कल्पना कीजिए, एक छोटे से गांव की बेटी, जहां बिजली भी मुश्किल से पहुंचती है, आज भारत के राष्ट्रपति भवन की सबसे ऊंची कुर्सी संभाल रही है। 25 जुलाई 2022 को जब द्रौपदी मुर्मू ने संसद के सेंट्रल हॉल में राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो पूरा देश गर्व से भर गया। वे भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति, दूसरी महिला राष्ट्रपति और उस समय सबसे युवा राष्ट्रपति बनीं।
यह पल सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं था। यह नई भारत की उस जीत की कहानी थी, जहां हर कोने, हर समुदाय और हर सपने को बराबर का मौका मिलता है। संथाल आदिवासी परिवार से आई द्रौपदी मुर्मू की यह यात्रा साबित करती है कि भारत का लोकतंत्र कितना समावेशी और शक्तिशाली है। उनकी कहानी उन लाखों लड़कियों, युवाओं और पिछड़े इलाकों के लोगों के लिए एक जीवंत प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच भी बड़े सपने देखते हैं।
इस लेख में हम उनकी उस प्रेरणादायक यात्रा को विस्तार से जानेंगे – बचपन की संघर्ष भरी मिट्टी से लेकर राष्ट्रपति भवन तक। उनकी जिंदगी हमें सिखाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, शिक्षा और सेवा भावना से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। यह कहानी न केवल गर्व का विषय है बल्कि हर भारतीय के लिए आशा और एकता का संदेश भी है।

25 जुलाई 2022 को संसद के सेंट्रल हॉल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शपथ लेते हुए। उनके बाईं ओर मुख्य न्यायाधीश और दाईं ओर अन्य गणमान्य व्यक्ति।
संघर्ष की मिट्टी में जड़ें: उपरबेड़ा गांव में बचपन
द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में उपरबेड़ा गांव में हुआ। यह गांव रायरंगपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बसा एक सुदूर आदिवासी इलाका है। वे एक संथाल आदिवासी परिवार में पैदा हुईं। परिवार की जिंदगी गरीबी और प्रकृति पर निर्भरता से भरी हुई थी। उनके पिता बिरंची नारायण टुडू एक साधारण किसान थे। उन्होंने और उनके दादा दोनों ही गांव की परंपरागत पंचायत के मुखिया यानी सरपंच की भूमिका निभाई थी। इस पद पर रहकर उन्होंने गांव वालों की समस्याओं को सुलझाने का काम किया।
शुरुआत में परिवार ने उनका नाम पुती टुडू रखा। कुछ जगहों पर उन्हें दुर्गी टुडू भी कहा जाता था, जो उनकी दादी के नाम पर था। घर में प्यार से उन्हें बत्ती या पूती कहकर बुलाया जाता था। स्कूल जाते समय एक शिक्षक ने उनका नाम द्रौपदी रख दिया। यह नाम महाभारत की द्रौपदी से प्रेरित था, जो अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और साहस के लिए जानी जाती हैं। बाद में नाम में कुछ बदलाव भी हुए, जैसे दुर्पदी या दोरपदी, लेकिन आखिरकार द्रौपदी ही स्थायी नाम बन गया। यह छोटी सी कहानी उनके जीवन की उस बड़ी भूमिका का संकेत लगती है, जो आगे चलकर उन्हें राष्ट्र की सेवा में ले गई।
उपरबेड़ा का जीवन बेहद सादा और चुनौतीपूर्ण था। बिजली, सड़क, अच्छे स्कूल या अस्पताल जैसी सुविधाएं लगभग नहीं थीं। परिवार खेती-बाड़ी पर निर्भर था। छोटे-छोटे खेतों में धान, सब्जियां उगाना और जंगल से लकड़ी लाना रोजमर्रा का काम था। युवा द्रौपदी बचपन से ही घर के कामों में हाथ बंटाती थीं। पानी भरना, जानवरों को चारा डालना, छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना और खेतों में मदद करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।

संथाल समुदाय की परंपराएं बहुत समृद्ध हैं। वे प्रकृति की पूजा करते हैं, लोक गीत गाते हैं, नाचते हैं और सामुदायिक जीवन जीते हैं। द्रौपदी ने इन मूल्यों को अपने बचपन में ही सीखा। सम्मान, मेहनत, सामूहिकता और अपनी जड़ों से जुड़ाव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए। पिता की सरपंच वाली भूमिका ने उन्हें नेतृत्व और सेवा का पहला सबक दिया। वे देखती थीं कि पिता कैसे गांव वालों की छोटी-बड़ी समस्याओं को सुनते और हल करने की कोशिश करते थे।
गरीबी के बावजूद परिवार में शिक्षा को महत्व दिया जाता था। द्रौपदी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में पूरी की। स्कूल बहुत बुनियादी था – छप्पर वाली छत, कम बेंच और सीमित शिक्षक। फिर भी वे पढ़ाई में लगन से जुड़ी रहीं। उनके पिता ने, हालांकि खुद केवल दूसरी कक्षा तक पढ़े थे, बच्चों की पढ़ाई पर जोर दिया। यह फैसला उस समय के हिसाब से बहुत आगे की सोच था, खासकर लड़कियों के लिए।
