हमें दिन रात TV में ये बताया जाता है की हमारे देश का दुनिया में डंका बज रहा है। हमें लगता है की हमारा पासपोर्ट इतना ताकतवर हो गया है की दुनिया का कोई भी देश हमारी तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकता।
लेकिन भाई, इन PR स्टंट के खुमार से बाहर निकलिए और इस देश की वो कड़वी हकीकत देखिए जिसने हमारे उस ‘डंके’ की हवा निकाल कर रख दी है।
जब समंदर के बीचों-बीच अमेरिका की एक मिसाइल हमारे तीन बेगुनाह और निहत्थे भारतीय नाविकों की जान ले लेती है, तो हमारा वो डंका अचानक से खामोश क्यों हो जाता है? तब हमारे सत्ताधारी और कूटनीति के ठेकेदार अचानक से गूंगे और बहरे क्यों हो जाते हैं?
अगर यही मिसाइल पाकिस्तान ने दागी होती, या किसी कमज़ोर देश ने हमारे किसी जहाज़ पर हमला किया होता, तो आज इस देश में क्या हो रहा होता? अब तक टीवी पर युद्ध के नगाड़े बज चुके होते। हमारे नेता मंचों से दहाड़ रहे होते और सर्जिकल स्ट्राइक की बातें हो रही होतीं।
लेकिन… लेकिन चूंकि इस बार मारने वाला कोई कमज़ोर देश नहीं, बल्कि खुद को दुनिया का बाप समझने वाला ‘अमेरिका’ है, तो हमारी सरकार ने तुरंत ‘शांति’, ‘कूटनीति’ और ‘कड़े विरोध’ का वो पुराना और सड़ा हुआ चोला ओढ़ लिया है।
अरे भाई! जब एक आम हिंदुस्तानी की जान की कीमत समंदर में ज़ीरो हो जाए, जब विदेशी ताकतें हमारे लोगों को कीड़े-मकोड़ों की तरह मार दें और हमारी सरकार सिर्फ कागज़ों पर विरोध दर्ज कराए, तो वो देश कोई ग्लोबल पावर या सुपरपावर नहीं कहलाता।
वो देश अमेरिका का एक डरपोक और लाचार पिछलग्गू बनकर रह जाता है। सच्ची देशभक्ति सिर्फ चुनाव जीतने में नहीं है, सच्ची देशभक्ति अपने देश के एक-एक नागरिक की जान की कीमत वसूलने में है, जो आज हमारी सत्ता पूरी तरह से भूल चुकी है।
ओमान की खाड़ी में अमेरिका का आतंकवाद और 3 भारतीय नाविकों का कत्ल, समंदर को अपने बाप की जागीर समझ रहा अमेरिका
अगर किसी को लग रहा है की मैं सिर्फ जज़्बात में बहकर बोल रहा हूं, तो ज़रा इसी महीने यानी 8 से 11 जून 2026 के बीच समंदर में हुए उस खौफनाक और वीभत्स तांडव को याद कर लीजिए।
ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वो इलाका है जहाँ से पूरी दुनिया का तेल और व्यापार गुज़रता है।
उन तीन कमर्शियल तेल टैंकरों- MT Settebello, MT Jalveer और MT Vaarivex- का कोई कसूर नहीं था। ये कोई जंगी जहाज़ या युद्धपोत नहीं थे जिन पर हथियार लदे हों। इन पर हमारे देश के दर्ज़नों आम भारतीय नाविक काम कर रहे थे।
वो नाविक जो अपने बूढ़े मां-बाप का पेट पालने के लिए, अपने बच्चों की फीस भरने के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर महीनों तक समंदर में ड्यूटी करते हैं।
तभी अचानक आसमान से मौत बरसती है। अमेरिका की नेवी और एयरफोर्स बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी इंटरनेशनल प्रोटोकॉल के इन निहत्थे कमर्शियल जहाजों पर मिसाइलों से सीधा और खौफनाक हमला कर देती है।
उस हमले में एमटी सेत्तेबेलो पर सवार हमारे तीन भारतीय बेटों- आदित्य शर्मा, पटनाला सुरेश और शिवानंद चौरसिया- की दर्दनाक मौत हो जाती है। उनकी लाशें समंदर के उस खारे पानी में खून से लथपथ हो जाती हैं।
ज़रा सोचिए इस क्रूरता को! अमेरिका ने तो सोमालिया के उन समुद्री लुटेरों को भी पीछे छोड़ दिया है। समुद्री लुटेरे तो फिर भी सिर्फ पैसा या फिरौती मांगते हैं, लेकिन ये अमेरिका तो सीधे इंटरनेशनल वाटर (International Waters) में मिसाइलें दागकर बेगुनाहों का कत्लेआम कर रहा है।
