बचपन से लेकर आज तक हमारे दिमाग में क्या ठूंसा गया? हमें रटाया गया की कोट पर लाल गुलाब लगाने वाले जवाहरलाल नेहरू तो ‘शांतिप्रिय’ थे।
वो तो बच्चों से बहुत प्यार करते थे, इसलिए उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहा जाता है। स्कूलों में उनके नाम पर बाल दिवस मनाया जाता है।
लेकिन आज उस झूठे और खून से सने हुए नकाब को नोचकर फेंकने का वक्त आ गया है। इस देश के आम हिंदू को ये जानना ही पड़ेगा की उस गुलाब के फूल के पीछे कितने बेगुनाह हिंदुओं का खून टपक रहा था।
बात 1946 के उस खौफनाक दौर की है, जब देश आज़ादी की दहलीज पर खड़ा था और मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान बनाने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान कर दिया था।
अगस्त से लेकर अक्टूबर 1946 तक बंगाल के नोआखली (Noakhali) में जिहादियों ने जो खून-खराबा किया, वो सुनकर आज भी रूह कांप जाती है। वो हिंदुओं का एकतरफा और सबसे खौफनाक कत्लेआम था।
हज़ारों हिंदुओं को उनके घरों से खींच-खींच कर काटा गया। हमारी मासूम बच्चियों और महिलाओं का सरेआम चीरहरण हुआ, उन्हें बाज़ारों में नग्न घुमाया गया और उनके पतियों के सामने उनके साथ दुष्कर्म करके उन्हें जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं की कटी हुई लाशें और खून से सनी हुई ज़मीन थी।
और उस वक्त दिल्ली में क्या हो रहा था? दिल्ली में कांग्रेस सरकार के मुखिया बनकर बैठे थे यही हमारे ‘शांतिप्रिय’ जवाहरलाल नेहरू! जब बंगाल में हिंदू खून की नदियां बह रही थीं, तब नेहरू के मुंह से उफ तक नहीं निकली। उनकी वो सारी ‘अहिंसा’ और ‘शांति’ रजाई ओढ़कर सो रही थी।
उनके लिए वो जिहादी दरिंदगी और हिंदुओं का कत्लेआम महज़ एक ‘राजनीतिक घटना’ थी। उन्होंने एक बार भी उन जिहादियों को रोकने के लिए सेना भेजने की बात नहीं की।
उनका सारा भाईचारा सिर्फ तब जागता था जब खरोंच किसी दूसरे मज़हब वाले को आती थी। हिंदुओं का खून उनके लिए पानी से भी सस्ता था।
मुसलमानों से परेशान होकर जब बिहार के हिंदुओं का खून खौला, तो जिहादियों को बचाने के लिए नेहरू ने दी हवाई बमबारी की खौफनाक धमकी
खैर, नोआखली में जो हुआ वो पूरे देश ने देखा। जब वहां से कटे-पिटे, लुटे-पिटे और रोते-बिलखते हिंदू शरणार्थी भागकर बिहार पहुंचे, तो बिहार के सनातनियों ने उनकी वो खौफनाक दुर्दशा अपनी आंखों से देखी।
जिन औरतों के सुहाग उजड़ गए थे, जिनकी बच्चियों को जिहादी उठा ले गए थे, उनकी चीखें सुनकर बिहार के हिंदू किसानों और नौजवानों का खून खौल उठा।
बिहार का हिंदू कोई बुज़दिल तो था नहीं। उन्होंने तय कर लिया की अब पानी सिर के ऊपर से जा चुका है। अगर सरकार और पुलिस इन जिहादियों को नहीं रोक सकती, तो अब हम इनका इलाज खुद करेंगे।
अक्टूबर-नवंबर 1946 में बिहार के हिंदुओं ने एकजुट होकर उन जिहादियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया।
और भाई साहब! जैसे ही बिहार के हिंदुओं ने अपने बचाव में हथियार उठाए और जिहादियों पर पलटवार शुरू किया, वैसे ही दिल्ली में बैठे नेहरू की ‘शांति’ को अचानक से हार्ट अटैक आ गया।
जो नेहरू नोआखली के कत्लेआम पर महीनों तक गूंगा और अंधा बना बैठा था, वो अचानक से हवाई जहाज़ में बैठकर सीधे पटना पहुंच गया। उसे लगने लगा की “हाय रे! मेरे प्यारे शांतिदूतों को ये हिंदू कैसे मार सकते हैं?”
