ये जो आज सूट-बूट और खादी पहनकर ‘जय भीम-जय मीम’ के नारे लगाते हुए दलितों के सबसे बड़े मसीहा बनने का ढोंग कर रहे हैं ना, असल में इनके हाथ हमारे हज़ारों गरीब और बेगुनाह हिंदू दलित भाइयों के खून से रंगे हुए हैं।
इस देश के वामपंथी इकोसिस्टम ने एक ऐसा खौफनाक और ज़हरीला झूठ फैला रखा है की मानों कम्युनिस्ट (Communists) ही इस देश के गरीबों और शोषितों के इकलौते तारणहार हों।
लेकिन भाई, आज मैं इतिहास के उस सड़े हुए और खून से लथपथ पन्ने को फाड़कर आपके सामने रखने जा रहा हूं, जिसे इन वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी लाल किताबों के नीचे बहुत ही बेशर्मी से दफना दिया था।
आपने पंजाब के जलियांवाला बाग का नाम तो सुना होगा जहाँ अंग्रेज़ों ने गोलियां चलवाई थीं? लेकिन क्या आपने कभी बंगाल के ‘मरिचझांपी’ (Marichjhapi) का नाम सुना है? शायद नहीं!
ये वो खौफनाक जगह है जहाँ किसी अंग्रेज़ या विदेशी ने नहीं, बल्कि खुद को दलितों का मसीहा कहने वाली कम्युनिस्ट सरकार ने हमारे 10,000 से ज़्यादा हिंदू दलितों (नामशूद्रों) को जानवरों की तरह काटकर फेंक दिया था।
ये वो जगह है जहाँ हमारे हिंदू दलित भाइयों का राशन-पानी बंद करके उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारा गया, हमारी दलित माताओं-बहनों के साथ पुलिस और वामपंथी काडर ने सरेआम दुष्कर्म किया और फिर उनके पेट चीर कर उनकी लाशें सुंदरबन के मगरमच्छों को खिला दी गईं।
ये कोई फिल्म की कहानी नहीं है मेरे भाई, ये इस लाल आतंक का वो खौफनाक नंगा सच है जिसे सेक्युलर मीडिया ने 45 सालों तक इस देश के हिंदुओं से छुपा कर रखा। आज इस दर्दनाक सच को जानने और इन वामपंथियों के गाल पर तमाचा मारने का वक्त आ गया है।
बांग्लादेश में जिहादियों के खौफ से भागे हिंदू नामशूद्र दलित, और कांग्रेस ने उन्हें ‘दंडकारण्य’ के नर्क में मरने के लिए छोड़ा
जब देश बंटा, तो पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हिंदुओं का खौफनाक कत्लेआम शुरू कर दिया था।
वहां रहने वाले जो रसूखदार और सवर्ण हिंदू थे, वो तो अपना पैसा और रसूख इस्तेमाल करके किसी तरह पश्चिम बंगाल भाग आए और यहां आकर बस गए।
लेकिन उन गरीब ‘नामशूद्र’ हिंदुओं का क्या? वो नामशूद्र, जो हमारे हिंदू समाज का दलित और पिछड़ा वर्ग था, जो खेतों में मज़दूरी करता था, जिसके पास ना पैसा था और ना ही रसूख। वो बेचारे उसी पूर्वी पाकिस्तान के नर्क में फंसे रह गए।
सालों तक वहां के कट्टरपंथियों ने उन गरीब हिंदू दलितों का खून चूसा। उनकी ज़मीनें छीन ली गईं, उनकी बेटियों को उठा लिया गया, और उन्हें ज़बरदस्ती इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया जाने लगा।
जब ज़ुल्म बर्दाश्त के बाहर हो गया, तो अपनी औरतों की इज़्ज़त और अपना सनातन धर्म बचाने के लिए ये लाखों नामशूद्र दलित 1950 से लेकर 1970 के दशक के बीच जान हथेली पर रखकर भारत की सीमा में दाखिल हुए।
उन्हें लगा था की भारत उनकी मातृभूमि है, यहां की कांग्रेसी सरकार उन्हें गले लगाएगी और बंगाल की उस धरती पर बसने देगी जहाँ की भाषा वो बोलते थे। लेकिन दिल्ली में बैठी उस कांग्रेसी सरकार ने जो गद्दारी की, वो किसी भी सच्चे हिंदू का दिल चीर कर रख देगी।
