क्या आपको लगता है की भारत जैसे देश का अचानक से अंतरिक्ष में रॉकेट भेजना, खुद की न्यूक्लियर पनडुब्बी बनाना या दुनिया की सबसे तेज़ मिसाइलें बनाना अमेरिका और पश्चिमी देशों को हज़म हो रहा है?
अरे भाई, बिल्कुल नहीं! जैसे ही भारत रक्षा या अंतरिक्ष के मामले में अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करता है, इन विदेशी ताकतों और पश्चिमी देशों के पेट में दर्द होने लगता है।
इनका वो अरबों डॉलर का हथियारों और तकनीक का बाज़ार खतरे में पड़ जाता है। फिर ये लोग बहुत ही खौफनाक और बुज़दिल तरीका अपनाते हैं। ये हमारे देश के उन ‘तेज़ दिमागों’ को ही खत्म कर देते हैं जो भारत की तकदीर बदल सकते हैं।
ये इस देश के महान वैज्ञानिकों के कत्लेआम का वो सच है जिसे CIA जैसी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने हमारे ही देश के कुछ गद्दारों के साथ मिलकर अंजाम दिया है।
होमी भाभा का प्लेन क्रैश और विक्रम साराभाई की रहस्यमयी मौत, अमेरिका की CIA का वो खौफनाक कबूलनामा
ज़रा इतिहास के पन्नों को पलटिए। बात 1960 के दशक की है। उस वक्त भारत के परमाणु कार्यक्रम के पितामह डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने पूरी दुनिया के सामने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया था की “अगर भारत सरकार मुझे परमिशन दे, तो मैं सिर्फ 18 महीने के अंदर भारत को परमाणु बम बनाकर दे सकता हूं।”
भाभा की वो एक दहाड़ सुनकर वाशिंगटन से लेकर लंदन तक हड़कंप मच गया। अमेरिका किसी भी कीमत पर भारत को न्यूक्लियर पावर नहीं बनने देना चाहता था। और फिर क्या हुआ?
जनवरी 1966 में होमी भाभा वियना जा रहे थे। उनका एयर इंडिया का वो विमान स्विस आल्प्स (Mont Blanc) की बर्फीली पहाड़ियों में अचानक क्रैश हो गया।
हमारे देश के सबसे महान वैज्ञानिक के चिथड़े उड़ गए और इसे एक ‘हादसा’ बताकर फाइल हमेशा के लिए दफना दी गई।
लेकिन पाप कभी छुपता नहीं है! सालों बाद एक अमेरिकी पत्रकार ग्रेगरी डगलस ने एक किताब लिखी- ‘कन्वर्सेशंस विद द क्रो’ (Conversations with the Crow)।
इस किताब में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के एक टॉप अफसर ‘रॉबर्ट क्रॉली’ ने बाकायदा हंसते हुए कबूल किया था की होमी भाभा और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की हत्या के पीछे सीआईए का ही हाथ था।
उस क्रॉली ने बेशर्मी से कहा था की “भारत के लोग बहुत चालाक हो रहे थे, वो न्यूक्लियर बम बना रहे थे, इसलिए हमने होमी भाभा के विमान के कार्गो में एक बम फिट कर दिया था जो पहाड़ियों के ऊपर जाकर फट गया।”
ज़रा सोचिए इस बात को! हमारे देश के सबसे बड़े दिमाग को अमेरिका ने बम से उड़ा दिया और हमारी सरकारें कुछ नहीं कर पाईं।
और ये सिलसिला यहीं नहीं रुका। होमी भाभा के बाद भारत के स्पेस प्रोग्राम (ISRO) की नींव रखने वाले डॉ. विक्रम साराभाई भी इसी साज़िश का शिकार हो गए। 1971 में विक्रम साराभाई केरल के कोवलम में एक रिसॉर्ट में रुके हुए थे।
वो इंसान जो अपनी फिटनेस का इतना ध्यान रखता था, जिसे कोई बीमारी नहीं थी, उसकी लाश अचानक से सुबह होटल के कमरे में रहस्यमयी हालत में पड़ी मिलती है।
सबसे खौफनाक बात तो ये है की इतने बड़े वैज्ञानिक की मौत के बाद उनका पोस्टमार्टम तक नहीं कराया गया! रातों-रात उनके शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
ये सब किसके इशारे पर हो रहा था? कौन थे वो दिल्ली में बैठे सफेदपोश गद्दार जो इन मौतों पर पर्दा डाल रहे थे?
