कौड़ियों के भाव बिकी आम आदमी की जान, कार से कुचलने वालों को आसानी से मिलती बेल, खून के आंसू रोते मां-बाप को इंसाफ कब

कभी-कभी लगता है की इस देश में एक आम, शरीफ और टैक्स भरने वाले मिडिल क्लास आदमी की औकात सड़क पर रेंगने वाले किसी कीड़े-मकोड़े से ज़्यादा कुछ भी नहीं है।

ज़रा सोचिए एक आम आदमी की ज़िंदगी क्या है? वो सुबह 7 बजे उठता है, धक्के खाकर ऑफिस पहुंचता है। महीने की पगार आते ही सरकार उसका टैक्स काट लेती है।

वो बेचारा अपनी आधी ज़िंदगी घर और गाड़ी की ईएमआई (EMI) भरने में निकाल देता है। सड़क पर चलता है तो हेलमेट ना पहनने या रेड लाइट जंप करने पर पुलिस उसका चालान काट देती है और वो चुपचाप फाइन भर देता है।

लेकिन फिर एक काली रात आती है। वो आम आदमी अपने ऑफिस से घर लौट रहा होता है। वो अपनी लेन में, एकदम नियम से चल रहा होता है। और तभी पीछे से 200 की स्पीड पर एक करोड़ों की कार आती है, जिसे किसी रईस बाप का नशे में धुत बिगड़ा हुआ नवाब चला रहा होता है।

वो कार उस आम आदमी को कुचल कर निकल जाती है। उसकी लाश सड़क पर खून से लथपथ पड़ी रहती है, और जानते हैं हमारा सड़ा हुआ सिस्टम क्या करता है?

पुलिस आती है, उस अमीरज़ादे को बड़े अदब से ‘सर’ कहकर थाने ले जाती है। थाने में उसे पिज़्ज़ा और बर्गर खिलाए जाते हैं। उसका बाप करोड़ों रुपये फेंककर बड़े-बड़े वकीलों की फौज खड़ी कर देता है और कोर्ट उस हत्यारे को रातों-रात बेल देकर घर भेज देती है।

और उस कुचले गए आम आदमी के घर वाले? वो थाने और कोर्ट की चौखट पर अपना सिर पटक-पटक कर खून के आंसू रोते रहते हैं, लेकिन उनकी चीखें इस बिकाऊ सिस्टम के बहरे कानों तक नहीं पहुंचतीं। 

आज इस देश की सबसे खौफनाक और कड़वी सच्चाई यही है की ‘न्याय’ की देवी की आंखों पर सिर्फ पट्टी नहीं बंधी है, बल्कि उसके कानों और मुंह में करोड़ों के नोट ठूंस दिए गए हैं। ये इंसाफ नहीं है, ये अमीरों का गुलाम बन चुका एक ऐसा सिस्टम है जो रोज़ आम आदमी को खून के आँसू रुला रहा है।

पुणे Porsche कांड, 300 शब्दों का निबंध और ज़मानत मिलने पर नोटों की माला पहनकर नाचते नीच अमीरजादों का गुरूर

अगर किसी को लगता है की मैं सिर्फ जज़्बात में बहकर बोल रहा हूं, तो ज़रा मई 2024 की उस खौफनाक रात को याद कर लीजिए।

पुणे का कल्याणी नगर इलाका! दो बहुत ही होनहार और नौजवान आईटी इंजीनियर- अनीश अवधिया और अश्विनी कोस्टा- अपनी बाइक से घर लौट रहे थे। उन दोनों ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी, मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए रात-दिन मेहनत कर रहे थे।

तभी पीछे से करोड़ों की एक बिना नंबर प्लेट वाली पोर्शे कार तूफानी स्पीड से आती है। उस कार को पुणे के एक बहुत बड़े बिल्डर विशाल अग्रवाल का 17 साल का बिगड़ा हुआ बेटा चला रहा था।

वो लड़का पब में लाखों रुपये की शराब पीकर, नशे में पूरी तरह धुत होकर कार दौड़ा रहा था। उसने अनीश और अश्विनी को इतनी भयानक टक्कर मारी की दोनों की लाशें हवा में उछल कर सड़क पर गिर पड़ीं। दोनों ने मौके पर ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

अब ज़रा इस देश के सिस्टम का वो नंगा नाच देखिए जो इसके बाद शुरू हुआ। उस अमीरज़ादे को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (Juvenile Justice Board) के सामने पेश किया गया।

क्या आप यकीन कर सकते हैं की दो बेगुनाह नौजवानों की हत्या करने वाले उस लड़के को कोर्ट ने क्या सज़ा दी? कोर्ट ने उसे मात्र 15 घंटे के अंदर ज़मानत दे दी और सज़ा के नाम पर कहा की “जाओ बेटा, सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का एक निबंध (Essay) लिखकर ले आना!”

