हिन्दुओं से नफरत की खौफनाक इंतहा, जब 1975 में कांग्रेस ने करी 60 लाख हिन्दुओं की जबरन नसबंदी, और मुस्लिमों को दी अपनी आबादी बढ़ाने की पूरी छूट

हिन्दुओं से नफरत की खौफनाक इंतहा, जब 1975 में कांग्रेस ने करी 60 लाख हिन्दुओं की जबरन नसबंदी, और मुस्लिमों को दी अपनी आबादी बढ़ाने की पूरी छूट

जो कांग्रेस वाले आज लोकतंत्र के सबसे बड़े ठेकेदार बने बैठे हैं, ज़रा उनके उस खूनी और काले इतिहास का पन्ना पलट कर देखिए। आपको पता चलेगा की इस देश में लोकतंत्र की असली हत्या किसने की थी।

साल 1975 में जब इंदिरा गांधी की कुर्सी खतरे में पड़ी, तो उन्होंने देश को बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे भारत को एक खौफनाक जेल में तब्दील कर दिया था।

ये जो इमरजेंसी (Emergency) या आपातकाल था, ये सिर्फ नेताओं को जेल में डालने या मीडिया का मुंह बंद करने तक सीमित नहीं था। इसके पीछे एक बहुत ही खौफनाक, घिनौनी और सनातनियों की नस्लें मिटाने वाली साज़िश रची गई थी।

विकास और ‘परिवार नियोजन’ के मीठे ज़हर में लपेटकर एक ऐसा दरिंदगी भरा फरमान निकाला गया, जिसने रातों-रात इस देश के आम, गरीब और बहुसंख्यक हिंदू पुरुषों को सरकार का सीधा शिकार बना दिया। और वो था नसबंदी (Sterilization) का खौफनाक फरमान!

जिस तरह जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों को गैस चेंबरों में डाला था, ठीक उसी तर्ज पर भारत में सिर्फ एक ही साल के अंदर 60 से 62 लाख हिंदुओं को ज़बरदस्ती पकड़कर नपुंसक बना दिया गया था!

हां भाई, 60 लाख से ज़्यादा लोग! ये वो गरीब हिंदू थे जिनकी आवाज़ सुनने वाला इस कांग्रेसी सिस्टम में कोई नहीं था।

इनके शरीर के साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया गया। इन्हें डराकर, धमकाकर और पुलिस के डंडों के ज़ोर पर इनकी नसबंदी करा दी गयी। और आज यही कांग्रेस हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने चली है?

बिना चुनाव जीता ‘तानाशाह’ संजय गांधी, और पुलिस के खौफनाक टारगेट जिसमें जानवरों की तरह ट्रकों में भरे गए हिन्दू

इस पूरे खौफनाक और बर्बर कत्लेआम का असली मास्टरमाइंड कौन था? वो था एक ऐसा बिगड़ैल नवाब जिसके पास देश का कोई संवैधानिक पद नहीं था, जिसने कभी कोई चुनाव नहीं जीता था।

लेकिन उसका खौफ दिल्ली से लेकर पूरे उत्तर भारत में किसी खूंखार जल्लाद से कम नहीं था। वो था इंदिरा गांधी का बेटा- संजय गांधी!

संजय गांधी ने इस देश को अपने बाप की जागीर समझ लिया था। उसने दिल्ली के महलों में बैठकर एक ऐसा खौफनाक सिस्टम तैयार किया जिसे ‘टारगेट सिस्टम’ (Target System) कहा जाता था। उसने राज्यों के मुख्यमंत्रियों, डीएम (DM), एसपी (SP), पुलिसवालों, सरकारी मास्टरों और पटवारियों को सीधे टारगेट दे दिए।

फरमान एकदम साफ था- “अगर तुमने हर महीने इतने लोगों की नसबंदी नहीं करवाई, तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी, तुम्हारी पगार रोक दी जाएगी और तुम्हें मीसा (MISA) कानून के तहत जेल की काल कोठरी में सड़ा दिया जाएगा।”

