हिंदुस्तान की राजनीति में नौटंकी और बेशर्मी तो हमने बहुत देखी है, लेकिन इस जून महीने के आखिरी हफ्ते में दिल्ली की सड़कों पर जो नज़ारा दिखा, उसने तो पूरे देश के सामने कांग्रेस का भयंकर मज़ाक बनाकर रख दिया है।
ज़रा सोचिए, देश की राजधानी! दिल्ली के सबसे वीआईपी इलाके- मंडी हाउस, आईटीओ और सिकंदरा रोड! सुबह-सुबह दिल्ली वाले अपने काम पर जा रहे थे और अचानक उनकी नज़र चौराहों पर लगे बड़े-बड़े पोस्टरों पर पड़ी।
उन पोस्टरों पर किसी अपराधी या भगोड़े की नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी के ‘युवराज’ राहुल गांधी की फोटो लगी थी और ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था- “गुमशुदा!”
पोस्टर्स में बाकायदा बताया था की ये जनाब अक्सर विदेश में पाए जाते हैं, किसी Pub में हो सकते हैं या किसी Beach पर चिल करते हुए दिख सकते हैं।
ये कोई हंसी-मज़ाक वाली बात नहीं है। राहुल गांधी अब सिर्फ अमेठी या रायबरेली के सांसद नहीं हैं। उन्हें लोकसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) की कुर्सी मिली हुई है। ये पद कोई बच्चों का खेल नहीं है भाई!
इस कुर्सी पर बैठने वाले को कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा मिलता है, देश के खजाने से भारी-भरकम सुविधाएं मिलती हैं, और उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है कि वो जनता के मुद्दों को संसद में उठाए।
पर हमारे ये जो 50 पार वाले कांग्रेसी ‘युवराज’ हैं ना, इनके लिए राजनीति कोई देश सेवा या जनता का दर्द दूर करने का जरिया नहीं है। इनके लिए राजनीति बस एक ‘पार्ट-टाइम हॉबी’ है, और ये खुद सिर्फ एक ‘पर्यटक’ हैं।
जब मूड किया, तो संसद में आकर दो-चार रटे-रटाए डायलॉग मार दिए, कुर्ता चढ़ाकर किसी मजदूर के साथ फोटो खिंचवा ली, और जैसे ही थोड़ा काम का प्रेशर बढ़ा या कोई ज़रूरी मुद्दा आया, अपना बैग पैक किया और सीधा विदेश फुर्र!
देश के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ की विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा अपनी ज़िम्मेदारी को ऐसे लावारिस छोड़कर विदेशी हवा खाने निकल गया हो।
ये सिर्फ कांग्रेस पार्टी की नाकामी नहीं है, ये इस देश के लोकतंत्र को अपना ‘प्राइवेट हॉलिडे पैकेज’ समझने वाली उस सामंती सोच का घटिया सबूत है।
विपक्ष के नेता या ‘लीडर ऑफ पर्यटन’, BJP के शहज़ाद पूनावाला के सीधे वार ने निकाल दी राहुल बाबा के विदेशी शौक की हवा
जैसे ही ये पोस्टर दिल्ली की सड़कों पर वायरल हुए, बीजेपी ने भी बिना कोई टाइम वेस्ट किए राहुल गांधी की पूरी क्लास लगा दी। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की और जो धोबिया पछाड़ वार किए, उसने कांग्रेस के प्रवक्ताओं के पसीने छुड़ा दिए।
पूनावाला ने साफ-साफ कहा की राहुल गांधी विपक्ष के नेता नहीं हैं, वो तो “गुमशुदा, लापता और MIA (Missing in Action) राहुल बाबा” हैं।
पूनावाला ने जो सबसे तगड़ा तंज कसा, उसने तो सोशल मीडिया पर आग ही लगा दी। उन्होंने कहा की राहुल गांधी का नाम ‘Leader of Opposition’ से बदलकर ‘Leader of Paryatan and Partying’ (पर्यटन और पार्टी करने वाला नेता) कर देना चाहिए। और सच कहूं तो ये नाम उन पर बिल्कुल सूट करता है!
भई, जब कोई नेता अपने देश में टिक ही नहीं सकता, जिसे भारत की गर्मी, यहाँ की राजनीति और यहाँ के मुद्दों से घबराहट होती हो, उसे तो ‘लीडर ऑफ पर्यटन’ ही कहा जाएगा ना?