अरे लानत है ऐसे न्याय पर! 300 शब्दों का निबंध? क्या उन दो होनहार युवाओं की जान की कीमत सिर्फ 300 शब्द थी? क्या एक गरीब या मिडिल क्लास मां-बाप के बुढ़ापे के सहारे को कुचलने की सज़ा सिर्फ एक निबंध है?

अगर उस पोर्शे कार की जगह कोई गरीब ऑटो वाला या ठेले वाला होता, तो क्या उसे निबंध लिखने को मिलता? अरे पुलिस अब तक उसकी हड्डियां तोड़ चुकी होती और उसे किसी फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया होता!

और हद तो तब हो गई जब अभी हाल ही में इस अमीर परिवार का एक वीडियो वायरल हुआ। जब सबूत मिटाने और पुलिस को रिश्वत देने के आरोप में जेल गया इस लड़के का बाप (विशाल अग्रवाल) सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत पाकर बाहर आया, तो इन लोगों ने जो किया वो देखकर हर देशवासी का खून खौल गया।

वीडियो में ये पूरा परिवार गले में नोटों और फूलों की मोटी-मोटी मालाएं पहनकर ‘मुंबई से आया मेरा दोस्त’ गाने पर बेशर्मों की तरह नाच रहा था!

जिस बाप के बेटे के हाथों पर दो बेगुनाहों का खून लगा हो, जिसने उन दो परिवारों के घर के चिराग बुझा दिए हों, उस परिवार को समाज में ऐसे नोटों की माला पहनकर सिर उठाकर चलने की हिम्मत कैसे मिल रही है? 

ये जश्न नहीं ये उन रोते हुए मां-बाप के आंसुओं का मज़ाक है। ये उस परिवार का वो खौफनाक अहंकार है जो चीख-चीख कर कह रहा है की “हम अमीर हैं, हम तुम्हारी लाशों पर नाचेंगे और तुम्हारा ये बिकाऊ सिस्टम हमारा कुछ नहीं उखाड़ सकता।”

खून के सैंपल बदलना और गरीबों को फंसाना, सबूत मिटाने वाला वो भ्रष्ट सिस्टम जो सिर्फ अमीरों की दलाली करता है

अब ज़रा इस सड़े हुए सिस्टम की उस नीचता और बेशर्मी को समझिए, जहाँ एक अमीर आदमी अपने पैसे के गुरूर में ये मान बैठता है की इस देश की पुलिस, डॉक्टर और अदालतें सब उसकी जेब में रखी हुई हैं।

जब वो 17 साल का रईसज़ादा पुणे की सड़कों पर दो लोगों की लाशें बिछाकर थाने पहुंचा, तो उसके बिल्डर बाप विशाल अग्रवाल ने क्या किया? उसने अपनी गलती नहीं मानी, बल्कि उसने तुरंत अपने करोड़ों रुपये इस सिस्टम के मुंह पर मार दिए।

ज़रा ‘ससून अस्पताल’ के उस फ्रॉड को देखिए। जब उस शराबी लड़के का मेडिकल टेस्ट होना था, तो उसके बाप ने अस्पताल के बड़े डॉक्टरों (डॉ. तावड़े और डॉ. हलनोर) को लाखों रुपये की रिश्वत दे दी। उन बिके हुए डॉक्टरों ने इंसानियत की धज्जियां उड़ाते हुए उस लड़के के खून के असली सैंपल डस्टबिन में फेंक दिए। 

और उसकी जगह किसकी खून की जांच हुई? उसकी मां (शिवानी अग्रवाल) के खून की! मतलब, बेटा शराब पीकर लोगों को कुचल रहा है और पुलिस फाइलों में खून उसकी मां का लगाया जा रहा है ताकि रिपोर्ट में शराब की बूंद भी ना आए। क्या कोई आम आदमी सरकारी अस्पताल में जाकर ऐसा फर्जीवाड़ा करने की सोच भी सकता है?

