‘पंडित डकैत’ बेनीमाधव रॉय- बंगाल का वो खूंखार ब्राह्मण, हर अमावस्या की रात जिहादी पठानों को कर लेता अगवा, सर काट के माँ दुर्गा को देता था जिहादियों की ‘नरबलि’

16वीं सदी का वो मनहूस और खौफनाक दौर याद कीजिये, जब बंगाल की धरती पर विदेशी जिहादियों के ज़ुल्मों का नंगा नाच चल रहा था। हवाओं में सिर्फ और सिर्फ हमारे मंदिरों के टूटने की आवाज़ें और हमारी बेबस हिन्दू बहन-बेटियों की चीखें गूंजती थीं।

अफगानी और पठान आक्रांताओं ने सनातनियों के खून से अपनी प्यास बुझाने को ही अपना सबसे बड़ा मज़हब मान लिया था। जिहाद की ऐसी खौफनाक आंधी चल रही थी की लगने लगा था जैसे बंगाल की पवित्र माटी से अब सनातन का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाएगा।

लेकिन हमारे शास्त्रों में लिखा है की जब असुरों का आतंक बर्दाश्त की सारी हदें पार कर देता है, जब धर्म पर संकट आता है, तो महाकाल किसी न किसी के हाथों में अपना खप्पर थमा कर उसे धरती पर भेज ही देते हैं।

उसी दौर में बंगाल के राजशाही (जो आज के समय में बांग्लादेश का हिस्सा है) में एक बहुत ही शांत ‘वरेन्द्र ब्राह्मण’ और संस्कृत के विद्वान रहा करते थे- आचार्य बेनीमाधव रॉय।

जो इंसान दिन-रात वेदों, शास्त्रों और उपनिषदों का पाठ करता हो, सोचिए उसके अंदर कितनी शांति और कितना ठहराव होगा।

बेनीमाधव रॉय अपने धर्म-कर्म में लीन रहने वाले एक आम आचार्य थे। लेकिन जब उन विदेशी जिहादी आक्रांताओं का ज़ुल्म अपनी सारी हदें पार कर गया, जब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा, तो उस शांत ब्राह्मण ने शास्त्र को ज़मीन पर रखकर वो खौफनाक शस्त्र उठाया की बंगाल के पठानों की रूह कांप गई।

आज हम उसी खूंखार ब्राह्मण और सनातन के सबसे बड़े रक्षक की वो धधकती हुई कहानी खोलेंगे जिसे सुनकर आज के हर सनातनी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।

ये उस ‘पंडित’ का खौफनाक तांडव है जिसने पठानों की छाती फाड़कर दुनिया को ये बता दिया था की जब एक सनातनी अपनी शिखा खोलकर शस्त्र उठाता है, तो बड़े-बड़े जिहादी साम्राज्यों की अर्थियां शमशान पहुंच जाती हैं।

जिहादी पठान के हाथों पत्नी का अपहरण और मंदिरों का विध्वंस, जब वेद पढ़ने वाले पंडित बेनीमाधव के अंदर जाग उठा भगवान परशुराम का क्रोध

उस 16वीं सदी के बंगाल में आम हिंदुओं की ज़िंदगी नर्क बन चुकी थी। जो ज़ालिम पठान फौजदार थे, वो नशे में धुत होकर किसी भी हिंदू मंदिर में घुस जाते और हमारी पवित्र मूर्तियों को तोड़ देते थे।

हिंदुओं की पूजा-पाठ, शंख बजाने और त्योहार मनाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। लेकिन बेनीमाधव रॉय इन सब से दूर अपनी विद्वता में लीन थे। फिर एक दिन उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने बंगाल के इतिहास की पूरी धारा ही पलट कर रख दी।

बेनीमाधव रॉय की पत्नी सान्याल परिवार की राजकन्या थीं और वो बेहद रूपवान थीं। इलाके के एक खूंखार और अय्याश पठान फौजदार की गंदी नज़र उस हिंदू बेटी पर पड़ गई।

और सबसे ज़्यादा खून खौलाने वाली बात ये है की इस घिनौने काम में उस पठान की मदद किसने की? हमारे ही बीच के एक गद्दार और ईर्ष्यालु हिंदू ज़मींदार ने! उस जयचंद की मदद से पठानों ने पंडित बेनीमाधव रॉय की पत्नी का ज़बरन अपहरण कर लिया।