सोशल मीडिया पर तो मीम्स की बाढ़ आ गई है। लोग फिल्मों के पोस्टर एडिट कर रहे हैं- ‘लापता राहुल’, ‘टूरिस्ट ज़िंदा है’, और ‘छोड़ दे इंडिया’ जैसे मीम्स ने कांग्रेस की रही-सही इज्जत भी तार-तार कर दी है।
कांग्रेसी नेता टीवी डिबेट्स में मुंह छुपाते फिर रहे हैं, क्योंकि उनके पास इस बात का कोई जवाब ही नहीं है की उनका सबसे बड़ा नेता आखिर देश से गायब क्यों है।
जब खुद पार्टी के कार्यकर्ताओं को नहीं पता की उनका नेता किस देश के किस कोने में बैठा है, तो वो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे?
22 सालों में 55 विदेशी टूर और 60 करोड़ का खर्च, देश से गायब रहने वाले इस ‘VIP पर्यटक’ की फंडिंग का आखिर क्या है राज
अब ज़रा इस हॉलिडे पॉलिटिक्स के पीछे छिपे उस खौफनाक सच पर आते हैं, जिसे सुनकर किसी का भी दिमाग सुन्न पड़ जाए।
बीजेपी के दिग्गज नेताओं संबित पात्रा और आर.पी. सिंह ने राहुल गांधी के इन गुपचुप विदेशी दौरों का जो कच्चा चिट्ठा खोला है, वो सीधा देश की सुरक्षा और पैसों की फंडिंग पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आंकड़े बताते हैं की राहुल गांधी ने अपने 22 साल के राजनीतिक करियर में 54-55 से ज्यादा विदेशी टूर किए हैं! मतलब औसतन हर साल दो से तीन लंबे विदेशी टूर।
आम आदमी पूरी जिंदगी कमाकर एक बार ढंग से विदेश नहीं जा पाता, और हमारे ये नेता प्रतिपक्ष हर दूसरे-तीसरे महीने थाईलैंड, यूरोप या अमेरिका में चिल कर रहे होते हैं।
सबसे बड़ा सवाल जो आर.पी. सिंह ने उठाया, वो ये है की इन विदेशी दौरों पर लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। जी हाँ, 60 करोड़!
अब सवाल ये उठता है की ये पैसा आ कहाँ से रहा है भाई? राहुल गांधी के चुनावी हलफनामे उठाकर देख लीजिए, उनकी घोषित इनकम इतनी नहीं है की वो इतने महंगे टूर कर सकें।
वो इतना इनकम टैक्स भी नहीं भरते। तो फिर इन फाइव-स्टार चार्टर्ड उड़ानों, महंगी होटलों और सीक्रेट मीटिंग्स का खर्चा कौन उठा रहा है?
क्या भारत-विरोधी विदेशी ताकतें इन दौरों की फंडिंग कर रही हैं? ये शक इसलिए भी गहरा हो जाता है क्योंकि जब भी राहुल गांधी विदेश जाते हैं, वो वहां जाकर भारत की बेइज्जती ही करते हैं।
वहां जाकर वो देश के लोकतंत्र को खतरे में बताते हैं, विदेशी ताकतों से भारत में दखल देने की गुहार लगाते हैं। तो क्या ये विदेशी हॉलिडे सिर्फ छुट्टियां मनाने के लिए होते हैं या बंद कमरों में भारत के खिलाफ कोई खिचड़ी पक रही होती है?