अरे भाई, ये भ्रष्ट सिस्टम सिर्फ अमीरों की दलाली के लिए ज़िंदा है! जब पुलिस और डॉक्टरों का ये नेक्सस पकड़ा गया, तो इनका एक और खौफनाक खेल सामने आया। इस रईस परिवार ने अपने ही एक गरीब ड्राइवर को बलि का बकरा बनाने की साज़िश रची थी। 

घटना के तुरंत बाद इन लोगों ने अपने ड्राइवर को बंधक बना लिया। उसे डराया, धमकाया और लालच दिया की “तू पुलिस के सामने जाकर कह दे कि गाड़ी मैं चला रहा था। हम तुझे पैसे देंगे और तेरे परिवार को पाल लेंगे।”

ज़रा सोचिए इस मानसिकता को! ये पैसे वाले लोग क्या समझते हैं? इन्हें लगता है की ये गरीब लोग, ये ड्राइवर, नौकर और आम आदमी सिर्फ इसलिए पैदा हुए हैं ताकि ये अमीरों के पापों की सज़ा भुगत सकें। 

ये अपनी करोड़ों की गाड़ियों से लोगों को कुचलेंगे, और जेल कोई ऐसा गरीब जाएगा जिसके घर में दो वक्त की रोटी भी नहीं बनती। ये एक ऐसा खौफनाक और बिकाऊ सिस्टम है जहाँ अगर तुम्हारे पास पैसा है, तो तुम किसी की भी जान खरीद सकते हो, और अगर तुम गरीब हो, तो तुम सिर्फ कुचले जाने के लिए बने हो। 

जो पुलिस एक आम आदमी को हेलमेट ना पहनने पर बीच सड़क पर लाठियों से मारती है, वही पुलिस इन रईसज़ादों को थाने में पिज़्ज़ा सर्व करती है। इस व्यवस्था पर थूकने का मन करता है!

मुंबई की सड़कों पर लग्ज़री कारों का आतंक, मरीन ड्राइव पर पुलिस को कुचलने वाले रईसज़ादे और हमारा लाचार सिस्टम

अगर आपको लग रहा है की अमीरों की गाड़ियों का ये खूनी खेल अब रुक गया है, तो ज़रा इसी महीने यानी मई 2026 के ताज़ा और खौफनाक आंकड़े उठाकर देख लीजिए।

इन रईसजादों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं की अब ये सिर्फ फुटपाथ पर चलने वाले गरीबों को नहीं, बल्कि उस पुलिस को भी कुचल रहे हैं जो हमारी और आपकी सुरक्षा के लिए सड़क पर खड़ी होती है।

अभी 25 मई 2026 को मायानगरी मुंबई के वीआईपी इलाके मरीन ड्राइव पर जो नंगा नाच हुआ, उसने इस देश की कानून व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा मारा है। सुबह-सुबह पुलिस वाले नाकाबंदी करके अपनी ड्यूटी कर रहे थे।

तभी एक 29 साल का अमीरज़ादा अपनी करोड़ों की Mercedes कार को तूफानी स्पीड में दौड़ाता हुआ आता है और सीधे पुलिस के बैरिकेड को रौंद देता है। उस खौफनाक टक्कर में ड्यूटी पर तैनात दो पुलिस कॉन्स्टेबल बुरी तरह कुचले गए और खून से लथपथ होकर सड़क पर गिर पड़े।

ज़रा सोचिए भाई! जिस देश में एक रईस बाप की बिगड़ी हुई औलाद पुलिस की वर्दी को अपनी मर्सिडीज के नीचे कुचलने से नहीं डरती, उस देश में एक आम, साइकिल या स्कूटी पर चलने वाले करदाता की क्या औकात है? ये लोग पुलिस को भी सड़क का कीड़ा समझते हैं, क्योंकि इन्हें पता है की बाप का पैसा, रसूख और नामी वकील इन्हें चंद घंटों में वीआईपी बेल दिलवा ही देंगे।