ज़रा एक मिनट के लिए आंखें बंद कीजिए और सोचिए की उस ब्राह्मण के दिल पर उस वक्त क्या गुज़री होगी! कोई आम और कमज़ोर आदमी होता तो शायद रोता, छाती पीटता, उस पठान सुबेदार के पैरों में गिरकर अपनी पत्नी की भीख मांगता या हताशा में आत्महत्या कर लेता।

लेकिन बेनीमाधव रॉय कोई आम मिट्टी के नहीं बने थे। उनके सीने में सनातन का वो ज्वालामुखी सुलग रहा था जिसे पठानों ने अपनी मौत के लिए खुद छेड़ दिया था।

पत्नी के इस वीभत्स अपहरण ने उस शांत, वेद पढ़ने वाले पंडित के भीतर साक्षात भगवान परशुराम का वो रौद्र क्रोध जगा दिया, जिसे संभालना अब किसी मुगल या पठान के बस की बात नहीं थी।

बेनीमाधव ने अपनी शिखा (चोटी) खोल दी और भगवान शिव को साक्षी मानकर एक खौफनाक कसम खाई। उन्होंने प्रतिज्ञा ली की जब तक वो बंगाल की इस पवित्र ज़मीन को इन विदेशी पठानों और गद्दारों के खून से धो नहीं देंगे, जब तक वो एक-एक जिहादी की गर्दन धड़ से अलग नहीं कर देंगे, तब तक वो चैन की सांस नहीं लेंगे।

ये ये बंगाल के इतिहास के सबसे खौफनाक अध्याय की वो शुरुआत थी जिसने आगे चलकर पठानों का गुरूर मिट्टी में मिला दिया।

गोविन्दो सिंघा की सेना और डकैत पंडित का खूंखार अवतार, जिहादियों का खज़ाना लूटकर गरीब हिन्दुओं को पालने वाला मसीहा

अब एक पंडित जिसके हाथ में हमेशा किताबें और पोथियां रही हों, वो अचानक से तलवार कैसे चलाए? बेनीमाधव रॉय ने अपना घर-बार, अपनी पहचान सब कुछ पीछे छोड़ दिया और वो सीधे पहुंचे ‘गोविन्दो सिंघा’ नाम के एक महान हिंदू योद्धा के पास। गोविन्दो सिंघा उस वक्त जंगलों में छुपकर पठानों के खिलाफ एक छोटी सी बागी सेना चला रहे थे।

बेनीमाधव ने वहां जाकर दिन-रात कड़ी तपस्या की। उन्होंने गुरिल्ला युद्धनीति सीखी और तलवारबाज़ी के ऐसे खूंखार गुर अपनाए की कुछ ही महीनों में उनके सामने अच्छे-अच्छे पठान और अफगानी सैनिक पानी भरते नज़र आने लगे।

उनके अंदर का वो ब्राह्मण अब एक ऐसा खूंखार क्षत्रिय बन चुका था जिसकी आंखों में सिर्फ और सिर्फ इंतकाम का खून सवार था।

कुछ समय बाद जब गोविन्दो सिंघा वीरगति को प्राप्त हुए, तो उस पूरी बागी सेना की कमान बेनीमाधव रॉय ने अपने हाथों में ले ली। यहीं से जन्म हुआ उस खौफनाक अवतार का जिसे दुनिया ‘पंडित डकैत’ के नाम से जानने लगी।

लेकिन भाई, इतिहासकार चाहे उन्हें जो भी नाम दें, वो कोई डकैत या लुटेरे नहीं थे। वो बंगाल के असली रॉबिनहुड थे, वो गरीब हिंदुओं के मसीहा थे!

पंडित डकैत का उसूल एकदम शीशे की तरह साफ था। वो और उनकी सेना सिर्फ और सिर्फ उन अमीर मुस्लिम ज़मींदारों, ज़ालिम नवाबों और पठान सूबेदारों को अपना शिकार बनाते थे जिन्होंने सालों तक हिंदुओं का खून चूसकर अपनी तिजोरियां भरी थीं।

रातों-रात पठानों की हवेलियों पर धावा बोला जाता, उनका सारा खज़ाना लूटा जाता और वो पैसा अगले ही दिन चुपचाप उन गरीब, बेसहारा और प्रताड़ित हिंदुओं के घरों में पहुंचा दिया जाता जो पठानों के ज़ुल्म से भूखे मर रहे थे।