ज़रा सोचिए, जब सिस्टम पर ऐसा खौफ बैठेगा तो क्या होगा? अपनी नौकरी और अपनी खाल बचाने के लिए इस देश की पुलिस और सरकारी मशीनरी पूरी तरह से अंधी और पागल हो गई।

पुलिस वालों ने शिकारियों की तरह गांव-गांव में छापे मारने शुरू कर दिए। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनें रोक कर आदमियों को बाहर खींचा गया।

बस स्टैंडों पर जो मज़दूर दिखा, खेतों में जो किसान काम करता दिखा, या गांव के मेलों में जो भी गरीब हिंदू आदमी नज़र आया, उसे कॉलर से पकड़-पकड़ कर ट्रकों में ऐसे ठूंसा गया जैसे वो इंसान नहीं, बल्कि कटने के लिए जा रही भेड़-बकरियां हों।

लोगों में इतना भयंकर खौफ बैठ गया था की जैसे ही पुलिस की जीप किसी गांव में आती थी, गांव के सारे मर्द अपने घर-बार छोड़कर रात के अंधेरे में जंगलों और खेतों में जाकर छुप जाते थे।

वो महीनों तक पेड़ों पर सोते थे ताकि पुलिस उन्हें पकड़ कर उनके अंगों पर वो गंदा चाकू ना चला दे। एक ऐसा देश जो आज़ाद था, वहां का बहुसंख्यक हिंदू अपनी ही चुनी हुई सरकार से जान बचाकर भाग रहा था।

ये कोई परिवार नियोजन नहीं था मेरे भाई, ये सीधे-सीधे हिंदुओं का शिकार करने का एक सरकारी और खूनी खेल था।

तुर्कमान गेट से मुज़फ्फरनगर तक जिहादी दंगे, मुसलमानों को नसबंदी से आज़ाद करके कांग्रेस ने दिखाया दोगलापन

अब ज़रा इस कांग्रेसी सरकार का वो दोगला और सेक्युलर चेहरा देखिए, जिसने इस देश की डेमोग्राफी को तबाह करने की असली नींव रखी थी।

संजय गांधी की एक बहुत ही खास और खौफनाक महिला मित्र थी- ‘रुखसाना सुल्ताना’। इस औरत ने पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद और तुर्कमान गेट इलाके में अपना खौफ कायम कर रखा था। उसने वहां नसबंदी का कैंप लगाया।

लेकिन जैसे ही प्रशासन ने मुस्लिमों के इलाकों में जाकर उनकी नसबंदी करने की कोशिश की, तो वहां क्या हुआ? वहां वो लोग पुलिस की जीप देखकर जंगलों में नहीं छुपे।

उन्होंने बाकायदा एकजुट होकर सरकार के खिलाफ खौफनाक जिहादी दंगे भड़का दिए! दिल्ली के तुर्कमान गेट से लेकर उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर तक, जैसे ही पुलिस नसबंदी करने पहुंची, इन कट्टरपंथियों ने पुलिस पर जानलेवा हमले शुरू कर दिए।

छतों से पत्थर बरसाए गए, पेट्रोल बम फेंके गए और पूरे के पूरे इलाकों में आग लगा दी गई। उन्होंने डंके की चोट पर कह दिया की “हमारा मज़हब हमें नसबंदी की इजाज़त नहीं देता, हम इसे नहीं मानेंगे।”

और फिर इस ‘कड़क’ कांग्रेसी सरकार ने क्या किया? जो संजय गांधी और जो इंदिरा गांधी हिंदुओं को कीड़े-मकोड़ों की तरह ट्रकों में भरवा रहे थे, उनकी पैंट इन जिहादी दंगों के सामने गीली हो गई।

जैसे ही मुसलमानों ने हिंसक तांडव किया, कांग्रेस सरकार ने घुटने टेक दिए। प्रशासन ने चुपचाप उनके मोहल्लों और उनकी बस्तियों में जाना बंद कर दिया।

