बंगाल को जिहादी सुल्तानों से आज़ाद कराया, तुगलक के पूर्वजों को उनकी औकात याद दिलाई, इस्लाम पर सनातन की जीत का प्रतीक 'कोणार्क सूर्य मंदिर' बनाने वाले हिंदू सम्राट 'नरसिंह देव प्रथम'

बंगाल को जिहादी सुल्तानों से आज़ाद कराया, तुगलक के पूर्वजों को उनकी औकात याद दिलाई, इस्लाम पर सनातन की जीत का प्रतीक ‘कोणार्क सूर्य मंदिर’ बनाने वाले हिंदू सम्राट ‘नरसिंह देव प्रथम’

इतिहास के पन्ने जब भी पलटता हूँ, तो 13वीं सदी का वो खौफनाक और खून से लथपथ मंज़र आंखों के सामने आ जाता है। ये वो दौर था जब पूरे उत्तर भारत पर इस्लामिक आक्रांताओं का काला साया मंडरा रहा था।

कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश जैसे तुर्क जिहादी आक्रांताओं ने दिल्ली के तख्त पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था। हमारी हज़ारों साल पुरानी महान नालंदा यूनिवर्सिटी को बख्तियार खिलजी के जिहादी गुंडों ने जलाकर राख कर दिया था।

उस वक्त उत्तर भारत के ज़्यादातर हिंदू राजा या तो वीरगति को प्राप्त हो चुके थे, या फिर अपने किलों के अंदर बैठकर सिर्फ अपनी रक्षा करने पर मजबूर थे। ऐसा लग रहा था जैसे सनातन धर्म की इस पवित्र ज़मीन पर जिहादियों की आंधी सब कुछ निगल जाएगी।

लेकिन इस देश की मिट्टी इतनी कमज़ोर नहीं है की कोई भी विदेशी लुटेरा आए और इसे हमेशा के लिए रौंद कर चला जाए।

जब उत्तर भारत सुलग रहा था, तब पूर्वी भारत यानी कलिंग (आज का ओडिशा) की ज़मीन से एक ऐसा बवंडर उठा जिसने इन इस्लामिक आक्रांताओं की रातों की नींद और दिन का चैन सब कुछ छीन लिया।

साल 1238 ईस्वी में कलिंग के राजसिंहासन पर एक ऐसा खूंखार और महापराक्रमी हिंदू शेर बैठा, जिसने तय कर लिया था की अब हम हाथ बांधकर मार नहीं खाएंगे। उस हिंदू सम्राट का नाम था- नरसिंह देव प्रथम।

नरसिंह देव की रगों में वो सनातन का बारूद दौड़ता था जो दुश्मनों को उनके घर में घुसकर भस्म करने की ताक़त रखता था। जब उन्होंने देखा की तुर्क और अफ़ग़ान के सुल्तान पूरे भारत में कत्लेआम मचा रहे हैं, तो उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरे भारतीय इतिहास की धारा को ही पलट कर रख दिया।

उन्होंने कसम खाई की अब हिंदू राजा अपने किलों में बैठकर दुश्मन का इंतज़ार नहीं करेगा। अब तलवारें म्यान से बाहर निकलेंगी और जिहादियों को उन्ही के घर में जाकर चीरा जाएगा।

जगन्नाथ पुरी को अपवित्र करने का वो जिहादी मंसूबा और नरसिंह देव प्रथम के हाथों बंगाल के सुल्तान तुगरल खान की मौत का फरमान

उस समय कलिंग के ठीक ऊपर, यानी आज के बंगाल पर दिल्ली सल्तनत का कब्ज़ा था। वहां का गवर्नर था एक खूंखार और क्रूर तुर्क- तुगरल तुगान खान।

ये तुगान खान कोई मामूली सिपहसालार नहीं था, ये दिल्ली के सुल्तानों का बहुत ही वफादार और कट्टर जिहादी कुत्ता था। इसका बस एक ही सपना था- किसी भी तरह कलिंग (ओडिशा) पर हमला करके उसे ‘दारुल इस्लाम’ में तब्दील कर देना।

तुगान खान की गिद्ध वाली नज़रें सीधे कलिंग की सबसे बड़ी आस्था, हमारे महाप्रभु ‘जगन्नाथ पुरी’ के भव्य मंदिर पर गड़ी हुई थीं। उसे पता था की पुरी के मंदिर में अथाह खज़ाना है।