और इसी मई महीने की शुरुआत में मुंबई के ही पवई (Powai) इलाके का वो वीभत्स हिट-एंड-रन कांड याद कर लीजिए। एक 19 साल का लड़का, जिसके हाथ में अभी ठीक से ड्राइविंग का तजुर्बा भी नहीं आया होगा, वो अपनी कार से फुटपाथ और सड़क किनारे चल रहे चार-चार बेगुनाह राहगीरों को एक झटके में कुचल देता है। 

वो लोग सड़क पर तड़पते रहते हैं, उनके हाथ-पैर टूट जाते हैं, लेकिन वो लड़का गाड़ी रोकने या उन घायलों को अस्पताल ले जाने के बजाय वहां से बेशर्मों की तरह भाग जाता है।

राजधानी दिल्ली के रिंग रोड का ताज़ा हाल देख लीजिए, जहाँ 29 मई 2026 को ही एक आम आदमी की लाश सड़क पर पड़ी मिली और उसे कुचलने वाली गाड़ी को थोड़ी दूर ले जा कर उसे चलने वाला अमीरजादा मौका देख कर गाड़ी छोड़कर भाग गया। ये कोई इत्तेफाक नहीं है भाई! ये एक बिकाऊ व्यवस्था का सिंडिकेट है जहाँ पैसा कानून को अपना कुत्ता बनाकर चला रहा है। 

आज सड़क पर निकलने वाला हर आम आदमी अपनी जान हथेली पर लेकर चल रहा है, क्योंकि उसे पता है की अगर सामने से किसी अमीरज़ादे की ऑडी या मर्सिडीज आ गई, तो उसकी ज़िन्दगी और न्याय भगवान भरोसे चले जायेगा।

वर्ली BMW कांड, डेढ़ किलोमीटर तक बोनट पर घिसटती औरत और रसूखदारों को रातों रात मिलने वाली VIP बेल

जब पुणे का Porsche वाला कांड हुआ था, तब ही रईसजादों के अहंकार ने मुंबई की सड़कों पर एक और गरीब परिवार को अपनी करोड़ों की गाड़ी के पहियों तले कुचल कर रख दिया। मायानगरी मुंबई का वर्ली इलाका। एक बहुत ही गरीब और सीधा-सादा मछुआरा कपल, प्रदीप नखवा और उनकी पत्नी कावेरी नखवा, सुबह-सुबह स्कूटी से मछलियां खरीदने जा रहे थे।

तभी पीछे से एक BMW कार आती है। इस कार को मिहिर शाह नाम का एक बिगड़ा हुआ नवाब चला रहा था, जो की एक बड़े शिव सेना नेता राजेश शाह का बेटा था। नशे में धुत इस रईसज़ादे ने स्कूटी को इतनी ज़ोरदार टक्कर मारी की प्रदीप तो छिटक कर दूर गिर गए, लेकिन उनकी पत्नी कावेरी नखवा उस कार के बोनट और बंपर के बीच फंस गईं।

इसके बाद जो हुआ, वो रूह कंपा देने वाला था। किसी भी इंसान के अंदर अगर ज़रा सी भी इंसानियत होती, तो वो गाड़ी रोक देता। लेकिन सत्ता और पैसे के नशे में चूर उस मिहिर शाह ने गाड़ी नहीं रोकी।

उसने कावेरी को उसी बोनट पर फंसाए रखा और गाड़ी को डेढ़ किलोमीटर तक पूरी स्पीड में दौड़ाता रहा! वो गरीब औरत सड़क पर घिसटती रही, उसका शरीर छिलता रहा, उसके मांस के चिथड़े सड़क पर उड़ते रहे, लेकिन उस अमीरज़ादे ने ब्रेक नहीं मारा। जब उस औरत की दर्दनाक मौत हो गई, तब जाकर उसने गाड़ी रोकी और वहां से भाग गया।

अब ज़रा पुलिस और कोर्ट का वो दोगलापन देखिए। पुलिस ने दिखावे के लिए गाड़ी ज़ब्त की और उस नेता बाप राजेश शाह को गिरफ्तार किया जिसने अपने बेटे को भगाने में मदद की थी। लेकिन जानते हैं क्या हुआ? अगले ही दिन कोर्ट ने उस रसूखदार बाप को मात्र 15,000 रुपये के मुचलके पर VIP Bail दे दी!