कांग्रेस ने इन गरीब हिंदू दलितों को पश्चिम बंगाल में बसने नहीं दिया। इसके बजाय, इन बेचारों को जानवरों की तरह मालगाड़ियों में ठूंस कर मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के उन भयानक, बंजर और सूखे जंगलों में फेंक दिया जिसे ‘दंडकारण्य’ (Dandakaranya) कहा जाता था।
वो नामशूद्र जो बंगाल की नदियों और उपजाऊ ज़मीन पर खेती करते थे, उन्हें दंडकारण्य के उन पथरीले और बंजर पहाड़ों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया। वहां ना पीने का पानी था, ना ढंग की छत थी, और ना ही कोई रोज़गार।
हमारे हिंदू दलित भाई उस दंडकारण्य के कैंपों में कीड़े-मकोड़ों की ज़िंदगी जी रहे थे। कांग्रेस ने अपने वोटबैंक के लिए रोहिंग्याओं को तो पलकों पर बिठाया, लेकिन अपने ही धर्म के लिए सब कुछ लुटा कर आए इन दलितों को नर्क की आग में झोंक दिया।
ज्योति बसु और कम्युनिस्टों की खौफनाक गद्दारी, वोटबैंक के लिए हिन्दू दलितों को फंसाया और फिर उन्हें बंगाल से खदेड़ने का फरमान सुनाया
जब ये गरीब नामशूद्र दलित दंडकारण्य के उस नर्क में घुट-घुट कर मर रहे थे, तब उनकी इस लाचारी का फायदा उठाने के लिए वामपंथी गिद्ध वहां पहुंच गए। बात 1977 की है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) को किसी भी हालत में सत्ता चाहिए थी। वामपंथी नेता, खासकर राम चटर्जी जैसे लोग, दंडकारण्य के कैंपों में गए।
उन्होंने इन हिंदू दलितों के आंसू पोंछने का नाटक किया और एक बहुत ही खौफनाक और झूठा वादा कर डाला। कम्युनिस्टों ने डंके की चोट पर कहा- “ये कांग्रेसी सरकार तुम्हारे साथ अन्याय कर रही है।
तुम बंगाल के बेटे हो। तुम हमें वोट दो, हमारी सरकार बनवाओ। जैसे ही हम बंगाल की गद्दी पर बैठेंगे, हम तुम्हें इस नर्क से निकालकर वापस बंगाल के सुंदरबन इलाके में ससम्मान बसाएंगे।”
मरता क्या ना करता! उन गरीब नामशूद्र हिंदुओं ने वामपंथियों की इन मीठी और ज़हरीली बातों पर भरोसा कर लिया। उन्होंने अपनी बची-खुची पूंजी लगाई, कम्युनिस्टों का झंडा उठाया और ज्योति बसु को सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया।
और जैसे ही 1977 में ज्योति बसु बंगाल का मुख्यमंत्री बना, इन कम्युनिस्टों का वो खूंखार और असली चेहरा बाहर आ गया।
जब ज्योति बसु सत्ता में आ गया, तो दंडकारण्य से करीब 40 हज़ार नामशूद्र दलितों ने अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और बंगाल के सुंदरबन में मौजूद ‘मरिचझांपी’ (Marichjhapi) द्वीप पर जाकर बस गए। इन 40 हज़ार लोगों ने सरकार से एक रुपया भी भीख नहीं मांगी।
उन्होंने अपनी मेहनत से उस दलदली द्वीप को साफ किया। वहां झोपड़ियां बनाईं, बच्चों के लिए स्कूल खोले, मछली पालन शुरू किया, एक बज़ार बना लिया और यहां तक की एक छोटी सी डिस्पेंसरी भी खड़ी कर ली। वो बस सम्मान की ज़िंदगी जीना चाहते थे।
लेकिन ज्योति बसु की उस अहंकारी और वामपंथी सरकार को ये बात चुभने लगी। उन्हें लगा की अगर ये लोग यहां आत्मनिर्भर हो गए, तो कल को हमारी पार्टी के गुलाम कैसे बनेंगे?