लेकिन उसका असली मकसद सिर्फ सोना-चांदी लूटना नहीं था! उसका मकसद था भगवान जगन्नाथ के उस पवित्र मंदिर को ज़मीनदोज़ करना, वहां की मूर्तियों को तोड़ना और करोड़ों हिंदुओं को अपने पैरों तले कुचल कर उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बना लेना। वो चाहता था की कलिंग की सड़कों पर भी हिंदुओं का खून वैसे ही बहे जैसे उत्तर भारत में बह रहा था।

लेकिन उस बेवकूफ तुर्क सुल्तान को ये नहीं पता था की उसका पाला इस बार किसी साधारण राजा से नहीं, बल्कि साक्षात महाकाल के एक ऐसे भक्त से पड़ा है जो मौत को मुट्ठी में लेकर चलता है।

सम्राट नरसिंह देव का खुफिया तंत्र इतना ज़बरदस्त था की उन्हें सुल्तान के इस जिहादी प्लान की भनक बहुत पहले ही लग गई। उन्हें पता चल गया की बंगाल का सुल्तान तुगान खान कलिंग पर एक बहुत बड़े हमले की तैयारी कर रहा है।

कोई और राजा होता, तो वो तुरंत अपने किलों की दीवारें ऊंची करवाने लगता और सेना को बॉर्डर पर खड़ा कर देता। लेकिन मैंने कहा ना, नरसिंह देव प्रथम की डिक्शनरी में ‘डिफेंस’ नाम का कोई शब्द था ही नहीं।

उन्होंने अपने सेनापतियों को बुलाया और एक ऐसी खौफनाक दहाड़ लगाई की पूरी कलिंग की सेना के खून में उबाल आ गया। सम्राट ने ऐलान कर दिया की “हम बंगाल के सुल्तान का इंतज़ार नहीं करेंगे।

हम कलिंग की पवित्र ज़मीन पर युद्ध नहीं लड़ेंगे। हम अपनी सेना लेकर सीधा बंगाल में घुसेंगे और उस तुगान खान की छाती पर चढ़कर उसे उसकी औकात याद दिलाएंगे!”

ये उस जिहादी सुल्तान की मौत का वो फरमान था जिस पर साक्षात एक हिंदू सम्राट ने अपने खून से दस्तखत कर दिए थे।

डिफेंस नहीं अब सीधा अटैक होगा, जब एक हिन्दू सम्राट ने पहली बार किसी इस्लामी सल्तनत के घर में घुसकर किया हमला

भारतीय इतिहास में ये एक ऐसा पल था जिसने पूरे के पूरे युद्ध के नियमों को उलट कर रख दिया था। सदियों से जिहादी आक्रांता भारत आते थे, हमला करते थे और हम हिंदू अपनी सीमाओं पर लड़ते थे।

लेकिन साल 1243 ईस्वी में जो हुआ, वो इस्लाम के उन क्रूर सुल्तानों के लिए किसी खौफनाक सपने से कम नहीं था।

सम्राट नरसिंह देव प्रथम ने अपनी उस खूंखार और विशाल सेना को आगे बढ़ने का आदेश दे दिया, जिसे इतिहास में ‘गजपति सेना’ (हाथियों वाली सेना) कहा जाता है।

हज़ारों की तादाद में विशाल और मतवाले हाथी, जिनकी सूंडों में भारी-भरकम तलवारें बंधी थीं, वो जब बंगाल की तरफ मुड़े तो ज़मीन कांपने लगी।

उनके पीछे लाखों की तादाद में कलिंग के वो निडर पैदल सैनिक और घुड़सवार थे, जो ‘हर हर महादेव’ और ‘जय जगन्नाथ’ का जयघोष करते हुए आगे बढ़ रहे थे।

ये हिंदू सेना तूफ़ान की तरह बंगाल के ‘राढ़’ और ‘वरेन्द्र’ क्षेत्र में घुस गई। ये वो इलाके थे जो सीधे तौर पर मुस्लिम सुल्तानों के कब्ज़े में थे। कलिंग की सेना ने वहां घुसते ही सुल्तान की मिलिट्री चौकियों को तहस-नहस करना शुरू कर दिया।

जो तुर्क सैनिक रास्ते में आए, उन्हें काट दिया गया। सनातन का वो भगवा ध्वज जो कलिंग में लहराता था, अब वो बंगाल की छाती पर पूरी शान से फहराने लगा था।

जब ये खबर लखनौती (बंगाल की राजधानी) में बैठे सुल्तान तुगरल तुगान खान के पास पहुंची, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसकी पैंट गीली हो गई। वो अपनी कुर्सी से उछल पड़ा।

उसे यकीन ही नहीं हो रहा था की कोई हिंदू राजा डिफेंसिव होने के बजाय सीधे इस्लामी सल्तनत के घर में घुसकर हमला करने की जुर्रत कैसे कर सकता है!

