आज हम बात कर रहे हैं सनातन धर्म के उस सबसे खूंखार, अजेय और साक्षात महाकाल के अवतार ‘महाराणा संग्राम सिंह’, यानी हमारे वीर ‘राणा सांगा’ की! ज़रा एक पल के लिए आंखें बंद कीजिए और उस रणभूमि की कल्पना कीजिए।
एक ऐसा इंसान जिसके शरीर का कोई भी हिस्सा साबुत नहीं था। एक आंख उन्होंने अपने ही भाइयों के साथ हुए राजसी संघर्ष में खो दी थी। खातोली के भयानक युद्ध में तलवार के वार से उनका एक हाथ कंधे से कटकर ज़मीन पर गिर चुका था।
उसी युद्ध में तोप के एक गोले ने उनका एक पैर हमेशा के लिए बेकार कर दिया था। और उनके पूरे शरीर पर भालों, तीरों और तलवारों के 80 खौफनाक घाव थे।
80 घाव! आज के इंसान को एक खरोंच लग जाए तो वो बिस्तर पकड़ लेता है। लेकिन वो मेवाड़ का हिंदू शेर जब अपने उस एक हाथ, एक आंख और कटे हुए पैर के साथ, हाथी पर सवार होकर रणभूमि में उतरता था, तो सामने खड़ी लाखों की जिहादी फौज में भगदड़ मच जाती थी।
वो 80 घाव कोई कमज़ोरी नहीं थे मेरे भाई, वो सनातन धर्म की रक्षा के लिए पहने गए 80 ‘स्वर्ण पदक’ (Medals) थे। राणा सांगा का खौफ इतना भयंकर था की उस दौर में कोई भी विदेशी लुटेरा या इस्लामी सुल्तान अकेले मेवाड़ की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।
ये कोई किताबी कहानी नहीं है, ये राजपूताने के खून से लिखा गया वो खौफनाक सच है जिसने विदेशी जिहादी आक्रांताओं को उनकी असली औकात याद दिला दी थी।
एक हाथ और पैर गवाने के बाद भी राणा सांगा ने खातोली में किया जिहादियों का कत्लेआम, जान बचाकर कुत्तों की तरह भागा इब्राहिम लोदी
अगर आपको राणा सांगा के उस रौद्र रूप का असली ट्रेलर देखना है, तो 1517 ईस्वी के उस खौफनाक ‘खातोली के युद्ध’ (Battle of Khatoli) के पन्ने पलट लीजिए। उस वक्त दिल्ली के तख्त पर एक बहुत ही घमंडी और क्रूर जिहादी आक्रांता बैठा था- इब्राहिम लोदी!
इस लोदी को बहुत गुरूर था अपनी उस विशाल और खूंखार जिहादी फौज पर। उसे लगता था की वो दिल्ली से चलेगा और पूरे राजपूताने को कुचलता हुआ निकल जाएगा। इसी गलतफहमी में फूलकर लोदी ने मेवाड़ की सीमा पर हमला करने की जुर्रत कर दी।
लेकिन लोदी ये भूल गया था की सामने कोई कमज़ोर राजा नहीं, बल्कि साक्षात सनातनी तूफान खड़ा है। खातोली (जो आज के राजस्थान के कोटा-बूंदी इलाके में है) के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं।
भाई साहब, उस दिन राणा सांगा और उनके राजपूत वीरों ने लोदी की उस विशाल जिहादी फौज को कुर्बान करने वाले बकरे की तरह काटा था! राजपूतों की तलवारें जब मुगलों और अफगानों की गर्दनों पर गिर रही थीं, तो रणभूमि में खून की नदियां बह निकलीं।
यही वो खौफनाक युद्ध था जिसमें राणा सांगा का एक हाथ तलवार के वार से कट गया था और एक पैर बुरी तरह ज़ख्मी होकर हमेशा के लिए अपाहिज हो गया था। लेकिन आप उस हिंदू शेर का जिगरा देखिए!
