हमारे और आपके बचपन से ही हमारे दिमाग में एक बहुत बड़ा और सफेद झूठ रटाया गया। हमारी किताबों में, टीवी पर और अखबारों में एक गोरी औरत की तस्वीरें छाप-छाप कर हमें बताया गया की “देखो, ये मदर टेरेसा हैं। ये शांति और सेवा की सबसे बड़ी मूरत हैं। इन्होंने भारत के गरीबों के लिए अपना जीवन दे दिया।”
लिबरल और विदेशी मीडिया ने मिलकर एक ऐसा नैरेटिव तैयार कर दिया की एक आम सीधा-सादा हिंदू सच में उन्हें ‘संत’ (Saint) मानने लगा।
लेकिन भाई, इस सफेद और नीली बॉर्डर वाली साड़ी के पीछे का जहरीला सच क्या था, ये कोई नहीं बताता! ये कोई सेवा का काम नहीं था। मदर टेरेसा का भारत आने का असली मकसद कभी यहां से गरीबी मिटाना था ही नहीं।
उनका इकलौता और खौफनाक एजेंडा था- बीमारी, गरीबी और लाचारी का फायदा उठाकर भारत के बेबस और गरीब हिंदुओं के गले में ‘क्रॉस’ डालना और उन्हें ईसाई बनाना।
‘वेटिकन’ ने उन्हें समाज सेवा के लिए नहीं, बल्कि भारत में अपना ‘धर्मांतरण का सिंडिकेट’ चलाने के लिए प्लांट किया था।
साल 2015 की वो घटना याद है आपको? जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने राजस्थान के एक कार्यक्रम में डंके की चोट पर वो सच बोल दिया था जिसे बोलने से बड़े-बड़े नेता कांपते थे।
भागवत जी ने खुले मंच से कहा था की- “मदर टेरेसा की सेवा अच्छी रही होगी, लेकिन उस सेवा के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य ये था की जिसकी सेवा की जा रही है, उसे ईसाई बना लिया जाए।”
भाई साहब, जैसे ही भागवत जी ने ये सच बोला, इस देश के पूरे लिबरल कीड़ों के पेट में ऐसा भयंकर दर्द उठा की ये सब छाती पीट-पीट कर टीवी पर रोने लगे। सेक्युलर नेताओं ने आसमान सिर पर उठा लिया।
लेकिन भागवत जी ने जो कहा था, वो सौ टका सच था। क्या तुम किसी भूखे को रोटी सिर्फ इसलिए दोगे ताकि वो अपने राम और कृष्ण को गालियां देने लगे? क्या किसी अनाथ को सहारा इसलिए दोगे ताकि वो अपनी सनातन संस्कृति को भूलकर चर्च का गुलाम बन जाए?
ये सेवा नहीं है भाई, ये गरीबी का नंगा सौदा है। और मदर टेरेसा ने दशकों तक भारत की ज़मीन पर वेटिकन के इशारे पर यही खौफनाक सौदा किया है।
दर्द से तड़पते हिन्दू मरीजों को दवा नहीं बल्कि यीशु का ज्ञान बांटती थी मदर टेरेसा, निर्मम मौत के अड्डों का वो खौफनाक सच
अगर किसी लिबरल कीड़े को मेरी बातों पर यकीन नहीं आ रहा है, तो ज़रा उन डॉक्टरों और पत्रकारों की रिपोर्ट्स पढ़ ले जिन्होंने मदर टेरेसा के उस तथाकथित ‘अस्पताल’ का नंगा सच दुनिया के सामने रखा था।
कलकत्ता में मदर टेरेसा ने एक जगह खोली थी जिसका नाम था- ‘निर्मल हृदय’ (Home for the Dying)। दुनिया भर के लोगों को लगता था की वाह! ये तो कोई फाइव-स्टार अस्पताल होगा जहाँ गरीबों का फ्री में बहुत शानदार इलाज होता होगा।
अरे भाई, वो कोई अस्पताल-वस्पताल नहीं था! वो असल में गरीब और लाचार हिंदुओं के लिए बनाए गए ‘मौत के कैंप’ थे।