रेलवे ट्रैक पर परमाणु वैज्ञानिकों की मिली लाशें, जब 11 से ज़्यादा न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की ‘रहस्यमयी परिस्थितियों’ में हुई मौत
अगर आप सोच रहे हैं की ये तो 60-70 के दशक की पुरानी बातें हैं, तो ज़रा अपने रोंगटे खड़े कर लेने वाले उस ताज़ा दौर को देखिए जब केंद्र में यूपीए (UPA) की सरकार बैठी थी।
2009 से लेकर 2014 के बीच का वो खौफनाक वक्त जब भारत के परमाणु वैज्ञानिकों को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचल-कुचल कर मारा गया।
आरटीआई (RTI) और पुलिस रिकॉर्ड्स चीख-चीख कर गवाही देते हैं की इन 4-5 सालों के अंदर भारत के 11 से ज़्यादा टॉप न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की बेहद ‘अप्राकृतिक’ और रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हुई।
ज़रा अक्टूबर 2013 की उस दिल दहला देने वाली घटना को याद कीजिए। भारत उस वक्त अपनी पहली न्यूक्लियर पनडुब्बी (Nuclear Submarine) ‘आईएनएस अरिहंत’ (INS Arihant) बना रहा था।
ये प्रोजेक्ट इतना सीक्रेट था की अमेरिका और चीन की नींदें उड़ी हुई थीं। इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले दो सबसे होनहार चीफ इंजीनियर- के.के. जोश और अभीश शिवम-एक दिन अचानक गायब हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद इन दोनों की लाशें विशाखापट्टनम के पास एक रेलवे ट्रैक पर पड़ी मिलती हैं!
रिपोर्ट्स बताती हैं की इन दोनों को पहले ज़हर दिया गया था और फिर इनकी लाशों को रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया ताकि इसे एक एक्सीडेंट या आत्महत्या का रूप दिया जा सके।
लेकिन भाई, सबसे बड़ा खून तो तब खौलता है जब हमारी अपनी पुलिस और हमारा अपना सिस्टम इस मामले में गद्दारी करता है।
पुलिस ने इतनी बड़ी हत्याओं को ‘रूटीन एक्सीडेंट’ कहकर रफा-दफा कर दिया। अरे भाई, क्या देश के टॉप न्यूक्लियर इंजीनियर ऐसे ही पटरियों पर कट कर मरते हैं?
ये कोई इत्तेफाक नहीं था। कैगा (Kaiga) न्यूक्लियर प्लांट के एक सीनियर साइंटिस्ट लोकनाथन महालिंगम अचानक मॉर्निंग वॉक पर जाते हैं और गायब हो जाते हैं। कुछ दिन बाद उनकी लाश नदी में सड़ती हुई मिलती है।
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) के एक और वैज्ञानिक उमा राव की लाश उनके ही घर में लटकती हुई मिलती है और पुलिस उसे तुरंत ‘डिप्रेशन’ घोषित कर देती है।
2025 में BrahMos मिसाइल पर काम कर रहे इंजीनियर की रहस्यमयी मौत, CIA का वो खूनी खेल आज भी थमा नहीं है
अक्टूबर 2025 की उस घटना को याद कीजिए जिसने पूरे रक्षा मंत्रालय को हिला कर रख दिया था। डीआरडीओ (DRDO) लखनऊ में ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos Missile) प्रोजेक्ट पर काम कर रहे एक बेहद होनहार और युवा सिस्टम इंजीनियर आकाशदीप गुप्ता की अचानक मौत हो जाती है।
आकाशदीप की उम्र सिर्फ 30 साल थी। वो पूरी तरह से फिट था, कोई बीमारी नहीं थी, नई-नई शादी हुई थी और वो भारत की सबसे खतरनाक सुपरसोनिक मिसाइल की तकनीक पर काम कर रहा था। अचानक से एक रात उसे ‘हार्ट अटैक’ आता है और वो दुनिया छोड़कर चला जाता है।
खुफिया दुनिया को जानने वाले लोग बहुत अच्छी तरह से वाकिफ हैं की विदेशी एजेंसियां ऐसे केमिकल और ज़हर का इस्तेमाल करती हैं जो शरीर में जाकर सीधा हार्ट अटैक लाते हैं और पोस्टमार्टम में उनकी कोई भनक तक नहीं लगती।
क्या ये महज़ एक इत्तेफाक था? बिल्कुल नहीं! ये भारत की मिसाइल तकनीक को कमज़ोर करने की एक बहुत ही खौफनाक और सोची-समझी ‘टारगेट किलिंग’ थी।