पटना पहुंचकर नेहरू ने जो किया, वो इस देश के इतिहास का सबसे शर्मनाक और गद्दारी भरा पल है। नेहरू ने खुलेआम मंच से बिहार के हिंदू किसानों को डराते और धमकाते हुए एक ऐसी खौफनाक बात कही जो कोई विदेशी दुश्मन ही कह सकता है।
नेहरू ने दहाड़ते हुए कहा- “अगर तुमने तुरंत ये सब नहीं रोका, तो मैं सेना बुला लूंगा और तुम पर हवाई जहाज़ से बम बरसाऊंगा!”
ज़रा समझिए! अपने ही देश के लोग, जो बेचारे किसान थे, जो अपने हिंदू भाइयों के दर्द से भड़के हुए थे, उन निहत्थे नागरिकों पर भारत का भावी प्रधानमंत्री हवाई जहाज़ से बम गिराने की धमकी दे रहा था!
क्या नेहरू ने नोआखली के जिहादियों को ऐसी कोई धमकी दी थी? क्या उसने जिन्ना के गुंडों पर बम गिराने की बात कही थी? बिल्कुल नहीं! उसका सारा रौद्र रूप और सारी तानाशाही सिर्फ और सिर्फ उन गरीब हिंदू किसानों के लिए थी।
5 नवंबर 1946 नगरनौसा की वो काली रात, जब नेहरू के आदेश पर 400 हिन्दू किसानों को मशीनगन से भून डाला गया
नेहरू की वो धमकी कोई खोखली बात नहीं थी। उसने जो कहा, वो उसने ज़मीन पर करके भी दिखा दिया। तारीख थी 5 नवंबर 1946! ये वो काली रात है जिसे इतिहास की किताबों से ऐसे मिटा दिया गया जैसे इसका कोई वजूद ही ना हो।
पटना से करीब 40 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव था- नगरनौसा (Nagarnausa)। वहां के सीधे-सादे हिंदू किसान अपने घरों और अपने परिवारों की रक्षा के लिए लाठी-डंडे लेकर इकट्ठे हुए थे।
उन्हें डर था की जिहादी भीड़ उन पर हमला कर सकती है। वो सिर्फ अपना विरोध जता रहे थे और अपनी ज़मीन पर खड़े थे।
तभी वहां नेहरू के सीधे आदेश पर सेना (मद्रास रेजिमेंट) को उतार दिया गया। अरे भाई, सेना का काम तो विदेशी दुश्मनों से लड़ना होता है, लेकिन यहां तो सेना को अपने ही देश के किसानों के खिलाफ खड़ा कर दिया गया था।
बिना किसी चेतावनी के, बिना कोई आंसू गैस छोड़े, सीधे मद्रास रेजिमेंट को ऑर्डर दिया गया- “फायर!”
और फिर जो खौफनाक तांडव हुआ, वो जलियांवाला बाग से भी ज़्यादा बर्बर था। सेना ने उन धोती-कुर्ता पहने, निहत्थे और गरीब हिंदू किसानों पर अंधाधुंध मशीनगन से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।
खेत और पगडंडियां खून से लाल हो गईं। जो किसान अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश कर रहा था, उसे भी पीठ पीछे गोलियां मारी गईं। वहां कोई दंगा नहीं हो रहा था, वहां सीधे-सीधे हिंदुओं का एकतरफा शिकार किया जा रहा था।
गोलियों की तड़तड़ाहट शांत होने के बाद जब वहां लाशें गिनी गईं, तो रूह कांप गई। सरकारी और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स चीख-चीख कर गवाही देते हैं की उस एक दिन की फायरिंग में 400 से ज़्यादा हिंदू किसान वहीं तड़प-तड़प कर अपनी जान दे बैठे!
कुछ पुराने चश्मदीदों और अनौपचारिक रिकॉर्ड्स की मानें तो ये आंकड़ा 1000 के पार था!