पुलिस वालों को सख्त हिदायत दे दी गई की “उन इलाकों में मत जाना, वहां दंगा हो जाएगा, हमारा वोटबैंक खिसक जाएगा।”

मतलब ज़रा इस खौफनाक तुष्टिकरण को समझिए! सिर्फ इसलिए क्योंकि मुसलमान एक वोटबैंक थे और उन्होंने सरकार को डरा दिया था, उन्हें इस नसबंदी के कहर से पूरी तरह आज़ाद कर दिया गया।

उन जिहादियों को अपनी आबादी बढ़ाने की, चार-चार शादियां करने की और 10-10 बच्चे पैदा करने की खुली छूट दे दी गई।

सरकार ने हार मान ली और सारा का सारा ज़ोर, सारा का सारा टारगेट सिर्फ और सिर्फ उस गरीब हिंदू पर थोप दिया गया जो सरकार से डरता था।

पिपली से सुल्तानपुर तक निहत्थे हिन्दुओं का चीरहरण, कुंवारे लड़कों और 70 साल के बूढ़ों की भी बेरहमी से करी नसबंदी

दूसरी तरफ हमारा वो बेचारा सीधा-सादा हिंदू समाज था। वो हिंदू जो कानून को मानता था, जो पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम नहीं फेंकता था, वो चुपचाप कटता रहा।

उसे ‘शांति’ और ‘देशभक्ति’ का पाठ पढ़ाकर उसकी मर्दानगी को जूतों तले रौंद दिया गया।

इस खौफनाक साज़िश का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक शिकार कौन हुआ? हमारे वो गरीब दलित, वाल्मीकि और किसान भाई जिनके पास ना कोई रसूख था, ना पैसा था और ना ही उन्हें बचाने वाला कोई मज़हबी बोर्ड था।

हरियाणा के पिपली गांव का वो खौफनाक मंज़र आज भी वहां के बुज़ुर्गों की रूह कंपा देता है। यूपी के मुज़फ्फरनगर, सुल्तानपुर और बिहार के अनगिनत गांवों में पुलिस ने कैसे पूरे-पूरे हिंदू गांवों को घेरा।

जो आदमी खेत में हल चला रहा था, जो बाज़ार में सब्ज़ी बेच रहा था, उसे घसीटते हुए जीप में डाल लिया गया।

पुलिस और सरकारी बाबुओं को सिर्फ अपना ‘नंबर’ और टारगेट पूरा करना था। उनके अंदर की इंसानियत इस कदर मर चुकी थी की उन्होंने ये भी नहीं देखा की जिसे वो पकड़ रहे हैं, वो 16-17 साल का एक कुंवारा लड़का है जिसकी अभी शादी तक नहीं हुई है, या वो 70 साल का कोई कमज़ोर बूढ़ा है जिसके पहले से ही पोते-पोतियां हैं।

जिसे पाया, उसे ज़बरदस्ती पकड़कर उस गंदी सी टेबल पर लिटा दिया।

लड़के रोते रहे, गिड़गिड़ाते रहे की “साहब हमारी तो अभी शादी भी नहीं हुई है, हमारी ज़िंदगी बर्बाद मत करो”, लेकिन उन सरकारी गुंडों ने एक नहीं सुनी।

उन्हें बेहोशी की दवाई तक ठीक से नहीं दी गई। चीखते और तड़पते हुए इन हिंदू मर्दों की नसें काट दी गईं।

क्या दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में अपने ही बहुसंख्यक समाज के साथ ऐसा घृणित और क्रूर बर्ताव हुआ है?

