कल तक पंचर बनाने वाले आज कैसे खरीद रहे करोड़ों की दुकानें, चांदनी चौक से लेकर सूरत तक हिन्दुओं के व्यापार को निगलने वाला खौफनाक 'व्यापार जिहाद'

कल तक पंचर बनाने वाले आज कैसे खरीद रहे करोड़ों की दुकानें, चांदनी चौक से लेकर सूरत तक हिन्दुओं के व्यापार को निगलने वाला खौफनाक ‘व्यापार जिहाद’

आज तक हम और आप सिर्फ लव जिहाद, लैंड जिहाद और कश्मीर-बंगाल में होने वाले खून-खराबे पर ही चर्चा करते आए हैं। हमें लगता था की ये जिहादी सिर्फ हमारी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं या हमारी बहन-बेटियों को फंसा रहे हैं।

लेकिन सच कहूं तो हमारी आंखों के ठीक सामने, हमारे अपने ही पुश्तैनी बाज़ारों में एक ऐसा मायाजाल फैल रहा है, जिसकी हमें भनक ही नहीं है। इस खौफनाक साज़िश का नाम है- ‘व्यापार जिहाद’।

ज़रा एक मिनट के लिए रुककर अपने आस-पास के बाज़ारों का हाल देखिए। एक आम हिंदू व्यापारी, जो सालों से अपनी पुश्तैनी दुकान चला रहा है, अगर उसे अपना बिज़नेस बढ़ाने के लिए 5 या 10 लाख रुपये का लोन चाहिए होता है, तो उसके बैंक के चक्कर काटते-काटते जूते घिस जाते हैं।

बैंक वाले उससे पच्चीसों गारंटी मांगते हैं। लेकिन उसी बाज़ार में, सड़क के उस पार बैठा एक आदमी जो कल तक साइकिलों के पंचर बनाता था, या कबाड़ बीनता था, वो अचानक से रातों-रात 10 से 15 करोड़ रुपये कैश देकर मेन मार्केट की सबसे बड़ी दुकान खरीद लेता है!

आखिर ये चमत्कार हो कैसे रहा है? क्या वो पंचर बनाने वाला रातों-रात अंबानी बन गया? बिल्कुल नहीं! ये कोई नॉर्मल बिज़नेस ग्रोथ या व्यापारिक तरक्की नहीं है।

ये ‘इकोनॉमिक जिहाद’ का वो खौफनाक मॉडल है, जहाँ भारत की अर्थव्यवस्था और हमारे पुराने बाज़ारों पर कब्ज़ा करके हिंदुओं को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने की साज़िश रची जा रही है।

इन जिहादियों को बहुत अच्छे से पता है की अगर किसी कौम की रीढ़ की हड्डी तोड़नी है, तो सबसे पहले उसका व्यापार छीन लो। जब हिंदू के पास पैसा ही नहीं बचेगा, तो वो ना तो मंदिर बना पाएगा, ना अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाएगा और ना ही धर्म की रक्षा के लिए लड़ पाएगा।

ये जिहादी इकोसिस्टम हमारे हकों को, हमारे बाज़ारों को और हमारी इकॉनमी को एक अजगर की तरह निगल रहा है।

अगर आज भी हिंदू व्यापारी अपनी सेक्युलर नींद से नहीं जागा तो कल हमारे अपने ही पुश्तैनी बाज़ारों में हमें दिहाड़ी मज़दूर बनकर इन जिहादियों की दुकानों पर झाड़ू-पोछा लगाना पड़ेगा और हमारे हाथ में सिर्फ पछतावा रह जाएगा।

चांदनी चौक से लेकर सूरत के कपड़ा बाज़ार तक हमारे पुश्तैनी बाज़ारों पर कैसे हो रहा है खौफनाक जिहादी कब्ज़ा

अगर किसी को लग रहा है की मैं ये सब हवा-हवाई बातें कर रहा हूँ, तो ज़रा देश के सबसे ऐतिहासिक और बड़े बाज़ारों का ज़मीनी दौरा कर लीजिए।

देश की राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक का वो ऐतिहासिक बाज़ार याद है आपको? एक दौर था जब चांदनी चौक, चावड़ी बाज़ार और भगीरथ पैलेस के कोने-कोने में हमारे हिंदू लालाओं, मारवाड़ियों और सेठों का डंका बजता था। वहां राम-राम और जय सियाराम से बोहनी होती थी। लेकिन आज वहां जाकर देखिए!