शरीर से खून के फव्वारे छूट रहे थे, एक हाथ कट चुका था, लेकिन सांगा ने युद्ध का मैदान नहीं छोड़ा। वो अपने बचे हुए एक हाथ से तलवार चलाते रहे और दुश्मनों को काटते रहे।
राणा सांगा के इस विकराल रूप को देखकर इब्राहिम लोदी की पूरी की पूरी फौज में मौत की दहशत फैल गई। वो सुल्तान, जो दिल्ली से मेवाड़ को कुचलने के सपने लेकर आया था, वो अपनी जान बचाने के लिए एक कायर कुत्ते की तरह रणभूमि छोड़कर दिल्ली की तरफ भाग खड़ा हुआ।
लोदी तो भाग गया, लेकिन सांगा के शेरों ने लोदी के शहज़ादे (बेटे) को बीच मैदान में दबोच लिया और उसे बंदी बनाकर अपने साथ ले गए। लोदी को बाद में भारी ज़ुर्माना और कई इलाके राणा सांगा को सौंपने पड़े, तब जाकर उसके बेटे की जान बख्शी गई। ये थी दिल्ली के सुल्तानों की असली औकात!
गागरोन का वो भयंकर महासंग्राम, जब राणा सांगा ने खूंखार जिहादी महमूद खिलजी को जंजीरों में जकड़कर जेल में सड़ाया
खातोली के युद्ध में लोदी की जो दुर्गति हुई थी, उसे देखकर बाकी के इस्लामी सुल्तानों के पसीने छूटने लगे थे। लेकिन कहते हैं ना की जब गीदड़ की मौत आती है, तो वो शहर की तरफ भागता है।
मालवा (आज का मध्य प्रदेश) का सुल्तान ‘महमूद खिलजी’ भी इसी गलतफहमी का शिकार हो गया। खिलजी बहुत ही क्रूर और जेहादी मानसिकता का लुटेरा था जो हिंदुओं पर ज़ुल्म करने के लिए कुख्यात था। 1519 ईस्वी में इसी खिलजी ने अपनी एक बहुत ही विशाल और खूंखार सेना लेकर राणा सांगा को चुनौती देने की बेवकूफी कर दी।
राणा सांगा को जैसे ही इस बात की भनक लगी, वो तुरंत अपनी राजपूती फौज लेकर मालवा की सीमा पर पहुंच गए। गागरोन (Gagron) के खौफनाक मैदान में दोनों फौजों की सीधी टक्कर हुई। इस युद्ध में सांगा के अंदर का वो हिंदू यमराज जाग चुका था जिसे रोकना किसी के बस की बात नहीं थी।
गागरोन के उस मैदान में राजपूतों ने खिलजी की सेना के ऐसे चिथड़े उड़ाए की दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ जिहादियों की कटी हुई लाशें ही नज़र आ रही थीं। खिलजी के सबसे बड़े-बड़े सेनापति और कमांडर गाजर की तरह काट कर मिट्टी में मिला दिए गए।
खुद सुल्तान महमूद खिलजी बुरी तरह से घायल हो गया। जब वो अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश कर रहा था, तो राणा सांगा के शूरवीरों ने उसे बीच मैदान में दबोच लिया।
ज़रा सोचिए उस नज़ारे को! मालवा का वो घमंडी सुल्तान, जो हिंदुओं को मिटाने के सपने देखता था, आज वो उसी हिंदू सम्राट के कदमों में खून से लथपथ पड़ा हुआ था। राणा सांगा ने उसे वहीं खत्म नहीं किया।
उन्होंने उस खूंखार खिलजी को भारी लोहे की ज़ंजीरों में जकड़वा दिया। उसे जानवरों की तरह घसीटकर मेवाड़ लाया गया और चित्तौड़गढ़ के किले की एक अंधेरी जेल में डाल दिया गया।
छह महीने तक वो घमंडी सुल्तान महमूद खिलजी चित्तौड़ की जेल में सड़ाया गया। रोज़ उसे अपनी मौत सामने नज़र आती थी। छह महीने बाद जब उसका सारा गुरूर टूट गया और वो सांगा के चरणों में गिरकर अपनी जान की भीख मांगने लगा, तब राणा सांगा ने राजपूती बड़प्पन दिखाते हुए उसे छोड़ दिया।
सांगा ने खिलजी के बेटे को ज़मानत के तौर पर अपने पास रख लिया और उसका आधा राज्य छीन लिया। खिलजी के लिए मौत से भी बदतर ज़िल्लत थी ये!