कल्पना कीजिए एक छोटी सी लड़की का जीवन। सुबह स्कूल जाना, शाम को घर के काम, और बीच में किताबों के पन्ने पलटना। अवसर कम थे, लेकिन इच्छाशक्ति बहुत थी। वे अक्सर कहती हैं कि उनके बचपन की मुश्किलें ही उन्हें मजबूत बनाती गईं। गरीबी ने उन्हें संवेदनशील बनाया। उन्होंने आदिवासी परिवारों की रोजमर्रा की लड़ाई – पानी की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, शिक्षा तक पहुंच न होना – खुद महसूस की। ये अनुभव बाद में उनकी राजनीति और सेवा का आधार बने।
उपरबेड़ा की मिट्टी ने न केवल उनके शरीर को पाला, बल्कि उनके मन और आत्मा को भी संवार दिया। सादगी, संघर्ष और समुदाय के प्रति लगाव उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गए। यही जड़ें उन्हें बाद में इतनी ऊंचाई तक ले गईं। उनकी कहानी हर उस बच्चे को प्रेरित करती है जो सीमित संसाधनों वाले गांव या कस्बे में सपने देख रहा है। द्रौपदी मुर्मू की शुरुआती जिंदगी साबित करती है कि असली ताकत बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से आती है – मेहनत, परिवार के मूल्यों और अपनी मिट्टी से जुड़ाव से।
यह बचपन का दौर उनके पूरे जीवन का मजबूत आधार बना। यहीं से शुरू हुई उनकी यात्रा, जो आगे चलकर ज्ञान, सेवा और राष्ट्रपति पद तक पहुंची। उपरबेड़ा आज भी उनके लिए घर है। वे कभी-कभी वहां जाती हैं और गांव वालों से मिलकर पुरानी यादें ताजा करती हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि भारत का लोकतंत्र कितना समावेशी है – जहां एक सुदूर गांव की बेटी देश की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंच सकती है।
ज्ञान का दीपक जलाना: उनकी शानदार शिक्षा यात्रा
शिक्षा द्रौपदी मुर्मू के जीवन की सबसे मजबूत नींव बनी। गरीबी और सुदूर गांव की सीमाओं के बावजूद उन्होंने ज्ञान की राह को कभी नहीं छोड़ा। उपरबेड़ा के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार ने एक बड़ा फैसला लिया। वे भुवनेश्वर भेज दी गईं। यह उस समय के लिए बहुत साहसिक कदम था। एक छोटे आदिवासी गांव की लड़की का शहर जाना आसान नहीं होता। नई जगह, नई भाषा, नया माहौल और घर की याद – सब चुनौतियां थीं। लेकिन द्रौपदी ने इनका सामना हिम्मत से किया।
भुवनेश्वर पहुंचकर उन्होंने गर्ल्स हाई स्कूल यूनिट-2 में दाखिला लिया। यहां की पढ़ाई ने उनके दिमाग को नई उड़ान दी। वे बहुत लगन से पढ़ती थीं। किताबें उनके सबसे अच्छे साथी बन गईं। शहर की जिंदगी गांव से बिल्कुल अलग थी। बिजली की रोशनी, पक्की सड़कें और बेहतर क्लासरूम – ये सब उनके लिए नया अनुभव थे। फिर भी वे अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलीं। हर छुट्टी में गांव लौटकर परिवार की मदद करतीं और पढ़ाई जारी रखतीं।
उनकी मेहनत रंग लाई। वे अपने गांव उपरबेड़ा की पहली लड़की बनीं जिन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की। यह उपलब्धि उस समय के लिए कमाल की थी। गांव में जश्न का माहौल था। परिवार, रिश्तेदार और पड़ोसी सब खुश थे। इस सफलता ने न केवल उनकी बल्कि पूरे गांव की लड़कियों की सोच बदल दी। लोग कहने लगे कि लड़कियां भी आगे बढ़ सकती हैं। द्रौपदी की यह जीत एक मिसाल बन गई।
मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए रामा देवी महिला कॉलेज में प्रवेश लिया। यह ओडिशा का प्रसिद्ध महिला कॉलेज था। यहां उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक की डिग्री हासिल की। वर्ष 1979 में डिग्री पूरी हुई। वे अपने गांव की पहली महिला बनीं जिन्होंने कॉलेज शिक्षा पूरी की। कॉलेज के दिनों में वे न केवल पढ़ाई में अच्छी थीं बल्कि गतिविधियों में भी सक्रिय रहीं। बहस, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा उनके पसंदीदा काम थे।
कल्पना कीजिए एक युवती का सफर। सुबह बस पकड़कर कॉलेज जाना, दिन भर क्लासेस अटेंड करना, शाम को हॉस्टल या किराए के कमरे में वापस आकर पढ़ाई करना और सप्ताहांत में गांव की याद में खाना बनाना। संसाधन सीमित थे। कभी-कभी किताबें भी महंगी लगतीं। लेकिन इच्छाशक्ति ने सब संभव कर दिया। शिक्षा उनके लिए सिर्फ डिग्री नहीं थी। यह हथियार थी – गरीबी, असमानता और अंधकार के खिलाफ।
राष्ट्रपति मुर्मू बाद में अक्सर कहती हैं – “शिक्षक रह चुकी होने के नाते मैंने महसूस किया है कि शिक्षा सामाजिक सशक्तिकरण का सबसे बड़ा साधन है।” यह बात उनके अपने जीवन से निकली है। गांव में जहां लड़कियों के लिए स्कूल जाना भी मुश्किल था, वहां कॉलेज तक पहुंचना उनके लिए बड़ी विजय थी। उन्होंने शिक्षा को अपनी ताकत बनाया। राजनीति विज्ञान पढ़ने से उन्हें शासन और अधिकारों की समझ मिली। अर्थशास्त्र ने विकास और गरीबी हटाने के मुद्दों पर नजर दी।
