टूटे हुए शिव मंदिरों का विक्राल बदला लेकर 'तुगलक' के जिहादियों की खोदी कब्र, दक्षिण भारत से 'तुर्कों' को खदेड़ कर 'विजयनगर साम्राज्य' की नींव रखने वाले हिन्दू योद्धा 'मुसुनूरी नायक'

टूटे हुए शिव मंदिरों का विक्राल बदला लेकर ‘तुगलक’ के जिहादियों की खोदी कब्र, दक्षिण भारत से ‘तुर्कों’ को खदेड़ कर ‘विजयनगर साम्राज्य’ की नींव रखने वाले हिन्दू योद्धा ‘मुसुनूरी नायक’

इतिहास के पन्नों में 1323 ईस्वी का वो साल एक ऐसा खौफनाक और काला अध्याय है, जिसे याद करके आज भी एक सच्चे सनातनी का खून खौल उठता है।

वो दौर था जब हमारा दक्षिण भारत अपनी अपार संपत्ति, भव्य मंदिरों और सनातन संस्कृति के कारण पूरी दुनिया में सोने की चिड़िया कहलाता था।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की ज़मीन पर महान काकतीय साम्राज्य का भगवा परचम लहराता था और वारंगल उनकी राजधानी हुआ करती थी। लेकिन दिल्ली के तख्त पर बैठे तुर्क सुल्तानों की गंदी नजर हमारे इस वैभव पर पड़ चुकी थी।

दिल्ली से सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक की लाखों की खूंखार जिहादी सेना ने वारंगल (तेलंगाना) पर एक भयंकर और कायरतापूर्ण हमला बोल दिया।

हमारे वीर काकतीय योद्धाओं ने मुट्ठी भर होने के बावजूद महीनों तक तुर्कों की उस विशाल सेना के छक्के छुड़ाए, लेकिन आखिर में छल और धोखे से काकतीय महाराजा प्रतापरुद्र को बंदी बना लिया गया।

वारंगल पर कब्ज़ा करते ही तुगलक ने सबसे पहले उस शहर का हिंदू नाम मिटाकर उसे ‘सुल्तानपुर’ कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ सनातन धर्म के खिलाफ वो खौफनाक विद्रोह जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

वारंगल का भव्य ‘स्वयंभू शिव मंदिर’, उसे इन जिहादियों ने बेरहमी से ज़मीनदोज़ कर दिया। हमारे पवित्र शिवलिंगों पर हथौड़े चलाए गए, मूर्तियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

ब्राह्मणों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा गया और हज़ारों हिन्दू बहन-बेटियों को गुलाम बनाकर उन्हें दिल्ली के बाज़ारों में नीलाम करने के लिए जानवरों की तरह हांक कर ले जाया गया।

उस खौफनाक कत्लेआम ने पूरे दक्षिण भारत में एक ऐसी दहशत फैला दी थी, की ऐसा लगने लगा था जैसे अब वारंगल के पहाड़ों के नीचे सनातन धर्म हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। चारों तरफ मौत, बर्बादी और इस्लाम की तलवार का खौफ मंडरा रहा था।

75 हिन्दू सरदारों की खूनी प्रतिज्ञा, ‘मुसुनूरी प्रोलय नायक’ ने उठाई भवानी तलवार और शुरू हुआ दक्षिण भारत में तुर्कों का महाविनाश

जब पूरे दक्षिण भारत में मातम पसरा हुआ था और बड़े-बड़े राजा तुर्कों के खौफ से दुबक कर बैठे थे, तब गोदावरी नदी के पास भद्राचलम की ज़मीन से ‘मुसुनूरी’ राजवंश का एक ऐसा खूंखार हिंदू शेर उठा, जिसकी दहाड़ सुनकर दिल्ली में बैठे सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक भी पसीना-पसीना हो जाता था। वो खूंखार शेर थे- मुसुनूरी प्रोलय नायक!

