चौधरी चरण सिंह पुण्यतिथि- नेहरु के सोवियत मॉडल को कुचलने वाले ‘भारत रत्न’, वो महान किसान नेता जिन्होंने ‘ज़मींदारी प्रथा’ का अंत कर किसानों को किया आजाद

आज 29 मई है। आज के ही दिन 1987 में इस देश की मिट्टी ने अपना सबसे सच्चा और सबसे बब्बर शेर खो दिया था। आज हमारे असली किसान मसीहा, धरती पुत्र और भारत रत्न चौधरी चरण सिंह जी की पुण्यतिथि है। 

चौधरी चरण सिंह जी कोई ऐसे राजनेता नहीं थे जो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हों या जिन्हें सत्ता विरासत में मिली हो।

वो एक साधारण किसान परिवार से निकले हुए वो शूरवीर थे, जिन्होंने गांव की उस तपती हुई धूप, उस कीचड़ और उस पसीने को जिया था। वो जानते थे की जब एक किसान का खून पसीना ज़मीन पर गिरता है, तब जाकर इस देश का पेट भरता है। 

लेकिन कांग्रेस के उस चापलूस इकोसिस्टम को ऐसे ज़मीनी नेता कभी रास नहीं आए। इन्हें तो वो सूट-बूट वाले लोग पसंद थे जो अंग्रेज़ी में बात करते हों और विदेशी ताकतों के आगे सिर झुकाते हों। 

आज 29 मई के इस पवित्र दिन पर, जब पूरा देश उस किसान शेर को नमन कर रहा है, तो ये लेख उसी दरबारी फ्रॉड की धज्जियां उड़ाने का एक शंखनाद है। हम आज वो इतिहास बताएंगे जिसे छुपाने के लिए इस कांग्रेस ने अपनी पूरी जान लगा दी थी।

ज़मींदारी प्रथा का विनाश और किसानों की आज़ादी, अंग्रेज़ों के दलालों की छाती पर पैर रखकर चौधरी जी ने दिलाया ज़मीन का हक़

अगर आपको चौधरी चरण सिंह जी के उस प्रखर शौर्य का असली अंदाज़ा लगाना है, तो आपको आज़ादी से पहले और आज़ादी के तुरंत बाद वाले उस काले दौर में जाना होगा।

उस वक्त भारत के गांवों की हालत क्या थी? उस वक्त गांवों पर अंग्रेज़ों के पाले हुए उन क्रूर और बेरहम ज़मींदारों का खौफनाक आतंक चलता था। 

ये ज़मींदार कोई और नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के वो दलाल थे जो गरीब किसानों का खून चूस-चूस कर अपनी तिजोरियां भर रहे थे। एक गरीब किसान दिन-रात अपने खेत में जानवरों की तरह मेहनत करता था, और फसल कटते ही ये ज़मींदार उसके मुंह से निवाला छीन कर ले जाते थे।

अगर कोई किसान आवाज़ उठाता, तो उसे कोड़ों से पीटा जाता था, उसकी ज़मीन छीन ली जाती थी और उसकी बहन-बेटियों की इज़्ज़त सरेआम नीलाम कर दी जाती थी।

जब देश में किसानों की ये दुर्दशा हो रही थी, तब चौधरी साहब ने अपनी राजनीतिक परवाह किए बिना सीधे इन बाहुबली ज़मींदारों की छाती पर पैर रख दिया।

उन्होंने 1939 में ही वो ऐतिहासिक ‘डेट रिडेम्पशन बिल’ (Debt Redemption Bill) बनवाया था, जिसने गरीब किसानों को सूदखोरों और साहूकारों के उस ज़हरीले जाल से आज़ाद कराया जहाँ पीढ़ियां कर्ज़ चुकाते-चुकाते मर जाती थीं।

लेकिन उनका सबसे ज़बरदस्त प्रहार तो 1950 में आया। वो चौधरी चरण सिंह ही थे जिन्होंने रातों-रात जागकर, अपनी पूरी जान लड़ाकर ‘यूपी ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम’ (UP Zamindari Abolition Act) का पूरा का पूरा ड्राफ्ट तैयार किया था।

ज़रा सोचिए उस वक्त के राजनीतिक दबाव को! कांग्रेस के अंदर ही कई बड़े-बड़े नेता बैठे थे जो खुद ज़मींदार थे या ज़मींदारों के टुकड़ों पर पलते थे। वो सब चौधरी साहब के खिलाफ खड़े हो गए। लेकिन वो जाट नेता किसी से डरा नहीं।

