5000 जिहादी 'तुर्कों' को मिनटों में मौत के घाट उतारने वाला हिंदू महारथी 'राजा आनंदपाल', नंगे पैर ही आनंदपाल की 'गुक्खर' सेना ने भारत भूमि को बनाया जिहादियों का शमशान

5000 जिहादी ‘तुर्कों’ को मिनटों में मौत के घाट उतारने वाला हिंदू महारथी ‘राजा आनंदपाल’, नंगे पैर ही आनंदपाल की ‘गुक्खर’ सेना ने भारत भूमि को बनाया जिहादियों का शमशान

11वीं सदी की शुरुआत का वो खौफनाक वक्त याद करो भाई! जब वो महमूद गजनवी नाम का खूंखार लुटेरा खैबर दर्रे से हमारे देश की पवित्र ज़मीन पर अपनी नापाक नज़रें गड़ाए घुस रहा था।

उसका भारत के मंदिरों को तोड़कर, यहां का सोना लूटकर इस ज़मीन पर इस्लाम का झंडा गाड़ने का सपना था। गजनवी को लगा था की भारत कोई लावारिस ज़मीन है जिसे वो बड़ी आसानी से अपने बूटों तले रौंद देगा।

लेकिन उस मूर्ख जिहादी को ये नहीं पता था की काबुल से लेकर पंजाब तक ‘हिंदू शाही राजवंश’ एक ऐसी लोहे की दीवार बनकर खड़ा है, जिससे टकराकर उसके जिहादी मंसूबे चकनाचूर होने वाले हैं।

महाराजा जयपाल ने सालों तक इन विदेशी जिहादियों को खून के आंसू रुलाए। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के बॉर्डर पर तुर्कों को वो भयानक टक्कर दी की उनके पसीने छूट गए।

और जब महाराजा जयपाल ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, तो उनके शूरवीर बेटे, महाराजा आनंदपाल ने सत्ता संभाली।

राजा आनंदपाल ने अपने पिता की चिता की भस्म माथे पर लगाकर कसम खाई की गजनवी के इस जिहादी साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा देंगे।

ये अपने धर्म, अपनी ज़मीन और अपने स्वाभिमान को बचाने की वो धधकती हुई ज्वाला थी जो अब गजनवी की पूरी जिहादी फौज को भस्म करने वाली थी।

महमूद गजनवी को खून के आंसू रुलाने वाला राजा आनंदपाल का महा गठबंधन, हिन्दू वीरांगनाओं ने जिहाद को कुचलने के लिए पिघला दिए अपने गहने

आनंदपाल बहुत अच्छे से जानते थे की ये कोई मामूली लड़ाई नहीं है। ये सीधे-सीधे सनातन धर्म और भारत माता के वजूद पर एक बहुत बड़ा और खौफनाक जिहादी हमला है।

1008 ईस्वी का वो साल था जब आनंदपाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के हिंदू राजाओं को ललकारा।

उन्होंने खत लिखकर साफ कह दिया की “अगर आज हम एक नहीं हुए, तो ये विदेशी दरिंदे हमारे मंदिरों को तोड़ेंगे और हमारी बहन-बेटियों को नोच खाएंगे।”

और फिर क्या था? आनंदपाल की उस दहाड़ को सुनकर पूरे उत्तर भारत के राजपूत और हिंदू शेर अपनी तलवारें म्यान से निकालकर इस खौफनाक ‘राजपूत महा-गठबंधन’ में शामिल होने के लिए निकल पड़े।

तुर्कों को उनके घर में घुसकर मारने की वो तैयारी शुरू हो गई जिसे देखकर आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

पर भाई, इतिहास का जो सबसे महान और जज़्बाती सच है ना, वो तो हमारी हिंदू वीरांगनाओं का वो सर्वोच्च बलिदान है।

जब इस धर्मयुद्ध के लिए हथियारों, घोड़ों और पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो भारत के घरों में बैठी आम हिंदू औरतों ने अपने मंगलसूत्र, अपने गहने, ज़ेवर और सोने-चांदी के बर्तन तक पिघलाकर राजा आनंदपाल के पास भेज दिए।