एक औरत को डेढ़ किलोमीटर तक घसीट कर मार डाला गया और मुजरिम का बाप मात्र 15 हज़ार रुपये देकर सीना तानकर बाहर आ गया! ये है इस देश के इंसाफ की असली और खौफनाक तस्वीर।

दिल्ली की सड़कों पर Audi का आतंक, फुटपाथ पर कुचले जाते गरीब और आसानी से छूटते अमीरज़ादे

अगर किसी को लगता है की पुणे और मुंबई के हादसे कोई अपवाद थे, तो ज़रा देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर (NCR) की सड़कों का खौफनाक मंज़र देख लीजिए। यहाँ के रईसज़ादों और अमीरज़ादियों ने तो सड़क को अपने बाप की जागीर समझ लिया है।

ज़रा जुलाई 2025 का वो वसंत विहार (दिल्ली) वाला हिट-एंड-रन कांड याद कीजिए। रात के अंधेरे में फुटपाथ पर वो गरीब मज़दूर सो रहे थे जिनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं थी। तभी उत्सव शेखर नाम का एक रईस अपनी लग्ज़री कार लेकर आता है और फुटपाथ पर सो रहे पांच-पांच गरीब लोगों को बेरहमी से कुचल कर निकल जाता है। 

वो लोग खून से लथपथ पड़े रहते हैं और वो अमीरज़ादा कुछ ही समय बाद बड़ी आसानी से ज़मानत लेकर बाहर आ जाता है!

ज़रा सोचिए, एक गरीब जिसके पास रहने के लिए घर भी नहीं है, जो दिन भर पसीना बहाकर फुटपाथ पर सोता है, उसकी जान की कीमत इस देश के बिकाऊ सिस्टम ने क्या लगा रखी है?

इतना ही नहीं, नोएडा में 64 साल के एक रिटायर्ड कर्मचारी को 100 की स्पीड पर उड़ती ऑडी ने कुचल कर मार डाला, और गाड़ी चलाने वाले नवाबज़ादे आराम से तेज़ आवाज़ में गाने सुनते हुए निकल गए। यही है इस देश का कानून जो अमीरजादों का गुलाम बना हुआ है!

नागपुर मर्सिडीज का कोहराम, न्याय का इंतज़ार करते करते टूटता मां बाप का दम और तारीखों का खेल

ये रईसजादों ने आम आदमी की नाक में दम कर रखा है। ज़रा नागपुर के उस राम झूला कांड को याद कीजिए जो फरवरी 2024 में हुआ था। रितिका मालू नाम की एक बहुत ही अमीर और रसूखदार महिला, जो शराब के नशे में पूरी तरह टल्ली थी, उसने अपनी Mercedes कार से दो नौजवान लड़कों- हुसैन मुस्तफा और आतिफ- को कुचल कर मार डाला था।

हुसैन का परिवार कोई बहुत अमीर परिवार नहीं था। उसके पिता गुलाम मुस्तफा एक आम इंसान थे। जब उनके बेटे की लाश उनके सामने आई, तो उनकी दुनिया खत्म हो गई। लेकिन इंसाफ तो दूर की बात, रितिका मालू को रातों-रात अस्पताल से ही बेल मिल गई! 

पुलिस ने उसके नशे की रिपोर्ट तक छुपाने की कोशिश की। गुलाम मुस्तफा अपने जवान बेटे के लिए न्याय की भीख मांगते हुए महीनों तक पुलिस स्टेशन और कोर्ट की चौखट पर माथा रगड़ते रहे। उन्हें सिर्फ एक चीज़ मिली- ‘तारीख पे तारीख’। रसूखदार महिला आराम से अपने घर में एसी की हवा खा रही थी, और वो बूढ़ा बाप अपने बेटे की फाइल लेकर धक्के खा रहा था।

और फिर मार्च 2026 में एक ऐसी दर्दनाक खबर आई जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। न्याय का इंतज़ार करते-करते, सिस्टम से लड़ते-लड़ते, उस बेबस बाप गुलाम मुस्तफा का दिल टूट गया। उन्हें हार्ट अटैक आया और वो तड़प कर मर गए! बस इतनी ही है इस देश में एक आम आदमी की औकात!