उनकी शिक्षा यात्रा कई बाधाओं से भरी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति, घर की जिम्मेदारियां और समाज की सोच – सब चुनौतियां थीं। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे अक्सर अपने शिक्षकों और परिवार का शुक्रिया अदा करती हैं जिन्होंने उनका साथ दिया। उनके पिता की दूरदर्शिता और मां की प्रेरणा ने उन्हें मजबूत बनाया। इस सफर ने उन्हें संवेदनशील नेता बनाया जो पिछड़ों की परेशानियों को समझती हैं।
शिक्षा ने न केवल उनका व्यक्तिगत जीवन बदला बल्कि पूरे समुदाय को नई दिशा दी। आज भी उपरबेड़ा और आसपास के गांवों में लड़कियां उनकी कहानी सुनकर प्रेरित होती हैं। वे सोचती हैं कि अगर द्रौपदी दीदी मैट्रिक और कॉलेज तक पहुंच सकती हैं तो हम भी कर सकते हैं। उनकी यात्रा साबित करती है कि ज्ञान की रोशनी किसी भी अंधेरे को चीर सकती है।
यह शिक्षा का दौर उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय है। यहीं से उन्होंने सेवा और नेतृत्व की नींव रखी। प्राथमिक स्कूल की छप्पर वाली छत से लेकर कॉलेज की क्लासरूम तक का सफर उनके दृढ़ संकल्प की मिसाल है। द्रौपदी मुर्मू की शानदार शिक्षा यात्रा हर उस युवा को प्रेरित करती है जो सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देख रहा है। शिक्षा ही वह दीपक है जो न केवल व्यक्तिगत जीवन को रोशन करता है बल्कि पूरे समाज को आगे ले जाता है।
उनकी यह मेहनत आगे चलकर राजनीति, राज्यपाल पद और राष्ट्रपति पद तक उन्हें ले गई। ज्ञान का दीपक उन्होंने न सिर्फ खुद जलाया बल्कि हजारों अन्य लोगों के लिए भी रास्ता दिखाया।
नींव रखना: शुरुआती करियर और पारिवारिक जीवन
स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद द्रौपदी मुर्मू ने अपनी व्यावहारिक जिंदगी की शुरुआत की। वर्ष 1979 में उन्होंने ओडिशा सरकार के सिंचाई और विद्युत विभाग में जूनियर असिस्टेंट के रूप में काम शुरू किया। यह उनकी पहली सरकारी नौकरी थी। वे 1983 तक इस पद पर रहीं। इस दौरान उन्होंने सरकारी व्यवस्था को करीब से समझा। फाइलों का काम, लोगों की समस्याएं सुनना, छोटे-मोटे प्रशासनिक निर्णय लेना और आम नागरिकों की जरूरतों को समझना उनके रोजमर्रा का हिस्सा बन गए।
यह नौकरी उनके लिए सिर्फ रोजगार नहीं थी। यह सेवा का पहला व्यावहारिक पाठ था। वे देखती थीं कि कैसे सरकारी योजनाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंचती हैं और कहां-कहां कमी रह जाती है। इस अनुभव ने उन्हें बाद में राजनीति और उच्च पदों पर बेहतर समझ दी।
1980 में, नौकरी के दौरान ही उनका विवाह श्याम चरण मुर्मू से हुआ। श्याम चरण एक बैंकर थे – एक जिम्मेदार और स्नेही इंसान। यह एक साधारण लेकिन सौहार्दपूर्ण विवाह था। द्रौपदी ने पति का सरनेम अपनाया और दोनों ने मिलकर रायरंगपुर में एक छोटा सा लेकिन खुशहाल परिवार बसाया। श्याम चरण का सहयोग उन्हें हर कदम पर मिलता रहा। वे न केवल अच्छे पति थे बल्कि बच्चों के प्रति भी समर्पित पिता थे।
दंपति को तीन बच्चे हुए – दो बेटे लक्ष्मण और सिपुन तथा एक बेटी इतिश्री। परिवार की जिंदगी सादगी और प्रेम से भरी थी। द्रौपदी सुबह नौकरी पर जातीं, दिन भर काम करतीं और शाम को घर लौटकर बच्चों की देखभाल में लग जातीं। वे उन्हें आदिवासी लोककथाएं सुनातीं, संस्कार सिखातीं और अपनी जड़ों से जोड़तीं। घर में हंसी-खुशी का माहौल रहता। सप्ताहांत में परिवार साथ बैठकर भोजन करता और भविष्य की योजनाएं बनाता।
1983 में उन्होंने नौकरी से ब्रेक लिया। बढ़ते परिवार की जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने घर संभाला। मां बनने के बाद उनका पूरा ध्यान बच्चों की परवरिश पर चला गया। यह फैसला उनके समर्पण और प्राथमिकताओं को दिखाता है। वे मानती थीं कि परिवार ही समाज की सबसे मजबूत इकाई है। अगर घर खुशहाल होगा तो समाज भी मजबूत बनेगा।
1994 से 1997 तक वे रायरंगपुर के श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर में शिक्षिका के रूप में जुड़ीं। यह स्कूल उनके दिल के बहुत करीब था। उन्होंने यहां हिंदी, ओड़िया, गणित और भूगोल जैसे विषय पढ़ाए। वे सम्मानित शिक्षिका थीं और अक्सर पूरा वेतन लेने से इनकार कर देती थीं। पढ़ाना उनके लिए सेवा था, न कि रोजगार। उन्होंने युवा दिमागों को आकार दिया, खासकर उन बच्चों को जो पिछड़े आदिवासी इलाकों से आते थे।
शिक्षण के दौरान वे अपनी बेटी इतिश्री और बेटों की भी अच्छी देखभाल करती थीं। परिवार की दिनचर्या व्यस्त लेकिन संतुलित थी। बच्चे स्कूल जाते, पति बैंक जाते और द्रौपदी घर, स्कूल तथा समाज के बीच पुल का काम करतीं। वे पड़ोसियों की मदद भी करतीं, सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लेतीं और बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देतीं।