प्रोलय नायक की रगों में वो उबलता हुआ खून था जो टूटे हुए शिव मंदिरों के मलबे को देखकर और भी ज़्यादा खौफनाक हो चुका था।

वो जानते थे की मोहम्मद बिन तुगलक की उस विशाल और क्रूर जिहादी फौज से अगर टक्कर लेनी है, तो अकेले काम नहीं चलेगा। पूरे हिंदू समाज को अपनी जातियों और रियासतों का लालच छोड़कर एक होना पड़ेगा।

प्रोलय नायक ने अपनी गज़ब की कूटनीति से वो कर दिखाया जो उस दौर में नामुमकिन लगता था।

उन्होंने दक्षिण भारत के 75 अलग-अलग हिंदू सरदारों (Nayakas) को एक साथ बुलाया और उन सबको सनातन धर्म के एक भगवा झंडे के नीचे लाकर खड़ा कर दिया। प्रोलाया वेमा रेड्डी जैसे महापराक्रमी योद्धा इस संघ के प्रमुख स्तंभ बने।

इन 75 हिंदू सरदारों ने मिलकर अपने ही खून से महादेव की शपथ ली की जब तक वारंगल के उन टूटे हुए शिव मंदिरों का इंतकाम नहीं ले लेते, और जब तक दक्षिण भारत की धरती से आखिरी जिहादी तुर्क का सिर धड़ से अलग करके ज़मीन को उनके खून से नहीं नहला देते, तब तक वो चैन की सांस नहीं लेंगे।

रेखापल्ली के घने जंगल और खौफनाक गुरिल्ला युद्ध जहाँ मुसुनूरी नायकों ने तुर्कों को बेरहमी से काटा

अब शुरू होता है वो भयंकर महासंग्राम। प्रोलय नायक बहुत अच्छे से जानते थे की खुले मैदान में तुगलक की उस लाखों की सेना और घुड़सवारों का सामना करना बेवकूफी होगी।

इसलिए उन्होंने अपनी युद्धनीति बदली। उन्होंने गोदावरी नदी के किनारे मौजूद ‘रेखापल्ली’ के उन घने, दुर्गम और डरावने जंगलों को अपना मिलिट्री बेस बनाया।

रेखापल्ली के उन्हीं जंगलों से मुसुनूरी नायकों ने जिहादियों के खिलाफ वो खौफनाक ‘गुरिल्ला युद्ध’ शुरू किया जिसने तुगलक की पूरी सेना की कमर तोड़ कर रख दी।

दिन के उजाले में ये हिंदू सेना जंगलों की ओट में छुप जाती थी, और जैसे ही रात का अंधेरा होता, ये हिंदू शेर भूखे बाघों की तरह तुर्कों की छावनियों पर टूट पड़ते थे।

गोदावरी और कृष्णा नदियों के बीच का वो पूरा इलाका इन जिहादी आक्रांताओं के लिए परमानेंट कब्रगाह बन गया।

रात के अंधेरे में कब कहाँ से प्रोलय नायक की तलवार निकलेगी और कितने तुर्कों के गले कट जाएंगे, इसका खौफ ऐसा था की तुगलक के सिपाही रात को सो नहीं पाते थे।

मुसुनूरी सेना ने तुर्क कमांडरों की गर्दनों को काटना शुरू कर दिया। उनके खज़ाने लूट लिए गए, उनके घोड़ों को छीन लिया गया और उनकी छावनियों में आग लगा दी गई।

रातों-रात मुसुनूरी नायकों ने तुर्कों का ऐसा भयंकर कत्लेआम मचाया की तुगलक के सिपाही वारंगल और रेखापल्ली का नाम सुनकर ही कांपने लगते थे।

उन जिहादियों को समझ आ गया था की उन्होंने काकतीय साम्राज्य के शिव मंदिरों को तोड़कर साक्षात मौत को दावत दे दी है।

