याद कीजिए अपने स्कूल के वो दिन, जब हमें पिकनिक के नाम पर दिल्ली की कुतुब मीनार ले जाया जाता था।
वहां हमारे वो सेक्युलर मास्टर और गाइड बड़ी चौड़ी छाती करके हमें बताते थे की “देखो बच्चों, ये कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाई थी, ये इस्लामी वास्तुकला (Architecture) का कितना महान अजूबा है।” और हम सीधे-सादे हिंदू बच्चे उस मीनार को देखकर तालियां बजाते थे।
लेकिन क्या कभी किसी ने हमें ये बताया की वो मीनार जिस ज़मीन पर खड़ी है, वो ज़मीन असल में हमारे 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों की चिता है?
क्या किसी किताब ने हमें पढ़ाया की उस जिहादी लुटेरे कुतुबुद्दीन ऐबक ने हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़कर, हमारे मंदिरों को मलबे में तब्दील करके उसी मलबे से इस खौफनाक इमारत को खड़ा किया था? नहीं ना!
क्योंकि अगर ये सच हमें बचपन में ही बता दिया जाता, तो शायद आज इस देश का हिंदू अपने ही खून से गद्दारी करने वाले इस सेक्युलर सिस्टम की ईंट से ईंट बजा चुका होता।
कुतुबुद्दीन ऐबक कोई वास्तुकला का प्रेमी या महान राजा नहीं था! वो मोहम्मद गौरी का एक वफादार गुलाम और खूंखार जल्लाद था। जब वो दिल्ली में घुसा, तो उसका एक ही जेहादी मकसद था- काफिर (हिंदुओं) के सबसे पवित्र स्थानों को नेस्तनाबूद करना।
दिल्ली का वो इलाका (महरौली) जो कभी चौहान और तोमर राजपूतों की राजधानी हुआ करता था, जो हमारे वैदिक ज्ञान, ज्योतिष और खगोल शास्त्र का सबसे बड़ा केंद्र था, ऐबक ने उसे रातों-रात एक शमशान में बदल दिया।
उसने 27 मंदिरों को तोड़ा और वहां एक जीत की मीनार खड़ी कर दी ताकि जब भी कोई हिंदू वहां से गुज़रे, तो उसे अपनी गुलामी और अपनी बेबसी याद आती रहे।
लेकिन अब वो खौफ का दौर बीत चुका है। आज का सनातनी जाग चुका है। अब हम इसे कुतुब मीनार नहीं मानते, ये डंके की चोट पर हमारा ‘विष्णु स्तंभ’ है और इसके चप्पे-चप्पे पर सिर्फ और सिर्फ हमारा हक़ है!
कुतुब मीनार परिसर का कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद, जहाँ साक्षात गणेश और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को जूतों तले रौंदा गया
अब ज़रा इस कुतुब मीनार परिसर के अंदर चलिए और उस खौफनाक सच्चाई को अपनी आंखों से देखिए जो वहां आज भी चीख-चीख कर गवाही दे रही है। मीनार के ठीक बगल में एक मस्जिद खड़ी है जिसका नाम है ‘कुव्वत-उल-इस्लाम’ मस्जिद।
ज़रा इस नाम का मतलब समझिए भाई! इसका मतलब होता है ‘इस्लाम की ताकत’। ये मस्जिद अल्लाह की इबादत के लिए नहीं बनाई गई थी, बल्कि ये तलवार और आतंक के ज़ोर पर हिंदुओं को कुचलने का एक भद्दा और जेहादी प्रदर्शन था।
खुद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने उस मस्जिद के पूर्वी दरवाज़े पर एक सरकारी बोर्ड लगा रखा है। उस बोर्ड पर साफ-साफ अंग्रेजी और हिंदी में लिखा है की “इस मस्जिद को 27 हिंदू और जैन मंदिरों के मलबे से बनाया गया है।”
ऐबक के ही दरबारी इतिहासकार हसन निज़ामी ने अपनी किताब ‘ताज-उल-मासीर’ में बड़ी बेशर्मी से शेखी बघारते हुए लिखा है की कैसे उन्होंने मंदिरों को तोड़ा और मूर्तियों को मस्जिद की चौखट में चुनवा दिया।
ज़रा वहां की दीवारों, खंभों और सीढ़ियों को देखिए। उन खंभों पर आज भी हमारे मंदिरों की वो शानदार नक्काशी, वो घंटियां, कलश और यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियां साफ नज़र आती हैं।
इन जिहादियों ने इतनी जल्दी और हड़बड़ी में ये मस्जिद बनाई थी की इन्हें मूर्तियों को पूरी तरह से मिटाने का वक्त ही नहीं मिला। इन्होंने बस मूर्तियों के चेहरे हथौड़े से तोड़ दिए और उन खंभों को उल्टा-सीधा खड़ा कर दिया।
लेकिन सबसे ज्यादा खून तो तब खौलता है जब आप वहां की सीढ़ियों को देखते हैं। इन गद्दार जिहादियों ने जानबूझकर हमारे प्रथम पूज्य भगवान गणेश और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को उन सीढ़ियों में ‘उल्टा’ चुनवा दिया था। ज़रा सोचिए इस क्रूर मानसिकता को!
