आज के इन कायर और ढुलमुल नेताओं को देखकर मुझे बार-बार भारत के असली शेर, ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल की याद आती है।
अगर आज सरदार पटेल ज़िंदा होते, तो इन अर्बन नक्सलियों और वामपंथी गद्दारों की ये औकात नहीं थी की ये सड़क पर खड़े होकर देश के खिलाफ एक शब्द भी बोल पाते।
ज़रा इतिहास के उस खौफनाक पन्ने को पलटिए। बात 1947 की है। जब पूरा देश अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद होकर जश्न मना रहा था, जब लाल किले पर पहली बार तिरंगा फहराया गया था, तब इस देश के अंदर बैठे एक गद्दार गुट ने उस तिरंगे को सलामी देने से साफ इंकार कर दिया था।
वो गुट कोई और नहीं, बल्कि ये कम्युनिस्ट (वामपंथी) ही थे। इन्होंने देश की सड़कों पर लाल झंडे लेकर रैलियां निकालीं और एक बेहद ही ज़हरीला नारा दिया- “ये आज़ादी झूठी है!”
जिस आज़ादी के लिए हमारे लाखों वीरों ने फांसी के फंदे चूमे, काला पानी की सज़ा काटी, उस आज़ादी को इन वामपंथियों ने ‘झूठा’ घोषित कर दिया। क्यों? क्योंकि ये लोग दिल और दिमाग से कभी भारत के थे ही नहीं।
इनका इकलौता और खौफनाक एजेंडा ये था की अब चूंकि अंग्रेज़ चले गए हैं, तो इस भारत में हिंसा, खून-खराबा और बगावत फैलाकर भारत की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दो और यहाँ एक ‘कम्युनिस्ट तानाशाही’ लागू कर दो।
लेकिन इन लाल झंडे वालों की सबसे बड़ी बदकिस्मती ये थी की दिल्ली के तख्त पर उस वक्त गृह मंत्री के रूप में कोई डरपोक नेता नहीं, बल्कि साक्षात ‘सरदार पटेल’ बैठे थे।
और पटेल ने इन गद्दारों का वो परमानेंट इलाज किया की इनकी आने वाली कई पुश्तें उस खौफ को भूल नहीं पाईं।
विदेशी आकाओं के इशारे पर भारत माता की पीठ में खंजर घोंपने वाले वामपंथी, और तेलंगाना में लाल आतंक का वो खौफनाक खूनी खेल
अगर आपको वामपंथियों के उस खूनी और हिंसक चेहरे का असली सच जानना है, तो 1948 के उस कुख्यात ‘कलकत्ता अधिवेशन’ (Calcutta Thesis) का इतिहास पढ़ लीजिए।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के उस वक्त के सबसे बड़े और खूंखार नेता बी.टी. रणदिवे (B.T. Ranadive) ने अपने सभी काडर और गुंडों को एक सीधा आदेश दिया था-
“भारत सरकार के खिलाफ हथियार उठा लो, सेना और पुलिस पर हमले करो और खूनी क्रांति के ज़रिए सत्ता पर कब्ज़ा कर लो।”
ये कोई राजनीतिक विरोध नहीं था भाई, ये सीधे-सीधे भारत माता पर बंदूक तानकर किया गया एक खुला देशद्रोह था।
इसका सबसे भयानक रूप दक्षिण भारत के ‘तेलंगाना’ में देखने को मिला। 1948 में जब सरदार पटेल ने अपना खौफनाक ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo) चलाकर हैदराबाद के निज़ाम को जूतों पर झुकाया और हैदराबाद को भारत में मिलाया, तो वहां के कम्युनिस्टों ने एक नई गद्दारी शुरू कर दी।
निज़ाम के सरेंडर करने के बाद इन कम्युनिस्टों ने अपने हथियार नहीं डाले, बल्कि उन्होंने भारतीय सेना और भारत सरकार के खिलाफ ही एक सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) छेड़ दिया।
तेलंगाना के हज़ारों गांवों में इन लाल आतंक वालों ने अपनी ‘समानांतर सरकार’ बना ली थी। ये लोग अपने ही बनाए हुए ‘पीपुल्स कोर्ट’ (कंगारू कोर्ट) चलाते थे।