रसूखदारों, कांग्रेसी नेताओं के करीबियों और बड़े सेठों को तो कोई छूता भी नहीं था। सारा का सारा ज़ुल्म सिर्फ उस लाचार और गरीब हिंदू पर था जो रोज़ कुआं खोदकर पानी पीता था।

उसके भविष्य को, उसके वंश को और उसकी मर्दानगी को कांग्रेस ने अपनी सत्ता की बलिवेदी पर चढ़ा दिया।

60 लाख हिन्दुओं की नसबंदी और 10 बच्चे पैदा करने की जिहादी आज़ादी, भारत की डेमोग्राफी बदलने का खौफनाक कांग्रेसी ब्लूप्रिंट

अब ज़रा इस पूरी खौफनाक साज़िश के उस सबसे गहरे और ज़हरीले सच को समझिए, जिसका खामियाज़ा आज 2026 में हमारा पूरा देश भुगत रहा है।

ये जो 1975 में नसबंदी का कहर ढाया गया, ये महज़ कोई सनक या परिवार नियोजन का फेलियर नहीं था।

अगर आप इसके पीछे के आंकड़ों और उस दौर की राजनीति को जोड़कर देखेंगे, तो आपको वो ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ का खौफनाक ब्लूप्रिंट नज़र आएगा जिसने भारत की जड़ों में तेज़ाब डालने का काम किया।

ज़रा एक मिनट के लिए सोचिए। 1975 में कांग्रेस ने 60 से 62 लाख हिंदुओं को ज़बरदस्ती पकड़कर नपुंसक बना दिया था।

उन 60 लाख हिंदू पुरुषों में ज़्यादातर वो नौजवान और अधेड़ उम्र के लोग थे जिनका पूरा जीवन बाकी था।

अगर उन 60 लाख हिंदुओं की नसबंदी ना हुई होती, तो उनके कितने बच्चे पैदा होते? आगे चलकर उन बच्चों के कितने बच्चे होते? आज 50 साल बाद अगर हम उस आबादी की गणना करें, तो वो करोड़ों में होगी।

कांग्रेस ने एक ही झटके में करोड़ों हिंदुओं को इस धरती पर आने से पहले ही हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया। उन्होंने हमारे सनातनियों की पीढ़ियों को, हमारे वंश को एक क्रूर सरकारी कैंची से काट डाला।

और ठीक उसी वक्त, इस देश के अंदर क्या हो रहा था? कांग्रेस की उसी सरकार ने जामा मस्जिद और तुर्कमान गेट के उन जिहादी दंगों के आगे घुटने टेक दिए थे।

उन जिहादियों को डंके की चोट पर ये लिखित और अलिखित आज़ादी दे दी गई की “तुम इस नसबंदी से पूरी तरह बाहर हो।

तुम जितनी चाहो बीवियां रखो, 10-10 बच्चे पैदा करो, अपनी आबादी बढ़ाओ, हम तुम्हारे मोहल्लों में पुलिस भी नहीं भेजेंगे।”

अरे भाई! ये कोई इत्तेफाक था क्या? एक तरफ तुम बहुसंख्यक हिंदू समाज की नसों को काट रहे हो, उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता को पुलिस के डंडों से कुचल रहे हो।

और दूसरी तरफ तुम उन जिहादियों को, जो इस देश के संविधान को नहीं मानते, जो शरिया के नाम पर दंगे करते हैं, उन्हें तुम बेतहाशा बच्चे पैदा करने की छूट दे रहे हो!

ये इस देश को ‘गज़वा-ए-हिंद’ की तरफ धकेलने की सबसे बड़ी और सबसे खौफनाक कांग्रेसी साज़िश थी।

ये चाहते थे की हिंदू की आबादी की रफ्तार पर ऐसा ब्रेक लगा दिया जाए कि वो कभी उठ ना पाए, और जिहादियों की भीड़ इतनी बढ़ा दी जाए की वो अपने वोटों के दम पर कांग्रेस को बार-बार चुनावों में जीता सकें।

आज जब हम मालदा, मुर्शिदाबाद, मेवात और कैराना में हिंदुओं को अपने ही घरों से भागते हुए देखते हैं, आज जब हम देखते हैं की कैसे ये जिहादी अपनी भीड़ के दम पर हमारी रामनवमी की शोभा यात्राओं पर पत्थर बरसाते हैं, तो याद रखना की इस भीड़ को पैदा करने और हिंदुओं को कमज़ोर करने की ये खूनी खाद 1975 में ही कांग्रेस ने डाल दी थी।