लंदन में रहने वाले भारतीय मूल के एक मशहूर डॉक्टर, डॉ. अरूप चटर्जी (Dr. Aroup Chatterjee) ने अपनी किताब और रिसर्च में इस खौफनाक क्रूरता का पूरा पर्दाफाश किया है। डॉ. चटर्जी ने जब मदर टेरेसा के उस ‘निर्मल हृदय’ का दौरा किया, तो उनकी रूह कांप गई।
वहां जो गरीब और बीमार हिंदू लेटे थे, जो टीबी (TB), कैंसर या दूसरी जानलेवा बीमारियों से तड़प रहे थे, उन्हें कोई ढंग का इलाज नहीं दिया जा रहा था। दर्द से चीखते हुए मरीजों को पेनकिलर्स (Painkillers) या मॉर्फिन नहीं दी जाती थी।
क्यों? क्योंकि मदर टेरेसा की वो सड़ी हुई और खौफनाक क्रिश्चियन थ्योरी कहती थी की- “गरीबों का तड़पना बहुत खूबसूरत है। जब वो दर्द सहते हैं, तो वो ईसा मसीह (Jesus Christ) के तड़पने जैसा होता है और इससे वो भगवान के करीब जाते हैं।”
ज़रा सोचिए इस अमानवीय और क्रूर मानसिकता को! तुम एक इंसान को तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दे रहे हो, उसे दर्द की एक गोली तक नहीं दे रहे हो, और इसे तुम ‘खूबसूरत’ बता रहे हो?
अरे भाई, अगर दर्द सहना इतना ही अच्छा और भगवान के करीब जाने का रास्ता था, तो खुद मदर टेरेसा जब अपनी बुढ़ापे की बीमारियों से जूझीं, तो उन्होंने कलकत्ता के उस टिन के शेड में तड़प कर जान क्यों नहीं दी?
जब खुद पर बात आई तो वो अमेरिका के सबसे महंगे और हाई-टेक अस्पतालों में जाकर VIP इलाज क्यों करवा रही थीं? वहां उनका वो यीशु वाला ज्ञान कहां जाकर छुप गया था?
और मेडिकल क्रूरता की तो सारी हदें ही पार थीं। वहां की जो नन (Nuns) थीं, उन्हें मेडिकल की कोई ABCD भी नहीं पता थी। एक ही सुई (Needle) को बिना स्टरलाइज़ किए, बिना गर्म पानी में उबाले, सिर्फ ठंडे पानी से धोकर दर्जनों मरीजों को बार-बार लगा दिया जाता था।
मरीजों को एक साथ बिना किसी प्राइवेसी के ठूंस दिया जाता था। वो कोई इलाज की जगह थी ही नहीं, वो तो बस एक वेटिंग रूम था जहाँ गरीबों को सिर्फ मरने के लिए लाया जाता था ताकि मरते वक्त उनका धर्म भ्रष्ट किया जा सके।
मौत के बिस्तर पर पड़े लाचार हिन्दुओं का छुपकर किया जाता था बैपटिज़्म, स्वर्ग के टिकट के नाम पर सनातनियों का सबसे घिनौना धर्मांतरण
अब ज़रा उस खौफनाक और घिनौने खेल को समझिए जिसके लिए ये सारा ‘सेवा’ का नाटक रचा गया था।
मशहूर विदेशी पत्रकार और लेखक क्रिस्टोफर हिचेंस (Christopher Hitchens) ने अपनी ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री और किताब ‘The Missionary Position: Mother Teresa in Theory and Practice’ में इस ‘सेक्युलर संत’ की ऐसी बखिया उधेड़ी है की कोई भी वेटिकन का पादरी आज तक उसका जवाब नहीं दे पाया है।
क्रिस्टोफर हिचेंस ने साफ-साफ बताया की मदर टेरेसा की संस्था में ‘छुपकर धर्मांतरण’ (Secret Baptisms) का एक बहुत ही खौफनाक सिस्टम चलता था। ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए।
एक गरीब और असहाय हिंदू जो अपनी ज़िंदगी की आखिरी सांसें गिन रहा है। वो दर्द से तड़प रहा है, अर्ध-बेहोशी की हालत में है और उसे कुछ भी होश नहीं है। ऐसे में ये ‘सेवा’ करने वाली नन क्या करती थीं?