जो भी इंसान भारत सरकार का साथ देता था, जो तिरंगा फहराता था या जो गांव का ज़मींदार होता था, उसे ये वामपंथी बीच चौराहे पर खड़ा करके गोलियों से भून देते थे या कुल्हाड़ी से काट डालते थे।
इन्होंने पूरे तेलंगाना को एक खूनी युद्ध के मैदान में बदल दिया था। पुलिस थानों पर बम फेंके जा रहे थे, ट्रेनों को पलटा जा रहा था और खुलेआम लूटपाट मची हुई थी।
ये लोग चाहते थे की तेलंगाना को भारत से अलग करके एक स्वतंत्र कम्युनिस्ट देश बना दिया जाए। ये उस दौर का सबसे बड़ा और खौफनाक ‘नक्सलवाद’ था जिसे विदेशी फंडिंग और विदेशी हथियारों के दम पर चलाया जा रहा था।
नेहरू के समाजवाद वाले ढोंग को लात मारकर जब सरदार पटेल ने दिया सेना को सीधा आदेश, “गद्दारों को गोलियों से भून डालो”
जब तेलंगाना की सड़कों पर इन कम्युनिस्टों का ये खूनी नंगा नाच चल रहा था, तब दिल्ली में बैठे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू क्या कर रहे थे? नेहरू अपनी उसी पुरानी ‘समाजवाद’ (Socialism) और ‘शांति’ वाली मीठी नींद में सो रहे थे।
नेहरू को हमेशा से कम्युनिस्टों से एक अजीब सा रोमांस था। उन्हें लगता था की बातचीत करके, भाईचारा दिखाकर इन लाल झंडे वालों को सुधारा जा सकता है।
नेहरू और कांग्रेस की इसी ढुलमुल और कायरता वाली नीति के कारण ही इन वामपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो गए थे।
लेकिन भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल किसी भ्रम में नहीं थे। पटेल एक ज़मीनी और कड़क सनातनी नेता थे। वो बहुत अच्छी तरह जानते थे की जो गद्दार भारत माता के टुकड़े करने के लिए हथियार उठा चुका है, जो विदेशी ताकतों के टुकड़ों पर पल रहा है, उसके साथ शांति वार्ता करना अपनी ही कब्र खोदने के बराबर है।
सरदार पटेल ने नेहरू के उस शांति वाले ढोंग को एक किनारे लात मारी और अपनी शक्तियों का पूरा इस्तेमाल करते हुए एक ऐसा खौफनाक फैसला लिया जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। पटेल ने भारतीय सेना और मिलिट्री पुलिस को सीधा, स्पष्ट और बेहद क्रूर आदेश दे दिया-
“जो भी कम्युनिस्ट भारत सरकार के खिलाफ हथियार उठाए दिखे, उसे पकड़ने या जेल में डालने का टाइम वेस्ट मत करो, उसे वहीं सड़क पर गोलियों से भून डालो!”
पटेल ने साफ कर दिया था की भारत की संप्रभुता के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी विदेशी एजेंट को ज़िंदा नहीं छोड़ा जाएगा। जैसे ही सरदार पटेल का ये आदेश ज़मीन पर उतरा, पुलिस और सेना ने वो खौफनाक तांडव शुरू किया की इन वामपंथियों की पैंट गीली हो गई।
सेना ने तेलंगाना और बंगाल के उन लाल गढ़ों में घुस-घुस कर सफाई अभियान चलाया। कम्युनिस्टों के कैंपों को आग लगा दी गई।
जो भी वामपंथी गुरिल्ला युद्ध के नाम पर सेना पर हमला करने आया, उसे बिना किसी रहम के, बिना किसी मानवाधिकार के रोने-धोने के, सीधे छाती में गोलियां उतार कर जहन्नुम पहुंचा दिया गया।
इसे कहते हैं एक असली लौह पुरुष की हुंकार! पटेल ने दुनिया को दिखा दिया की अगर तुम लोकतंत्र का फायदा उठाकर इस देश को अंदर से खोखला करने की साज़िश रचोगे, तो भारत का गृह मंत्रालय तुम्हें तुम्हारे ही खून से नहला देगा।