इनका मकसद था की जब भी ये शांति दूत नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद के अंदर जाएं, तो उनके गंदे जूते साक्षात हमारे भगवानों के चेहरों पर पड़ें। हमारे आराध्य देव 800 सालों से वहां उन जेहादियों के जूतों की ठोकरें खा रहे हैं और ये मानवाधिकार का रोना रोने वाले लिबरल हमें ‘भाईचारे’ का ज्ञान बांटते हैं।
कुतुब मीनार के जिहादी झूठ को चीरता हमारा सनातन लौह स्तंभ, कैसे दफनाया गया इस विष्णु ध्वज का इतिहास
कुतुब मीनार के प्रांगण में एक और ऐसी चीज़ खड़ी है जो इन वामपंथी इतिहासकारों और मुगलों के गुलामों के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा है। वो है- प्राचीन लौह स्तंभ (Iron Pillar)! मस्जिद के ठीक सामने खड़ा वो 1500 साल पुराना लोहे का खंभा, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा है।
आज की मॉडर्न साइंस और दुनिया भर के गोरे वैज्ञानिक भी अपना माथा पीट कर रह गए की आखिर चौथी सदी में हिंदुओं के पास वो कौन सी तकनीक थी जिसने ऐसा लोहा बना दिया जो बारिश, धूप और सदियों के थपेड़े सहकर भी एकदम सीना ताने खड़ा है।
लेकिन हमारे लिए वो सिर्फ एक लोहे का खंभा नहीं है। वो इस बात का साक्षात और सबसे बड़ा प्रमाण है की वो पूरी जगह असल में भगवान विष्णु का मंदिर थी। उस स्तंभ के ऊपर संस्कृत और प्राचीन ब्राह्मी लिपि में कुछ श्लोक खुदे हुए हैं।
जब आप उन श्लोकों को पढ़ेंगे, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। उसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा है की इसे सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने ‘विष्णुपद गिरी’ (यानी भगवान विष्णु की पहाड़ी) पर भगवान विष्णु के सम्मान में एक ‘विष्णु ध्वज’ के रूप में स्थापित किया था।
मतलब, जो जगह 1500 साल पहले विष्णुपद गिरी थी, जहाँ हमारे भगवान विष्णु का ध्वज लहराता था, जहाँ हमारे 27 भव्य मंदिर थे और वेधशालाएं थीं, वहां बाद में एक विदेशी लुटेरा आता है, खून की नदियां बहाता है और उस जगह का नाम ‘कुतुब मीनार’ रख दिया जाता है!