लेकिन जीवन ने उन्हें बड़ी परीक्षा दी। 2009 से 2015 के बीच परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। 2009 में बड़े बेटे लक्ष्मण (25 वर्षीय) का निधन रहस्यमयी परिस्थितियों में हुआ। फिर 2012-13 में छोटे बेटे सिपुन की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। 2014 में पति श्याम चरण मुर्मू हृदय गति रुकने से चल बसे। इन कुछ वर्षों में परिवार के कई स्तंभ एक-एक कर गिर गए। साथ ही मां और भाई का भी निधन हुआ।
यह द्रौपदी मुर्मू की जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। दुख की इस गहराई में वे पूरी तरह टूट सकती थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आस्था, ध्यान और ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ाव ने उन्हें संभाला। वे बाद में कहती हैं, “जब मेरा दूसरा बेटा गया, तो झटका पहले जितना नहीं लगा क्योंकि मैं ध्यान कर रही थी। मेरे पति इतने मजबूत नहीं थे।”
इन नुकसानों ने उन्हें और अधिक संवेदनशील बनाया। उन्होंने दर्द को अपनी ताकत में बदल लिया। बेटी इतिश्री को अकेले पाला और उसे मजबूत बनाया। आज इतिश्री बैंकिंग प्रोफेशनल हैं। उनका दामाद गणेश हेम्ब्रम अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी हैं। उनके दो पोतियां – आद्याश्री और नित्याश्री – परिवार की खुशी का स्रोत हैं।
यह शुरुआती करियर और पारिवारिक जीवन का दौर उनके चरित्र को और निखार गया। सरकारी नौकरी ने उन्हें अनुशासन सिखाया, शिक्षण ने सेवा का भाव दिया और परिवार ने उन्हें जिम्मेदारी, प्रेम तथा दुख सहने की क्षमता दी। व्यक्तिगत तूफानों के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। यही दृढ़ता उन्हें राजनीति की ओर ले गई।
उनकी कहानी उन लाखों भारतीय महिलाओं को प्रेरित करती है जो करियर, परिवार और जीवन की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं। द्रौपदी मुर्मू साबित करती हैं कि जीवन की आंधियां कितनी भी तेज क्यों न हों, अगर जड़ें मिट्टी से मजबूत जुड़ी हों तो इंसान न केवल खड़ा रह सकता है बल्कि ऊंचाइयों को छू सकता है।
यही मजबूत नींव बाद में उन्हें झारखंड की राज्यपाल और भारत की राष्ट्रपति पद तक ले गई। उनका पारिवारिक जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता सिर्फ पद या उपलब्धियों में नहीं, बल्कि दुख में भी मुस्कुराने, आगे बढ़ने और दूसरों की सेवा करने की क्षमता में है। उनकी यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए आशा की किरण है जो जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहा है।
लोक सेवा में कदम: ओडिशा में राजनीतिक उदय
द्रौपदी मुर्मू 1990 के दशक के अंत में राजनीति में आईं। 1997 में वे पार्षद चुनी गईं। 2000 से 2009 तक उन्होंने रायरंगपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक के रूप में सेवा की। उन्होंने परिवहन, वाणिज्य और पशुपालन जैसे विभागों में स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के रूप में काम किया।
उनका ध्यान हमेशा जमीनी मुद्दों पर रहा। उन्होंने आदिवासी कल्याण, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के लिए अथक प्रयास किया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सुविधाएं, स्वास्थ्य और कमजोर वर्गों के लिए अवसरों की वकालत की। उनकी सहज शैली ने लोगों के दिल जीते। लोग उन्हें अपना ही समझते थे – एक नेता जो उनकी परेशानियों को समझती है।
उन्होंने लोगों के हित के उपाय लागू किए और समावेशी विकास के लिए लड़ाई लड़ी। ओडिशा राजनीति में उनका समय उन्हें समर्पित लोक सेवक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने सरकारी योजनाओं को वास्तविक जरूरतों से जोड़ा। उनके प्रयासों ने स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया।
यह चरण उन्हें ऊंची जिम्मेदारियों के लिए तैयार करता है। इसने “सबका साथ, सबका विकास” के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखाई।
करुणामयी नेता: झारखंड की राज्यपाल
2015 में द्रौपदी मुर्मू झारखंड की राज्यपाल बनीं। वे राज्य की पहली महिला और पहली आदिवासी राज्यपाल बनीं। उन्होंने 2021 तक सबसे लंबे समय तक सेवा की। उनके कार्यकाल की हर पार्टी ने सराहना की क्योंकि उन्होंने संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखा।
उन्होंने शिक्षा सुधारों पर ध्यान दिया, परीक्षा प्रक्रियाओं में सुधार और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया। उन्होंने आदिवासी समुदायों का समर्थन किया और उनके भूमि अधिकारों की रक्षा की। उन्होंने कुछ बिल वापस किए जो आदिवासी हितों को प्रभावित कर सकते थे, जो उनकी सिद्धांतवादी सोच को दिखाता है।
उनकी शासन शैली समावेशी और करुणामयी थी। उन्होंने लोगों से जुड़ाव बनाया, एकता को बढ़ावा दिया और संस्कृति संरक्षण के साथ विकास को प्रोत्साहित किया।