वो उस मरते हुए हिंदू के पास आती थीं। वो उससे पूछती थीं की “क्या तुम्हें एक ‘स्वर्ग का टिकट’ चाहिए?” ज़ाहिर सी बात है, एक तड़पता हुआ इंसान हां में ही सिर हिलाएगा।
बस, इसके बाद वो नन एक गीला कपड़ा लेती थीं, उस हिंदू के माथे पर फेरती थीं और चुपचाप ईसाई धर्म के वो मंत्र (Baptism rituals) पढ़ देती थीं- “मैं तुम्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा देती हूँ।”
और इस तरह, एक झटके में उस गरीब हिंदू को मरने से ठीक पहले धोखे से ईसाई बना लिया जाता था!
अरे लानत है ऐसे मज़हब पर और लानत है ऐसी सेवा पर! इससे बड़ा नीच और घिनौना काम इस दुनिया में क्या हो सकता है? तुम एक इंसान के बेहोशी और लाचारी का फायदा उठाकर, बिना उसकी असली मर्जी जाने, उसके भगवान राम और कृष्ण को उससे छीन रहे हो?
ये सेवा नहीं है, ये किसी की आस्था और उसके धर्म के साथ किया गया सरेआम बलात्कार है।
मदर टेरेसा के पास जो भी मरने के लिए आता था, उनके लिए वो एक इंसान नहीं, बल्कि अपनी डायरी में ‘ईसाई कन्वर्जन’ का एक नंबर बढ़ाने का ‘टारगेट’ होता था। इन लोगों ने गरीबों के आंसुओं का व्यापार किया और लिबरल मीडिया ने इसी व्यापार को ‘महानता’ का नाम दे दिया।
दुनिया भर से बटोरा गया अरबों का चंदा और भ्रष्टाचारियों से याराना, भारी विदेशी फंडिंग से भारत में खड़ा किया गया ईसाई साम्राज्य
अब एक और बहुत बड़ा सवाल उठता है। जब मदर टेरेसा की संस्था ‘मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी’ के पास पूरी दुनिया से अंधाधुंध पैसा आ रहा था, तो फिर उनके कलकत्ता वाले उन सेंटरों में इतनी गंदगी और बदहाली क्यों थी? वहां मरीजों के लिए अच्छी दवाइयां और डॉक्टर क्यों नहीं थे?
भाई, अगर आप फंडिंग के वो आंकड़े देखेंगे तो आपका दिमाग सुन्न पड़ जाएगा। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद मदर टेरेसा को दुनिया भर के अमीर देशों, हॉलीवुड के एक्टरों, बड़े-बड़े नेताओं और कैथोलिक ईसाइयों से अरबों डॉलर का चंदा (Donations) मिलता था।
उनके बैंक अकाउंट हमेशा डॉलर और पाउंड से छलकते रहते थे। लेकिन क्या वो पैसा कभी भारत के गरीब हिंदुओं के लिए कोई वर्ल्ड-क्लास अस्पताल बनाने में खर्च हुआ? क्या उस पैसे से गरीबों के लिए पक्के और साफ-सुथरे घर बनाए गए? बिल्कुल नहीं!
तो फिर वो अरबों रुपया गया कहां? वो सारा का सारा पैसा भारत के गांव-देहातों और दुनिया के दूसरे पिछड़े देशों में 500 से ज़्यादा नए ‘कॉन्वेंट’ (ईसाई केंद्र) और धर्मांतरण की फैक्ट्रियां खोलने में झोंक दिया गया!
उस पैसे से ननों (Nuns) की फौज तैयार की गई ताकि वो गली-गली जाकर ईसाइयत का प्रचार कर सकें। उस पैसे से वेटिकन का वो खौफनाक और विशाल साम्राज्य खड़ा किया गया जो आज भी हमारे वनवासी और दलित भाइयों को निगल रहा है।
और ज़रा इस ‘महान संत’ की संगत तो देखिए! मदर टेरेसा को पैसा कहां-कहां से आता था? जब अमेरिका के सबसे बड़े आर्थिक घोटालेबाज़ और फ्रॉड ‘चार्ल्स कीटिंग’ (Charles Keating) को पुलिस ने पकड़ा, जिसने लाखों अमेरिकियों की ज़िंदगी भर की कमाई लूट ली थी, तो आपको जानकर हैरानी होगी की उस चोर ने मदर टेरेसा को लाखों डॉलर का चंदा दिया था।
और जब उस फ्रॉड कीटिंग पर कोर्ट में मुकदमा चला, तो इस ‘संत’ मदर टेरेसा ने क्या किया? उन्होंने अमेरिकी जज को बाकायदा एक खत लिखा और गुज़ारिश की की “चार्ल्स कीटिंग बहुत अच्छा इंसान है, उसने मुझे बहुत पैसा दिया है, इसलिए उसे छोड़ दिया जाए।” ज़रा सोचिए! जो पैसा लाखों गरीबों को लूटकर कमाया गया था, मदर टेरेसा को वो पैसा लेते वक्त कोई ‘पाप’ नज़र नहीं आया?