तड़प तड़प कर मरे हमारे हज़ारों हिन्दू पूर्वज, गंदे चाकुओं और मौत के कैंपों का वो भयानक इतिहास जिसे दरबारियों ने छुपाया

अगर किसी को लगता है की ये सिर्फ नसबंदी तक सीमित था, तो ज़रा उन ‘मौत के कैंपों’ का खौफनाक मंज़र भी सुन लीजिए, जिसे सुनकर आज भी इंसान की रूह कांप जाती है।

पुलिस और सरकारी बाबुओं को सिर्फ अपने टारगेट पूरे करने थे। उन्होंने गांव के सरकारी स्कूलों, टूटे-फूटे टेंटों और गंदे अस्पतालों में ऐसे नसबंदी कैंप बनाए जो किसी कसाईखाने से कम नहीं थे।

वहां कोई साफ-सफाई नहीं थी, कोई हाइजीन (Hygiene) नहीं था। एक ही गंदी टेबल पर खून से लथपथ चादर बिछी रहती थी और उसी पर एक के बाद एक हिंदू आदमियों को लिटा दिया जाता था।

जो डॉक्टर वहां ऑपरेशन कर रहे थे, वो ना तो औज़ारों को स्टरलाइज़ (Sterilize) करते थे और ना ही हाथ धोते थे। एक ही गंदे रेज़र, ब्लेड और जंग लगे चाकुओं से दर्जनों लोगों के ऑपरेशन किए गए।

कई लोगों को तो ठीक से बेहोशी की दवाई (Anesthesia) भी नहीं दी गई। वो दर्द से चीखते थे, तड़पते थे, लेकिन उन्हें चार पुलिसवाले कसकर पकड़ लेते थे और डॉक्टर उनका शरीर काट देता था।

अरे भाई, ये मेडिकल कैंप नहीं थे, ये हमारे पूर्वजों को तड़पा-तड़पा कर मारने के टॉर्चर रूम थे! ऑपरेशन के बाद उन गरीब हिंदुओं को बस स्टैंडों पर, सड़कों के किनारे और खेतों में लावारिस जानवरों की तरह फेंक दिया गया।

ना कोई दवाई दी गई, ना कोई पट्टी की गई। नतीजा क्या हुआ? हज़ारों-हज़ारों हिंदू पुरुषों को भयंकर इंफेक्शन (Infection) हो गया।

टिटनेस फैल गया। उनके शरीर में ज़हर बन गया और खून बहने से वो अपने घरों की चौखट पर, अपनी औरतों और बच्चों के सामने तड़प-तड़प कर मर गए।

वो रोते रहे, लेकिन उस कांग्रेसी सिस्टम में कोई उन्हें अस्पताल ले जाने वाला नहीं था। गांव के गांव मातम में डूब गए।

औरतों का सुहाग सिर्फ इसलिए उजड़ गया क्योंकि संजय गांधी नाम के उस तानाशाह को अपना ‘टारगेट’ पूरा करना था।

लेकिन इस देश के उन गद्दार और चाटुकार दरबारियों को देखिए! इन दरबारी इतिहासकारों और बिकाऊ सेक्युलर पत्रकारों ने इस पूरे नरसंहार को, इस पूरे कत्लेआम को इतिहास की किताबों से ऐसे गायब कर दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

60 लाख हिंदुओं के उस खून को, उन आंसुओं को चुपचाप फाइलों के नीचे दफना दिया गया। उलटा हमारे सामने टीवी और किताबों में इंदिरा गांधी को ‘आयरन लेडी’ (Iron Lady) बनाकर पेश किया गया।

जिसने हमारे बाप-दादों को नपुंसक बनाया, जिसने हमारे निर्दोष हिंदुओं को तड़पा-तड़पा कर मार डाला, उसे इस देश में ‘दुर्गा’ का अवतार बताया गया!

इससे बड़ा अपमान, इससे बड़ी मानसिक गुलामी एक सनातन समाज के लिए और क्या हो सकती है?

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