सरकार ने तुरंत अपना रंग बदला और एक बेहद ही नीच बहाना ढूंढ निकाला। ज्योति बसु सरकार ने कहा की “मरिचझांपी तो ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (Project Tiger) का हिस्सा है। ये रिज़र्व फॉरेस्ट है। यहाँ बाघ रहते हैं, इसलिए इन शरणार्थियों को यहाँ से खदेड़ना होगा।”
अरे बेशर्मों! जब तुमने उनसे वोट मांगा था, तब तुम्हें बाघ याद नहीं आए? और ज़रा इस वामपंथी क्रूरता का स्तर देखिए। इनके लिए सुंदरबन के जंगली जानवरों और बाघों की जान उन 40 हज़ार हिंदू दलितों की जान से ज़्यादा कीमती हो गई!
ज्योति बसु ने डंके की चोट पर फरमान सुना दिया की मरिचझांपी खाली करो, वरना तुम्हें काट कर फेंक दिया जाएगा। ये थी इन वामपंथियों की वो ऐतिहासिक गद्दारी जिसने मरिचझांपी के उस वीभत्स नरसंहार की नींव रखी।
मरिचझांपी में कम्युनिस्टों का वो क्रूर नाकेबंदी मॉडल, पीने के पानी में मिलाया ज़हर और गर्भवती महिलाओं को मारा भूखा
जब नामशूद्र हिंदुओं ने मरिचझांपी द्वीप छोड़ने से साफ इंकार कर दिया, तो ज्योति बसु की उस सरकार ने जो किया, वो हिटलर और मुगलों की क्रूरता को भी पीछे छोड़ देता है। जनवरी 1979 का महीना था।
बंगाल सरकार ने पुलिस की पूरी फौज और सीपीएम (CPI-M) के हथियारबंद गुंडों की एक लंबी-चौड़ी फौज को मरिचझांपी द्वीप के चारों तरफ तैनात कर दिया।
द्वीप को चारों तरफ से गनबोट्स (Gunboats) और पुलिस की नावों ने घेर लिया। इसे कहते हैं ‘इकोनॉमिक ब्लॉकेड’ (Economic Blockade)। द्वीप पर बाहर से आने वाला राशन, चावल, दवाइयां और पानी सब कुछ पूरी तरह से बंद कर दिया गया। किसी को भी द्वीप से बाहर जाने या अंदर आने की इजाज़त नहीं थी।
ज़रा सोचिए वहां क्या गुज़र रही होगी! जब उस द्वीप पर छोटे-छोटे बच्चे भूख से तड़पने लगे, जब गर्भवती महिलाओं के पेट में दर्द उठने लगा और उन्हें खाने को एक दाना नहीं मिला, तो कुछ नौजवान लड़कों ने छोटी-छोटी नावों में बैठकर बाहर से चावल लाने की कोशिश की।
लेकिन उन वामपंथी राक्षसों ने क्या किया? पुलिस की बड़ी-बड़ी मोटरों वाली नावों से उन गरीब दलितों की छोटी नावों को टक्कर मारकर डुबो दिया गया। जो लोग पानी में गिरे, उन्हें डंडों से मार-मार कर नदी में ही डुबो दिया गया।
और क्रूरता की हद तो तब हो गई जब पुलिस और वामपंथी गुंडों ने द्वीप के अंदर मौजूद पीने के पानी के ट्यूबवेल में ज़हर, कीचड़ और मरे हुए जानवरों की लाशें डाल दीं! पीने का पानी ज़हरीला हो गया।
लोग अपनी जान बचाने के लिए वही गंदा और ज़हरीला पानी पीने को मजबूर हो गए। देखते ही देखते पूरे द्वीप पर हैज़ा (Cholera) और डायरिया जैसी भयंकर बीमारियां फैल गईं।
बिना दवा और बिना इलाज के वो गरीब हिंदू दलित तड़प-तड़प कर मरने लगे। माताओं की गोद में उनके नवजात बच्चे भूख और बीमारी से दम तोड़ने लगे। जगह-जगह लाशें बिछने लगीं।