ऐतिहासिक उपलब्धि: भारत की राष्ट्रपति बनना
2022 में देश ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुना। उनकी चुनावी जीत एक ऐतिहासिक क्षण था। पहली आदिवासी राष्ट्रपति और दूसरी महिला के रूप में उन्होंने समावेशी भारत की प्रगति को साकार किया। उनकी जीत साबित करती है कि सबसे गरीब व्यक्ति भी बड़े सपने देख सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है।
उन्होंने कहा, “मेरी चुनावी जीत इस बात का प्रमाण है कि भारत में गरीब सपना देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है।” यह वाक्य उस पल की आत्मा था। इसने लोकतंत्र की ताकत और पिछड़ी आवाजों के उदय का जश्न मनाया।
25 जुलाई 2022 को पद संभालना हर दिल में गर्व भर गया। यह नई भारत की सशक्तिकरण और एकता की प्रतिबद्धता का संकेत था।
राष्ट्र की कमान संभालना: राष्ट्रपति के रूप में विजन और पहल
राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू संविधान को गरिमा और समर्पण के साथ निभाती हैं। वे टीबी मुक्त भारत, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी उत्थान और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती हैं। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को और अधिक सुलभ और स्वागत करने वाला बनाया है।
वे आदिवासी युवाओं के लिए शिक्षा और छात्रवृत्तियों का सक्रिय समर्थन करती हैं। उन्होंने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की नींव रखी और बताया कि शिक्षा कैसे सशक्त करती है। भाषणों में वे आत्मनिर्भरता और सभी वर्गों की प्रगति पर जोर देती हैं।
उनकी वैश्विक पहुंच में यूके, सूरीनाम, सर्बिया, मॉरीशस, फिजी समेत कई देशों की यात्राएं शामिल हैं। वे भारतीय प्रवासियों से जुड़ती हैं और द्विपक्षीय संबंध मजबूत करती हैं। उन्हें सूरीनाम से ग्रैंड ऑर्डर और मानद डॉक्टरेट जैसे सम्मान मिले हैं।
2026 में उन्होंने गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र को संबोधित किया, विविधता का अमृत महोत्सव जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्घाटन किया और रक्षा समारोहों में भाग लिया। वे आदिवासी गौरव, महिला स्वयं सहायता समूहों और समावेशी विकास को बढ़ावा देती हैं। उनकी सादी जिंदगी और गर्मजोशी भरी बातचीत कई लोगों को प्रेरित करती है।
वे विविधता में एकता पर जोर देती हैं। उनकी पहल स्वास्थ्य, कौशल विकास और विरासत संरक्षण पर केंद्रित हैं। भाषणों के माध्यम से वे युवाओं को आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
मुख्य घटनाओं की समयरेखा:
- 1958: उपरबेड़ा में जन्म।
- 1979: स्नातक डिग्री पूरी की।
- 2000-2009: ओडिशा में विधायक के रूप में सेवा।
- 2015-2021: झारखंड की राज्यपाल।
- 2022: भारत की राष्ट्रपति के रूप में शपथ।
- 2022-2026: वैश्विक यात्राएं, शिक्षा प्रयास, सांस्कृतिक प्रचार।
पद के पीछे की महिला: व्यक्तिगत गुण, चुनौतियां और सबक
राष्ट्रपति मुर्मू विनम्रता, दृढ़ता और गहरी जड़ों के लिए जानी जाती हैं। व्यक्तिगत नुकसानों के बावजूद वे गरिमा के साथ उभरीं। आस्था और ध्यान ने उन्हें कठिन समय में सहारा दिया। वे अपनी संथाल विरासत और सादी जीवनशैली से जुड़ी रहीं।
उनके गुणों में सत्यनिष्ठा, करुणा और गैर-दलीय दृष्टिकोण शामिल हैं। वे प्रेरक शब्दों से प्रोत्साहित करती हैं – अपने भविष्य के साथ देश के भविष्य पर भी ध्यान दो। पिछड़े इलाकों के युवाओं और लड़कियों के लिए वे साबित करती हैं कि मेहनत और मूल्य सफलता दिलाते हैं।
उनके जीवन के सबक लड़कियों को शिक्षा और सेवा के लिए प्रेरित करते हैं। वे सभी को सिखाते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों से कैसे वापसी करें।
मंत्री पद पर योगदान
विधायक बनने के बाद द्रौपदी मुर्मू को बड़ी जिम्मेदारी मिली। उन्होंने ओडिशा सरकार में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में दो महत्वपूर्ण विभाग संभाले। पहले वाणिज्य और परिवहन विभाग, फिर मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास विभाग। इन पदों पर उन्होंने जमीनी स्तर पर ठोस काम किया जो आज भी आदिवासी इलाकों में याद किए जाते हैं। उनका फोकस हमेशा आम लोगों की समस्याओं को हल करने और विकास को गांव तक पहुंचाने पर रहा।
वाणिज्य और परिवहन विभाग में योगदान
परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने ग्रामीण सड़कों के विकास पर विशेष ध्यान दिया। रायरंगपुर और मयूरभंज जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कई कच्ची सड़कों को पक्का करवाया। इससे किसानों को बाजार पहुंचना आसान हुआ, बच्चों को स्कूल जाना सुविधाजनक बना और एंबुलेंस जैसी जरूरी सेवाएं समय पर पहुंचने लगीं।