देखते ही देखते प्रोलय नायक की उस धधकती हुई तलवार ने पूरे तटीय आंध्र प्रदेश को इन जिहादियों के खूनी पंजों से आज़ाद करा लिया।

जो ज़मीन कल तक इस्लाम के खौफ से सहम रही थी, वहां अब हर तरफ ‘हर हर महादेव’ का जयघोष गूंज रहा था।

‘कापय नायक’ का वो भयंकर पलटवार, जब तुगलक के कमांडर को कुत्ता बना कर पीटकर वारंगल से खदेड़ा गया

रेखापल्ली के उन बीहड़ जंगलों से शुरू हुआ वो खौफनाक गुरिल्ला युद्ध अभी अपनी चरम सीमा पर पहुंच ही रहा था की सनातन धर्म के उस महान रक्षक प्रोलय नायक ने वीरगति प्राप्त कर ली।

दिल्ली में बैठे मोहम्मद बिन तुगलक को लगा की प्रोलय नायक के मरने के बाद अब दक्षिण भारत के हिंदुओं की बगावत ठंडी पड़ जाएगी और वो फिर से अपने जिहादी मंसूबों को अंजाम दे पाएगा।

लेकिन उस क्रूर सुल्तान को ये नहीं पता था की प्रोलय नायक ने जिस बगावत की आग को सुलगाया था, वो अब एक ऐसा खौफनाक ज्वालामुखी बन चुकी थी जिसे बुझाना तुर्कों के बाप के भी बस की बात नहीं थी।

प्रोलय नायक के बाद हिंदू सेना की कमान उनके चचेरे भाई ‘कापय नायक’ के हाथों में आ गई। कापय नायक प्रोलय नायक से भी दस कदम आगे और खूंखार थे।

कापय नायक बहुत अच्छे से जानते थे की अगर इन तुर्क जिहादियों को हमेशा के लिए दक्षिण भारत से उखाड़ फेंकना है, तो वारंगल के उस अभेद्य किले को वापस छीनना ही होगा जहाँ तुगलक का खूंखार गवर्नर ‘मलिक मक़बूल’ अपनी जिहादी सेना के साथ कुंडली मारकर बैठा था।

कापय नायक ने एक ऐसी बेजोड़ और खौफनाक कूटनीति रची जिसने दिल्ली सल्तनत की ईंट से ईंट बजा दी। उन्होंने होयसल साम्राज्य के महान हिंदू राजा ‘वीर बल्लाल तृतीय’ से हाथ मिलाया।

1336 ईस्वी के आस-पास दक्षिण भारत के इन दो हिंदू शेरों ने मिलकर एक ऐसा अजेय और खूंखार हिंदू गठबंधन तैयार किया, जिसकी गूंज सुनकर ही वारंगल के किले में बैठे तुर्कों की पैंट गीली होने लगी थी।

फिर वो खौफनाक दिन आ ही गया। कापय नायक ने अपनी विशाल हिंदू सेना के साथ वारंगल के किले पर ऐसा भयंकर और जानलेवा हमला किया की तुगलक की उस खूंखार जिहादी सेना के परखच्चे उड़ गए।

कापय नायक की तलवारें प्यासी थीं। जो तुर्क जिहादी कल तक निहत्थे हिंदुओं को काट रहे थे, आज वो मैदान-ए-जंग में चूहों की तरह अपनी जान की भीख मांग रहे थे।

वारंगल के मैदान में जिहादियों की लाशों के ऐसे पहाड़ बिछा दिए गए की ज़मीन का रंग लाल हो गया।

जब तुगलक के कमांडर मलिक मक़बूल ने देखा की कापय नायक के राजपूत और स्थानीय वीर उसकी सेना को बुरी तरह काट रहे हैं, तो वो खूंखार गवर्नर अपनी सारी हेकड़ी भूल गया।