किसी भी निहत्थे कमर्शियल जहाज़ पर ऐसा जानलेवा हमला करना सीधे-सीधे ‘वॉर क्राइम’ (War Crime) यानी युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन अमेरिका खुद को दुनिया का कानून, पुलिस और जज सब कुछ समझता है।
उसे लगता है की समंदर उसके बाप की जागीर है और वहां चलने वाले दूसरे देशों के नाविक उसके लिए सिर्फ ‘कोलैटरल डैमेज’ हैं, जिनकी जान की कोई कीमत नहीं है।
ट्रंप का बेशर्मी भरा गुरूर, ईरान के बहाने बेगुनाह भारतीयों का खून बहाकर सीना तान के ली खूनी हमले की ज़िम्मेदारी
जब हमारे तीन बेटों की खून से सनी लाशें सामने आईं, तो अमेरिका ने कोई माफी नहीं मांगी, कोई खेद नहीं जताया। उल्टे उनके अहंकार और उनके गुरूर का वो नंगा नाच सामने आया जिसने हर सच्चे हिंदुस्तानी का खून खौला कर रख दिया।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बाकायदा अपनी प्रेस रिलीज़ जारी करके बहुत ही बेशर्मी से और सीना तानकर इस खूनी हमले की ज़िम्मेदारी ली।
इन्होंने बताया की हां, हमने ‘हेलफायर मिसाइलों’ से इन जहाजों को उड़ाया है। और इसके पीछे अमेरिका ने बहाना क्या दिया? अमेरिका का तर्क है की उसने ईरान पर नेवल नाकेबंदी (Blockade) लगा रखी है और ये जहाज़ ईरान का तेल ले जा रहे थे।
वाह रे अमेरिका! तुम्हारी मक्कारी और तुम्हारी गुंडागर्दी की कोई हद है? तुम्हारी ईरान से दुश्मनी है, तुम्हारा ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ जो चाहे राजनीतिक खेल खेले, हमें उससे कोई मतलब नहीं है।
लेकिन अगर कोई कमर्शियल जहाज़ ईरान का तेल ले जा रहा था, तो क्या तुम उस पर मिसाइल दागकर उन गरीब भारतीय नाविकों का खून बहाओगे जो सिर्फ उस जहाज़ पर एक कर्मचारी के तौर पर नौकरी कर रहे थे?
उनका ईरान की राजनीति से क्या लेना-देना था? क्या उन निहत्थे लड़कों ने तुम्हारी अमेरिकी नेवी पर कोई गोली चलाई थी?
ये सीधे-सीधे ट्रंप प्रशासन की उस ज़हरीली, घमंडी और खौफनाक विदेश नीति का नतीजा है जहाँ दुनिया के बाकी देशों के इंसानों की जान की कीमत अमेरिका के एक डॉलर से भी कम समझी जाती है।
अमेरिका खुद को दुनिया का ‘दादा’ समझता है। वो ये जताना चाहता है की अगर किसी ने हमारी बात नहीं मानी, तो हम किसी भी देश के नागरिक को समंदर में भून देंगे और कोई हमारा बाल भी बांका नहीं कर पाएगा।
अमेरिका की इस खूनी दादागिरी ने दुनिया के सारे अंतरराष्ट्रीय कानूनों को फाड़कर समंदर में फेंक दिया है। और सबसे बड़ा दुख इस बात का है की हमारे देश के तीन बेटों की लाशों पर खड़े होकर अमेरिका अपनी इस गुंडागर्दी का जश्न मना रहा है।
एक कमज़ोर और बुज़दिल सिस्टम का नंगा सच, जब मारने वाला अमेरिका हो तो कहां गायब हो जाता है 56 इंच का सीना
अमेरिका ने जो किया, वो तो एक दुश्मन या एक घमंडी सुपरपावर का काम था। लेकिन उस कत्लेआम के बाद हमारी अपनी सरकार ने जो किया, उसने इस देश के हर उस नागरिक का सिर शर्म से झुका दिया जो ‘विश्वगुरु’ के सपने देख रहा था।
जब तीन भारतीयों के चिथड़े उड़ गए, तो हमारी दिल्ली में बैठी सत्ता ने क्या किया? उन्होंने साउथ ब्लॉक के एक कमरे में अमेरिका के एक राजनयिक को बुलाया, उसे एक कागज़ थमाया और कहा की “हम इस घटना का ‘कड़ा विरोध’ (Strong Protest) दर्ज कराते हैं।”
बस? खत्म? क्या उन तीन भारतीय नाविकों के खून की कीमत, उनके रोते हुए मां-बाप के आंसुओं की कीमत सिर्फ एक ‘कागज़ी विरोध’ है? लानत है ऐसे कमज़ोर और बुज़दिल सिस्टम पर!