उसने डंके की चोट पर वो कानून पास करवाया और रातों-रात लाखों भूमिहीन किसानों, दलितों और पिछड़ों को उसी ज़मीन का मालिक बना दिया जिस ज़मीन पर वो पीढ़ियों से गुलामी कर रहे थे।

ये था असली राष्ट्रवाद! ये थी असली क्रांति! उस एक झटके में चौधरी साहब ने ज़मींदारों के उस अहंकार को हमेशा-हमेशा के लिए मिट्टी में मिला दिया और भारत के किसान को उसकी अपनी ज़मीन पर सीना तानकर खड़े होने का हक़ दिलाया।

नागपुर अधिवेशन की वो हुंकार, जब नेहरु के सोवियत मॉडल और तानाशाही को चौधरी साहब ने जूतों तले कुचल दिया

खैर, चौधरी साहब का असली इम्तिहान तो अभी बाकी था। आज कल जो लोग बात-बात पर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का रोना रोते हैं, ज़रा उन्हें 1959 का वो इतिहास पढ़ाना चाहिए जब इस देश में पंडित जवाहरलाल नेहरू का राज चलता था।

उस वक्त नेहरू जी का ऐसा खौफ और ऐसा दबदबा था की कांग्रेस का बड़े से बड़ा नेता भी उनके सामने अपनी नज़रें नहीं उठा पाता था। जो नेहरू कह दें, वही इस देश का कानून बन जाता था।

बात 1959 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन की है। नेहरू जी के दिमाग पर उस वक्त रूस (सोवियत यूनियन) और कम्युनिस्टों का वो विदेशी मॉडल बुरी तरह हावी था। नेहरू जी चाहते थे की भारत में भी रूस की तरह ‘कोऑपरेटिव फार्मिंग’ लागू कर दी जाए।

आसान भाषा में समझें तो इसका सीधा-सीधा मतलब ये था की किसानों की ज़मीनें उनसे छीन ली जाएंगी, खेत की सारी बाउंड्री तोड़ दी जाएगी और ज़मीन सीधे सरकारी कब्ज़े में चली जाएगी। किसान अपनी ही ज़मीन पर सिर्फ एक सरकारी मज़दूर बनकर रह जाएगा, और जो भी अनाज उगेगा, वो सीधे सरकार के खज़ाने में जाएगा।

ये वही खौफनाक कम्युनिस्ट मॉडल था जिसने रूस और चीन में करोड़ों किसानों को भूखा मार दिया था। जब नागपुर अधिवेशन में नेहरू जी ने इस मॉडल को पेश किया, तो पूरे के पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया।

जो बड़े-बड़े कांग्रेस के नेता खुद को किसानों का नेता कहते थे, वो सब नेहरू के डर से अपनी कुर्सियों पर दुबक कर बैठ गए। किसी की हिम्मत नहीं हुई की वो नेहरू की तानाशाही के खिलाफ एक शब्द भी बोल दे।

तभी उस सन्नाटे को चीरते हुए एक शेर अपनी जगह से उठा। वो कोई और नहीं, चौधरी चरण सिंह थे। वो सीधे मंच पर गए और उन्होंने पंडित नेहरू की आंखों में आंखें डालकर डंके की चोट पर उस खौफनाक कम्युनिस्ट मॉडल की धज्जियां उड़ा दीं।

चौधरी साहब ने भरी सभा में दहाड़ते हुए कहा की “पंडित जी! भारत का किसान रूस का गुलाम नहीं है। एक भारतीय किसान के लिए उसकी ज़मीन सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं है, वो उसकी मां है, वो उसका स्वाभिमान है। अगर तुमने उसकी ज़मीन को सरकारी बनाने की कोशिश की, तो ये देश का किसान बगावत कर देगा और तुम्हारी सरकारें उखड़ जाएंगी। किसान अपनी ज़मीन का मालिक खुद रहेगा, सरकार नहीं!”

