हमें स्कूलों की किताबों में यही पट्टी पढ़ाई गई की विज्ञान, सर्जरी और आधुनिक मेडिकल साइंस सब इन पश्चिमी देशों और अंग्रेजों की देन है।
हमारे दिमाग में ऐसी भावना भर दी गई मानो अगर ये गोरे अंग्रेज हमारे देश में न आते, तो हम आज भी सिर्फ जड़ी-बूटियां ही पीस रहे होते।
लेकिन सच कभी छुपता नहीं है भाई! आज उसी पश्चिमी जगत का सारा घमंड चूर-चूर हो गया है। सदियों से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को अपनी जागीर और बपौती समझने वाले इन पश्चिमी देशों को आखिरकार हमारे सनातन ज्ञान के आगे सिर झुकाना ही पड़ा है।
स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में अभी जो हुआ है ना, ये आधुनिक विज्ञान का हमारे प्राचीन हिंदू ज्ञान के आगे एक तरह से ऑफिशियल ‘सरेंडर’ है।
दुनिया के सबसे पुराने और सबसे नामी सर्जिकल संस्थान ने डंके की चोट पर ये मान लिया है की सर्जरी की शुरुआत लंदन या अमेरिका की किसी हाई-टेक लैब में नहीं, बल्कि भारत की पवित्र धरती पर हिंदू महर्षि ‘सुश्रुत’ द्वारा हुई थी।
जिस मेडिकल साइंस का क्रेडिट लेकर पश्चिमी देश दुनिया भर में अपना रुतबा झाड़ते थे, आज उसी विज्ञान की नींव में उन्हें हमारे सनातन ऋषियों का चेहरा साफ-साफ नज़र आ गया है।
अंग्रेजों की धरती पर स्थापित हुई महर्षि ‘सुश्रुत’ की 90 किलो की भव्य कांस्य मूर्ति, हिंदू प्राचीन कला ने गाड़े झंडे
ज़रा इस ऐतिहासिक पल और इसकी अहमियत का अंदाज़ा लगाइए। अभी 19 जून 2026 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में मौजूद ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ के भव्य ‘प्लेफेयर ऑडिटोरियम’ में एक ऐसा कार्यक्रम हुआ जिसने भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया है।
ये वो संस्था है जो 1505 में बनी थी और पूरी दुनिया के डॉक्टर इसे अपना मक्का-मदीना मानते हैं। इसी पवित्र जगह पर हमारे महान हिंदू ऋषि महर्षि सुश्रुत की 90 किलो की विशाल और भव्य कांस्य मूर्ति का पूरे राजसी सम्मान के साथ अनावरण किया गया।
स्कॉटलैंड में भारत के महावाणिज्य दूत सिद्धार्थ मलिक और खुद इस रॉयल कॉलेज की अध्यक्ष डॉ. क्लेयर मैकनॉट ने जब इस मूर्ति से पर्दा हटाया, तो वहां मौजूद हर विदेशी डॉक्टर की आंखें फटी रह गईं।
लेकिन इस कहानी में जो सबसे ज्यादा सीना चौड़ा करने वाली बात है, वो कुछ और ही है। ये मूर्ति विदेशी मशीनों से नहीं बनी है।
इसे हमारे तमिलनाडु के कुंभकोणम के पास ‘स्वामीमलाई’ में मास्टर शिल्पकार राघवानंतम स्थापति और उनकी टीम ने अपने हाथों से गढ़ा है।
आपको जानकर हैरानी होगी की इसे बनाने में कोई आधुनिक पश्चिमी तकनीक नहीं, बल्कि हमारी वही 7000 साल पुरानी ‘लॉस्ट-वैक्स’ वाली प्राचीन हिंदू तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।
जी हां, ये वही तकनीक है जो हमारी सिंधु घाटी सभ्यता और हमारे महान चोल साम्राज्य की सबसे बड़ी पहचान रही है।
मतलब ज्ञान भी हमारे सनातन का और उस ज्ञान को आकार देने वाली कला भी हमारे ही सनातन की! अंग्रेजों के गढ़ में घुसकर हमारी कला और विज्ञान ने एक साथ अपने झंडे गाड़ दिए हैं।
जब जंगलों में भटक रहे थे अंग्रेज, तब काशी की पवित्र धरती पर ‘प्लास्टिक सर्जरी’ कर रहे थे हमारे महर्षि ‘सुश्रुत’
आजकल के ये जो कोट-टाई पहनने वाले पश्चिमी डॉक्टर खुद को बड़ा तीसमारखां समझते हैं ना, ज़रा इनकी असलियत सुन लीजिए।
आज से लगभग 2600 साल पहले (करीब 600 ईसा पूर्व), जब इन पश्चिमी देशों में सभ्यता का नामोनिशान तक नहीं था, जब ये लोग जंगलों में भटक रहे थे और कच्चे मांस पर ज़िंदा थे।
तब हमारी काशी (वाराणसी) की पवित्र धरती पर महर्षि सुश्रुत मेडिकल साइंस और सर्जरी के ऐसे-ऐसे चमत्कार कर रहे थे जिन्हें देखकर आज के वैज्ञानिक भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।
उन्होंने ‘सुश्रुत संहिता’ नाम का जो महाग्रंथ लिखा, वो मेडिकल साइंस का सबसे बड़ा खजाना है। सुश्रुत संहिता में 1,120 अलग-अलग तरह की बीमारियों का पूरा पक्का इलाज लिखा है।
उसमें 700 से ज्यादा औषधीय पौधों की पूरी डिक्शनरी है कि कौन सा पौधा किस बीमारी में काम आएगा।
और सर्जरी की बात करें तो भाई साहब, जो ‘प्लास्टिक सर्जरी’ आज के दौर में अरबों रुपये का बिजनेस बन चुकी है, उसकी शुरुआत खुद महर्षि सुश्रुत ने ही की थी।
दुनिया में सबसे पहले कटी हुई नाक को सफलतापूर्वक जोड़ने का ऑपरेशन हमारे इसी हिंदू ऋषि ने किया था।
बात सिर्फ नाक जोड़ने तक सीमित नहीं थी। मोतियाबिंद निकालकर आंखों की रोशनी लौटाना हो, महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी करनी हो, या शरीर को चीरकर अंदर से पथरी निकालनी हो!