ज़रा याद कीजिए आज से कुछ महीने या एक-दो साल पहले का वो वक्त। जब समंदर में यमन के हूतियों (Houthis) ने या ईरान ने किसी जहाज़ पर कब्ज़ा किया था या हमारे नाविकों को रोका था, तो हमारी सरकार का रिएक्शन कैसा था?
तब हमारी नेवी (Indian Navy) ने तुरंत अपने बड़े-बड़े युद्धपोत (Warships) और डिस्ट्रॉयर समंदर में उतार दिए थे। हमारे मरीन कमांडोज़ ने हेलीकॉप्टर से उतरकर ऑपरेशन किए थे।
तब टीवी चैनलों पर दिन-रात डंका पीटा गया था की “देखो भारत का 56 इंच का सीना, हमारी नेवी किसी को नहीं छोड़ेगी!”
लेकिन आज? आज जब अमेरिका ने हमारे तीन बेटों को जान से मार डाला, तो हमारी वो ताकतवर नेवी अपने बैरकों में क्यों बंद है? हमारे वो युद्धपोत समंदर में जाकर अमेरिका की आंखों में आंखें क्यों नहीं डाल रहे?
क्योंकि मारने वाला अमेरिका है ना! ये एक कड़वी हकीकत है मेरे भाई की हमारी सत्ता अमेरिका से सीधे आंख मिलाने की औकात नहीं रखती।
जब सामने कोई कमज़ोर देश होता है, तो हम अपनी बाज़ू फड़काने लगते हैं, लेकिन जब सामने अमेरिका खड़ा हो जाता है, तो हमारा सारा 56 इंच का सीना और सारा ‘विश्वगुरु’ का चोला रजाई ओढ़कर सो जाता है।
ये कोई कूटनीति नहीं है, ये वो कायरता है जिसे हमारा सिस्टम ‘शांति’ के नाम पर छुपाने की कोशिश कर रहा है।
भारतीय मीडिया की सड़ी हुई खामोशी और ट्रंप का डर, व्यापार और डॉलर के लालच में कौड़ियों के भाव बेच दी आम भारतीय की जान
अब ज़रा इस कत्लेआम के बाद अपने देश के उस बिकाऊ और दोहरे चरित्र वाले मीडिया का नज़ारा देखिए। ये वो मीडिया है जो रात के 8 बजते ही टीवी स्टूडियो में फौजी जैकेट पहनकर बैठ जाता है।
अगर रूस और यूक्रेन के बीच कोई मिसाइल गिरे, या दुनिया के किसी और कोने में कुछ हो जाए, तो ये एंकर टीवी स्क्रीन पर ऐसे गला फाड़-फाड़ कर चीखते हैं जैसे मिसाइल इनके घर के आंगन में गिरी हो।
लेकिन भाई, आज जब ओमान की खाड़ी में अमेरिका की असली और खौफनाक मिसाइल ने हमारे तीन ज़िंदा हिंदुस्तानियों के चिथड़े उड़ा दिए, तो इन टीवी एंकरों के मुंह पर टेप क्यों चिपक गया है?