आज चांदनी चौक की 70 प्रतिशत से ज़्यादा बड़ी-बड़ी दुकानों और कपड़ों के शोरूम्स पर उन बड़े-बड़े दाढ़ी वाले जिहादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है।

जो हिंदू व्यापारी पीढ़ियों से वहां बैठे थे, उन्हें मुंहमांगी कीमत का लालच देकर बाज़ार से खदेड़ दिया गया है। वहां की पूरी की पूरी डेमोग्राफी ही पलट गई है। अब वहां गलियों में नमाज़ियों की भीड़ लगती है और हिंदू ग्राहक को वहां से गुज़रने में घुटन और डर महसूस होता है।

और बात सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है भाई। ज़रा गुजरात के सूरत और अहमदाबाद की तरफ नज़र घुमाइए। सूरत, जिसे भारत का ‘टेक्सटाइल हब’ कहा जाता है, जहाँ के कपड़ा बाज़ार पर सदियों से गुजरातियों और राजस्थानियों का खून-पसीना लगा था, आज वहां का नंगा सच क्या है?

वहां साड़ी और टेक्सटाइल के बड़े-बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और होलसेल मार्केट में इस जिहादी इकोसिस्टम ने अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं की हिंदू व्यापारी वहां घुट-घुट कर बिज़नेस कर रहा है। इन्होंने होलसेल से लेकर रिटेल चेन तक हर जगह अपना मज़हबी सिंडिकेट बिठा दिया है।

आप जयपुर के जौहरी बाज़ार और परकोटे का हाल देख लीजिए। मेरठ का सर्राफा बाज़ार हो, या हैदराबाद का पुराना शहर- जहाँ-जहाँ हिंदुओं के पुश्तैनी और सबसे ज़्यादा कमाई वाले बाज़ार थे, वहां-वहां इन जिहादियों ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत दुकानों को खरीद-खरीद कर वहां ‘मिनी-पाकिस्तान’ खड़े कर दिए हैं।

ये सिर्फ दुकानों की खरीद-फरोख्त नहीं है, ये भारत के व्यापारिक तंत्र को अपने कब्ज़े में लेकर हिंदुओं को उनके ही देश में आर्थिक भिखारी बनाने का एक भयंकर और खौफनाक मास्टरप्लान है।

अंध-नमाज़ियों की इस अंधी दौलत का सोर्स क्या है, खाड़ी देशों की ‘हवाला’ फंडिंग 

अब हर एक सच्चे हिंदू के दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यही आना चाहिए की आखिर इन कल के पंचर बनाने वालों और रेहड़ी लगाने वालों के पास शहर की सबसे महंगी प्रॉपर्टी खरीदने के लिए 50-50 करोड़ रुपये आ कहां से रहे हैं? ये अंधी दौलत का सोर्स क्या है?

अरे भाई, ये पैसा इनका अपना नहीं है। ये वो हराम का और जिहादी पैसा है जो मिडिल ईस्ट (अरब देशों), कतर और तुर्की से भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए भेजा जा रहा है।

ये सारा खेल ‘हवाला’ नेटवर्क के ज़रिए चल रहा है। विदेशी जिहादी भारत में बैठे अपने इन स्लीपर सेल्स को बोरों में भरकर कैश पहुंचा रहे हैं। इनका मकसद मुनाफा कमाना नहीं है, इनका मकसद है बाज़ार पर जिहादी झंडा गाड़ना।

इस खौफनाक फंडिंग में सबसे बड़ा रोल उस ‘वक्फ बोर्ड’ और ज़कात (Zakat) के पैसों का भी है जो मदरसों और मस्जिदों के ज़रिए इकट्ठा होता है। ज़रा इस ‘टारगेटेड बाइंग’ के मॉडल को समझिए।

अगर मेन मार्केट में किसी हिंदू की दुकान की असली कीमत 2 करोड़ रुपये है, तो ये जिहादी उस हिंदू व्यापारी के पास जाते हैं और सीधे 5 या 6 करोड़ रुपये कैश टेबल पर फेंक देते हैं!