सुश्रुत जी ने ऐसे 300 से ज्यादा बेहद मुश्किल ऑपरेशन उस जमाने में करके दिखा दिए थे जब दुनिया को सुई-धागे का भी ठीक से ज्ञान नहीं था।
हैरान करने वाली बात तो ये है की उन्होंने ऑपरेशनों के लिए जो 120 सर्जिकल औजार बनाए थे, उनका डिजाइन आज के मॉडर्न अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक स्कैल्पल (Scalpel) और चिमटियों (Forceps) से हूबहू मिलता है।
आज जो औजार विदेशी कंपनियों के ठप्पे के साथ आते हैं, उनका असली ब्लूप्रिंट हजारों साल पहले एक हिंदू ऋषि अपने हाथों से बना चुका था।
दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज ने मुहर लगाकर सुश्रुत को माना सर्जरी का असली भगवान, जारी की विशेष किताब
‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ ने जो किया है, वो असल में एक आधिकारिक कुबूलनामा है। इस कॉलेज ने अब डंके की चोट पर महर्षि सुश्रुत को ‘फादर ऑफ सर्जरी’ (सर्जरी के पितामह) और ‘फादर ऑफ प्लास्टिक सर्जरी’ का खिताब दे दिया है।
सोचिए, जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर राज किया, जिन्होंने हमारी गुरुकुल व्यवस्था को तहस-नहस करके अपना मैकाले वाला एजुकेशन सिस्टम हम पर थोपा, आज उन्हीं के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान में हमारे हिंदू ऋषि को सर्जरी का भगवान मानकर पूजा जा रहा है।
लेकिन इस पूरे ऐतिहासिक काम के पीछे जिस इंसान की भगीरथ तपस्या है, उनका ज़िक्र करना भी बहुत ज़रूरी है। ये सब रातों-रात नहीं हुआ है।
ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के एक बहुत ही मशहूर और धाकड़ सर्जन हैं- प्रोफेसर चंद्र चेरुवु (Prof. Chandra Cheruvu)।
वो वहां के बड़े डॉक्टर हैं, लेकिन उनके दिल में अपना सनातन धर्म और भारत की असली पहचान धड़कती है। प्रो. चंद्र चेरुवु और उनकी संस्था ‘चेरुवु फैमिली फाउंडेशन’ ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट का बीड़ा उठाया था।
लेकिन इस पूरे ऐतिहासिक काम के पीछे जिस इंसान की भगीरथ तपस्या है, उसका ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है।
ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के मशहूर सर्जन प्रोफेसर चंद्र चेरुवु (Prof. Chandra Cheruvu) और उनकी संस्था ‘चेरुवु फैमिली फाउंडेशन’ ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट का बीड़ा उठाया था।
उन्होंने अपनी मेहनत से इस विशालकाय मूर्ति को बनवाया और अंग्रेजों के इस सबसे पुराने गढ़ में इसे स्थापित करवा कर ही दम लिया।
और बात सिर्फ मूर्ति तक ही खत्म नहीं हुई है। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में एक और बड़ा काम हुआ जिसने पश्चिमी मेडिकल साइंस के अहंकार के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी।
प्रोफेसर चंद्र चेरुवु ने मूर्ति अनावरण के मौके पर एक बहुत ही शानदार और सबूतों पर आधारित किताब भी लॉन्च की, जिसका नाम है- ‘Maharshi Sushruta A Compendium – Father of Surgery’।
ये कोई कहानी-किस्सों की किताब नहीं है भाई! ये वो पक्का दस्तावेज़ है जो वहां के मेडिकल छात्रों और बड़े-बड़े विदेशी डॉक्टरों को पढ़ना पड़ेगा।
अब जब भी स्कॉटलैंड या यूरोप का कोई भी मेडिकल स्टूडेंट सर्जरी की पढ़ाई शुरू करेगा, तो उसे सबसे पहले ये जानना ही पड़ेगा की उसके आधुनिक औजारों का असली जनक लंदन या न्यूयॉर्क का कोई गोरा वैज्ञानिक नहीं, बल्कि भारत की पावन धरती का एक महान हिंदू ऋषि है।