ज़रा सोचिए इस दिल दहला देने वाले मंज़र को। एक तरफ नोआखली में जिहादी हिंदुओं को काट रहे थे, और दूसरी तरफ बिहार में खुद नेहरू की सरकार हिंदुओं को मशीनगनों से भून रही थी। हिंदू जाए तो जाए कहां?
400 लाशें बिछा दी गईं, 400 घरों के चिराग बुझा दिए गए, औरतों का सुहाग उजाड़ दिया गया। और ये सब किसने किया? उसी आदमी ने जिसे आज ये सेक्युलर इकोसिस्टम ‘शांति का मसीहा’ बताता है।
पद्मजा नायडू को लिखा वो खूनी पत्र जिसमें 400 हिन्दुओं की लाशों पर नेहरू ने मनाया था अपना बेशर्म ‘जश्न’
अब आप सोच रहे होंगे की जब 400 लोगों की मौत की खबर नेहरू को मिली होगी, तो शायद उसे दुख हुआ होगा। शायद उसे लगा होगा की सेना से फायरिंग करवाकर उसने बहुत बड़ी गलती कर दी।
अगर आपको ऐसा लग रहा है, तो आप उस क्रूर और खौफनाक मानसिकता को अब तक नहीं समझ पाए हैं जो उस आदमी के दिमाग में भरी हुई थी।
5 नवंबर 1946 की उसी रात को, जब नगरनौसा के खेतों में उन गरीब किसानों की लाशें ठंडी भी नहीं हुई थीं, जब उनके घरों में चीख-पुकार मची हुई थी, तब दिल्ली में बैठा ये ‘चाचा नेहरू’ क्या कर रहा था?
वो अपने कमरे में बैठकर अपनी एक बेहद करीबी मित्र, सरोजिनी नायडू की बेटी ‘पद्मजा नायडू’ को एक प्रेम भरा और खौफनाक पत्र लिख रहा था।
इस खत में नेहरू ने जो लिखा है, वो दुनिया के किसी भी इंसान का खून खौलाने के लिए काफी है। नेहरू ने अपने उस खत में लिखा-
“मुझे अभी खबर मिली है की मिलिट्री ने किसानों की एक भीड़ पर फायरिंग की है और करीब 400 लोग मारे गए हैं। आम तौर पर ऐसी बात सुनकर मुझे बहुत दुख होता है और मैं दहल जाता। लेकिन क्या तुम यकीन करोगी? मुझे यह सुनकर बहुत राहत मिली है।”
अरे बेशर्मों! ज़रा इस नीचता और क्रूरता के स्तर को नापने की कोशिश करो। जिस देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाला आदमी, अपने ही देश के 400 निर्दोष किसानों की लाशों पर ‘राहत’ और खुशी महसूस कर रहा हो, क्या वो इंसान कहलाने लायक है?
“मुझे राहत मिली है!” ये शब्द क्या बताते हैं? ये शब्द चीख-चीख कर बता रहे हैं की नेहरू को हिंदुओं से कितनी भयंकर नफरत थी। उसे खुशी थी की जो हिंदू जिहादियों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत कर रहे थे, उन्हें सेना ने कुत्तों की तरह मार डाला।
ये कोई दुख की चिट्ठी नहीं थी, ये 400 हिंदुओं की लाशों पर मनाया गया एक खूनी और बर्बर जश्न था।
क्या दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश के नेता ने आज तक अपनी ही जनता की मौत पर ऐसी खुशी मनाई है?
जलियांवाला बाग में गोलियां चलाने वाले जनरल डायर ने भी शायद इतनी बेशर्मी से जश्न नहीं मनाया होगा, जितनी बेशर्मी से इस ‘शांतिप्रिय’ ने अपनी चिट्ठी में मनाया था। इसे सिर्फ इसलिए राहत थी क्योंकि मरने वाले काफिर थे और मारे गए लोग जिहादियों का विरोध कर रहे थे।
ये खत इस बात का सबसे बड़ा सबूत है की कांग्रेस की बुनियाद में ही हिंदुओं के खून का सौदा करना लिखा था। जिहादियों को बचाने के लिए ये लोग अपने ही देश के हिंदुओं को मशीनगन से भुनवा सकते थे और फिर रात को सुकून की नींद सो सकते थे।
आज अगर वो 400 किसान ज़िंदा होते, तो वो इस देश के सेक्युलर सिस्टम के मुंह पर थूकते जो आज भी इस कातिल को ‘चाचा’ कहकर पूजता है!