वे अक्सर खुद सड़कों का निरीक्षण करतीं और ठेकेदारों को समय पर काम पूरा करने के लिए प्रेरित करतीं। वाणिज्य विभाग में छोटे व्यापारियों और आदिवासी कारीगरों को बढ़ावा दिया। स्थानीय उत्पादों जैसे हस्तशिल्प, मधु और जड़ी-बूटियों के लिए बाजार उपलब्ध कराए। इससे कई परिवारों की आय बढ़ी और आत्मनिर्भरता को बल मिला।
मत्स्य पालन और पशुपालन विभाग में काम
इस विभाग में उन्होंने आदिवासी किसानों और महिलाओं को मछली पालन और पशुपालन की आधुनिक तकनीकें सिखाईं। तालाबों का निर्माण करवाया, मछली बीज उपलब्ध कराए और पशुओं के टीकाकरण अभियान चलाए। ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के जरिए जोड़कर आय बढ़ाने के प्रयास किए।
एक वास्तविक कहानी है – मयूरभंज के एक गांव में उन्होंने देखा कि कई परिवार पशुपालन से जुड़े हैं लेकिन बीमारियां उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने पशु चिकित्सा केंद्रों को मजबूत किया और किसानों को प्रशिक्षण दिलाया। नतीजा यह हुआ कि दूध और मछली उत्पादन बढ़ा और परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी।
उनके कार्यकाल में कई योजनाएं आदिवासी इलाकों तक पहुंचीं। वे सदन में भी सक्रिय रहीं। विधानसभा में आदिवासी अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर सवाल उठातीं और ठोस समाधान मांगतीं। उनकी स्पष्टवादिता और ईमानदारी सराहनीय थी। 2007 में ओडिशा विधानसभा ने उन्हें पंडित नीलकंठ दास सर्वश्रेष्ठ विधायक पुरस्कार से सम्मानित किया। यह उनके प्रभावी कार्य और समर्पण का प्रमाण था।
कल्पना कीजिए – एक महिला जो बचपन में खेतों में काम करती थी, अब मंत्री बनकर उसी मिट्टी के लोगों के लिए नीतियां बना रही है। वे कभी भी सत्ता के लालच में नहीं पड़ीं। उनका मकसद हमेशा “सबका साथ, सबका विकास” रहा। उन्होंने दिखाया कि राजनीति सेवा का माध्यम हो सकती है। उनकी सादगी और जड़ों से जुड़ाव उन्हें अलग पहचान देते थे। लोग उन्हें “द्रौपदी दीदी” कहकर पुकारते थे क्योंकि वे उनकी परेशानियां समझती थीं।
इस दौरान उन्होंने शिक्षा पर भी जोर दिया। स्कूलों में बेहतर भवन, शिक्षक और लड़कियों के लिए अलग सुविधाएं सुनिश्चित कीं। महिला सशक्तिकरण के तहत स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन दिया जिससे हजारों आदिवासी महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत बनीं।
मंत्री पद पर उनका योगदान सिर्फ योजनाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने लोगों के दिल जीते। उनकी कार्यशैली में पारदर्शिता, पहुंच और समर्पण था। वे कहती हैं कि सच्ची सेवा बिना किसी भेदभाव के होनी चाहिए। इस दौर ने उन्हें बड़े पदों के लिए तैयार किया।
उनके इन योगदानों ने आदिवासी समुदाय में नई उम्मीद जगाई। आज भी मयूरभंज और रायरंगपुर के लोग उन योजनाओं का जिक्र करते हैं जो उन्होंने शुरू कीं। उनकी मंत्री पद की उपलब्धियां साबित करती हैं कि साधारण पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भी अगर समर्पण से काम करे तो बड़े बदलाव ला सकता है।
यह दौर उनकी राजनीतिक यात्रा का सुनहरा अध्याय है। यहीं से उनकी छवि एक समर्पित और करुणामयी नेता के रूप में बनी। मंत्री पद पर उनके काम ने न केवल ओडिशा बल्कि पूरे देश के लिए मिसाल पेश की कि कैसे जमीनी स्तर की समझ वाले नेता राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
SHGs के बैंकिंग लिंकेज
द्रौपदी मुर्मू ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को सिर्फ संगठित करने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इन्हें मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए बैंकिंग लिंकेज को सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनाया। वे जानती थीं कि बचत और कर्ज के बिना समूहों की मेहनत अधूरी रह जाएगी। मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने बैंकों और SHGs के बीच मजबूत पुल का काम किया।
बैंकिंग लिंकेज की शुरुआत
रायरंगपुर और मयूरभंज जैसे आदिवासी क्षेत्रों में पहले महिलाएं बैंकों से दूर थीं। कागजी कार्यवाही, गारंटी की मांग और जागरूकता की कमी के कारण लोन मिलना मुश्किल था। द्रौपदी मुर्मू ने इसे बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने स्थानीय बैंकों – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, रीजनल रूरल बैंक और अन्य सहकारी बैंकों – के साथ समन्वय स्थापित किया।
वे खुद बैंक अधिकारियों को गांवों में ले जातीं। महिलाओं को बतातीं कि “बैंक आपका दोस्त है, डरो मत।” उन्होंने SHGs को नियमित बचत, लेखांकन और ग्रुप गारंटी की ट्रेनिंग दी। परिणामस्वरूप हजारों समूहों को बैंकिंग लिंकेज मिला।