तुगान खान ने आनन-फानन में जिहाद का नारा दिया। उसने अपनी पूरी की पूरी तुर्क घुड़सवार सेना, अपने सबसे खूंखार कमांडरों और हथियारों को इकट्ठा किया और सम्राट नरसिंह देव की सेना को रोकने के लिए ‘कटासिन’ के मैदान की तरफ कूच कर दिया।

कटासिन का खौफनाक महासंग्राम जहाँ बेरहमी से काटी गई जिहादी तुर्क फौज और अपनी जान बचाकर भागा सुल्तान

साल 1243 ईस्वी, जगह बंगाल का कटासिन का मैदान। ये वो ऐतिहासिक रणभूमि थी जहाँ इस्लाम की क्रूर तलवारों और सनातन के स्वाभिमान के बीच एक ऐसा खौफनाक महासंग्राम होने वाला था, जिसकी गूंज दिल्ली के तख्त तक पहुंचने वाली थी।

तुगान खान की वो तुर्क सेना पूरे घमंड के साथ कटासिन के मैदान में पहुंची। सम्राट नरसिंह देव बहुत ही चतुर और खूंखार रणनीतिकार थे।

उन्हें पता था की तुर्कों की ताकत उनके तेज़ दौड़ने वाले घोड़े हैं। इसलिए सम्राट ने एक ऐसा खौफनाक जाल बिछाया की सुल्तान उस जाल में चूहे की तरह फंस गया।

नरसिंह देव ने अपनी कलिंग सेना को अचानक पीछे हटने का आदेश दे दिया। इसे युद्ध नीति में ‘टैक्टिकल रिट्रीट’ कहते हैं। जब सुल्तान ने देखा की हिंदू सेना पीछे हट रही है, तो उसका जिहादी घमंड सातवें आसमान पर पहुंच गया।

उसे लगा की कलिंग की सेना डर कर भाग रही है। सुल्तान के तुर्क सैनिकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। वो इतने बेखौफ हो गए की उन्होंने अपने घोड़ों से उतरकर हथियार नीचे रख दिए और अपने तंबू लगाकर आराम से खाने-पीने और आराम करने लगे।

और ठीक इसी पल का तो वो हिंदू शेर इंतज़ार कर रहा था!

दोपहर का वक्त था। तुर्क सैनिक पूरी तरह से बेफिक्र होकर बैठे थे। तभी अचानक, कटासिन के पीछे मौजूद उन घनी झाड़ियों और खाइयों में से महाकाल के उन भूखे शेरों ने ऐसी खौफनाक दहाड़ के साथ हमला किया की तुर्कों की रूह कांप गई।

कलिंग की सेना ज़मीन फाड़कर बाहर आ गई। इससे पहले की सुल्तान के सैनिक अपनी तलवारें उठा पाते या अपने घोड़ों तक पहुंच पाते, नरसिंह देव के उन विशाल और मतवाले हाथियों ने तुर्क सेना की छाती पर पैर रख दिया।

भाई साहब, वो मंज़र इतना खौफनाक था की उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कलिंग के हाथियों ने जिहादियों के घोड़ों को अपने पैरों तले कुचल कर उनकी चटनी बना दी।

चारों तरफ सिर्फ तुर्कों की कटी हुई लाशें, खून के फव्वारे और चीख-पुकार मची हुई थी। जो तुर्क सैनिक कल तक हिंदुओं का कत्लेआम करते थे, आज उन्हें अपनी ही जान बचाने के लिए छुपने की जगह नहीं मिल रही थी।

कलिंग के राजपूतों और खंडायातों (Odia Warriors) ने तुर्कों को काट कर पूरे कटासिन के मैदान को उनके खून से लाल कर दिया।

सुल्तान तुगरल तुगान खान ने जब अपनी उस अजेय फौज का ये खौफनाक हश्र देखा, तो उसकी बची-खुची हिम्मत भी जवाब दे गई। वो समझ गया की अगर वो एक पल भी और वहां रुका, तो सम्राट नरसिंह देव की तलवार सीधा उसका सिर धड़ से अलग कर देगी।

वो खूंखार सुल्तान, जो कल तक जगन्नाथ पुरी को तोड़ने के सपने देख रहा था, आज अपनी जान की भीख मांगता हुआ, मुट्ठी भर सैनिकों के साथ घोड़े पर बैठकर मैदान से किसी डरपोक कुत्ते की तरह भाग खड़ा हुआ!