‘राष्ट्रपिता’ का खौफनाक दोगलापन और कांग्रेस की वो गद्दारी जिसने जिहादी तुष्टिकरण के लिए हमेशा हिन्दू खून का किया सौदा
अब ज़रा इस पूरे खूनी खेल में उस शख्स की भूमिका को देखिए जिसे ये दरबारी इकोसिस्टम ‘महात्मा’ और ‘राष्ट्रपिता’ कहकर पूजता है।
जब 1946 में बंगाल के नोआखली में जिहादियों की भीड़ हमारे हिंदुओं को काट रही थी, हमारी औरतों को सरेआम बाज़ारों में नग्न कर रही थी, तब मोहनदास करमचंद गांधी क्या कर रहे थे?
गांधी जी उस वक्त ‘शांति’ का पाठ पढ़ा रहे थे। उनका ज्ञान था की “हिंदुओं को बहादुरी से मर जाना चाहिए, लेकिन हथियार नहीं उठाना चाहिए।”
वाह! क्या गज़ब का इंसाफ था! जब कटने वाला हिंदू हो, तो उसे अहिंसा की घुट्टी पिला दो। लेकिन जैसे ही बिहार के अंदर हिंदुओं का खून खौला और उन्होंने नोआखली के नरसंहार का बदला लेने के लिए उन जिहादियों पर पलटवार किया, तो अचानक से गांधी जी का सारा खून खौल उठा।
गांधी जी ने तुरंत दिल्ली से एक खौफनाक बयान जारी कर दिया। उन्होंने पूरे बिहार के हिंदुओं को ‘पापी’ और ‘राक्षस’ घोषित कर दिया।
उन्होंने धमकी दे दी की “अगर बिहार के हिंदुओं ने मुसलमानों पर हाथ उठाना बंद नहीं किया, तो मैं आमरण अनशन करके अपनी जान दे दूंगा।”
ज़रा सोचिए इस भयानक दोगलेपन को! नोआखली में जब जिहादी हिंदुओं को काट रहे थे, तब गांधी जी ने अपना खाना-पीना नहीं छोड़ा, तब उन्होंने कोई आमरण अनशन नहीं किया। लेकिन जब हिंदू अपनी रक्षा के लिए खड़ा हुआ, तो गांधी जी मरने-मारने पर उतारू हो गए।
और दूसरी तरफ उनका सबसे चहेता चेला जवाहरलाल नेहरू बिहार में खड़ा होकर अपनी ही सेना से उन निहत्थे हिंदू किसानों को मशीनगन से भुनवा रहा था। नगरनौसा का वो 400 हिंदुओं का नरसंहार कोई इत्तेफाक नहीं था।
ये कांग्रेस की उस खौफनाक गद्दारी की पहली और सबसे बड़ी सीढ़ी थी, जहाँ एक खास जिहादी वोटबैंक को पालने के लिए हमेशा हिंदुओं की बलि चढ़ाई गई।
नेहरू ने इस कत्लेआम के बाद बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा (श्रीबाबू) पर भयंकर दबाव डाला की वो विधानसभा में खड़े होकर इस मिलिट्री फायरिंग को सही ठहराएं।
ये कांग्रेस की वो नीच राजनीति थी जिसकी नींव ही हमारे पूर्वजों के खून और उनकी कटी हुई लाशों पर रखी गई थी।
‘सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू’ का वो पन्ना नंबर 65 जिसे कांग्रेसी दरबारियों ने सबूत मिटाने के लिए कर दिया गायब
जब कोई कातिल कत्ल करता है, तो वो सबसे पहले अपने खून से सने हुए सुबूत मिटाता है। नेहरू ने तो 5 नवंबर 1946 को अपनी उस करीबी मित्र पद्मजा नायडू को वो खौफनाक खत लिख दिया था जिसमें उसने 400 हिंदू किसानों की मौत पर ‘राहत’ मिलने की बात कहकर जश्न मनाया था।
लेकिन इस देश के कांग्रेसी दरबारियों और सेक्युलर इतिहासकारों को दशकों बाद एहसास हुआ की अगर ये चिट्ठी इस देश के हिंदुओं ने पढ़ ली, तो क्या होगा?