इनकी ये सड़ी हुई खामोशी कोई इत्तेफाक नहीं है। ये उस खौफ और उस चापलूसी का नतीजा है जो ऊपर से कंट्रोल की जाती है।
इन सबको पता है की अगर टीवी पर अमेरिका की गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाई, तो दिल्ली में बैठे आका नाराज़ हो जाएंगे। और हमारे वो आका क्यों डरते हैं? क्योंकि व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप बैठा है!
इस देश की सरकार और नीति-निर्माताओं को ये डर सता रहा है की अगर हमने अमेरिका से आंख में आंख डालकर सवाल पूछ लिया, अगर हमने अमेरिका को उसकी औकात दिखा दी, तो कहीं ट्रंप नाराज़ ना हो जाए।
कहीं वो भारत के सामानों पर भारी टैरिफ (Tariff) ना लगा दे। कहीं वो हमारे आईटी वालों के एच-1बी (H1B) वीज़ा कैंसिल ना कर दे। हमारा एक्सपोर्ट ना गिर जाए!
ज़रा सोचिए हमने अपने ज़मीर को किस गंदे और घिनौने स्तर पर गिरा दिया है। मतलब, चंद डॉलर्स के लिए, कुछ ट्रेड डील्स को बचाने के लिए और वीज़ा के लालच में इस देश ने अपने ही नागरिकों की जान का सौदा कर लिया?
आदित्य, सुरेश और शिवानंद की जान को तराज़ू के एक पलड़े पर रखा गया और दूसरे पलड़े पर अमेरिका से मिलने वाले डॉलर रखे गए, और हमारी सत्ता ने डॉलर्स को चुन लिया! क्या एक आम करदाता, एक आम हिंदुस्तानी की जान की कीमत बस इतनी सी रह गई है?
जब कोई देश अर्थव्यवस्था और विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए अपने ही नागरिकों के खून को पानी समझने लगे, तो उस देश की आत्मा मर जाती है।
ये कोई कूटनीति नहीं है भाई, ये एक नंगी और शर्मनाक दलाली है जो अमेरिका के डर से हमारी विदेश नीति को खोखला कर रही है।
हम दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे जब हम अपने ही तीन बेटों की चिता पर खड़े होकर अमेरिका के साथ व्यापार की कसमें खा रहे हैं?
अंतरराष्ट्रीय कानूनों का मज़ाक और भारत की संप्रभुता पर हमला, ‘ग्लोबल साउथ’ लीडर का जूमला
ये जो पूरी दुनिया को मानवाधिकार और ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ का ज्ञान बांटते हैं ना, अमेरिका की इस मिसाइल ने उन सारे अंतरराष्ट्रीय कानूनों को फाड़कर समंदर की गहराई में गाड़ दिया है।
हम G20 की बैठकें करते हैं, हम ब्रिक्स (BRICS) में जाते हैं और सीना ठोककर कहते हैं की भारत ‘ग्लोबल साउथ’ का लीडर है। हम दुनिया भर के विकासशील देशों की आवाज़ हैं।
अरे खाक आवाज़ हैं हम! जब तुम अपने ही देश के पासपोर्ट को अमेरिका की हेलफायर मिसाइलों से नहीं बचा सकते, तो दुनिया का कौन सा कमज़ोर देश तुम पर भरोसा करेगा?