बंगाल की राजधानी लखनौती पर सम्राट नरसिंह देव का कब्ज़ा, जब खौफ के मारे सुल्तान ने दिल्ली के तख्त से मांगी अपनी जान की भीख

कटासिन के मैदान में तुर्क सेना की जो भयंकर तबाही हुई थी, वो तो सिर्फ उस खौफनाक सुनामी का एक छोटा सा ट्रेलर था जो बंगाल पर कहर बनकर टूटने वाली थी।

सम्राट ने अपनी उस खूंखार गजपति सेना को रुकने का आदेश नहीं दिया। उन्होंने अपनी खून से सनी तलवार बंगाल की राजधानी ‘लखनौती’ की तरफ तान दी। लखनौती उस समय बंगाल में इस्लामी सत्ता का सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था।

वहां तुर्कों का खज़ाना था, उनके हथियार थे और उनकी ताकत का गुरूर था। लेकिन साल 1244 ईस्वी में कलिंग की उस हिंदू सेना ने लखनौती के चारों तरफ ऐसा मौत का घेरा डाला की पूरे बंगाल के सुल्तानों और तुर्क लड़ाकों की रूह कांप गई।

कल्पना कीजिए उस खौफनाक मंज़र की! जो लखनौती कल तक हिंदुओं के कत्लेआम के फरमान जारी करती थी, आज उसी लखनौती के दरवाज़ों पर सनातन का भगवा ध्वज लहरा रहा था। कलिंग के उन मतवाले हाथियों ने लखनौती के दरवाज़ों को तोड़ना शुरू कर दिया।

शहर के अंदर बैठे सुल्तान तुगरल तुगान खान की हालत ये हो गई थी की वो अपने ही महल के अंदर एक चूहे की तरह दुबक कर बैठ गया था। उसकी पूरी की पूरी जिहादी ठसक हवा हो चुकी थी।

उसे पता था की अगर नरसिंह देव की सेना महल के अंदर घुस गई, तो वो उसे और उसके जनरलों को ज़िंदा ज़मीन में गाड़ देंगे।

मौत को अपने इतने करीब देखकर उस क्रूर तुर्क सुल्तान की पैंट गीली हो गई। उसने अपना सारा गुरूर भूलकर, रोते-गिड़गिड़ाते हुए दिल्ली के सुल्तान ‘अलाउद्दीन मसूद शाह’ को खत लिखा।

उसने उस खत में भीख मांगी की “मुझे बचा लो! कलिंग का ये हिंदू सम्राट बहुत ही खूंखार है। इसने हमारी सेना को गाजर-मूली की तरह काट दिया है। अगर दिल्ली से तुरंत मदद नहीं आई, तो ये हिंदू सेना पूरे बंगाल को खत्म कर देगी और इस्लाम का नामोनिशान मिटा देगी।”

ज़रा सोचिए इस हिंदू शौर्य को! जिस दिल्ली सल्तनत के नाम से पूरे भारत के राजा खौफ खाते थे, आज उसी दिल्ली के दरबार में एक हिंदू सम्राट के नाम का खौफ गूंज रहा था।

दिल्ली के सुल्तान ने आनन-फानन में अवध के गवर्नर ‘तैमूर खान’ को एक बहुत बड़ी फौज देकर बंगाल की तरफ भेजा ताकि लखनौती को बचाया जा सके।

लेकिन जब तक वो दिल्ली की मदद बंगाल पहुंच पाती, तब तक कलिंग के उन हिंदू शेरों ने लखनौती को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। उन्होंने तुर्कों का वो सारा खज़ाना लूट लिया जो उन्होंने दशकों तक बेगुनाह हिंदुओं को मारकर और मंदिर तोड़कर इकट्ठा किया था।

नरसिंह देव प्रथम ने अपनी शर्तों पर वहां कत्लेआम मचाया, सुल्तान का सारा गुरूर जूतों तले कुचला, और फिर अपना वो लूटा हुआ खज़ाना और विजय का परचम लेकर पूरे सम्मान और शान के साथ वापस अपनी कलिंग की सीमा में लौट आए।

