"सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट"- भगवान राम को काल्पनिक बताने वाली गद्दार कांग्रेस का वो खतरनाक प्लान, प्रगति की आड़ में 'राम सेतु' को मलबे में बदलने की थी पूरी तैयारी

“सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट”- भगवान राम को काल्पनिक बताने वाली गद्दार कांग्रेस का वो खतरनाक प्लान, प्रगति की आड़ में ‘राम सेतु’ को मलबे में बदलने की थी पूरी तैयारी

एक सनातनी जब रामेश्वरम के तट पर जाकर उस समंदर को देखता है, तो उसे सिर्फ पानी नज़र नहीं आता.. उसे उस समंद पर पत्थरों की वो लकीर नज़र आती है जिसे हमारे भगवान श्री राम की वानर सेना ने अपने हाथों से बनाया था।

वो राम सेतु सिर्फ पत्थरों का कोई पुल नहीं है.. वो हमारी आस्था का, हमारी रामायण का और हमारे सनातन धर्म के वजूद का वो साक्षात और जीता-जागता प्रमाण है जिसके कण-कण में हमारे प्रभु राम के चरणों की धूल बसी है।

लेकिन ज़रा सोचिए इस देश की उस सड़ी हुई कांग्रेस की नीचता को, जिसने विकास और ‘प्रगति’ का झूठा नकाब पहनकर हमारी इसी सबसे बड़ी आस्था को बारूद से उड़ाने का पूरा मास्टरप्लान तैयार कर लिया था।

साल था 2005! केंद्र में सोनिया गांधी के रिमोट कंट्रोल से चलने वाली यूपीए (UPA) की कांग्रेसी सरकार बैठी थी। इस सरकार ने बड़े ही ढोल-नगाड़ों के साथ एक प्रोजेक्ट का ऐलान किया, जिसका नाम था- ‘सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट’।

टीवी और अखबारों में ज्ञान बांटा जाने लगा की इस प्रोजेक्ट के बनने से भारत और श्रीलंका के बीच पानी के जहाज़ों का रास्ता छोटा हो जाएगा।

हमें बताया गया की जहाज़ों को अब श्रीलंका का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा, हमारा हज़ारों करोड़ का तेल बचेगा और देश का भयंकर ‘आर्थिक विकास’ होगा। सुनने में कितनी मीठी और प्रोग्रेसिव बात लगती है ना? लेकिन इसके पीछे का खौफनाक सच कुछ और ही था।

समुद्र में जहाज़ों का रास्ता बनाने के लिए कई अलग-अलग अलाइनमेंट (नक्शे) मौजूद थे। ऐसे कई रास्ते थे जहाँ से बिना राम सेतु को छुए जहाज़ों के लिए गहरी नहर खोदी जा सकती थी।

लेकिन इस कांग्रेसी सरकार ने जानबूझकर, पूरी मक्कारी के साथ वो ‘अलाइनमेंट नंबर 6’ चुना जो सीधे हमारे पवित्र राम सेतु की छाती को चीरते हुए जाता था।

मतलब साफ था, जहाज़ों का रास्ता तो सिर्फ एक बहाना था, इनका असली और खौफनाक मकसद राम सेतु के उन पवित्र पत्थरों को बड़ी-बड़ी ड्रेजिंग मशीनों से तोड़कर मलबे में तब्दील करना था।

ये लोग रामायण के उस साक्षात सबूत को गहरे पानी में दफना देना चाहते थे ताकि आने वाली पीढ़ियों को ये बताया जा सके की राम तो कभी थे ही नहीं, वो तो सिर्फ एक कहानी का हिस्सा हैं। ये विकास नहीं था, ये सनातन की जड़ों को तोड़ने का बहुत बड़ा षड्यंत्र था!

2007 का वो गद्दार ‘सेतुसमुद्रम’ हलफनामा, जब सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस ने भगवान राम को ही बता दिया काल्पनिक

अगर किसी लिबरल कीड़े को ये लग रहा है की मैं कांग्रेस पर झूठे आरोप लगा रहा हूं, तो ज़रा इतिहास के उस सबसे काले और गद्दार पन्ने को पलटिए जिसने करोड़ों हिंदुओं की आत्मा को छलनी कर दिया था।

जब राम सेतु को तोड़ने का काम शुरू हुआ और बड़ी-बड़ी मशीनें वहां पहुंच गईं, तो पूरे देश में हाहाकार मच गया। रामभक्तों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया की हमारे भगवान की इस धरोहर को टूटने से बचाया जाए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। और इसके बाद सितंबर 2007 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया, उसे पढ़कर आज भी किसी भी सच्चे हिंदू का खून खौल उठता है।

उस सरकारी हलफनामे में बड़ी ही बेशर्मी और ठसक के साथ लिख दिया गया की “वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस में लिखे गए भगवान राम के अस्तित्व का कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण ही मौजूद नहीं है!”