भारत की महिलाओं ने अपना सुहाग और अपना सोना दांव पर लगा दिया ताकि आनंदपाल की सेना को हथियारों की कोई कमी ना हो।

एक तरफ लूट और हवस की आग में अंधे होकर आए जिहादी तुर्क थे, और दूसरी तरफ धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान और माल सब कुछ कफन में बांधकर निकले हमारे हिंदू शेर।

ये कोई फौज की लड़ाई नहीं थी, ये पूरा का पूरा एक सनातनी जन-आंदोलन था जिसने गजनवी की खटिया खड़ी कर दी थी।

पेशावर के मैदान में 40 दिन तक दुबक कर बैठा रहा वो गजनवी, हिन्दू सेना को देखकर जिहादियों की हो गयी थी सिट्टी-पिट्टी गुल

अब ज़रा आते हैं उस खौफनाक मैदान-ए-जंग पर जहाँ मौत अपना सबसे क्रूर खेल खेलने के लिए तैयार खड़ी थी। 1008-1009 ईस्वी की वो भयंकर कड़ाके की सर्दियां।

सिंधु नदी के किनारे वैहिंद (Chach) का वो विशाल मैदान। एक तरफ राजा आनंदपाल की वो विशाल और क्रोध से उबलती हुई भगवा सेना थी, और दूसरी तरफ वो गजनवी था जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा ‘बुतशिकन’ (मूर्तियां तोड़ने वाला) और खूंखार लुटेरा बताता था।

लेकिन भाई, ज़मीन पर असलियत क्या थी? जैसे ही गजनवी ने दूर से आनंदपाल की उस भयानक और अजेय हिंदू सेना को देखा, उस जिहादी लुटेरे की हवा टाइट हो गई।

जो गजनवी अपनी क्रूरता के लिए जाना जाता था, वो इतना डर गया की पूरे 40 दिनों तक अपने टेंट से बाहर निकलने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई।

ज़रा सोचिए इस कायरता को! 40 दिन तक ये जिहादी तुर्क अपनी खाइयों में चूहों की तरह दुबके बैठे रहे।

गजनवी रोज़ अपनी सेना को देखता और उसे लगता की अगर वो मैदान में गया तो ये हिंदू शेर उसकी बोटी-बोटी नोच लेंगे।

जब 40 दिन बीत गए और गजनवी के कैंप में राशन-पानी खत्म होने लगा, तो उसकी बौखलाहट बढ़ने लगी। उसे लगा की अगर लड़ा नहीं तो भूखे मर जाएंगे और उसकी सेना बगावत कर देगी।

उसी डर और घबराहट में गजनवी ने एक खौफनाक चाल चली। उसने अपने 6,000 खूंखार तुर्क तीरंदाज़ों को हिंदू सेना को उकसाने के लिए खाइयों से बाहर भेजा।

उसे लगा की तीरंदाज़ों को देखकर हिंदू सेना डर जाएगी। पर उस बेवकूफ जिहादी को ये नहीं पता था की उसने मौत के मुंह में हाथ डाल दिया है और अब उसकी पूरी फौज का ऐसा नंगा चीरहरण होने वाला है जिसे इतिहास सदियों तक नहीं भूल पाएगा।

नंगे पैर टूट पड़े 30 हज़ार खूंखार ‘गुक्खर’ हिंदू योद्धा, गजनवी के ‘एलीट’ जिहादी गार्ड्स के सीने चीरकर रख दिए

और फिर हुआ वो खौफनाक पलटवार जिसने गजनवी के गुरूर के परखच्चे उड़ा कर रख दिए!