कम्युनिस्ट पार्टी पर बैन और काल कोठरी में सड़े हज़ारों वामपंथी, जब लौह पुरुष के डंडे से थर थर कांपने लगा पूरा लाल इकोसिस्टम
सरदार पटेल सिर्फ गोलियां चलवाकर नहीं रुके। उन्हें पता था की जब तक इस गद्दार इकोसिस्टम की वैचारिक और कानूनी कमर नहीं तोड़ी जाएगी, तब तक ये कीड़े फिर से पनप उठेंगे।
इसलिए उन्होंने कानून का वो खौफनाक हथौड़ा चलाया जिसकी चोट से ये पूरी की पूरी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) घुटनों के बल ज़मीन पर आ गिरी।
पटेल ने पश्चिम बंगाल, मद्रास, त्रावणकोर-कोचीन (केरल) और हैदराबाद जैसे उन सभी राज्यों में जहाँ ये लाल आतंक अपना सिर उठा रहा था, वहां कम्युनिस्ट पार्टी को सीधे ‘गैरकानूनी और देशद्रोही संगठन’ घोषित करके उस पर परमानेंट बैन लगा दिया।
पूरे देश की पुलिस को खुली छूट दे दी गई की जहाँ भी कोई लाल झंडे वाला नेता दिखे, उसे कॉलर से पकड़कर सीधा काल कोठरी में ठूंस दो।
भाई साहब, पटेल के उस डंडे का खौफ इतना भयानक था की जो वामपंथी नेता कल तक खुलेआम ‘खूनी क्रांति’ के भाषण देते थे, वो अपनी जान बचाने के लिए चूहों की तरह ज़मीन के नीचे छुपने लगे।
पूरे देश से चुन-चुन कर वामपंथी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं की सरदार पटेल के उस ऑपरेशन में 10,000 से ज़्यादा कम्युनिस्टों को पकड़कर जेलों में सड़ा दिया गया था। कई बड़े नेता तो पुलिस के खौफ से भेष बदलकर भागते फिर रहे थे।
सरदार पटेल ने इस लाल इकोसिस्टम का वो आर्थिक और ढांचागत विनाश किया की इन्हें दिन में तारे नज़र आ गए। इनकी ऑफिसें सील कर दी गईं, इनका विदेशी पैसा रोक दिया गया और इनका पूरा का पूरा गुरिल्ला नेटवर्क मलबे में तब्दील कर दिया गया।
पटेल के इस खौफनाक और निर्मम एक्शन का ही नतीजा था की इन वामपंथियों को अपनी औकात समझ में आ गई। जो लोग हथियार उठाकर भारत पर कब्ज़ा करने के सपने देख रहे थे, उन्हें 1951 आते-आते गिड़गिड़ा कर अपने हथियार डालने पड़े और भारत के संविधान के सामने अपनी नाक रगड़नी पड़ी।
आज के उन लिबरल पत्रकारों और अर्बन नक्सलियों से पूछिए की क्या उन्हें अपने बाप-दादों का वो खौफनाक हश्र याद है? वामपंथी सिर्फ उन्हीं सरकारों के सामने भौंकते हैं जो कमज़ोर होती हैं।
जब सामने पटेल जैसा कोई दृढ़ और राष्ट्रवादी शेर खड़ा होता है, तो ये अपनी बिलों में घुसकर लोकतंत्र की भीख मांगने लगते हैं।
चीन के लाल आतंक पर पटेल की वो ऐतिहासिक चेतावनी जिसे नेहरू के “हिंदी चीनी भाई भाई” वाले ढोंग ने अनसुना कर दिया
अब ज़रा इस पूरे वामपंथी ड्रामे और गद्दारी के उस खौफनाक पहलू को देखिए, जिसने आगे चलकर भारत की पीठ में सबसे बड़ा खंजर घोंपा। अगर आप सोचते हैं की इन कम्युनिस्टों का वफादार सिर्फ रूस था, तो आप गलत हैं।
इनका असली और सबसे खूंखार आका उस वक्त चीन के बीजिंग में बैठकर भारत को निगलने के सपने देख रहा था। और इस बात को अगर उस वक्त देश में कोई एक इंसान पूरी गहराई से समझ रहा था, तो वो सिर्फ और सिर्फ सरदार वल्लभभाई पटेल थे।
सरदार पटेल की दूरदृष्टि इतनी भयानक और सटीक थी की वो किसी भी गद्दार की आंखों में देखकर उसका पूरा एजेंडा पढ़ लेते थे।