उन्हें पता था की अगर उस खूनी रात का सच बाहर आ गया, तो देश का युवा नेहरू की मूर्तियों पर कालिख पोत देगा और कांग्रेस का वो सारा ‘शांतिप्रिय’ वाला नकाब तार-तार हो जाएगा। इसलिए इन लोगों ने इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे नीच और सबसे खौफनाक ‘बौद्धिक फ्रॉड’ किया।
हुआ यूं की 1984 और 1989 के बीच ‘जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड’ ने नेहरू की चिट्ठियों और भाषणों को किताबों के रूप में छापना शुरू किया। इस किताब का नाम था- ‘Selected Works of Jawaharlal Nehru’।
इस किताब की सीरीज़ 2, वॉल्यूम 1 के ‘पेज नंबर 65’ पर 5 नवंबर 1946 की वो चिट्ठी बाकायदा जस-की-तस छापी गई थी। क्योंकि तब इंटरनेट नहीं था और इन्हें लगता था की कोई आम हिंदू इतनी मोटी किताबें कहां पढ़ेगा।
लेकिन जब 2003 के बाद इंटरनेट का ज़माना आया और राष्ट्रवादी शोधकर्ताओं ने इतिहास के पन्नों को खंगालना शुरू किया, तो इन कांग्रेसी दरबारियों की पैंट गीली हो गई। इन्हें समझ आ गया की ये पन्ना नंबर 65 एक ऐसा टाइम-बम है जो नेहरू के पूरे सेक्युलर महल को उड़ा देगा।
फिर इन गद्दारों ने क्या किया? 2003 में जब इस किताब का नया एडिशन छापा गया, तो उसमें से बड़ी चालाकी से वो पन्ना ही गायब कर दिया गया! जी हां! ‘नेहरू मेमोरियल फंड’ की वेबसाइट से भी उस खौफनाक लेटर को रातों-रात डिलीट कर दिया गया। जैसे वो चिट्ठी कभी लिखी ही ना गई हो।
ये कोई भूल-चूक नहीं थी मेरे भाई! ये इस देश के इतिहास की सबसे बड़ी डकैती थी। ये सिर्फ एक पन्ना नहीं चुरा रहे थे, ये उन 400 हिंदू किसानों की चीखों को, उनके खून को और उनकी शहादत को हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास की कब्र में दफना रहे थे।
लेकिन सत्य को कभी ज़मीन में नहीं गाड़ा जा सकता। राष्ट्रवादी लेखकों और पत्रकारों ने पुरानी लाइब्रेरियों से 1984 के उस ओरिजिनल पन्ने को ढूंढ निकाला और इस सेक्युलर फ्रॉड के चिथड़े उड़ा कर रख दिए।
अब हमारी ये ज़िम्मेदारी है की हम इस 400 हिंदू किसानों के खौफनाक नरसंहार और नेहरू के उस खूनी पत्र (पन्ना नंबर 65) के सच को इस देश के हर एक स्कूल, हर एक मोबाइल, हर एक व्हाट्सएप ग्रुप और हर एक चौपाल तक पहुंचाएं।
हमारी आने वाली पीढ़ियों को, हमारे बच्चों को ये पता होना चाहिए की जिस आदमी की जैकेट पर वो गुलाब का फूल देखते हैं, उस फूल को लाल करने के लिए उनके अपने पूर्वजों का कितना खून बहाया गया है।
हमें डंके की चोट पर उन सभी संस्थानों, पार्कों और सड़कों के नाम बदलने की मांग करनी होगी जो इस ‘शांतिप्रिय’ के नाम पर रखे गए हैं।
जिस आदमी ने अपने ही देश के किसानों पर हवाई जहाज़ से बम बरसाने की धमकी दी हो और मशीनगन चलवाकर उनकी लाशों पर जश्न मनाया हो, वो इस देश का ‘चाचा’ तो क्या, इस देश का नागरिक कहलाने के लायक भी नहीं है।
जय श्री राम! भारत माता की जय!