जैसे ही वो 6000 जिहादी तीरंदाज़ आगे बढ़े, आनंदपाल की सेना के मोर्चे पर खड़े 30,000 ‘गुक्खर’ (जिन्हें गक्खड़ या खोखर भी कहा जाता है) योद्धा अपनी लाइनों से बाहर निकल आए।

भाई साहब, ये गुक्खर कोई आम सैनिक नहीं थे। ये पंजाब और पहाड़ियों के वो खूंखार लड़ाके थे जिन्हें देखकर यमराज भी रास्ता छोड़ दे। ये मौत के वो सौदागर थे जो जब मारते थे तो पलक झपकने का मौका भी नहीं देते थे।

ये 30 हज़ार गुक्खर नंगे सिर और नंगे पैर थे! इनके शरीरों पर कोई भारी कवच नहीं था, बस आंखों में खून उबल रहा था और हाथों में नंगी तलवारें, भाले और खंजर थे।

इन्होंने चीते जैसी खौफनाक फुर्ती से गजनवी की उस तीरंदाज़ सेना पर ऐसा सीधा और जानलेवा धावा बोला की उन जिहादियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

मौत का ऐसा नंगा नाच हुआ की वैहिंद का वो मैदान जिहादियों की चीखों से गूंज उठा। इन गुक्खरों ने गजनवी के उन ‘एलीट गार्ड्स’ की लाइनें फाड़ कर रख दीं जिन्हें गजनवी अपना सबसे अजेय हथियार मानता था।

वो खूंखार हिंदू योद्धा सीधे उन जिहादियों के टेंट में घुस गए। जो भी तुर्क या मुगल सैनिक सामने आया, उसे बीच से चीर कर रख दिया गया।

किसी का सिर कटा, किसी का धड़ अलग हो गया! गुक्खरों के हाथों में मौत नाच रही थी।

मिनटों में कट कर गिर पड़ी 5000 जिहादी तुर्कों की लाशें, खौफ के मारे युद्ध छोड़कर भागने ही वाला था महमूद गजनवी

जब गुक्खरों ने गजनवी के कैंप में एंट्री मारी, तो वो उन जिहादियों के लिए साक्षात प्रलय था। ये कोई हमारी मनगढ़ंत कहानी नहीं है!

ये वो खौफनाक सच है जिसे खुद मुस्लिम इतिहासकार मोहम्मद कासिम फरिश्ता (Ferishta) ने रोते हुए अपनी किताबों में दर्ज़ किया है।

फरिश्ता ने साफ-साफ लिखा है की उन नंगे पैर वाले हिंदू गुक्खरों का कहर इतना भयानक था की महज़ कुछ ही मिनटों के अंदर, देखते ही देखते 5,000 से ज़्यादा खूंखार जिहादी तुर्कों को काट कर ज़मीन पर सुला दिया गया था।

गजनवी जिन ‘एलीट’ तुर्क और अफगान गार्ड्स पर घमंड करता था, जो सिर से लेकर पैर तक लोहे के कवच पहने हुए थे, उन भारी-भरकम जिहादियों को हमारे नंगे बदन वाले हिंदू शेरों ने बीच से फाड़ कर रख दिया था।

चारों तरफ सिर्फ जिहादियों की कटी हुई लाशें बिछी पड़ी थीं। किसी तुर्क का सिर धड़ से अलग पड़ा था, तो किसी का हाथ कट कर दूर जा गिरा था।

गुक्खरों की उन नंगी तलवारों और खंजरों ने गजनवी के पूरे कैंप को एक खौफनाक कसाईखाने में तब्दील कर दिया था। उस सर्द दिन में वैहिंद की वो पूरी ज़मीन उन विदेशी लुटेरों के गर्म खून से लाल हो चुकी थी।

और वो गजनवी? वो गजनवी जो खुद को अजेय बताता था, जो ‘बुतशिकन’ होने का घमंड करता था, उसकी हालत उस दिन एक डरे हुए चूहे जैसी हो गई थी।

जब उसने देखा की उसकी सबसे ताकतवर फौज मिनटों में साफ हो रही है और ये हिंदू योद्धा सीधा उसके टेंट की तरफ मौत बनकर बढ़ रहे हैं, तो वो खौफ के मारे कांपने लगा। उसे अपनी मौत साक्षात सामने नाचती हुई नज़र आने लगी।

इतिहास गवाही देता है की गजनवी इतना खौफज़दा हो चुका था की उसने तुरंत अपने कमांडरों को युद्ध रोकने और वहां से उल्टे पैर भागने का आदेश दे दिया था।

वो अपनी जान की भीख मांगते हुए उस मैदान-ए-जंग को छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान की तरफ दुम दबाकर भागने ही वाला था।