अपनी मृत्यु से सिर्फ एक महीने पहले, 7 नवंबर 1950 को सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक बेहद लंबी और ऐतिहासिक चिट्ठी लिखी थी।
ये चिट्ठी कोई नॉर्मल कागज़ का टुकड़ा नहीं था, ये साक्षात भारत की सुरक्षा का वो मास्टरप्लान था जिसे अगर मान लिया जाता, तो आज भारत का नक्शा कुछ और ही होता।
पटेल ने उस चिट्ठी में नेहरू को डंके की चोट पर चेतावनी दी थी की “चीन का कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद हमारे लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। चीन ने जिस तरह से तिब्बत को निगला है, वो दिन दूर नहीं जब वो हमारी सीमाओं पर आकर खड़ा हो जाएगा।”
पटेल ने साफ लिखा था की हमें चीन पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। और सबसे खौफनाक बात जो पटेल ने उस खत में लिखी थी, वो भारत के अंदर बैठे इन वामपंथी गद्दारों के बारे में थी।
पटेल ने नेहरू को चेताया था की “हमारे देश के अंदर जो कम्युनिस्ट बैठे हैं, उनकी वफादारी भारत के प्रति नहीं, बल्कि चीन के प्रति है। अगर कल को चीन भारत पर हमला करता है, तो ये लाल झंडे वाले गद्दार भारत माता की पीठ में छुरा घोंपेंगे और दुश्मन का साथ देंगे।”
लेकिन उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू का क्या रवैया था? नेहरू अपनी उसी ‘शांति’, ‘अहिंसा’ और ‘समाजवाद’ की मीठी अफीम खाकर सो रहे थे। नेहरू को लगा की पटेल तो बहुत ज़्यादा शक करते हैं।
नेहरू ने पटेल की उस ऐतिहासिक चेतावनी को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और दुनिया के सामने ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ का वो फर्जी और जानलेवा नारा उछाल दिया।
नेहरू ने चीन के कम्युनिस्ट नेताओं के साथ गले मिलकर पंचशील के समझौते किए और अपनी सेना को कमज़ोर छोड़ दिया।
नतीजा क्या हुआ? ठीक 12 साल बाद, 1962 में चीन ने हम पर धोखे से हमला किया और हमारी हज़ारों वर्ग किलोमीटर ज़मीन हड़प ली।
हमारे हज़ारों वीर जवान बिना अच्छे जूतों और बिना हथियारों के बर्फ में लड़ते हुए शहीद हो गए। और जानते हैं उस 1962 के युद्ध के दौरान भारत के इन कम्युनिस्टों ने क्या किया? सरदार पटेल की भविष्यवाणी 100 प्रतिशत सच साबित हुई!
जब हमारे जवान बॉर्डर पर चीनियों की गोलियां खा रहे थे, तब इस देश के वामपंथियों ने चीन का समर्थन किया! इन गद्दारों ने भारत की सेना के लिए खून डोनेट करने से मना कर दिया।
इन्होंने हड़तालें कीं ताकि सेना तक हथियार ना पहुंच सकें। इन्होंने खुलेआम कहा की चीन हमलावर नहीं है।
अगर नेहरू ने 1950 में ही पटेल की बात सुन ली होती और इन लाल झंडे वाले गद्दारों को उसी वक्त देश से बाहर फेंक दिया होता, तो भारत को 1962 की वो जलालत कभी नहीं झेलनी पड़ती। पटेल की उस शेर वाली दूरदृष्टि के आगे नेहरू का वो सेक्युलर और समाजवादी ढोंग पूरी तरह से नंगा हो चुका था।
बंगाल के तेभागा से लेकर त्रावणकोर तक पटेल के डंडे से थर थर कांपता पूरा वामपंथी इकोसिस्टम
अगर किसी को लग रहा है की कम्युनिस्टों का ये खूनी तांडव सिर्फ तेलंगाना तक सीमित था, तो वो वामपंथी गद्दारी के इतिहास का सिर्फ आधा पन्ना ही जानता है।