ज़रा उस खौफनाक साहस की कल्पना कीजिए! उस वक्त नेहरू के खिलाफ बोलना मतलब अपने राजनीतिक करियर को फांसी पर लटकाना था।

लेकिन चौधरी साहब को कुर्सी की कोई परवाह नहीं थी, उन्हें परवाह थी तो सिर्फ उस गरीब किसान की जिसकी ज़मीन छिनने वाली थी। उनकी उस प्रखर और ज़बरदस्त दलीलों के आगे नेहरू का वो विदेशी सोवियत मॉडल ताश के पत्तों की तरह ढह गया। कांग्रेस को वो प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

अगर उस दिन नागपुर अधिवेशन में चौधरी चरण सिंह नेहरू से ना भिड़ते, अगर वो उस दिन चुप रह जाते, तो यकीन मानिए आज इस देश का किसान अपनी ही ज़मीन पर एक सरकारी गुलाम होता।

कांग्रेस की गद्दारी और किसान शेर की बगावत, कैसे एक परिवार ने चौधरी साहब को बार बार दिया धोका

अब ज़रा इस देश की उस सबसे पुरानी और सबसे गद्दार पार्टी का वो नंगा सच देखिए, जिसने हमेशा किसानों के नाम पर सिर्फ रोटियां सेंकीं। कांग्रेस पार्टी की एक बहुत ही खौफनाक फितरत रही है- ये पार्टी सिर्फ और सिर्फ दरबारियों और चाटुकारों को पसंद करती है।

अगर आप नेहरू-गांधी परिवार के सामने सिर झुकाकर खड़े हैं, उनकी हर गलत बात पर ताली बजा रहे हैं, तो आप इस पार्टी में सबसे महान हैं।

लेकिन जैसे ही कोई ज़मीन से जुड़ा नेता, जिसकी रगों में स्वाभिमान दौड़ रहा हो, इनके अहंकार को चुनौती देता है, तो ये पूरी की पूरी कांग्रेसी मशीनरी उसको बर्बाद करने पर उतारू हो जाती है।

चौधरी चरण सिंह जी के साथ भी कांग्रेस ने बिल्कुल यही किया। वो कोई ऐसे नेता तो थे नहीं जो मैडम के दरबार में जाकर हाजिरी लगाते। वो तो वो बब्बर शेर थे जो सीधा आंखों में आंखें डालकर सच बोलते थे।

जब कांग्रेस को चुनाव जीतने होते थे, जब उन्हें यूपी के किसानों और जाटों के थोक के भाव वोट चाहिए होते थे, तब तो वो चौधरी साहब का खूब इस्तेमाल करते थे। लेकिन जब भी उस किसान शेर को उसका असली हक़ देने की बात आती, तो कांग्रेस का ये दरबारी इकोसिस्टम उन्हें हमेशा पीछे धकेल देता था।

जब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा और चौधरी साहब को समझ आ गया की ये पार्टी किसानों का सिर्फ खून चूसना जानती है, तो उन्होंने सत्ता की मलाई को उसी पल लात मार दी।

उन्होंने कांग्रेस के उस सड़े हुए और चाटुकार सिस्टम से ऐतिहासिक बगावत कर दी और अपनी एक अलग राह चुनते हुए ‘भारतीय क्रांति दल’ की स्थापना की।

ये कोई छोटी-मोटी बगावत नहीं थी भाई! ये उस वक्त की सर्वशक्तिमान कांग्रेस की छाती पर रखा गया वो पत्थर था जिसने यूपी में कांग्रेस की जड़ों को ऐसा हिलाया की वो आज तक वहां खड़ी नहीं हो पाई।

लेकिन कांग्रेस का वो दोगलापन और वो गद्दारी 1979 में अपने चरम पर पहुंच गई। उस वक्त देश में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी और चौधरी चरण सिंह जी देश के प्रधानमंत्री बने थे।

उस वक्त इंदिरा गांधी ने बहुत ही चालाकी और मक्कारी से चौधरी साहब को बाहर से समर्थन देने का वादा किया था। लेकिन इंदिरा गांधी की शर्त क्या थी? वो चाहती थीं की इमरजेंसी के दौरान उन्होंने जो खौफनाक ज़ुल्म किए थे, उनके खिलाफ जो मुकदमे चल रहे थे, चौधरी साहब प्रधानमंत्री की कुर्सी का इस्तेमाल करके उन सारे केसों को खत्म करवा दें।

ज़रा सोचिए इस गंदी ब्लैकमेलिंग को! लेकिन चौधरी चरण सिंह कोई आम राजनेता नहीं थे जो कुर्सी के लिए अपना ज़मीर बेच देते। उन्होंने इंदिरा गांधी की उस गैर-कानूनी और असंवैधानिक मांग को सीधे जूतों तले कुचल दिया।