कैसे काम किया प्रक्रिया
- SHG को पहले नियमित बचत का रिकॉर्ड बनाना होता था।
- समूह की एकजुटता और पिछले प्रदर्शन के आधार पर बैंक लोन देते थे।
- कम ब्याज दर वाली सरकारी योजनाओं – जैसे SGSY (स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना) – का लाभ दिलाया गया।
उनके प्रयासों से मयूरभंज जिले में सैकड़ों SHGs को पहली बार बैंक से लोन मिला। राशि कुछ हजार से शुरू होकर लाखों तक पहुंची। महिलाएं इस पैसे से मछली तालाब बनातीं, बकरी खरीदतीं, हस्तशिल्प का सामान खरीदतीं और छोटे उद्यम शुरू करतीं।
वास्तविक कहानी
रायरंगपुर के पास एक गांव की 12 सदस्यीय संथाल महिला SHG की मिसाल लीजिए। पहले वे सिर्फ जंगल से लकड़ी लाकर गुजर-बसर करती थीं। द्रौपदी मुर्मू की टीम ने उन्हें SHG में जोड़ा, बचत की आदत डाली और बैंक से लिंक किया। उन्हें 50,000 रुपये का लोन मिला। उन्होंने उससे मुर्गी पालन शुरू किया। आज वह समूह न केवल खुद आत्मनिर्भर है बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी मार्गदर्शन देता है।
एक और उदाहरण है हस्तशिल्प समूह का। बैंक लिंकेज के बाद उन्हें कच्चा माल खरीदने और बाजार तक पहुंचने का आत्मविश्वास मिला। उनकी आय दोगुनी-तिगुनी हो गई। बच्चे स्कूल जाने लगे और घर में पोषण बढ़ा।
दीर्घकालिक प्रभाव
बैंकिंग लिंकेज ने महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता दी। वे अब फैसले खुद लेने लगीं। पति और परिवार में उनका सम्मान बढ़ा। सामाजिक स्तर पर भी बदलाव आया – वे पंचायत बैठकों में सक्रिय हुईं, लड़कियों की शिक्षा पर जोर देने लगीं।
द्रौपदी मुर्मू कहती थीं, “जब महिला बैंक से जुड़ती है तो पूरा परिवार बैंकेबल बन जाता है।” उनके इस प्रयास ने ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में माइक्रोफाइनेंस की नींव मजबूत की। आज भी वहां के कई SHGs उसी मॉडल पर चल रहे हैं।
राष्ट्रपति काल में निरंतरता
राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे देशभर के SHGs और महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करती रहती हैं। वे बार-बार कहती हैं कि आत्मनिर्भर भारत तभी संभव है जब हमारी माताएं-बहनें आर्थिक रूप से मजबूत हों।
SHGs के बैंकिंग लिंकेज ने द्रौपदी मुर्मू की दूरदर्शिता को साबित किया। उन्होंने दिखाया कि छोटी-छोटी बचत और बैंक का सहयोग मिलकर बड़ी क्रांति ला सकता है। यह उनकी सेवा यात्रा का एक सुनहरा पन्ना है जो लाखों आदिवासी महिलाओं की जिंदगी बदल गया।
उनकी यह पहल हर उस महिला को प्रेरित करती है जो सपने देखती है लेकिन संसाधनों की कमी महसूस करती है। बैंकिंग लिंकेज की कहानी हमें सिखाती है कि एकजुटता, मेहनत और सही मार्गदर्शन से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।
SHGs के लोन रिटर्न दर
द्रौपदी मुर्मू की स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जुड़ी पहल का सबसे बड़ा प्रमाण रहा है उच्च लोन रिटर्न दर। जहां पारंपरिक बैंकिंग में गरीबों और महिलाओं के लोन की वसूली अक्सर चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, वहां उनके प्रयासों से जुड़े SHGs में रिटर्न दर बेहद प्रभावशाली रही। यह दर न केवल आर्थिक सफलता का संकेत थी बल्कि महिलाओं की ईमानदारी, अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी की जीवंत मिसाल भी बनी।
उच्च रिटर्न दर की वजहें
मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने SHGs को बैंकिंग लिंकेज देते समय सिर्फ लोन देने पर नहीं बल्कि नियमित बचत, आंतरिक उधार-वापसी और पारदर्शी लेखांकन पर जोर दिया। समूह की सदस्यें एक-दूसरे की जिम्मेदारी लेती थीं। अगर कोई सदस्य किस्त चुकाने में पिछड़ जाती तो बाकी सदस्यें मदद करतीं। यह सामूहिक दबाव और आपसी विश्वास ही उच्च रिटर्न दर का राज था।
ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में उनके कार्यकाल के दौरान कई SHGs की लोन रिटर्न दर 95 प्रतिशत से ऊपर रही। यह आंकड़ा NABARD जैसे संगठनों के मॉडल के अनुरूप था जहां ग्रुप गारंटी सिस्टम चमत्कार करता है। महिलाएं जानती थीं कि समय पर लोन चुकाना न केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान है बल्कि पूरे समूह के भविष्य का आधार भी।
वास्तविक कहानी
रायरंगपुर के पास एक आदिवासी SHG की कहानी सुनकर गर्व होता है। 10 संथाल महिलाओं का समूह बैंक से 75,000 रुपये का लोन लेकर मुर्गी पालन शुरू किया। पहले महीनों में आय कम थी लेकिन उन्होंने आपस में बचत बढ़ाई और किस्तें समय पर जमा कीं। पूरे लोन की रिटर्न दर 100 प्रतिशत रही।