सिर्फ कीटिंग ही नहीं, हैती (Haiti) का वो क्रूर और खून-पीने वाला तानाशाह ‘जीन-क्लाउड डुवेलियर’ (Jean-Claude Duvalier) जिसने अपने ही देश के हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, मदर टेरेसा उस तानाशाह से भी लाखों डॉलर का चंदा लेकर आई थीं और उसकी तारीफों के पुल बांधे थे।
मतलब, अगर तुम कैथोलिक चर्च को पैसा दे रहे हो, तो तुम चाहे कितने भी बड़े कातिल या लुटेरे क्यों ना हो, मदर टेरेसा की नज़रों में तुम भगवान के बंदे बन जाते हो।
ये इस विदेशी इकोसिस्टम का वो सबसे सड़ा हुआ और करप्ट चेहरा है, जिसे हमारे देश की मीडिया ने हमेशा एक पवित्र नकाब के पीछे छुपा कर रखा।
अनाथ बच्चों का सरेआम सौदा और झारखंड का वो क्रूर सच, मदर टेरेसा के अनाथालयों में पल रहा ईसाई धर्मांतरण का खौफनाक माफिया
अब ज़रा इस ‘पवित्र’ संस्था के उस काले और घिनौने चेहरे को देखिए जिसे सुनकर किसी भी इंसान की रूह कांप जाएगी। जब आप अनाथालय शब्द सुनते हैं, तो आपके दिमाग में क्या आता है? एक ऐसी जगह जहाँ बेसहारा बच्चों को प्यार, ममता और एक नया परिवार दिया जाता हो।
दुनिया भर के लोगों ने यही सोचकर मदर टेरेसा की संस्था ‘मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी’ को अरबों डॉलर का चंदा दिया था। लेकिन इन अनाथालयों की आड़ में जो खौफनाक गोरखधंधा चल रहा था, उसका पर्दाफाश साल 2018 में झारखंड की राजधानी रांची में हुआ।
रांची में इसी संस्था का एक घर चलता था जिसका नाम था ‘निर्मल हृदय’। यहाँ वो कुंवारी और बेबस लड़कियां आश्रय लेने आती थीं जो किसी कारण से गर्भवती हो जाती थीं।
वो लड़कियां समाज के डर से छुपकर यहाँ आती थीं की ये नन (Nuns) उनकी मदद करेंगी। लेकिन इन ‘सेवा की मूरतों’ ने उन मजबूर लड़कियों की कोख का क्या सौदा किया, वो इस देश के इतिहास का सबसे शर्मनाक पन्ना है।
जब उन लड़कियों के बच्चे पैदा होते थे, तो ये नन उन नवजात बच्चों को उनकी माताओं से छीन लेती थीं। और फिर उन बच्चों का क्या होता था? उन मासूम बच्चों को बाकायदा एक लाख से डेढ़ लाख रुपये में अमीर परिवारों को बेच दिया जाता था!
हाँ भाई, ये कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है, ये भारत के कानून और पुलिस की फाइलों में दर्ज़ वो नंगा सच है जिसने पूरे वेटिकन सिस्टम की चूलें हिला दी थीं। जब पुलिस ने वहां छापा मारा, तो बाकायदा वहां की एक नन (सिस्टर कोन्सिलिया) को बच्चों की खरीद-फरोख्त (Child Trafficking) के जुर्म में रंगे हाथों गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
अरे भाई, तुम अनाथालय चला रहे हो या बच्चों की मंडी खोल कर बैठे हो? जो लोग दुनिया भर में शांति और इंसानियत का ढोंग रचते हैं, वो चंद रुपयों के लिए नवजात बच्चों का सौदा कर रहे थे।!