उस हलफनामे में डंके की चोट पर कहा गया की राम सेतु को ना तो किसी भगवान ने बनाया है और ना ही किसी इंसान ने। ये तो सिर्फ समुद्र के अंदर बालू और पत्थरों का एक प्राकृतिक ढांचा है, इसलिए इसे तोड़ने से किसी की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होनी चाहिए।

ज़रा इस भयानक गद्दारी को अपने दिमाग में बैठाने की कोशिश कीजिए! एक ऐसा देश जहाँ की 80 करोड़ से ज़्यादा आबादी सुबह उठकर राम का नाम लेती है, जहाँ कण-कण में राम बसे हैं, जहाँ राम के बिना इस देश के वजूद की कल्पना भी नहीं की जा सकती… उसी देश की सरकार, उसी देश की सबसे बड़ी अदालत में खड़े होकर अपने ही भगवान को ‘काल्पनिक’ और झूठा घोषित कर रही थी।

क्या दुनिया के किसी भी ईसाई या इस्लामिक देश में वहां की सरकार की इतनी हिम्मत हो सकती है की वो अदालत में लिखकर दे दे कि उनके भगवान या उनके पैगंबर कभी पैदा ही नहीं हुए? बिल्कुल नहीं!

लेकिन भारत में ये गद्दारी इसलिए हुई क्योंकि इस हलफनामे का ड्राफ्ट किसी आम आदमी ने नहीं, बल्कि रोमिला थापर और इरफान हबीब जैसे वामपंथी कसाइयों के उस अर्बन नक्सल इकोसिस्टम ने तैयार किया था, जिन्हें हिंदू धर्म से जन्मजात नफरत है।

कांग्रेस ने अपने वामपंथी आकाओं को खुश करने के लिए हमारे आराध्य को महज़ एक कॉमिक बुक का कैरेक्टर बनाकर रख दिया था। ये सनातनियों के गाल पर कांग्रेस का मारा हुआ वो खौफनाक तमाचा था जिसे इतिहास कभी माफ नहीं कर सकता।

DMK का सड़ा हुआ अहंकार और करुणानिधि के वो बयान जिन्होंने करोड़ों रामभक्तों के सीने पर छिड़का नमक

अब ज़रा इस पूरी साज़िश के उस दूसरे और सबसे घिनौने पहलू को देखिए। इस सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट को इतनी ज़िद और अहंकार के साथ आगे बढ़ाने के पीछे सिर्फ कांग्रेस नहीं थी, बल्कि उनकी सबसे बड़ी गठबंधन वाली पार्टी- डीएमके (DMK) का हाथ था।

उस वक्त केंद्र सरकार में शिपिंग मंत्री टी.आर. बालू थे, जो डीएमके के कद्दावर नेता थे। बालू ने कसम खा रखी थी की चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे पूरे देश का हिंदू रोता रहे, वो राम सेतु को तोड़कर ही दम लेंगे।

जब कांग्रेस के उस हलफनामे का पूरे देश में भयंकर विरोध हुआ और हिंदू समाज सड़कों पर उतरकर अपना गुस्सा दिखाने लगा, तो डीएमके के मुखिया और तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का जो बयान आया, उसने तो क्रूरता और अहंकार की सारी हदें ही पार कर दीं।

करुणानिधि ने मंच से माइक पकड़कर बड़ी ठसक से कहा था- “कौन राम? ये राम कौन है? क्या राम कोई इंजीनियर था? उसने कौन से इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी जो उसने समंदर के बीच में पुल बना दिया? राम सेतु तो सिर्फ एक अंधविश्वास है।”

अरे भाई! ज़रा इस सड़े हुए अहंकार को देखिए। एक मुख्यमंत्री, जो संविधान की शपथ लेकर कुर्सी पर बैठा है, वो करोड़ों हिंदुओं के भगवान का सरेआम मज़ाक उड़ा रहा है। वो हमारी आस्था पर थूक रहा है और सत्ता के नशे में चूर होकर हमारे आराध्य की इंजीनियरिंग की डिग्री मांग रहा है।