राहुल गांधी आज तक देश को ये नहीं बता पाए की वो विदेश जाकर किन लोगों से मिलते हैं और उनका असली एजेंडा क्या होता है। ये जो ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ है ना, ये सिर्फ गैर-ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि देश के पीठ में खंजर घोंपने की एक सोची-समझी साज़िश भी हो सकती है, जिसकी जांच हर हाल में होनी चाहिए।
संसद में जनता की आवाज़ उठाने के बजाय विदेशी ‘पब और बीच’ पर चिल करते युवराज का गैर-ज़िम्मेदाराना रवैया
ज़रा सोचिए, देश की जनता वोट क्यों देती है? एक आम हिंदुस्तानी चिलचिलाती धूप में लाइन में लगकर अपने सांसद को इसलिए चुनता है ताकि वो संसद में जाकर उसके हक की आवाज़ उठाए।
और जब बात ‘लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष’ की हो, तो ये ज़िम्मेदारी सौ गुना बढ़ जाती है। पूरा विपक्ष उस एक चेहरे की तरफ देखता है की वो सरकार से सवाल पूछेगा, ज़रूरी मुद्दों पर बहस करेगा और सड़क से लेकर संसद तक जनता के लिए लड़ेगा।
लेकिन हमारे इन कांग्रेस वाले युवराज का रवैया देखिए! इन्हें राजनीति कोई गंभीर काम नहीं, बल्कि एक ‘पार्ट-टाइम हॉबी’ लगती है।
दो-चार रैलियां कर लीं, संसद में आकर कोई बचकाना सा भाषण दे दिया, आँख मार दी, और फिर जनाब इतने ‘थक’ जाते हैं कि इन्हें अपना ‘डिटॉक्स’ करने के लिए रातों-रात लंदन, बैंकॉक या वियतनाम भागना पड़ता है।
अरे भाई, ये कोई पहली बार का ड्रामा थोड़ी है! कांग्रेस का पुराना रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए। जब भी संसद का कोई अहम सत्र शुरू होने वाला होता है, जब देश में कोई बड़ा मुद्दा गरमाया होता है, या जब किसी राज्य में चुनाव सिर पर होते हैं, राहुल गांधी का पासपोर्ट और सूटकेस सबसे पहले तैयार मिलता है।
देश में किसान आंदोलन चल रहा हो, कोई प्राकृतिक आपदा आई हो, या बजट पर चर्चा होनी हो- राहुल बाबा को इन सब से कोई मतलब नहीं। वो सीधे किसी विदेशी पब या रिसॉर्ट में जाकर अपनी थकान उतार रहे होते हैं।
अब ज़रा इनकी तुलना देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करके देखिए। एक तरफ वो इंसान है जिसने पिछले 22 सालों में (चाहे वो गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हों या देश के प्रधानमंत्री) एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली।
वो इंसान दिवाली भी बॉर्डर पर जवानों के बीच मनाता है। और दूसरी तरफ ये 50 पार कर चुके ‘युवा नेता’ हैं, जिन्हें हर दो महीने में विदेशी हवा खाने की तलब लग जाती है।
यही फर्क है एक ज़मीनी नेता और एक चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए वीआईपी पर्यटक में! मोदी जी के लिए ये देश उनका परिवार है, उनकी कर्मभूमि है।
और राहुल गांधी के लिए ये देश सिर्फ एक पॉलिटिकल टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जहाँ वो सिर्फ चुनाव के वक्त पिकनिक मनाने आते हैं और फिर वापस अपनी असली दुनिया (विदेश) में लौट जाते हैं।
क्या 140 करोड़ का ये महान देश ऐसे गैर-ज़िम्मेदार और भगोड़े नेता को विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में बर्दाश्त कर सकता है? कतई नहीं!
राहुल गांधी को ग्लोबल लीडर बताने वाली कांग्रेस का बेशर्म बचाव और जनता के पीठ में घोंपा जा रहा खंजर
अब जब राहुल गांधी के इन विदेशी दौरों पर बवाल मचा और दिल्ली की सड़कों पर उनके गुमशुदा होने के पोस्टर लग गए, तो कांग्रेस के दरबारी और चाटुकार नेता उन्हें बचाने के लिए मैदान में उतर आए।
लेकिन भाई, उन्होंने राहुल बाबा को बचाने के लिए जो दलीलें दी हैं, उन्हें सुनकर तो किसी को भी अपना सिर पीट लेने का मन करेगा!
सलमान खुर्शीद जैसे कांग्रेस के बड़े नेता और सीपीएम (CPM) के एम.ए. बेबी जैसे उनके वामपंथी सहयोगियों ने टीवी पर आकर क्या कहा पता है?
वो पूरी बेशर्मी से कह रहे हैं की “अरे, राहुल गांधी तो एक ग्लोबल लीडर (Global Leader) हैं! उन्हें विदेशी यूनिवर्सिटियों से बुलावा आता है। वो दुनिया भर के बड़े विचारकों से मिलते हैं।”
वाह रे कांग्रेसियों की चाटुकारिता! मतलब अगर आपका नेता संसद से भागकर विदेश में छुट्टियां मना रहा है, तो वो ‘ग्लोबल लीडर’ हो गया? अरे, किस बात के ग्लोबल लीडर हैं राहुल गांधी?