जी हां, मार्केट रेट से दोगुना या तिगुना पैसा! अब आप खुद सोचिए, कोई नॉर्मल बिज़नेसमैन घाटे का सौदा क्यों करेगा? वो इसलिए 5 करोड़ फेंकते हैं क्योंकि वो कोई दुकान नहीं खरीद रहे, वो हिंदुओं की छाती पर पैर रखने की ज़मीन खरीद रहे हैं।

अरब देशों की जिहादी फंडिंग एजेंसियां इन लोगों को बिना किसी ब्याज के भारी कैश देती हैं, सिर्फ इस शर्त पर की “जाओ और शहर की सबसे मेन मार्केट से हिंदू को बाहर फेंक कर उस दुकान पर कब्ज़ा करो।”

और हमारा वो भोला-भाला या लालची हिंदू व्यापारी 2 करोड़ एक्स्ट्रा देखकर खुश हो जाता है की उसने बड़ा मुनाफे का सौदा कर लिया। उसे ये अक्ल ही नहीं होती की उसने चंद रुपयों के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों के मुंह से निवाला छीन कर एक जिहादी को दे दिया है।

ये एक ऐसा खौफनाक आर्थिक नेक्सस है जिसे अगर आज ईडी (ED) और इनकम टैक्स वालों ने नहीं खंगाला, तो आने वाले 10 सालों में देश के किसी भी बड़े बाज़ार में कोई हिंदू सेठ या लाला नज़र नहीं आएगा। सारा का सारा बाज़ार इन हवाला कारोबारियों और जिहादी सिंडिकेट के हाथों में चला जाएगा।

व्यापारिक एकाधिकार का षड्यंत्र, हिन्दुओं को सप्लाई चेन से बाहर फेंकने का जिहादी मॉडल

इस व्यापार जिहाद का सबसे खौफनाक हिस्सा तो दुकान खरीदने के बाद शुरू होता है। वामपंथी गद्दार अक्सर ज्ञान बांटते हैं की “व्यापार का कोई धर्म नहीं होता।” लेकिन ये झूठ सिर्फ हिंदुओं के दिमाग में भरा गया है। एक जिहादी के लिए उसका व्यापार ही उसका सबसे बड़ा धर्म और जिहाद है।

जैसे ही ये लोग किसी मार्केट में 2-4 बड़ी दुकानें खरीदते हैं, इनका पूरा का पूरा ‘इकोनॉमिक मोनोपोली’ यानी व्यापारिक एकाधिकार का खेल शुरू हो जाता है।

ये लोग बाज़ार में एक साइलेंट रूल बना लेते हैं की अब ये किसी हिंदू वेंडर या मैन्युफैक्चरर से कच्चा माल नहीं खरीदेंगे। ये सिर्फ और सिर्फ अपने ही समुदाय के लोगों से माल उठाएंगे। अगर इन्हें अपनी दुकान पर सेल्समैन या अकाउंटेंट भी रखना होगा, तो ये चुन-चुन कर टोपी वालों और मदरसे के लड़कों को ही नौकरी पर रखेंगे।

देखते ही देखते ये पूरी की पूरी सप्लाई चेन से हिंदुओं को धक्के मारकर बाहर निकाल देते हैं। ट्रांसपोर्टर इनका, माल बनाने वाला इनका, दुकान वाला इनका और माल बेचने वाला भी इनका! और हम मूर्ख हिंदू?

हम तो ‘सेक्युलरिज्म’ के नशे में अंधे हो चुके हैं। हमारा हिंदू ग्राहक अपनी ही हिंदू दुकानों को छोड़कर इन जिहादियों की दुकानों पर भीड़ लगाता है क्योंकि ये शुरुआत में थोड़ा सस्ता माल बेचकर हिंदुओं की दुकानों को ठप करने की चाल चलते हैं।

एक जिहादी कभी भूल कर भी किसी हिंदू की दुकान से सुई तक नहीं खरीदता। उनका पैसा सिर्फ और सिर्फ उनके ही समुदाय (Ummah) में गोल-गोल घूमता है।

लेकिन हमारा हिंदू अपनी शादी की शेरवानी से लेकर घर का राशन तक इन जिहादियों की दुकानों से खरीद कर उनकी तिजोरियां भर रहा है।

ये वामपंथी इकोसिस्टम हमें भाईचारे का अफीम चटाकर हमारी गर्दन कटवा रहा है। अगर हमने इस जिहादी सप्लाई चेन को नहीं तोड़ा, तो ये हमें हमारे ही देश में भूखा मार देंगे!