और इस पूरे खेल में सबसे बड़े गद्दार कौन हैं? वो वामपंथी इतिहासकार जिन्होंने हमें ये रटाया की “कुतुब मीनार इल्तुतमिश ने पूरी करवाई थी।” अरे बेशर्मों! इल्तुतमिश ने सिर्फ हमारे तोड़े गए मंदिरों के मलबे को एक के ऊपर एक रखा था। उसने कोई नई चीज़ नहीं बनाई थी।
साकेत कोर्ट में गूंजी सनातन की दहाड़, हिन्दू पक्ष के वकीलों ने कैसे खोल दिया इस जिहादी इमारत का पूरा कच्चा चिट्ठा
आज का हिंदू अब वो 1990 वाला डरा हुआ हिंदू नहीं है जो कोर्ट-कचहरी और मुल्लों की धमकियों से पीछे हट जाए। जब ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि की लड़ाई पूरे ज़ोरों पर थी, उसी वक्त दिल्ली के साकेत कोर्ट में एक ऐसी ऐतिहासिक याचिका दाखिल की गई जिसने पूरे सेक्युलर इकोसिस्टम में भयंकर भूकंप ला दिया।
सनातन के सच्चे योद्धा एडवोकेट हरि शंकर जैन जी और रंजना अग्निहोत्री जी ने सीधे तौर पर भगवान ऋषभदेव और भगवान विष्णु जी की तरफ से ये मुकदमा ठोक दिया।
वकीलों ने साकेत कोर्ट में डंके की चोट पर वो सारे सबूत रखे। उन्होंने एएसआई (ASI) का वो बोर्ड दिखाया जहाँ 27 मंदिरों के तोड़े जाने की बात लिखी है। उन्होंने वो सीढ़ियां दिखाईं जहाँ भगवान गणेश को उल्टा रखा गया है।
उन्होंने साफ शब्दों में कोर्ट से कहा की “जनाब, अगर किसी विदेशी आक्रांता ने हमारे भगवान का मंदिर तोड़कर वहां कोई ढांचा बना दिया हो, तो क्या इससे उस ज़मीन की और उस मूर्ति की दिव्यता खत्म हो जाती है? हमारे भगवान 800 सालों से वहां विराजमान हैं। प्राण-प्रतिष्ठा एक बार हो गई तो वो जगह हमेशा के लिए भगवान की ही रहती है।”
जैसे ही ये दलीलें कोर्ट में गूंजीं, ओवैसी से लेकर तमाम सेक्युलर पत्रकार छाती पीटने लगे की “अब कुतुब मीनार पर भी दावा कर दिया, इस्लाम खतरे में है, ये लोग तो पूरी दिल्ली मांग लेंगे!”
ये इनका डर है भाई! ये डर इस बात का है की ज्ञानवापी और भोजशाला के बाद अब इनका ये ‘कुतुब मीनार’ वाला जिहादी किला भी ढहने वाला है। इन्हें पता चल गया है की हिंदू अब जाग चुका है और वो अब अपने एक-एक तोड़े गए मंदिर का पाई-पाई का हिसाब लेगा।
अब देश के बच्चों को कुतुब मीनार नहीं बल्कि विष्णु स्तंभ पढ़ाया जाए
अब वक्त आ गया है की हम उस मानसिक गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ें जो हमें स्कूल की किताबों से पहनाई गई हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक था कौन? वो कोई महान सम्राट नहीं था, वो मोहम्मद गौरी का एक खरीदा हुआ गुलाम था।
वो एक ऐसा खूंखार दरिंदा था जिसने भारत की ज़मीन पर लाखों हिंदुओं का खून बहाया, हमारी औरतों को गुलाम बनाकर बाज़ारों में बेचा और हमारे ज्ञान के केंद्रों को जलाकर राख कर दिया।
और हमारे देश का ये वामपंथी इकोसिस्टम देखिए! इन्होंने दिल्ली के दिल में खड़ी एक इमारत का नाम उसी जल्लाद ऐबक के नाम पर ‘कुतुब मीनार’ रख दिया। ये लोग हमसे उम्मीद करते हैं की हम अपने ही पूर्वजों के कातिल के नाम पर बनी मीनार को देखकर गर्व महसूस करें?
अब देश की सरकार को, NCERT को और एएसआई ASI को एक बहुत ही कड़ा फैसला लेना होगा। कुतुब मीनार के बाहर लगे वो सारे बोर्ड उखाड़ कर फेंक देने चाहिए जिनमें ऐबक की शान में कसीदे पढ़े गए हैं।
वहां एक नया और भव्य बोर्ड लगना चाहिए जिस पर डंके की चोट पर लिखा हो- “यह प्राचीन विष्णु स्तंभ और सूर्य वेधशाला है, जिसे विदेशी इस्लामी लुटेरों ने 27 हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़कर हड़पने की कोशिश की थी।”
अगर बच्चा स्कूल में पढ़ेगा की ये ‘कुतुब मीनार’ है, तो वो हमेशा मानसिक रूप से मुगलों और सुल्तानों का गुलाम रहेगा। लेकिन जिस दिन वो इसे ‘विष्णु स्तंभ’ पुकारना शुरू करेगा, उसी दिन उसके अंदर वो सनातनी आग और स्वाभिमान ज़िंदा हो जाएगा।
हर हर महादेव! जय श्री राम!