वो अपनी औरतों और बचे-खुचे सिपाहियों को लेकर रातों-रात वारंगल से एक कायर कुत्ते की तरह दुम दबाकर दिल्ली की तरफ भाग खड़ा हुआ।

जिस वारंगल को मोहम्मद बिन तुगलक ने ‘सुल्तानपुर’ बनाया था, वहां कापय नायक ने उस जिहादी नाम को जूतों तले कुचलकर वापस सनातन का वो पवित्र भगवा झंडा फहरा दिया जिसकी छांव के लिए पूरा दक्षिण भारत तरस रहा था।

तोड़े गए शिव मंदिरों का शुद्धिकरण, मुसुनूरी नायकों की इसी आग से पैदा हुआ अजेय ‘विजयनगर साम्राज्य’

वारंगल की ज़मीन पर भगवा परचम फहराने के बाद कापय नायक ने कोई जश्न नहीं मनाया। उनका सबसे पहला और सबसे पवित्र लक्ष्य कुछ और ही था।

जिन काकतीय शिव मंदिरों को तुर्क जिहादियों ने बेरहमी से तोड़ा था, जहाँ हमारे शिवलिंगों का अपमान किया गया था, कापय नायक सीधे वहीं पहुंचे।

उस पवित्र ज़मीन को जिहादियों के खून और उनके नापाक कब्ज़े से आज़ाद कराने के बाद एक महा-शुद्धिकरण का शंखनाद हुआ।

कापय नायक ने पूरे वारंगल के अपवित्र हो चुके मंदिरों को पवित्र नदियों के जल और वैदिक मंत्रों के उच्चारण से दोबारा शुद्ध करवाया।

टूटे हुए शिवलिंगों की जगह पूरी श्रद्धा और राजसी सम्मान के साथ नई प्राण-प्रतिष्ठा की गई। वारंगल की उन गलियों में जहाँ कुछ समय पहले मौत का सन्नाटा और इस्लामिक खौफ पसर गया था, वहां अब फिर से सुबह-शाम ‘हर हर महादेव’ के जयकारे गूंजने लगे थे।

इन्हीं मुसुनूरी नायकों की उस भयंकर बगावत और उनके द्वारा काटी गई जिहादियों की लाशों को देखकर दक्षिण भारत के दो और हिंदू शेरों की रगों में सोया हुआ बारूद जाग उठा था।

उन शेरों के नाम थे- ‘हरिहर’ और ‘बुक्का’! जिन्हें तुगलक ने धोखे से बंदी बनाकर जबरन इस्लाम कबूल करवा दिया था, उन्होंने प्रोलय और कापय नायक की इस हिंदू हुंकार को देखा।

स्वामी विद्यारण्य के आशीर्वाद से हरिहर और बुक्का ने तुर्कों की उस ज़ंजीर को तोड़ फेंका, वापस सनातन धर्म में अपनी ‘घरवापसी’ की और 1336 ईस्वी में तुंगभद्रा नदी के किनारे एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी जिसके नाम से ही इस्लामिक सुल्तानों की रूह कांप जाती थी। और वो साम्राज्य था- ‘महान विजयनगर साम्राज्य’!

अगर 14वीं सदी के उस खौफनाक दौर में मुसुनूरी नायक अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर तुगलक की उस खूंखार जिहादी सेना की कब्र ना खोदते, तो आज पूरा दक्षिण भारत किसी इस्लामिक खलीफा का गुलाम होता।

ना वहां हमारे भव्य मंदिर बचते और ना ही वहां सनातन धर्म की कोई पहचान ज़िंदा रहती।

विजयनगर साम्राज्य की वो अजेय दीवार जो अगले 300 सालों तक दक्षिण भारत की रक्षा करती रही, उसकी असली बुनियाद मुसुनूरी नायकों के उसी खौफनाक प्रतिशोध और तुर्कों के बहे हुए खून पर रखी गई थी।

Scroll to Top