अब सड़कों पर उतरेगा आम आदमी का गुस्सा, इस बिकाऊ सिस्टम को उखाड़ फेंकने और Juvenile Act में बदलाव की हुंकार

अब बहुत हो गया ये कोर्ट-कचहरी और ज़मानत का खेल! आम आदमी की सहनशक्ति अब जवाब दे चुकी है। हम सुबह से शाम तक गधे की तरह मेहनत करते हैं, टैक्स भरते हैं, ताकि सरकार हमें सुरक्षा दे सके।

लेकिन जब वही सरकार और वही कानून हत्यारों के गले में नोटों की माला पड़ने दे और उन्हें खुली सड़क पर नाचने की छूट दे दे, तो फिर आम आदमी के पास सड़क पर उतरकर व्यवस्था को जाम करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

पुणे काण्ड के मृतक अनीश के पिता ने बहुत ही दर्द भरे शब्दों में एक बात कही थी की “इन रईसों के समाज में दो लोगों को मारना और फिर उसका जश्न मनाना बहुत आम बात है।” ये सिर्फ एक बाप का दर्द नहीं है, ये पूरे मिडिल क्लास की वो लाचारी है जो आज ज्वालामुखी बनकर फटने को तैयार है।

अगर आज हमने इस बिकाऊ सिस्टम को नहीं उखाड़ फेंका, तो यकीन मानिए, कल को कोई और नशे में धुत अमीरज़ादा आपके या हमारे बच्चे को कुचल कर चला जाएगा, और कोर्ट उसे भी सड़क सुरक्षा पर एक निबंध लिखने का टास्क देकर छोड़ देगी।

अब हमें भीख नहीं मांगनी है, हमें डंके की चोट पर अपने लिए कानून बदलवाने हैं। हमारी सबसे पहली और सबसे आक्रामक मांग ये होनी चाहिए की इस सड़े हुए ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ (Juvenile Justice Act) में तुरंत बदलाव किए जाएं।

अरे भाई, जब एक 16 या 17 साल का लड़का पब में जाकर लाखों की शराब पी सकता है, वो अपनी अक्ल से 200 की स्पीड पर पोर्शे कार दौड़ा सकता है, वो लड़कियों के साथ अय्याशी कर सकता है… तो फिर जुर्म करने के बाद वो ‘नाबालिग’ कैसे हो गया?

अगर तुम्हारा दिमाग शराब पीने और गाड़ी दौड़ाने के लिए बालिग हो चुका है, तो फिर मर्डर करने के बाद सज़ा भी तुम्हें बालिग वाली ही मिलनी चाहिए। 2012 के निर्भया कांड के बाद जैसे बलात्कार के लिए कानून बदला गया था, वैसे ही अब मर्डर और हिट-एंड-रन (Hit and Run) के लिए भी कानून बदलना ही होगा।

जो भी नाबालिग ऐसे जघन्य अपराध करे, उसे जुवेनाइल होम में पिज़्ज़ा खाने के लिए नहीं, बल्कि सीधे तिहाड़ जेल की चक्की पीसने के लिए भेजा जाना चाहिए। ऐसे हत्यारों को फांसी के तख्ते पर लटकाना चाहिए ताकि किसी भी रईसज़ादे की गाड़ी की स्पीड बढ़ने से पहले उसकी रूह कांप जाए।

जो पुलिस और डॉक्टर ऐसे केस में रिश्वत लेते पकड़े जाएं, उन्हें सिर्फ सस्पेंड मत करो, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर उनकी सारी संपत्ति ज़ब्त कर लो।

हमें ऐसे रईसों के खिलाफ ‘योगी मॉडल’ चाहिए! अगर कोई अमीर अपनी गाड़ी से किसी को कुचलता है, तो सबसे पहले उस अमीर की करोड़ों की कोठी पर सरकारी बुलडोज़र चलना चाहिए। जब उनका वो अहंकार मलबे में तब्दील होगा, तब जाकर उन्हें एक आम आदमी की ज़िंदगी की कीमत समझ में आएगी।

इस पैसे के अहंकार और बिकाऊ सिस्टम को अब जूतों तले कुचलने का वक्त आ गया है। अगर हमने आज बगावत नहीं की, तो ये रईस लोग हमें ऐसे ही कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचलते रहेंगे और ये सिस्टम उनकी दलाली करता रहेगा। अब न्याय भीख में नहीं मिलेगा, अब न्याय सड़क पर लड़कर छीना जाएगा!

जय हिन्द!

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