पठानों और मुगलों की आंखों में धूल झोंकने के लिए बेनीमाधव रॉय कभी-कभी अमीर हिंदुओं को लूटने का ‘नाटक’ भी करते थे, ताकि उन पठान सूबेदारों को ये ना लगे की ये कोई संगठित हिंदू बगावत है।

लेकिन मजे की बात ये थी की उन अमीर हिंदुओं का एक भी पैसा खर्च नहीं किया जाता था, बल्कि कुछ समय बाद गुप्त रूप से उन्हें उनका सारा माल वापस लौटा दिया जाता था।

इस ज़बरदस्त चालाकी और अपनी खौफनाक युद्धनीति से पंडित डकैत ने पूरे बंगाल में पठानों की नाक में दम कर दिया था। सूबेदारों की नींद उड़ चुकी थी और उनका लूटा हुआ पैसा अब हिंदुओं के काम आ रहा था।

चालन बील का वो शैतान का भीटा और माँ यवनमर्दिनी काली का वो दरबार, यहाँ कांपती थी अफगान सुबेदारों की रूह

अब पंडित डकैत की सेना दिनों-दिन बड़ी और ताक़तवर हो रही थी। पूरे इलाके के सताए हुए हिंदू नौजवान उनके साथ जुड़ने लगे थे।

ऐसे में बेनीमाधव रॉय को एक ऐसे महफूज़ और खौफनाक अड्डे की ज़रूरत थी जहाँ पठानों की भारी-भरकम फौज कभी पहुंच ना सके। इसके लिए उन्होंने राजशाही के ‘ताराश चालन बील’ के उस रहस्यमयी, दलदली और घने जंगलों वाले इलाके को चुना।

चालन बील का वो दलदल इतना भयानक था की वहां के रास्तों को समझना किसी बाहरी इंसान या पठान सैनिक के लिए लगभग नामुमकिन था। उसी चालन बील के बीचों-बीच स्थित एक द्वीप पर बेनीमाधव रॉय ने अपना वो खौफनाक साम्राज्य खड़ा किया।

और सबसे पहले वहां क्या किया गया? बेनीमाधव रॉय एक परम सनातनी ब्राह्मण थे। उन्होंने उस घने जंगल के द्वीप पर ‘माँ यवनमर्दिनी काली’ की एक भव्य, विशाल और रौद्र मूर्ति स्थापित की।

भाई, ज़रा इस नाम का मतलब तो समझिए! ‘यवनमर्दिनी’ का मतलब ही होता है- यवनों यानी विदेशी आक्रांताओं, क्रूर पठानों और जिहादियों का वध करने वाली देवी! उन्होंने अपने संघर्ष को सीधे अपनी आराध्य देवी के चरणों में समर्पित कर दिया।

वो मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं था, वो पठानों की मौत का सबसे बड़ा और सबसे खौफनाक सेंटर बन गया था। धीरे-धीरे बंगाल के पठानों, फौजदारों और अफगान सूबेदारों के बीच उस जगह का ऐसा भयंकर खौफ बैठ गया की वो लोग उस द्वीप को ‘शैतान का भीटा’ कहने लगे थे।

पठानों का ये पक्का मानना था की वो कोई इंसानों की जगह नहीं है, वो साक्षात मौत का घर है। जो भी पठान सैनिक, फौजदार या जासूस उस चालन बील के दलदल में पंडित डकैत को पकड़ने के लिए घुसा, वो आज तक ज़िंदा वापस लौटकर नहीं आया।

उस द्वीप के चारों तरफ एक ऐसा रहस्यमयी, काला और खौफनाक सन्नाटा रहता था जो किसी भी विदेशी लुटेरे की रूह कंपाने के लिए काफी था।

वहां से सिर्फ रात के अंधेरे में माँ यवनमर्दिनी काली के जयकारे, शंख की आवाज़ें और उन पठानों की खौफनाक चीखें ही बाहर आती थीं जो पंडित डकैत के हत्थे चढ़ जाते थे। ये वो जगह थी जहाँ पठानों को अपनी असली औकात का अंदाज़ा होता था।

अमावस्या की वो खौफनाक काली रातें जब पठानों का सिर काटकर माँ दुर्गा को चढ़ाई जाती थी जिहादियों की नरबलि