उन्होंने डंके की चोट पर कह दिया की “मैं एक किसान का बेटा हूं, मैं किसी की ब्लैकमेलिंग के आगे नहीं झुकूंगा और ना ही कानून के साथ कोई खिलवाड़ करूंगा।”

इसका नतीजा क्या हुआ? इंदिरा गांधी ने एक महीने के भीतर ही अपना समर्थन वापस ले लिया और चौधरी साहब की सरकार गिर गई।

चौधरी चरण सिंह जी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ दी, सत्ता को लात मार दी, लेकिन उस परिवार के अहंकार के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। ये थी एक असली धरती पुत्र की वो ईमानदारी जिसे इन वामपंथी गद्दारों ने इतिहास से मिटाने की पूरी कोशिश की।

भारत रत्न से सम्मान और आज की BJP सरकार का वो ऐतिहासिक प्रहार जिसने कांग्रेस को उसकी औकात दिखा दी

दशकों तक इस देश पर कांग्रेस और उनके पाले हुए दरबारी इतिहासकारों ने राज किया। इन्होंने खुद को ही सारे बड़े-बड़े मेडल और अवार्ड बांट लिए। नेहरू जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए खुद को ‘भारत रत्न’ दे दिया, इंदिरा गांधी ने खुद को ‘भारत रत्न’ दे दिया।

लेकिन जो आदमी इस देश के करोड़ों किसानों का मसीहा था, जिसने ज़मींदारी प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंका, जिसने अपना पूरा जीवन गांव की मिट्टी और खलिहानों के नाम कर दिया… उसे इन लोगों ने दशकों तक ‘भारत रत्न’ के लायक नहीं समझा।

क्यों? क्योंकि अगर ये चौधरी चरण सिंह जी को भारत रत्न दे देते, तो देश के आम आदमी को कांग्रेस की सारी काली करतूतों का पता चल जाता।

इन अर्बन नक्सलियों और दरबारियों का वो जो झूठा इकोसिस्टम था, वो पूरी तरह से चकनाचूर हो जाता। इन्होंने तो हमेशा यही कोशिश की कि किसानों का ये शेर सिर्फ इतिहास के किसी अंधकार में खो जाए।

लेकिन जब केंद्र में एक पक्की, राष्ट्रवादी और अपनी मिट्टी से जुड़ी हुई BJP सरकार आई, तो उसने इतिहास के उन सारे पन्नों को वापस पलट दिया जिन्हें दीमक खाने के लिए छोड़ दिया गया था।

फरवरी 2024 का वो ऐतिहासिक दिन कौन भूल सकता है! जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने डंके की चोट पर चौधरी चरण सिंह जी को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का ऐलान किया, तो पूरे देश के किसानों, मज़दूरों और आम नागरिकों की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

वो सिर्फ एक ‘भारत रत्न’ का ऐलान नहीं था भाई! वो उस कांग्रेस के दरबारी इकोसिस्टम के मुंह पर पड़ा हुआ करारा तमाचा था जिसकी गूंज कांग्रेस ऑफिस में आज तक सुनाई दे रही है। 

उस दिन इस देश के करोड़ों किसानों को लगा की हां, आज सही मायनों में उनके मसीहा को वो सम्मान मिला है जिसका वो दशकों से हक़दार था।

इस राष्ट्रवादी सरकार ने उस भूल को सुधार दिया जिसे कांग्रेस जानबूझकर अपने अहंकार के कारण कभी सुधारना नहीं चाहती थी। आज चौधरी चरण सिंह जी का नाम उन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुका है जिसे कोई भी सेक्युलर कीड़ा अब कभी नहीं मिटा सकता।

आज 29 मई के इस ऐतिहासिक दिन पर उस महान किसान शेर को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी की हम उनके उस सपनों के भारत को साकार करें, जहाँ ना कोई ज़मींदार हो, ना कोई विदेशी एजेंट हो और ना ही कोई कोंग्रेसी गद्दार।

जहाँ सिर्फ और सिर्फ भारत माता की जय हो और गांव के हर एक खेत में सनातन का भगवा और खुशहाली की फसल लहराए!

वन्दे मातरम! जय जवान जय किसान!

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