चंद पैसों के लालच में अपना धर्म और अपनी दुकानें बेचते हिन्दू, हमारी उस लालची मानसिकता का सच

अब ज़रा इस पूरे खौफनाक खेल के उस कड़वे सच पर बात करते हैं, जिसे सुनकर शायद बहुत से हिंदुओं को बुरा लग जाए। लेकिन जब बीमारी कैंसर बन चुकी हो, तो कड़वी दवा पिलानी ही पड़ती है।

हम दिन-रात इन जिहादियों को गालियां देते हैं, लेकिन कभी आईने के सामने खड़े होकर अपनी गिरेबान में झांक कर नहीं देखते। आखिर इन पंचर छापों और जिहादियों की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वो हमारे ऐतिहासिक बाज़ारों में घुस आएं?

इनकी हिम्मत इसलिए हुई क्योंकि हमारा हिंदू व्यापारी चंद रुपयों के लालच में अंधा होकर अपना धर्म और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बेच रहा है!

ज़रा सोचिए, वो दुकान जिसे आपके दादा-परदादा ने खून-पसीना एक करके खड़ा किया था। जहाँ उन्होंने राम जी और लक्ष्मी माता की तस्वीर लगाकर बोहनी की थी।

आज का हिंदू व्यापारी क्या कर रहा है? जैसे ही कोई दाढ़ी वाला जिहादी उसके पास आता है और मार्केट रेट 2 करोड़ की दुकान के लिए 5 करोड़ कैश का सूटकेस खोलकर सामने रख देता है, तो उस हिंदू सेठ की नीयत डोल जाती है।

वो लालच में अंधा हो जाता है। वो सोचता है की “वाह! मैंने तो बहुत तगड़ा मुनाफे का सौदा कर लिया। 3 करोड़ एक्स्ट्रा मिल गए, अब मैं कहीं और जाकर बड़ा बिज़नेस कर लूंगा या एफडी (FD) कराकर ऐश करूंगा।”

अरे मूर्ख! तूने मुनाफे का सौदा नहीं किया, तूने अपनी ही संस्कृति और अपनी आने वाली नस्लों की अर्थी सजाने के लिए लकड़ियां बेची हैं! वो जिहादी तुझे 5 करोड़ इसलिए नहीं दे रहा क्योंकि तेरी दुकान सोने की बनी है।

वो तुझे वो एक्स्ट्रा 3 करोड़ रुपये इसलिए दे रहा है क्योंकि उसे तेरी दुकान नहीं, बल्कि उस बाज़ार से ‘हिंदू’ नाम का वजूद मिटाना है। वो वहां गज़वा-ए-हिंद का बीज बो रहा है और तू चंद रुपयों के लिए उसके आगे अपनी पुश्तैनी ज़मीन गिरवी रख रहा है।

और सबसे बड़ा दर्द तो हिंदू समाज की उस ‘कायरता’ और एकता की कमी को देखकर होता है। जब बाज़ार में किसी हिंदू दुकानदार पर कोई आर्थिक संकट आता है, जब उसका बिज़नेस डूब रहा होता है, तो बगल वाला हिंदू व्यापारी उसकी मदद करने के बजाय मज़े लेता है। हमारे अंदर वो ‘सिंडिकेट’ वाली एकता बची ही नहीं है।

हम एक-दूसरे को गिराने में लगे रहते हैं। और इसी बात का फायदा ये मज़हबी और हवाला फंडिंग वाला नेक्सस उठाता है। वो उस कमज़ोर और कर्ज़े में डूबे हिंदू को टार्गेट करते हैं और भारी भरकम कैश फेंककर उसे बाज़ार से ही आउट कर देते हैं। 

और इसका सबसे भयानक असर हमारी हिंदू महिलाओं पर पड़ता है। जब बाज़ार का माहौल एक इस्लामिक स्लम जैसा हो जाता है, वहां दाढ़ी वाले और कट्टरपंथी लड़कों की भीड़ खड़ी होने लगती है, तो हमारी हिंदू बहन-बेटियां उस बाज़ार में जाने से कतराने लगती हैं।