क्या रायबरेली और वायनाड की जनता ने उन्हें इसलिए वोट दिया था की वो कैंब्रिज या ऑक्सफोर्ड में जाकर अंग्रेज़ी में गप हांकें? क्या उन्हें ‘लोकसभा का नेता प्रतिपक्ष’ इसलिए बनाया गया है की वो विदेशी पबों में जाकर ग्लोबल थिंकर बनें?
ये दलीलें सिर्फ हास्यास्पद नहीं हैं, ये देश की जनता के मुंह पर सीधा थूकने जैसा है। ये जनता के उस भरोसे के पीठ में खंजर घोंपना है जो उन्होंने विपक्ष को दिया था।
कांग्रेस का ये इकोसिस्टम इतना अंधा हो चुका है की वो अपने नेता की कायरता और गैर-ज़िम्मेदारी को ‘ग्लोबल लीडरशिप’ का नाम दे रहा है।
सच्चाई तो ये है की जब ये ‘ग्लोबल लीडर’ विदेश जाते हैं, तो वहां जाकर भारत की ही जड़ें खोदते हैं। वहां के सेमिनारों में बैठकर ये कहते हैं की भारत में लोकतंत्र मर चुका है, भारत की न्यायपालिका खराब है, भारत का चुनाव आयोग बिका हुआ है।
मतलब, देश का खाओ और विदेश में जाकर उसी देश की थाली में छेद करो! और फिर जब देश की जनता इनसे संसद में सवाल पूछने का इंतज़ार करती है, तो ये किसी बीच (Beach) पर चश्मा लगाकर आराम फरमा रहे होते हैं।
ये कांग्रेस का वो शर्मनाक और दोगला चेहरा है जिसे आज पूरा देश पहचान चुका है।
पार्ट-टाइम राजनीति और ‘हॉलिडे’ पॉलिटिक्स का अब होना चाहिए अंत, देश को चाहिए एक फुल-टाइम नेता, कोई विदेशी टूरिस्ट नहीं
खैर, बात बहुत साफ है। देश की जनता को और इस लोकतंत्र को एक ऐसे विपक्ष की ज़रूरत है जो 24 घंटे और सातों दिन ज़मीन पर रहे।
जो जनता के दुख-दर्द को समझे, जो संसद के हर सत्र में पूरी तैयारी के साथ आए। हमें किसी ऐसे ‘विदेशी टूरिस्ट’ की कोई ज़रूरत नहीं है जिसके लापता होने के पोस्टर देश की राजधानी की सड़कों पर लगाने पड़ें।
राजनीति कोई पार्ट-टाइम जॉब नहीं है जहाँ आप जब मर्जी आए पंच-इन (Punch-in) कर लें और जब मर्जी आए छुट्टी लेकर भाग जाएं। खासकर तब, जब आप विपक्ष के नेता की उस संवैधानिक कुर्सी पर बैठे हों जिसकी ज़िम्मेदारी सरकार की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने की होती है।
अगर राहुल गांधी को भारत की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती, अगर उन्हें भारतीय संसद की बहस उबाऊ लगती है, और अगर उनका दिल सिर्फ विदेशी पब, पिज़्ज़ा और Beach पर ही लगता है, तो उन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।
कोई किसी को जबरदस्ती राजनीति में थोड़ी लाया है! आप शौक से अपनी विदेशी छुट्टियां मनाइए, अपना टूरिज्म एंजॉय कीजिए, लेकिन कृपया करके इस ‘नेता प्रतिपक्ष’ की गरिमामयी कुर्सी को छोड़ दीजिए।
अब कांग्रेस को भी ये समझ लेना चाहिए की जनता अब 1970 या 80 के दशक वाली भोली-भाली जनता नहीं रही। अब हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है, हर आदमी इंटरनेट पर देख रहा है की जब देश में बाढ़, गर्मी या कोई संकट आता है, तो उनके ये ‘युवराज’ किस देश के किस फाइव-स्टार होटल में चिल कर रहे होते हैं।
राहुल गांधी को अब तय करना होगा की उन्हें एक गंभीर राजनेता बनना है या फिर हमेशा के लिए एक ‘लीडर ऑफ पर्यटन’ बनकर इतिहास के पन्नों में मज़ाक बनकर रह जाना है। देश अब इस हॉलिडे पॉलिटिक्स को और बर्दाश्त नहीं करेगा!