राजा आनंदपाल की वो भगवा सेना उस दिन जीत के बिल्कुल दरवाज़े पर खड़ी थी। जिहाद का नामोनिशान उस दिन भारत के उस बॉर्डर पर हमेशा-हमेशा के लिए मिटने ही वाला था।

एक झुलसते हाथी और दुर्भाग्य ने पलट दिया इतिहास का पन्ना, वरना उसी मैदान में गिद्ध नोच रहे होते गजनवी की लाश

लेकिन कहते हैं ना भाई, की कभी-कभी किस्मत भी गद्दारी कर जाती है। हम हिंदू कभी दुश्मनों की तलवारों से नहीं हारे, हमने जब भी मात खाई है, तो या तो अपनों के धोखे से खाई है या फिर उस खौफनाक दुर्भाग्य से जिसने ऐन मौके पर हमारे मुंह से जीत का निवाला छीन लिया।

वैहिंद के मैदान में जब हिंदू सेना गजनवी की उस जिहादी फौज का अंतिम संस्कार कर रही थी, जब जीत हमारी मुट्ठी में थी, ठीक उसी वक्त अचानक इतिहास का सबसे मनहूस और बुरा पल आ गया।

गजनवी की सेना, जो पीछे भाग रही थी, उन्होंने बौखलाहट में नेफ्था (Naphtha/Fireballs) के कुछ आग उगलते गोले और जलते हुए तीर हिंदू सेना की तरफ फेंके।

बदकिस्मती से एक आग का गोला और तीर सीधे महाराजा आनंदपाल के उस विशाल हाथी को जाकर लग गया जिस पर बैठकर वो युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे।

हाथी एक जानवर ही तो है! आग और उस भयंकर जलन से वो हाथी बुरी तरह झुलस गया और खौफ के मारे बेकाबू हो गया। वो डरा हुआ और चिंघाड़ता हुआ हाथी युद्ध के उस मोर्चे से पलट कर पीछे की तरफ भागने लगा।

जब लड़ रही हिंदू सेना और उन गुक्खरों ने देखा की महाराजा आनंदपाल का हाथी मैदान से पीछे की तरफ जा रहा है, तो उन्हें लगा की शायद राजा युद्ध हार कर पीछे हट रहे हैं या उन्हें कोई भारी चोट लग गई है।

उस वक्त ना तो मोबाइल फोन होते थे और ना ही रेडियो की राजा अपनी सेना को बता पाते की “अरे रुको! हाथी बेकाबू है, मैं भाग नहीं रहा।”

सेनापति को पीछे जाता देख उस जीती हुई हिंदू सेना में अचानक एक भयंकर भगदड़ मच गई। जो सेना अभी तक शेरों की तरह जिहादियों को फाड़ रही थी, वो बिना किसी लीडर के कनफ्यूज़ हो गई और उनका मनोबल टूट गया।

जो गजनवी अभी तक अपनी जान बचाकर भागने की तैयारी कर रहा था, उसने जब देखा की हिंदू सेना में भगदड़ मच गई है, तो उस लुटेरे को एक मौका मिल गया।

उसने अपनी बची हुई सेना को वापस पलटने का ऑर्डर दिया और उस बिखरी हुई हिंदू सेना पर पीछे से कायरों की तरह हमला कर दिया।

अगर उस दिन वो हाथी ना मुड़ता! अगर उस आग के गोले ने वो दुर्भाग्यपूर्ण खेल ना खेला होता! तो कसम भवानी की, उसी वैहिंद के मैदान में महमूद गजनवी की लाश पड़ी होती और उस जिहादी लुटेरे के मांस को भारत के गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे होते।

वैहिंद के उस दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध के बाद भी राजा आनंदपाल ने तुर्कों और जिहादियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके। वो पहाड़ों और जंगलों में चले गए, लेकिन उन्होंने मरते दम तक गजनवी की नाक में दम करके रखा।

उन्होंने बता दिया की एक सच्चा हिंदू शेर कभी किसी विदेशी आक्रांता की गुलामी स्वीकार नहीं कर सकता।

हर हर महादेव! जय भवानी!

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