एक हिंदू राजा के हाथों इस कदर जूतों से पिटना और ज़ंजीरों में बंधकर जेल में सड़ना- ये वो इतिहास है जो आज हर सनातनी के रोंगटे खड़े कर देता है। और यही वो इतिहास है जिसे लिबरल कीड़े हमसे दूर रखना चाहते थे।
गुजरात से लेकर मालवा तक, तीन-तीन इस्लामी सल्तनतों का काल बने राणा सांगा, पूरे उत्तर भारत में गाड़ा सनातन का भगवा
अगर आप राणा सांगा के उस दौर (1509 से 1527) का नक्शा उठाकर देखेंगे, तो आपको समझ आएगा की ये एक हाथ और एक आंख वाला राजा असल में क्या चीज़ था।
उत्तर भारत में उस वक्त तीन सबसे खूंखार और बड़ी इस्लामी सल्तनतें थीं- दिल्ली में लोदी, मालवा में खिलजी, और गुजरात में मुज़फ्फर शाह। इन तीनों सुल्तानों का एक ही मकसद था की किसी तरह मेवाड़ को कुचलकर पूरे भारत पर शरिया का राज कायम किया जाए।
लेकिन जब तक राणा सांगा ज़िंदा थे, इन तीनों सल्तनतों की हैसियत उनके सामने रेंगने वाले कीड़ों से ज़्यादा नहीं थी। सांगा ने इब्राहिम लोदी को दो बार (खातोली और बाड़ी के युद्ध में) जूतों से पीटा।
मालवा के खिलजी को जेल में सड़ाया। और जब गुजरात के सुल्तान मुज़फ्फर शाह ने मेवाड़ पर आंख उठाने की कोशिश की, तो सांगा ने गुजरात की सेना को भी ईडर के युद्ध में ऐसा खदेड़ा की गुजरात के सुल्तान को अपनी जान बचाने के लिए अपने ही किले में दुबक कर बैठना पड़ा।
राणा सांगा इकलौते ऐसे अजेय हिंदू सम्राट बन चुके थे, जिन्हें पूरे भारत में ‘हिंदूपत’ (Hindupat) यानी हिंदुओं का सबसे बड़ा रक्षक कहा जाता था।
उनके नाम का खौफ और सम्मान इतना बड़ा था की जब वो रणभूमि में अपना भगवा झंडा लेकर उतरते थे, तो उनके पीछे राजपूताने के 7 उच्च श्रेणी के राजा, 9 बड़े राव, और 104 खूंखार सरदार अपनी नंगी तलवारें लेकर मरने-मारने को तैयार खड़े रहते थे।
ये वो दौर था जब मुगलों (बाबर) के भारत में घुसने से पहले ही, राणा सांगा के नेतृत्व में भारत लगभग एक पूर्ण ‘हिंदू स्वराज्य’ बनने की कगार पर पहुंच चुका था।
इस्लामी सल्तनतों की कमर टूट चुकी थी। दिल्ली का तख्त डगमगा रहा था और मालवा-गुजरात की हवा टाइट थी। सांगा ने अपनी तलवार के दम पर पूरे उत्तर भारत में सनातन का वो भगवा गाड़ दिया था, जिसे देखकर विदेशी आक्रांताओं के पसीने छूटते थे।
ये वो अजेय हिंदूपत थे जिन्होंने साबित कर दिया था की अगर हिंदू एकजुट हो जाए, तो दुनिया की कोई भी जिहादी ताक़त उसे हराना तो दूर, उसकी तरफ आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकती।
बयाना के मैदान में मुगलों का खौफनाक कत्लेआम, राणा सांगा की तलवार देखकर उल्टे पैर भागी बाबर की जिहादी फौज
अब ज़रा उस खौफनाक जिहादी लुटेरे बाबर की बात करते हैं जिसे हमारी स्कूलों की किताबों में ‘मुगल साम्राज्य का संस्थापक’ कहकर बहुत महान बताया जाता है।
जब 1526 में बाबर ने पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी को मार गिराया और दिल्ली पर कब्ज़ा किया, तो उस विदेशी आक्रांता को एक बहुत बड़ी गलतफहमी हो गई थी।
उसे लगा की उसने भारत जीत लिया है और अब यहाँ के हिंदू राजा उसके सामने घुटने टेक देंगे। लेकिन उस कायर लुटेरे को ये नहीं पता था की उसका असली बाप तो अभी राजपूताने में अपनी तलवार पर धार रख रहा है!
दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद बाबर ने राजपूताने की तरफ बढ़ने की हिमाकत की। फरवरी 1527 में बयाना के किले के पास मुगलों की उस खूंखार और जेहादी फौज का सामना पहली बार असली राजपूती फौलाद से हुआ। राणा सांगा की अग्रिम टुकड़ी ने मुगलों की उस फौज को बीच मैदान में घेर लिया।
भाई साहब, बयाना के उस मैदान में राजपूतों ने मुगलों का जो खतरनाक कत्लेआम किया था, वो इतिहास का वो सुनहरा पन्ना है जिसे वामपंथी गद्दारों ने जानबूझकर हमसे छुपा लिया।
मुगलों के बड़े-बड़े कमांडर और सेनापति अपनी जान की भीख मांगते हुए नज़र आए। राजपूतों की तलवारें इतनी खौफनाक रफ्तार से चल रही थीं की मुगलों के सिर ऐसे कट रहे थे जैसे खेतों में फसल कटती है।
बाबर के सैनिक अपनी जान बचाकर वहां से ऐसे भागे जैसे कोई कुत्ता दुम दबाकर भागता है। जो मुगल सैनिक ज़िंदा बचकर बाबर के कैंप में पहुंचे, वो खौफ से इस कदर कांप रहे थे की उनके मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।
उन्होंने बाबर को जाकर बताया की “हम उस एक आंख और एक हाथ वाले हिंदू यमराज से नहीं लड़ सकते। वो इंसान नहीं है, वो साक्षात मौत है जो हाथ में तलवार लेकर मुगलों को ढूंढ रही है!” बयाना के उस मैदान में मुगलों का सारा गुरूर, उनका सारा जेहादी घमंड राणा सांगा के शेरों ने जूतों तले कुचल कर रख दिया था।
राणा सांगा के खौफ से कांपते बाबर ने तोड़े शराब के प्याले, मौत सामने देखकर कायर मुगलों से मांगी जिहाद की भीख
बयाना की उस खौफनाक हार और राणा सांगा के 80 घाव वाले उस विकराल रूप का ऐसा भयंकर खौफ मुगलों के दिमाग में बैठ गया था की बाबर की पूरी की पूरी फौज ने आगे लड़ने से ही साफ इंकार कर दिया। मुगल सैनिक बाबर के सामने रोने लगे की “हमें यहाँ से वापस काबुल जाना है, हम राजपूताने में अपनी कब्र नहीं खोदना चाहते।”
और तो और, उसी वक्त काबुल से आए एक मुस्लिम ज्योतिषी (मोहम्मद शरीफ) ने ये भविष्यवाणी कर दी की सितारे मुगलों के खिलाफ हैं और इस युद्ध में बाबर की हार पक्की है।
ये सुनकर बाबर की पैंट सचमुच गीली हो गई। वो अपनी मौत को अपने सामने खड़ा देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था की वो अपनी भागती हुई कायर फौज को कैसे रोके।
फिर उस लुटेरे बाबर ने वो खौफनाक मज़हबी नौटंकी रची, जिसे आज के लिबरल इतिहासकार उसकी ‘बहादुरी’ बताते हैं। अपनी मौत के खौफ से कांपते हुए बाबर ने सोने-चांदी के अपने सारे शराब के प्याले ज़मीन पर पटक-पटक कर तोड़ दिए।
उसने ज़मीन पर बैठकर रोना शुरू कर दिया और अपनी सेना के सामने कुरान हाथ में लेकर ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) की भीख मांगने लगा।
बाबर ने अपनी सेना से कहा की “अगर हम जीते तो गाज़ी कहलाएंगे और अगर इस काफिर सांगा के हाथों मारे गए तो शहीद कहलाएंगे।” ज़रा सोचिए इस नंगे सच को!