ये लाल आतंक एक कैंसर की तरह पूरे भारत में फैलने की कोशिश कर रहा था। पश्चिम बंगाल का ‘तेभागा आंदोलन’ हो या केरल (त्रावणकोर) का ‘पुन्नप्रा-वायलार विद्रोह’, इन कम्युनिस्टों का पैटर्न हर जगह एकदम सेम था।
इनका तरीका क्या था? ये लोग गरीब किसानों और मज़दूरों को भड़काते थे। उनके हाथों में लाल झंडे और देसी हथियार थमा देते थे।
फिर ये पुलिस थानों पर हमले करते, ज़मींदारों के घर जला देते, और जो भी आम आदमी भारत सरकार या तिरंगे का सम्मान करता, उसकी सरेआम गर्दन काट देते थे।
केरल के पुन्नप्रा-वायलार में तो इन कम्युनिस्ट गुंडों ने पुलिस कैंपों पर धावा बोलकर कई पुलिसवालों को बर्बरता से मार डाला था।
लेकिन इन लाल गद्दारों को ये नहीं पता था की दिल्ली में बैठा गृह मंत्री अब कोई अंग्रेज़ नहीं है, बल्कि वो लौह पुरुष है जिसने 562 रियासतों को अपनी एक उंगली के इशारे पर भारत में मिला लिया है।
सरदार पटेल ने इन सभी राज्यों की सरकारों और पुलिस को एक सीधा और खौफनाक ‘फ्री हैंड’ दे दिया। पटेल की तरफ से एक ही लाइन का संदेश था- “लाल आतंक को उसकी औकात दिखा दो।”
बंगाल के बीहड़ों से लेकर केरल के जंगलों तक, इन हथियारबंद कम्युनिस्टों को कुत्तों की तरह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। जहाँ भी इन्होंने पुलिस पर हमला करने की कोशिश की, वहां पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार करने का ड्रामा नहीं किया, बल्कि सीधे छाती पर गोलियां उतारीं। पुन्नप्रा-वायलार में सैकड़ों कम्युनिस्ट गुंडों को सेना और पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया।
पटेल की उस ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति का ही खौफ था की जो कम्युनिस्ट भारत के संविधान को मानने से इंकार कर रहे थे, जो कल तक ‘खूनी क्रांति’ के गीत गाते थे, वो 1951 आते-आते भीगी बिल्ली बन गए।
उन्हें समझ आ गया की अगर भारत सरकार के खिलाफ एक और बंदूक उठी, तो पटेल उनकी पूरी की पूरी नस्लों को मिट्टी में मिला देंगे। इसी खौफ और इसी डंडे के दम पर कम्युनिस्टों ने अपने हथियार डाले और जान बचाने के लिए लोकतंत्र और चुनाव का रास्ता अपनाया।
आज जो वामपंथी नेता सफेद कुर्ता पहनकर संसद में बैठते हैं, वो लोकतंत्र के प्रति अपने प्यार की वजह से नहीं, बल्कि पटेल के उस खौफनाक डंडे की वजह से वहां पहुंचे हैं जो 1948 में इनके बाप-दादों पर बजा था।
अब ज़रा इतिहास के उस खौफनाक पन्ने से निकलकर आज के 2026 के भारत में आइए। आज हालात क्या हैं? आज इन गद्दारों ने अपनी शक्लें बदल ली हैं। अब इन्होंने कोट-पैंट पहन लिया है। ये अब ‘अर्बन नक्सल’ बन चुके हैं।
ये अर्बन नक्सल आज हमारी यूनिवर्सिटीज़ में प्रोफेसर बनकर बैठे हैं। ये लुटियंस मीडिया में पत्रकार बनकर बैठे हैं। इनका तरीका बदल गया है, लेकिन इनका वो खौफनाक एजेंडा आज भी वही है- भारत के टुकड़े करना और सनातन संस्कृति को मिटाना।
आज जब हम इन कागज़ी शेरों का दोगलापन देखते हैं, तो दिल से एक ही आवाज़ निकलती है की आज इस देश को फिर से एक सरदार पटेल की ज़रूरत है। आज की इन सरकारों को पटेल के उस ‘लौह मॉडल’ को अपनाना ही पड़ेगा।
भारत माता की जय!