ये जिहादियों के गाल पर इतिहास का वो सबसे करारा और खौफनाक तमाचा था जिसकी गूंज से आने वाली कई सदियों तक कोई भी सुल्तान कलिंग की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

इस्लाम पर सनातन की जीत का साक्षात प्रतीक ‘कोणार्क का भव्य सूर्य मंदि’, सम्राट नरसिंह देव द्वारा बनाया गया एक ‘विजय-स्मारक’

जब सम्राट नरसिंह देव प्रथम अपनी उस ऐतिहासिक और खूंखार विजय के बाद वापस कलिंग लौटे, तो उन्होंने तय किया की इस जीत को इतिहास के पन्नों में महज़ कुछ शब्दों में नहीं सिमटने दिया जाएगा।

वो चाहते थे की आने वाली सैकड़ों पीढ़ियां इस बात पर गर्व करें की उनके पूर्वजों ने विदेशी इस्लामी आक्रांताओं को उनके घर में घुसकर उनके ही खून से नहलाया था।

और इसी अजेय सनातन शौर्य को पत्थरों पर अमर करने के लिए सम्राट ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया।

उन्होंने बंगाल के सुल्तानों से लूटे गए उसी खज़ाने का इस्तेमाल करके चंद्रभागा नदी के किनारे भगवान सूर्य को समर्पित एक ऐसा भव्य और विशाल मंदिर बनवाया, जिसकी कल्पना करना भी आज के आर्किटेक्ट्स के लिए नामुमकिन है। जी हां! मैं बात कर रहा हूँ विश्व प्रसिद्ध ‘कोणार्क के सूर्य मंदिर’ (Konark Sun Temple) की।

अगर आप सोचते हैं की कोणार्क सिर्फ एक पूजा पाठ की जगह या एक साधारण मंदिर है, तो आप इसका असली और खौफनाक इतिहास नहीं जानते।

कोणार्क का ये सूर्य मंदिर असल में एक ‘वॉर मेमोरियल’ है। ये सनातन धर्म की इस्लाम पर हुई उस प्रचंड विजय का सबसे बड़ा और जीता-जागता स्मारक है।

आप आज भी कभी कोणार्क के उस भव्य मंदिर में जाकर उसकी दीवारों और मूर्तियों को ध्यान से देखिएगा। वहां आपको कोई साधारण कलाकृतियां नहीं दिखेंगी। वहां के पत्थरों पर नरसिंह देव प्रथम की उस खूंखार गजपति सेना के युद्ध का वो पूरा सच उकेरा गया है।

वहां आपको ऐसी विशाल मूर्तियां मिलेंगी जहाँ एक खूंखार और ताक़तवर युद्ध का घोड़ा (War Horse) एक विदेशी मुस्लिम आक्रांता को अपने पैरों के नीचे बेरहमी से कुचल रहा है।

आप उस मूर्ति में उस कुचले जा रहे सैनिक के चेहरे को देखेंगे, तो उसकी दाढ़ी और उसके कपड़े साफ-साफ बता देंगे की वो कोई और नहीं, बल्कि वही तुर्क और अफ़ग़ान जिहादी है जिसे कलिंग के घोड़ों ने कटासिन के मैदान में अपनी टापों से कुचल कर मार डाला था।

वहां के हाथियों की मूर्तियां देखिए, जो जिहादियों को अपनी सूंड से उठाकर ज़मीन पर पटक रहे हैं। कोणार्क के इस सूर्य मंदिर का एक-एक पत्थर, उसकी एक-एक सीढ़ी और उसका वो विशाल पहिया चीख-चीख कर पूरी दुनिया को बता रहा है की अगर हमारी आस्था और हमारी मातृभूमि पर हमला करने की कोशिश की, तो हम तुम्हारे तख्त पलट देंगे!

तुम्हारे खज़ाने लूट लेंगे और तुम्हारे सीने पर पैर रखकर अपने इष्ट देवों के ऐसे भव्य मंदिर बनाएंगे की तुम्हारी आने वाली नस्लें उसे देखकर खौफ से कांप उठेंगी।

ये कोणार्क मंदिर मुगलों, तुर्कों और खिलजियों के लिए एक चेतावनी था की कलिंग की तरफ भूलकर भी मत देखना, वरना यहाँ मौत के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

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