जो वामपंथी आज टीवी पर बैठकर फिलिस्तीन के लिए, गाज़ा के लिए और मानवाधिकारों के लिए दिन-रात छाती पीटते हैं, उन गद्दारों ने 1979 में अपने ही देश के, अपने ही धर्म के उन गरीब हिंदू दलितों का ऐसा भयानक ‘कंसंट्रेशन कैंप’ (Concentration Camp) बना दिया था जहाँ से ज़िंदा बचना नामुमकिन था।
ये कोई दंगा नहीं, ये एक चुनी हुई वामपंथी सरकार द्वारा, पुलिस की वर्दी और सत्ता के गुरूर में किया गया बहुसंख्यक हिंदू दलितों का एक संस्थागत और सोची-समझी साज़िश वाला कत्लेआम था।
लेकिन ये तो सिर्फ शुरुआत थी। अभी वो खौफनाक दिन आना बाकी था जब कम्युनिस्टों की बंदूकें उन निहत्थे दलितों के सीने छलनी करने वाली थीं।
1979 का दर्दनाक नरसंहार, पुलिस और कम्युनिस्ट गुंडों ने हिन्दू दलितों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर 10,000 लाशों को मगरमच्छों के आगे फेंक दिया
जब भूख, प्यास और हैज़े जैसी बीमारी से भी ये नामशूद्र हिंदू दलित नहीं टूटे, जब उन्होंने घुटने टेकने से साफ मना कर दिया और अपनी मेहनत से बसाई गई ज़मीन को छोड़ने को तैयार नहीं हुए, तो ज्योति बसु की उस वामपंथी सरकार का असली और खूंखार शैतान बाहर आ गया।
जनवरी के आखिरी हफ्ते (31 जनवरी 1979) और फिर मई के उस खौफनाक महीने में जो कुछ मरिचझांपी द्वीप पर हुआ, वो इस देश के इतिहास का सबसे काला, सबसे घिनौना और सबसे वीभत्स दिन है।
कम्युनिस्ट सरकार ने पुलिस के साथ-साथ अपने हथियारों से लैस सीपीएम (CPI-M) के काडर यानी लाल गुंडों को नावों में भरकर उस द्वीप पर उतार दिया।
उनके हाथों में मशीनगनें थीं, पेट्रोल बम थे और आंखों में उन गरीब हिंदुओं को मिटा देने का खौफनाक नशा था। आते ही उन्होंने उन निहत्थे, कंकाल बन चुके दलितों पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा सुंदरबन कांप उठा।
जो लोग डरकर अपनी झोपड़ियों में छुपे थे, उन झोपड़ियों में बाहर से आग लगा दी गई। बच्चे और बूढ़े ज़िंदा जलने लगे। और भाई, सबसे ज़्यादा रूह तो तब कांपती है जब वहां की औरतों पर हुए ज़ुल्म की खौफनाक कहानियां सामने आती हैं।
पुलिस की वर्दी में और लाल झंडे उठाए उन वामपंथी गुंडों ने हमारी दलित माताओं और बहनों का सरेआम चीरहरण किया, उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
उन गरीब औरतों की चीखें सुंदरबन के जंगलों में गूंजती रहीं, वो रहम की भीख मांगती रहीं, लेकिन कोलकाता में बैठे उन वामपंथी आकाओं के कानों तक वो आवाज़ नहीं पहुंची।
जब हज़ारों लोग गोलियों और आग से भून दिए गए, तो इन वामपंथियों ने अपने इस महापाप के सुबूत मिटाने का एक ऐसा खौफनाक तरीका अपनाया जिसे सुनकर बड़े से बड़ा शैतान भी कांप जाए।
उन्होंने उन दलितों की लाशों के पेट चाकुओं से फाड़ दिए! पेट इसलिए फाड़े गए ताकि जब लाशों को पानी में फेंका जाए, तो वो फूल कर ऊपर ना तैरें और किसी को पता ना चले। और फिर उन फटे हुए पेट वाली हज़ारों लाशों को सुंदरबन की गहरी नदी में खूंखार मगरमच्छों के आगे फेंक दिया गया!
