दिल्ली के तख्त पर बैठकर जिहादी मुगल बादशाह शाहजहां को लगता था की उसकी हथियारों से भरपूर लाखों की फौज के आगे पूरा हिन्दू समाज घुटने टेक देगा।
लेकिन उसके इस खौफनाक घमंड को उसी के खून से धोने का काम हमारी देवभूमि उत्तराखंड की एक अकेली हिन्दू शेरनी ने किया था।
उस शेरनी का नाम था- महारानी कर्णावती! जिसने शाहजहां की मुग़ल फौज की वो खाल उधेड़ी और उन्हें वो नंगी ज़िल्लत दी, जिसे सुनकर हर सनातनी को अपने हिन्दू पूर्वजों पर गर्व होने लगेगा!
बात 1640 के आसपास की है। गढ़वाल के पराक्रमी महाराजा महीपत शाह के निधन के बाद वहां की गद्दी पर उनके 7 साल के मासूम बेटे पृथ्वीपति शाह को बैठाया गया। राजकाज की पूरी डोर महारानी कर्णावती के हाथों में आ गई।
जब दिल्ली में बैठे शाहजहां को ये बात पता चली, तो उसके मुंह में पानी आ गया। उस जिहादी मुगल को लगा की एक अकेली विधवा औरत और 7 साल के बच्चे को तो वो चुटकियों में कुचल देगा और देवभूमि के मंदिरों को तोड़कर वहां अपना कब्ज़ा कर लेगा।
इसी घमंड में शाहजहां ने अपने सबसे खूंखार सेनापति नजाबत खान को 30,000 जिहादी सैनिकों के साथ गढ़वाल को तबाह करने भेज दिया।
हिन्दू शेरनी कर्णावती का वो खतरनाक प्लान जिसमें तड़प तड़प कर मरे शाहजहां के घमंडी सैनिक
नजाबत खान अपनी 30 हज़ार की भारी-भरकम फौज लेकर दून घाटी (देहरादून) से होता हुआ पूरे गुरूर में पहाड़ों में घुस गया। मुगलों को लगा की कोई उन्हें रोक क्यों नहीं रहा!
लेकिन उन्हें क्या पता था की वो गढ़वाल की उस हिन्दू शेरनी के बिछाए हुए खौफनाक जाल में फंस चुके हैं। रानी कर्णावती ने मुगलों को जानबूझकर पहाड़ों की गहराई और अलकनंदा की भूलभुलैया में घुसने दिया।
और जैसे ही ये जिहादी फौज पहाड़ों के बीच फंसी, रानी की सेना ने पीछे से रसद (खाने-पीने का सामान) और भागने के सारे रास्ते हमेशा के लिए बंद कर दिए।
अब शुरू हुआ मुगलों का असली तांडव। बर्फबारी, भयानक ठंड और भूख से शाहजहां के खूंखार सैनिक बिलबिलाने लगे। जो मुगल कल तक हिन्दुओं को काटने का सपना देख रहे थे, वो भूख के मारे अपने ही घोड़ों को काटकर खाने लगे और पहाड़ों में तड़प-तड़प कर मरने लगे।
ज़िंदा रहना है तो अपनी नाक और कान काटो, मुगलों की वो सबसे भयानक जलालत
जब नजाबत खान और उसके बचे-खुचे सैनिक दाने-दाने को मोहताज हो गए और मौत उनके सामने नाचने लगी, तो उन्होंने हथियार डाल दिए। वो घमंडी मुगल रानी कर्णावती के पैरों में गिरकर कुत्तों की तरह अपनी जान की भीख मांगने लगे।
तब उस हिन्दू महारानी ने वो खौफनाक फरमान सुनाया, जिसे सुनकर मुगलों की पैंट गीली हो गई। रानी ने दहाड़ते हुए कहा- “मैं तुम्हें ज़िंदा छोड़ दूंगी, लेकिन एक शर्त पर। हर एक मुगल सैनिक को अपनी नाक और कान खुद काटकर मुझे देने होंगे!”
ज़रा उस खौफनाक मंज़र की कल्पना कीजिए! 30 हज़ार जिहादी सैनिकों ने अपनी जान बचाने के लिए रोते-बिलखते हुए अपनी ही तलवारों से अपनी नाक और कान काटे। मुगलों की ऐसी नंगी ज़िल्लत इतिहास में आज तक किसी ने नहीं की थी।
बिना नाक के दिल्ली लौटी फौज और शाहजहां का वो खौफ जो उम्र भर नहीं गया
जब मुगलों की वो कटी हुई नाक वाली फौज दिल्ली की तरफ लौटी, तो सेनापति नजाबत खान इस भयंकर जलालत को बर्दाश्त नहीं कर पाया। रास्ते में ही उसने शर्म से आत्महत्या कर ली।
और जब दिल्ली के लाल किले में बैठे शाहजहां ने अपनी बिना नाक और कान वाली जिहादी फौज को देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
पूरा मुगल दरबार खौफ से कांप उठा। डर के मारे मुगलों ने महारानी कर्णावती का नाम ही ‘नकटी रानी’ (नाक काटने वाली रानी) रख दिया था।
इस खौफनाक सज़ा के बाद शाहजहां की ऐसी हिम्मत टूटी की उसने जीते जी दोबारा कभी देवभूमि गढ़वाल की तरफ आंख उठाकर नहीं देखा।
आज के बच्चों को मुगलों का वो झूठा इतिहास नहीं, बल्कि रानी कर्णावती का ये खौफनाक शौर्य पढ़ना चाहिए। जब कोई सनातनी शेरनी अपनी धरती के लिए तलवार उठाती थी, तो इन जिहादियों को अपनी नाक कटा कर कुत्तों की तरह भागना पड़ता था!
वन्दे मातरम! हर हर महादेव!