अब ज़रा इतिहास के उस सबसे रूह कंपा देने वाले पन्ने को खोलते हैं, जिसे पढ़कर आज भी किसी कमजोर दिल वाले इंसान के पसीने छूट जाएंगे। पंडित डकैत बेनीमाधव रॉय और उनकी खूंखार सेना का एक बहुत ही साफ उसूल था।

वो दिन के उजाले में चालन बील के उन घने और दलदली जंगलों में छुपे रहते थे। दिन में वहां सिर्फ सन्नाटा होता था। लेकिन जैसे ही सूरज ढलता था और रात का अंधेरा छाता था, ये खामोश ब्राह्मण एक ऐसे कालभैरव में बदल जाते थे जिसकी प्यास सिर्फ और सिर्फ जिहादियों के खून से बुझती थी।

और इसमें भी सबसे खौफनाक होती थी ‘अमावस्या’ की वो काली रात! जिस रात चांद आसमान से गायब रहता था और चारों तरफ घुप अंधेरा होता था, उस रात बंगाल के पठानों और सूबेदारों की सांसें थम जाया करती थी।

अमावस्या की रात को पंडित डकैत की सेना अपने गुप्त ठिकानों से बाहर निकलती थी। उनका टारगेट कोई आम आदमी नहीं होता था।

वो चुन-चुन कर उन पठान सैनिकों, ज़ालिम फौजदारों और जिहादी सूबेदारों के ठिकानों पर धावा बोलते थे जिन्होंने किसी हिंदू महिला की इज़्ज़त पर हाथ डाला हो या किसी हिंदू मंदिर को तोड़ा हो।

रातों-रात उन जिहादियों को उनके बिस्तरों से, उनके तंबुओं से घसीट कर अगवा कर लिया जाता था। उनके मुंह में कपड़ा ठूंसकर और हाथ-पैर बांधकर उन्हें उसी रहस्यमयी ‘शैतान के भीटे’ (चालन बील के द्वीप) पर लाया जाता था।

वहां का मंज़र सोचकर देखिए! आधी रात का वक्त, चारों तरफ घने जंगल का सन्नाटा, मशालों की आग से उठती हुई लपटें, ढाक (बंगाल का पारंपरिक ढोल) की वो रोंगटे खड़े कर देने वाली तेज़ आवाज़ और बीच में साक्षात ‘माँ यवनमर्दिनी काली’ की विशाल और रौद्र मूर्ति!

उन खूंखार पठानों को, जो कल तक हिंदुओं पर ज़ुल्म करते थे, आज उसी माँ काली के चरणों में जानवरों की तरह पटक दिया जाता था। बेनीमाधव रॉय अपने हाथों में वो भारी-भरकम और धारदार खड्ग (तलवार) उठाते थे।

वेद और संस्कृत के श्लोक पढ़ने वाला वो मुख जब माँ काली के मारक मंत्रों का उच्चारण करता था, तो वहां बंधे हुए पठानों की रूह उनके शरीर से बाहर निकलने लगती थी।

और फिर… एक ही झटके में उस जिहादी पठान का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था! खून का फव्वारा माँ यवनमर्दिनी के चरणों को धो देता था।

ये कोई साधारण हत्या नहीं थी भाई, ये ‘नरबलि’ का वो खौफनाक अनुष्ठान था जिससे बेनीमाधव रॉय बंगाल की ज़मीन को उन आक्रांताओं के पापों से मुक्त कर रहे थे।

इतिहास के पन्ने बताते हैं की उस चालन बील के द्वीप पर उन जिहादी पठानों की कटी हुई खोपड़ियों का एक विशाल पहाड़ बन गया था। जो पठान वहां एक बार गया, उसकी सिर्फ बिना धड़ की खोपड़ी ही उस पहाड़ का हिस्सा बनी।

ये बेनीमाधव रॉय का वो भयंकर तांडव था जिसने पठानों के अंदर ये खौफ भर दिया था की अगर बंगाल के किसी हिंदू पर हाथ उठाया, तो अमावस्या की रात को तुम्हारी गर्दन माँ काली के चरणों में काट दी जाएगी।

सुबेदार जलील खान का अंत और काल जोगला व काल चंदेया का भयंकर तांडव जिसने कंपा दी पठानों की रूह

पंडित डकैत की सेना में एक से बढ़कर एक ऐसे शूरवीर थे, जो साक्षात मौत का दूसरा नाम बन चुके थे। इन वीरों में दो सबसे खूंखार और भयानक कमांडर थे- जुगल किशोर सान्याल और चंडी प्रसाद रॉय।