और सबसे दर्दनाक बात क्या थी? जब करुणानिधि हमारे राम को गालियां दे रहा था, तब ये पूरा का पूरा सेक्युलर इकोसिस्टम, ये वामपंथी मीडिया और लुटियंस दिल्ली के पत्रकार तालियां पीट रहे थे।

वो इसे ‘रेशनलिज्म’ (तर्कवाद) और फ्रीडम ऑफ स्पीच बता रहे थे। ज़रा इन सेक्युलर गिद्धों के दोगलेपन को देखिए। अगर किसी दूसरे मज़हब के पैगंबर या उनके किसी धार्मिक ढांचे पर कोई एक सवाल भी उठा देता है, तो ये लोग पूरे देश में आग लगा देते हैं।

“गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सज़ा” के नारे लगने लगते हैं और गला काटने के फतवे जारी हो जाते हैं।

लेकिन जब हिंदुओं के आराध्य श्री राम का मज़ाक उड़ाया गया, तो कोई फतवा नहीं निकला, किसी मानवाधिकार वाले ने विरोध नहीं किया। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार चुपचाप तमाशा देखती रही क्योंकि उन्हें अपनी कुर्सी बचाने के लिए डीएमके के सांसदों की ज़रूरत थी।

इन गद्दारों ने अपनी सत्ता के लालच में हमारे राम के सम्मान का सरेआम सौदा कर दिया था। ये वो घाव है जो आज भी हर रामभक्त के सीने में सुलग रहा है।

रामभक्तों का खौफनाक जनसैलाब जिसने कांग्रेस को ‘सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट’ वापस लेने और घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया

लेकिन ये वामपंथी और कांग्रेसी गद्दार शायद एक बात भूल गए थे। ये भारत है! यहाँ हिंदू बहुत सहिष्णु है, वो बहुत कुछ बर्दाश्त कर लेता है, लेकिन जब बात उसके भगवान राम के अस्तित्व पर आ जाए, तो वो सहिष्णु हिंदू उसी पल परशुराम बनने में देर नहीं लगाता।

जैसे ही राम को काल्पनिक बताने वाले उस हलफनामे और राम सेतु को तोड़ने की साज़िश की खबर आम हिंदुओं तक पहुंची, पूरे देश में एक ऐसा खौफनाक जनसैलाब उमड़ पड़ा जिसकी कल्पना इस घमंडी सरकार ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

ये कोई राजनीतिक रैली नहीं थी, ये करोड़ों सनातनियों के टूटे हुए सब्र का वो ज्वालामुखी था जो अब फटने लगा था।

विश्व हिंदू परिषद (VHP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और देश भर के लाखों साधु-संत अपने मठों और आश्रमों को छोड़कर सड़कों पर उतर आए। रामेश्वरम से लेकर दिल्ली तक “राम सेतु बचाओ” आंदोलन की वो प्रचंड आंधी चली जिसने दिल्ली के तख्त की चूलें हिला कर रख दीं।

हाईवे जाम हो गए, ट्रेनों के चक्के रुक गए। रामभक्तों ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “अगर राम सेतु के एक भी पत्थर पर खरोंच आई, तो इस देश में वो तांडव होगा की ये सरकारें कहीं छुपने की जगह नहीं ढूंढ पाएंगी।”

जब ये उबलता हुआ जनसैलाब सड़कों पर दिखा, तो उस कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी की पैंट गीली हो गई। उन्हें अचानक समझ आ गया की उन्होंने किस शेर की पूंछ पर पैर रख दिया है।

इन कांग्रेसी नेताओं को अपना पूरा का पूरा हिंदू वोटबैंक हाथ से खिसकता हुआ दिखने लगा। जो नेता कल तक राम को काल्पनिक बताकर ठहाके मार रहे थे, उनके चेहरों पर खौफ की लकीरें साफ दिखने लगीं।

अंततः, रामभक्तों की उस हुंकार के आगे इस गद्दार सरकार को घुटने टेकने ही पड़े। 14 सितंबर 2007 को, भारी दबाव और डर के साये में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपना वो हिंदू-विरोधी हलफनामा चुपचाप वापस ले लिया।