जिस मुगल को अजेय बताया जाता है, वो एक पैर, एक आंख और एक हाथ वाले हिंदू सम्राट के सामने इतना लाचार हो गया था की उसे अपनी फौज को रोकने के लिए अपने मज़हब और जिहाद की अफीम का सहारा लेना पड़ा।
ये बाबर की कोई महानता नहीं थी, ये राणा सांगा के उस खौफनाक शौर्य के सामने मुगलों की सबसे बड़ी कायरता और ज़िल्लत का साक्षात प्रमाण था!
खानवा के खूनी रण में अपनों के धोखे का शिकार हुए वीर राणा सांगा, मातृभूमि पर प्राण न्योछावर करने वाले राजपूती तूफान का अमर इतिहास
मार्च 1527 का वो दिन जब खानवा के खौफनाक मैदान में भारत के भाग्य का फैसला होना था। एक तरफ बाबर की वो जेहादी फौज थी जिसके पास आग उगलने वाली तोपें और बारूद था (जिसका इस्तेमाल भारत में पहली बार हो रहा था)।
और दूसरी तरफ वो 80 घाव वाला राजपूती तूफान था जिसके पास सिर्फ तलवारें, भाले और अपनी भारत माता के लिए कट मरने का वो भगवा जज़्बा था।
राणा सांगा जब अपने उसी कटे हुए पैर, एक हाथ और एक आंख के साथ हाथी पर सवार होकर खानवा के मैदान में उतरे, तो मुगलों की सांसें हलक में अटक गईं।
राजपूतों ने तोपों के गोलों की परवाह किए बिना मुगलों की फौज पर वो खौफनाक प्रहार किया कि बाबर की अग्रिम पंक्तियां ताश के पत्तों की तरह ढहने लगीं।
राजपूत अपनी जान की बाज़ी लगाकर तोपों के मुंह तक पहुंच गए थे। बाबर को अपनी मौत एक बार फिर बिल्कुल सामने दिखने लगी थी। सांगा की जीत लगभग पक्की हो चुकी थी।
लेकिन हमारे सनातन धर्म का वो पुराना और सबसे बदनसीब श्राप एक बार फिर हमारे ही सामने आ खड़ा हुआ- “अपनों की गद्दारी!”
जब युद्ध अपने चरम पर था और मुगलों का कत्लेआम हो रहा था, ठीक उसी ऐन मौके पर राणा सांगा की ही सेना का एक गद्दार ‘सलहदी तंवर’ अपनी 35 हज़ार की फौज लेकर अचानक पाला बदल गया और बाबर की जेहादी फौज से जा मिला।
इस एक धोखे ने पूरे युद्ध का पासा पलट दिया। जो राजपूत आगे बढ़कर मुगलों को काट रहे थे, वो अचानक चारों तरफ से घिर गए।
उसी भयंकर गोलाबारी के बीच एक ज़हरीला तीर सीधे राणा सांगा के सिर में आकर लगा और वो हिंदू शेर अपने हाथी के हौदे में बेहोश होकर गिर पड़ा। सांगा के बेहोश होते ही राजपूत सरदारों ने उन्हें मैदान से बाहर निकाल लिया।
जब सांगा को होश आया, तो उनके शरीर से खून बह रहा था, लेकिन उनका राष्ट्रप्रेम देखिए! उन्होंने अपनी मरहम-पट्टी कराने से साफ इंकार कर दिया।
उन्होंने वहीं खड़े होकर एक खौफनाक कसम खाई की “जब तक मैं उस विदेशी लुटेरे बाबर को इस भारत की ज़मीन से नहीं उखाड़ फेंकूंगा, तब तक मैं चित्तौड़गढ़ के किले में अपना मुंह नहीं दिखाऊंगा।”
वो शेर अपनी बची-खुची सेना को लेकर फिर से बाबर पर हमला करने की तैयारी करने लगा, लेकिन अफसोस! कुछ कायर सरदारों ने उन्हें ज़हर दे दिया और 1528 में उस अजेय हिंदूपत ने अपने प्राण भारत माता के चरणों में त्याग दिए।
वो हारे नहीं थे भाई, उन्हें धोखे से मारा गया था!