UNCLOS यानी समंदर के जो अंतरराष्ट्रीय कानून हैं, वो साफ कहते हैं की ‘इंटरनेशनल वाटर’ में कोई भी कमज़ोर या ताकतवर देश किसी भी कमर्शियल जहाज़ पर इस तरह जानलेवा हमला नहीं कर सकता। लेकिन अमेरिका को किसी यूएन (UN) या किसी कानून से कोई मतलब नहीं है।
अमेरिका इस नेवल ब्लॉकेड (Naval Blockade) की आड़ में असल में पूरे मिडिल ईस्ट और दुनिया के तेल व्यापार पर अपना खौफनाक कब्ज़ा जमाना चाहता है।
वो दुनिया को ये मैसेज दे रहा है की “समंदर में वही जहाज़ चलेगा जिसे अमेरिका परमिशन देगा, और जो हमारी बात नहीं मानेगा, हम उसे समंदर की कब्र में सुला देंगे।”
अगर आज भारत ने अमेरिका की इस गुंडागर्दी के सामने घुटने टेक दिए और इसे चुपचाप बर्दाश्त कर लिया, तो यकीन मानिए हमने एक बहुत ही खौफनाक भविष्य की नींव रख दी है।
कल को अमेरिका किसी भी भारतीय जहाज़ को, चाहे वो किसी भी देश का सामान ले जा रहा हो, बीच समंदर में रोक लेगा। अमेरिकी सैनिक हमारे जहाज़ों पर चढ़ेंगे, हमारे लोगों को बंधक बनाएंगे, और अगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आया तो वो हमारे जहाज़ को डुबो देंगे।
और हमारी सरकार क्या करेगी? वो फिर से दिल्ली में बैठकर एक ‘निंदा प्रस्ताव’ पास करेगी! जब तुम आज अपनी संप्रभुता और अपने नागरिकों की रक्षा के लिए खड़े नहीं हो सकते, तो कल कोई भी देश तुम्हारे पासपोर्ट की इज़्ज़त नहीं करेगा। हमारी खामोशी ने हमारे ही देश के स्वाभिमान को नीलाम कर दिया है।
अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर उसी की भाषा में जवाब देने का आ गया वक्त
अब बहुत हो गया ये डिप्लोमेसी का सड़ा हुआ ड्रामा! ये ‘कड़ा विरोध’ और ‘निंदा’ वाले कागज़ उठाकर डस्टबिन में फेंक देने चाहिए। जब तुम्हारे सीने पर मिसाइल दागी जाए, तो उसका जवाब कागज़ के टुकड़ों से नहीं, बल्कि फौलाद से दिया जाना चाहिए।
आज देश का आम आदमी, देश का नौजवान अपनी सरकार से सीधा सवाल पूछ रहा है की अगर तुम्हारे सीने में सच में 56 इंच का दम है, तो उसे अमेरिका के सामने साबित करके दिखाओ!
हमारी मांग एकदम साफ और आक्रामक होनी चाहिए। सबसे पहले भारत सरकार उस अमेरिकी राजदूत को कॉलर पकड़कर तलब करे और डंके की चोट पर उन 3 मारे गए भारतीयों के परिवारों के लिए करोड़ों डॉलर का हर्जाना वसूले।
ये कोई एक्सीडेंट नहीं था, ये मर्डर था। और जिस अमेरिकी कमांडर (CENTCOM Commander) ने उन कमर्शियल जहाज़ों पर मिसाइल दागने का ऑर्डर दिया था, उसके खिलाफ भारत में क्रिमिनल केस दर्ज होना चाहिए। अगर हम अमेरिका से इतना नहीं करवा सकते, तो हमें महाशक्ति कहलाने का कोई हक नहीं है।
और बात सिर्फ हर्जाने तक खत्म नहीं होती। भारतीय नौसेना को तुरंत अपने सबसे घातक और आधुनिक डिस्ट्रॉयर- जैसे आईएनएस कोच्चि और आईएनएस चेन्नई- को ओमान की खाड़ी में उतारना चाहिए।
हमारे कमर्शियल जहाज़ों को हमारी नेवी की सीधी सुरक्षा मिलनी चाहिए। सरकार को अपनी नौसेना को खुली और स्पष्ट छूट देनी होगी की अगर समंदर में कोई भी विदेशी ताकत- चाहे वो खुद अमेरिका ही क्यों ना हो- हमारे किसी भी निहत्थे जहाज़ पर अपने हथियार लॉक करे या हमला करने की कोशिश करे, तो भारतीय नौसेना उसे करारा और मुंहतोड़ जवाब दे।
अगर हम आज भी डर-डर कर जिएंगे, अगर हम आज भी ट्रंप के टैरिफ और डॉलर के लालच में अपनी गर्दन झुका लेंगे, तो फिर हम आज़ाद कहां हुए? हम तो आज भी मानसिक रूप से वाशिंगटन के गुलाम ही हैं।
हमें एक ऐसा भारत चाहिए जो दुश्मन की आंखों में आंखें डालकर बात करे। हमें वो भारत नहीं चाहिए जो विदेशी आकाओं के सामने दुम हिलाने लगे और अपने ही बच्चों के खून को भूल जाए।
दुनिया सिर्फ और सिर्फ ताकत की भाषा समझती है, और अब वक्त आ गया है की अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए!