और ज़रा इनका अहंकार तो देखिए! साल 2015 में जब भारत में एक राष्ट्रवादी सरकार बैठी थी, तो सरकार ने अनाथ बच्चों को गोद लेने के कानून (CARA Guidelines) में कुछ सख्त बदलाव किए।
सरकार ने नियम बनाया की बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया एकदम पारदर्शी होगी और कोई भी योग्य इंसान (चाहे वो सिंगल मदर हो, तलाकशुदा हो या किसी भी धर्म का हो) बच्चा गोद ले सकता है।
जैसे ही ये नया कानून आया, मदर टेरेसा की इस संस्था को भयंकर मिर्ची लग गई। इन्होंने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की हम भारत सरकार के इस सिस्टम के तहत बच्चों को गोद नहीं देंगे!
इन्होंने भारत में अपने अनाथालयों से बच्चों को गोद देना ही बंद कर दिया। क्यों? क्योंकि इन्हें डर था की अगर इनका पाला हुआ कोई अनाथ बच्चा किसी हिंदू परिवार में चला गया, तो वो बच्चा बड़ा होकर मंदिर जाने लगेगा, वो माथे पर तिलक लगाएगा और रामायण पढ़ेगा।
इनका असली मकसद उन अनाथ बच्चों को एक खुशहाल परिवार देना कभी था ही नहीं! इनका इकलौता मकसद था उन बच्चों को सिर्फ और सिर्फ कैथोलिक ईसाई परिवारों में भेजना या उन्हें बचपन से ही अपने मिशनरी सिस्टम का हिस्सा बनाकर उन्हें कट्टर ईसाई नन और पादरी बनाना।
ये अनाथालय नहीं थे भाई, ये तो ईसाई धर्मांतरण की वो खौफनाक फैक्ट्रियां थीं जहाँ बेसहारा बच्चों का ब्रेनवॉश करके उन्हें सनातन धर्म के खिलाफ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता था।
लिबरल गद्दारों और विदेशी मीडिया का वो खौफनाक गठजोड़ जिसने एक धर्मांतरण एजेंट को बना दिया महान संत
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की अगर मदर टेरेसा की ये संस्था इतना बड़ा फ्रॉड कर रही थी, अगर ये गरीबों को तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ रही थी और बच्चों का सौदा कर रही थी, तो फिर मदर टेरेसा को पूरी दुनिया में ‘संत’ और ‘महान आत्मा’ का दर्जा कैसे मिल गया?
इसका जवाब छुपा है पश्चिम के उस ‘व्हाइट सेवियर कॉम्प्लेक्स’ (White Savior Complex) में और हमारे देश के उन वामपंथी पत्रकारों की गद्दारी में, जिन्होंने चंद डॉलरों के लिए अपने ही देश को दुनिया के सामने नंगा कर दिया।
अमेरिका और यूरोप के मीडिया, खासकर बीबीसी (BBC) और विदेशी पत्रकारों को हमेशा से भारत की एक बहुत ही गंदी, दरिद्र और सपेरों वाली तस्वीर दिखाने में मज़ा आता रहा है।
वो पूरी दुनिया को ये दिखाना चाहते थे की भारत तो भिखारियों और कुष्ठ रोगियों का देश है। यहाँ के हिंदू तो बहुत क्रूर हैं, ये लोग अपने ही गरीबों को कीड़े-मकोड़ों की तरह सड़क पर मरने के लिए छोड़ देते हैं।
और फिर इस विदेशी मीडिया ने अपनी एक ‘स्क्रिप्ट’ तैयार की। इन्होंने पूरी दुनिया को बताया की “देखो, जब हिंदू अपने ही लोगों को मरने के लिए छोड़ रहे थे, तब यूरोप से आई एक गोरी और दयालु क्रिश्चियन औरत ने आकर उन भारतीयों को बचाया।”
और हमारे ही देश के उन लिबरल नेताओं, सेक्युलर मुख्यमंत्रियों और JNU छाप पत्रकारों ने वेटिकन की इस दलाली में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इन्होंने एक धर्मांतरण करने वाली विदेशी एजेंट को हमारे बच्चों की किताबों में भगवान बनाकर बिठा दिया।
ये इस देश के आत्मसम्मान की सबसे बड़ी हत्या थी।