उन्हें वहां असुरक्षित और असहज महसूस होता है। और ये जिहादी यही तो चाहते हैं! ये लव जिहाद का सबसे बड़ा अड्डा इन्हीं दुकानों को बनाते हैं। जब हिंदू ग्राहक उस बाज़ार में आना कम कर देते हैं, तो अगल-बगल के हिंदू दुकानदारों की सेल गिरने लगती है।

इन जिहादियों का परमानेंट बॉयकॉट और अपने बाज़ारों को बचाने की जरुरत

जब एक जिहादी हमारे बाज़ार से सुई तक नहीं खरीदता, जब वो अपना पूरा पैसा सिर्फ अपने मज़हब वालों को अमीर बनाने में लगाता है, तो फिर हम हिंदू इतने बेवकूफ क्यों हैं?

आज देश के हर एक सनातनी को, हर एक हिंदू को अपने ईष्ट देव की कसम खानी होगी की वो अपनी जेब से एक फूटी कौड़ी भी किसी जिहादी की दुकान पर खर्च नहीं करेगा। चाहे तुम्हें कोई सामान 10 रुपये महंगा मिले, लेकिन खरीदो तो सिर्फ और सिर्फ अपने हिंदू भाई की दुकान से खरीदो।

बाज़ार जाओ तो दुकान का बोर्ड देखो। अगर वहां किसी जिहादी का नाम है, या वहां किसी ने अपनी पहचान छुपाकर दुकान खोल रखी है, तो तुरंत वहां से वापस लौट आओ।

जो तुम्हारे खाने में थूकते हैं, जो हलाल के नाम पर तुमसे जज़िया वसूलते हैं, जो तुम्हारे पैसों से अमीर होकर तुम्हारी ही बहन-बेटियों को लव जिहाद में फंसाते हैं, उन्हें तुम अपना पैसा क्यों दे रहे हो?

जब इनका माल ही नहीं बिकेगा, जब इनकी दुकानों पर मक्खियां भिनभिनाएंगी, तो ये हवाला का करोड़ों का फंड भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इनकी आर्थिक कमर तोड़ना ही हमारा सबसे पहला धर्मयुद्ध होना चाहिए।

और रही बात उन लालची हिंदू दुकानदारों की जो चंद करोड़ों के लिए अपना धर्म बेच देते हैं, तो अब हिंदू समाज को उनके खिलाफ भी खौफनाक रुख अपनाना पड़ेगा।

जो भी हिंदू अपनी पुश्तैनी दुकान या ज़मीन किसी जिहादी को बेचे, पूरे के पूरे हिंदू समाज को उसका हुक्का-पानी बंद कर देना चाहिए। उसका पूर्ण रूप से सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। ना उसे किसी हिंदू की शादी-ब्याह में बुलाओ, ना उससे कोई रिश्ता रखो। उसे एहसास होना चाहिए की गद्दारी की सज़ा क्या होती है।

संसद में बैठे हमारे हिंदूवादी नेताओं और ईडी (ED), इनकम टैक्स (IT) के अधिकारियों को भी अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना ही होगा।

हम डंके की चोट पर मांग करते हैं की देश के पुराने बाज़ारों में पिछले 10 सालों में जिहादियों द्वारा 1 करोड़ से ऊपर की जितनी भी प्रॉपर्टी नकद में खरीदी गई है, उन सब पर रातों-रात ईडी का छापा पड़ना चाहिए।

उनके विदेशी खातों की जांच होनी चाहिए। अगर वो पैसा हवाला, वक्फ या किसी आतंकी फंडिंग का निकलता है, तो उन दुकानों को तुरंत ज़ब्त करके उन पर सरकारी बुलडोज़र चला देना चाहिए।

इतिहास गवाह है की जिसने व्यापार पर कब्ज़ा किया, उसने पूरे देश पर राज किया। अंग्रेज़ भी पहले व्यापारी बनकर ही आए थे।

अगर आज तुमने अपने बाज़ारों को इन जिहादियों के पंजों से नहीं छीना, अगर आज तुमने इस आर्थिक जिहाद का गला नहीं घोंटा, तो कल ये तुम्हारे मंदिरों और तुम्हारे घरों पर भी अपना हरा झंडा गाड़ देंगे और तुम कुछ नहीं कर पाओगे।

अपने बाज़ारों को बचाओ, अपने पैसे को सिर्फ सनातनियों के बीच रखो।

जय श्री राम! भारत माता की जय!

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