डैमेज कंट्रोल का एक बहुत ही भद्दा और झूठा नाटक रचा गया। सरकार के मंत्रियों ने आकर टीवी पर सफाई दी की “अरे, हमसे तो गलती हो गई थी, हमारी भावना किसी को ठेस पहुंचाने की नहीं थी।”

लेकिन तीर कमान से निकल चुका था भाई! हलफनामा वापस लेने से वो पाप नहीं धुल सकता था जो कांग्रेस कर चुकी थी। उस एक घटना ने पूरे देश के सामने कांग्रेस और इस वामपंथी इकोसिस्टम का वो नंगा और घिनौना चेहरा पेश कर दिया था, जिसने ये साबित कर दिया की सनातन धर्म को मिटाने के लिए ये गद्दार किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

राम सेतु तो बच गया, लेकिन रामभक्तों के सीने में जो आग लगी थी, वो आज तक बुझी नहीं है।

राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की कानूनी लड़ाई और आज तक जारी सरकार का टालमटोल

कांग्रेस का वो गद्दार हलफनामा तो 2007 में रामभक्तों की हुंकार के आगे वापस ले लिया गया था, लेकिन राम सेतु को बचाने की वो कानूनी लड़ाई आज तक कोर्ट की फाइलों में तारीख-पे-तारीख का दर्द झेल रही है।

डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे चुनिंदा राष्ट्रवादी योद्धा सालों से सुप्रीम कोर्ट में अकेले दम पर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं। उनकी मांग बहुत ही साफ और सीधी है की राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ (National Heritage Monument) घोषित किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी सेक्युलर या वामपंथी सरकार उस पर हथौड़ा चलाने की हिम्मत ना कर सके।

लेकिन भाई, इस देश की न्याय व्यवस्था और बाबूगिरी का वो सड़ा हुआ सिस्टम देखिए जो आज, जून 2026 में भी हिंदुओं की आस्था के साथ भद्दा मज़ाक कर रहा है।

2023 में केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ी-बड़ी बातें करते हुए कहा था की “राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है, सरकार इस पर विचार कर रही है।” हिंदू समाज को लगा की चलो, अब शायद हमारे आराध्य की निशानी को उसका असली सम्मान मिल जाएगा।

फिर अगस्त 2025 आया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी किया की भैया, इस मामले में कुछ फैसला लिया भी है या सिर्फ कागज़ों का पेट भर रहे हो? और अब, मार्च 2026 में जो एक आरटीआई (RTI) का खुलासा सामने आया है, उसने तो पूरे हिंदू समाज के सीने में आग लगा दी है।

आरटीआई की रिपोर्ट में ये सच सामने आया की ASI के रिकॉर्ड रूम में आज भी राम सेतु को ‘संरक्षित स्मारक’ घोषित करने का कोई ठोस प्रस्ताव मौजूद ही नहीं है!

लानत है ऐसे सिस्टम पर! जो ASI पुराने से पुराने टूटे हुए खंडहरों को ‘संरक्षित’ घोषित करने के लिए रातों-रात फाइलें पास कर देती है, उसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक बनाने में पसीने क्यों छूट रहे हैं?

आखिर वो कौन से अदृश्य बाबू हैं जो आज भी सिस्टम के अंदर बैठकर राम सेतु की फाइलों पर कुंडली मारे बैठे हैं?

अब इस मामले की सुनवाई जुलाई 2026 के लिए टल चुकी है। लेकिन सवाल ये है की हम हिंदू आखिर कब तक कोर्ट की चौखट पर अपनी ही आस्था के लिए भीख मांगते रहेंगे?

जब अयोध्या में हमारे रामलला 500 सालों के संघर्ष के बाद अपने भव्य महल में विराजमान हो चुके हैं, तो फिर राम सेतु को एक ‘राष्ट्रीय स्मारक’ का कागज़ देने में इतनी आनाकानी क्यों? ये टालमटोल अब करोड़ों रामभक्तों के सब्र का इम्तिहान ले रहा है।

अब केंद्र में बैठी मोदी सरकार को ये बात बिल्कुल डंके की चोट पर समझनी होगी की हम अब और RTI और सुप्रीम कोर्ट की तारीखों का इंतज़ार नहीं कर सकते। सरकार को तुरंत, बिना किसी देरी के, संसद में बिल लाकर या सीधे ‘एग्जीक्यूटिव ऑर्डर’ पास करके राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ घोषित करना ही होगा!

जय श्री राम!

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