नदी का पानी हिंदू दलितों के खून से लाल हो चुका था। मगरमच्छों की दावत चल रही थी और वामपंथी सरकार अपनी ‘कामयाबी’ का जश्न मना रही थी।
कुछ अनौपचारिक आंकड़ों, जीवित बचे लोगों और चश्मदीदों के मुताबिक इस खौफनाक लाल आतंक में करीब 10,000 हिंदू दलितों को काट कर फेंक दिया गया था। जो बच गए, उन्हें जानवरों की तरह ट्रकों में भरकर वापस दंडकारण्य के नर्क में फेंक दिया गया।
वामपंथ और कम्युनिज्म इस देश का सबसे बड़ा कैंसर
ज्योति बसु सरकार ने उस नरसंहार के वक्त पूरे सुंदरबन इलाके में पत्रकारों के जाने पर पूरी तरह से बैन लगा दिया था। पुलिस का ऐसा पहरा था की कोई चिड़िया भी वहां पर नहीं मार सकती थी।
प्रेस की आज़ादी का सरेआम गला घोंट दिया गया था। और मजे की बात देखिए, आज यही कम्युनिस्ट और वामपंथी नेता टीवी पर बैठकर हमें ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ (Freedom of Speech) और फासीवाद का ज्ञान बांटते हैं!
इन गद्दार इतिहासकारों ने हमारी स्कूल-कॉलेजों की किताबों में एक पन्ना तक मरिचझांपी के नाम पर नहीं लिखा। इन्होंने हमें विदेशी लुटेरों की महानता पढ़ाई, इन्होंने हमें वामपंथियों के झूठे संघर्ष की कहानियां रटवाईं।
लेकिन उन 10 हज़ार नामशूद्र दलितों के खून को इतिहास से ऐसे पोंछ दिया जैसे उनका कोई वजूद ही ना हो।
क्यों? क्योंकि मारने वाले कोई और नहीं, बल्कि इनके अपने वामपंथी आका थे। ये अर्बन नक्सल सिर्फ और सिर्फ एजेंडे की राजनीति करते हैं।
अगर मरने वाला हिंदू है, चाहे वो दलित हो, वाल्मीकि हो या सवर्ण, इनकी नज़रों में उसकी जान की कीमत एक सड़क के कीड़े के बराबर भी नहीं है।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी खुद वामपंथियों और कम्युनिस्टों के सबसे बड़े विरोधी थे। उन्होंने साफ कहा था की कम्युनिस्टों की विचारधारा इस देश के लिए एक कैंसर है।
लेकिन आज ये लाल झंडे वाले लोग बाबा साहेब का नाम लेकर उसी दलित समाज को ठग रहे हैं जिसे इन्होंने मरिचझांपी में ज़िंदा जलाया था।
