स तुरंत उसके बचाव में अपनी ढाल लेकर खड़े हो जाते हैं।

बाब-अल-मंडेब के मामले में भी ठीक यही हो रहा है। अगर आप बीबीसी (BBC), अल जज़ीरा (Al Jazeera), न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) या किसी भी वामपंथी विचारधारा वाले ग्लोबल मीडिया आउटलेट को पढ़ेंगे, तो आपको एक बड़ा ही चालाकी से बुना हुआ नैरेटिव दिखेगा। ये लोग हूती आतंकियों को कभी ‘आतंकवादी’ नहीं लिखते।

इनके लिए हूती हमेशा ‘विद्रोही’ (Rebels) या ‘लड़ाके’ होते हैं। ज़रा सोचिए, जो लोग अंधाधुंध मिसाइलें दाग कर निर्दोष नाविकों की जान ले रहे हैं, समंदर में कामर्शियल जहाजों को डुबा रहे हैं (जैसे ‘रुबीमार’ और ‘ट्रू कॉन्फिडेंस’ जहाज़ों का हाल किया), उन्हें ये वामपंथी मीडिया ‘रेबेल’ कहकर एक रोमांटिक और क्रांतिकारी छवि देने की कोशिश कर रहा है।

इस इकोसिस्टम ने बड़ी ही मक्कारी से हूतियों के इस आतंकी नंगे नाच को गाज़ा और फिलिस्तीन के मुद्दे से जोड़ दिया है। हूतियों ने एक बयान क्या दे दिया की वो ये सब इज़राइल का विरोध करने और फिलिस्तीनियों के समर्थन में कर रहे हैं, पूरी वामपंथी लॉबी उनके इस ‘रेजिस्टेंस’ के कसीदे पढ़ने लगी।

अमेरिका और यूरोप की यूनिवर्सिटियों में बैठे लेफ्ट-विंग प्रोफेसर्स और छात्र इन आतंकियों का समर्थन कर रहे हैं।

इन्हें मानवाधिकारों का हल्ला करना तो बहुत पसंद है, लेकिन इनका मानवाधिकार भी बड़ा सेलेक्टिव होता है। जब हूतियों की मिसाइल से ‘ट्रू कॉन्फिडेंस’ जहाज़ पर तीन निर्दोष क्रू मेंबर्स (जिनमें फिलिपिनो और वियतनामी नाविक थे) जलकर मर गए, तब संयुक्त राष्ट्र (UN) या एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) के किसी भी वामपंथी की आंखों से एक आंसू भी नहीं टपका।

समंदर में फंसा वो गरीब नाविक, जो महीनों अपने परिवार से दूर रहकर दुनिया की रसद ढोता है, उसके मानवाधिकारों की फिक्र इस इकोसिस्टम को कभी नहीं होती। इन्हें फिक्र होती है तो बस उन आतंकियों की, जिन पर अगर गलती से कोई पलटवार हो जाए, तो ये तुरंत ‘इस्लामोफोबिया’ और ‘ज़ुल्म’ का रोना रोने लगते हैं।

यही वामपंथी दोगलापन है जिसने दुनिया में आतंकवाद को इस कदर पनपने की खुली छूट दे रखी है। जिहाद को क्रांति की चादर में लपेटकर पेश करने का ये खेल दुनिया को बहुत भारी पड़ रहा है। आज जो देश अपने ही घर में पल रहे वामपंथियों के दबाव में आकर कड़े फैसले नहीं ले पा रहे, वो भविष्य में अपनी ही तबाही का इंतज़ाम कर रहे हैं।

यमन के आतंकियों की कब्र खोदकर ही बचेगी वैश्विक अर्थव्यवस्था

सीधी सी बात है, आतंकवाद और चरमपंथ को कभी भी बातचीत, डिप्लोमेसी या तुष्टिकरण से नहीं हराया जा सकता। जब सामने वाला आपके अस्तित्व और अर्थव्यवस्था को मिटाने पर तुला हो, तो उसे ‘रेबेल’ मानकर उसके साथ टेबल पर नहीं बैठा जाता, बल्कि उसे उसकी ही भाषा में जवाब दिया जाता है।

पश्चिमी देशों को अब अपनी राजनीतिक कायरता त्यागनी होगी और उन ठिकानों को मटियामेट करना होगा जहाँ से ये मिसाइलें और ड्रोन्स आ रहे हैं। इतना ही नहीं, उस असली आका (ईरान) की नकेल भी कसनी होगी जो पर्दे के पीछे से इस पूरे खेल को फाइनेंस और ऑपरेट कर रहा है।

ग्लोबल इकॉनमी को अगर ज़िंदा रहना है, तो इस जिहादी फंदे को काटना ही होगा, और वो भी पूरी बेदर्दी से। क्योंकि अगर आज हमने इस आतंकी ब्लैकमेलिंग के सामने घुटने टेक दिए, तो कल ये हमारे घरों के दरवाज़ों तक पहुँचने में देर नहीं लगाएंगे।

बाब-अल-मंडेब में शांति तभी लौटेगी जब आतंकियों के दिलों में मिसाइल दागने से पहले अपनी मौत का खौफ पैदा होगा। और ये खौफ सिर्फ और सिर्फ ताक़त की भाषा से ही पैदा किया जा सकता है। बाकी सब तो बस कागज़ी बातें हैं!

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