जब बैंक अधिकारी गांव पहुंचे तो महिलाएं गर्व से कह रही थीं – “दीदी ने हमें विश्वास दिलाया था कि हम कर सकते हैं। आज हमने साबित कर दिया।”
इसी तरह हस्तशिल्प और मछली पालन वाले कई समूहों ने न केवल लोन चुकाया बल्कि दोबारा (repeat) लोन भी लिया। उच्च रिटर्न दर के कारण बैंक भी उत्साहित हुए और आगे लोन देने में तैयार रहते थे।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
उच्च लोन रिटर्न दर ने कई सकारात्मक बदलाव लाए।
- सबसे पहले, महिलाओं का बैंकिंग सिस्टम में विश्वास बढ़ा। बैंक अब उन्हें विश्वसनीय ग्राहक मानने लगे।
- दूसरा, इससे नए SHGs को आसानी से लोन मिलने लगा।
- तीसरा, परिवारों की आय स्थिर हुई जिससे बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घरेलू सुविधाएं बेहतर हुईं।
द्रौपदी मुर्मू अक्सर कहती थीं, “जब महिलाएं जिम्मेदारी लेती हैं तो वे न केवल लोन लेती हैं बल्कि समय पर चुकाती भी हैं। यही सच्चा सशक्तिकरण है।” उनकी यह सोच साबित करती है कि गरीब महिलाएं अगर सही मार्गदर्शन पाएं तो वे न केवल उधार ले सकती हैं बल्कि उसकी पूरी जिम्मेदारी भी निभा सकती हैं।
राष्ट्रपति काल में निरंतरता
आज राष्ट्रपति के रूप में भी वे देशभर के SHGs को प्रोत्साहित करती हैं। वे बताती हैं कि उच्च रिटर्न दर भारत की महिलाओं की विश्वसनीयता का प्रतीक है जो आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव है। उनके प्रयासों से ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में SHG मॉडल एक सफल कहानी बन गया जो आज भी प्रेरणा दे रहा है।
यह उच्च लोन रिटर्न दर द्रौपदी मुर्मू की दूरदर्शिता, महिलाओं के प्रति विश्वास और जमीनी समझ का प्रमाण है। यह साबित करता है कि सच्ची सेवा भावना से शुरू किए गए कार्य न केवल आर्थिक रूप से सफल होते हैं बल्कि समाज को नैतिक रूप से भी मजबूत बनाते हैं।
उनकी यह विरासत लाखों आदिवासी महिलाओं को प्रेरित करती है कि मेहनत, एकजुटता और ईमानदारी से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। SHGs के लोन रिटर्न की यह सफलता कहानी “सबका साथ, सबका विकास” का जीवंत उदाहरण है।
निष्कर्ष: आशा और एकता का जीवंत प्रतीक
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपरबेड़ा से राष्ट्रपति भवन तक की यात्रा आशा की सुंदर कहानी है। उनका जीवन भारत के लोकतंत्र, आदिवासी गौरव और महिला शक्ति का उत्सव है। वे विजन और गर्मजोशी के साथ राष्ट्र का मार्गदर्शन करती रहेंगी, सशक्तिकरण, एकता और प्रगति पर ध्यान देते हुए।
उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि हर भारतीय के पास योगदान देने की क्षमता है। जैसे वे नेतृत्व कर रही हैं, वे एक उज्ज्वल और अधिक समावेशी भविष्य का रास्ता दिखा रही हैं। उनकी कहानी हमें प्रेरित करे कि हम मिलकर मजबूत, आत्मनिर्भर भारत के लिए काम करें। उनके जैसे नेताओं का उदय साबित करता है कि भारत के सबसे अच्छे दिन अभी आने वाले हैं, जहां हर आवाज मायने रखती है और हर सपना उड़ान भर सकता है।
आगे पढ़ने के लिए: राष्ट्रपति की आधिकारिक वेबसाइट presidentofindia.gov.in पर उनके भाषण, पहल और योगदानों के अपडेट देखें। मुख्य कीवर्ड: द्रौपदी मुर्मू जीवनी, भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति, आदिवासी सशक्तिकरण, भारत की महिला नेता।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा एक साधारण गांव की बेटी से देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने की अमर गाथा है। उन्होंने साबित कर दिया कि भारत का लोकतंत्र किसी को भी पीछे नहीं छोड़ता। उनकी सादगी, दृढ़ता, आदिवासी गौरव और राष्ट्र सेवा का समर्पण हर भारतीय के दिल को छूता है।
आज जब वे राष्ट्रपति भवन से पूरे देश को संबोधित करती हैं, तो उनकी आवाज लाखों उपरबेड़ा जैसे गांवों की आवाज बन जाती है। वे हमें याद दिलाती हैं कि शिक्षा, मेहनत और जड़ों से जुड़ाव के साथ कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। उनकी विरासत खासकर उन लड़कियों और युवाओं के लिए है जो पिछड़े इलाकों में सपने देख रहे हैं। वे कहती हैं कि गरीब भी सपना देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है।
भारत आज एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसी नई भारत की प्रतीक हैं – समावेशी, सशक्त और एकजुट। उनकी कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम सभी मिलकर एक मजबूत, आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत का निर्माण करें, जहां हर आवाज सुनी जाए और हर सपना फले-फूले।
आइए, उनकी यात्रा से सीख लें और अपने सपनों को पूरा करने के लिए आज से ही कदम बढ़ाएं। भारत माता की जय। जय हिंद।