ये दोनों योद्धा इतने क्रूर और निर्दयी तरीके से पठानों को काटते थे की खुद पठानों ने डर के मारे इनका नाम ‘काल जोगला’ और ‘काल चंदेया’ रख दिया था।

‘काल’ यानी साक्षात यमराज! जब रात के अंधेरे में पठान सैनिक आपस में बात करते थे, तो काल जोगला और काल चंदेया का नाम सुनकर ही उनके पसीने छूट जाते थे।

उस वक्त राजशाही के इलाके में दो बहुत ही खूंखार और ज़ालिम अफगान सूबेदार हुआ करते थे- जलील खान और खलील खान। इन दोनों ने हिंदुओं का जीना हराम कर रखा था।

ये सरेआम टैक्स के नाम पर गरीब हिंदुओं को कोड़े मारते थे और उनकी बहन-बेटियों को उठाकर अपने हरम में डाल लेते थे। जब इन दोनों की बर्बरता की खबर पंडित बेनीमाधव रॉय के कानों तक पहुंची, तो उनकी आंखों में खून उतर आया।

उन्होंने तुरंत अपने दोनों सबसे खतरनाक कमांडरों- काल जोगला और काल चंदेया- को बुलाया और आदेश दिया की मुझे कल सूरज उगने से पहले ये दोनों जिहादी सूबेदार माँ काली के दरबार में ज़िंदा चाहिए।

उस रात जो हुआ, वो पठानों के इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गया। काल जोगला और काल चंदेया ने अपने मुट्ठी भर लड़ाकों के साथ सूबेदार जलील खान की भारी-भरकम सुरक्षा वाली हवेली को चारों तरफ से घेर लिया।

पठानों के पास अच्छी-खासी फौज और हथियार थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने बाहर काल जोगला और काल चंदेया को देखा, उनकी रूह इस कदर कांप गई की उन्होंने बिना लड़े ही अपने हथियार ज़मीन पर डाल दिए। वो जानते थे की अगर इनसे लड़े, तो बोटी-बोटी काट कर कुत्तों को खिला दी जाएगी।

जलील खान और खलील खान को कॉलर से पकड़कर, रस्सियों से जानवरों की तरह बांधकर, कीचड़ और दलदल में घसीटते हुए उसी चालन बील के द्वीप पर लाया गया।

जिन सूबेदारों के नाम से आम हिंदू थर-थर कांपता था, आज वो दोनों सूबेदार पंडित डकैत के सामने ज़मीन पर पड़े अपनी जान की भीख मांग रहे थे, रो रहे थे और गिड़गिड़ा रहे थे।

लेकिन पंडित डकैत के दिल में इन जिहादियों के लिए कोई दया नहीं थी। उन्होंने वही खौफनाक खड्ग उठाई और एक ही झटके में जलील खान और खलील खान के सिर धड़ से अलग करके माँ यवनमर्दिनी काली को उनकी भेंट चढ़ा दी।

इस घटना के बाद तो पूरे बंगाल में ऐसा भूचाल आया की बड़े-बड़े अफगानी और पठान सूबेदार रातों-रात राजशाही छोड़कर भागने लगे। पठानों को समझ आ गया था की वो किसी इंसान से नहीं लड़ रहे हैं, वो एक ऐसे प्रेत से लड़ रहे हैं जो अमावस्या की रात को उनका खून पीने आता है।

आज हमें इस बात को समझना होगा की अगर बेनीमाधव रॉय उस दिन अपने हाथ में सिर्फ वेद और माला लेकर बैठे रहते, अगर वो “कोई बात नहीं, ईश्वर सब ठीक करेगा” सोचकर अहिंसा का राग अलापते, तो आज बंगाल में एक भी हिंदू ज़िंदा नहीं बचता।

जब जिहादी तुम्हारे घरों में घुसकर तुम्हारी बहन-बेटियों पर हाथ डालने लगें, तुम्हारे मंदिरों को तोड़ने लगें, तो वहां शांति का पाठ पढ़ना कायरता होती है।

धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना ही सनातन की असली और सबसे प्राचीन पहचान है। अपने अंदर उस रौद्र रूप को जगाओ, क्योंकि बिना खौफ के ना तो धर्म बचता है और ना ही अस्तित्व!

जय माँ काली!

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