दोस्तों इतिहास के पन्नों में एक ऐसा धधकता हुआ सच छुपा है जिसे सुनकर हर सच्चे हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।
1857 की अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति से पूरे सौ साल पहले ही, दक्षिण भारत की पवित्र माटी पर एक ऐसे हिंदू शेर ने जन्म ले लिया था, जिसने अंग्रेजों और उनके चाटुकार नवाबों की आंखों में आंखें डालकर बगावत का वो भयंकर शंखनाद किया था जिसकी गूंज से लंदन तक की ज़मीन हिल गई थी।
उस महान और अजेय योद्धा का नाम था- पुली थेवर (Puli Thevar)।
1 सितंबर 1715 को तमिलनाडु के तेनकासी क्षेत्र के ‘नेरकट्टमसेवल’ में इस पराक्रमी हिंदू शासक का जन्म हुआ था। ये वो दौर था जब पूरे देश में अंग्रेजों और जिहादी नवाबों का खौफ पसरा हुआ था।
बड़े-बड़े राजे-महाराजे अपनी गद्दी बचाने के लिए अंग्रेजों के आगे घुटने टेक रहे थे। लेकिन नेरकट्टमसेवल का ये शासक कोई मामूली इंसान नहीं था।
तमिल भाषा में ‘पुली’ का मतलब होता है- ‘बाघ’ (Tiger)। और ये उपाधि उन्हें कोई खैरात में नहीं मिली थी, बल्कि उनकी रगों में दौड़ने वाले उस शौर्य और अदम्य साहस के कारण मिली थी जिसने दुश्मनों की नींदें हराम कर रखी थीं।
पुली थेवर भगवान शिव के बहुत परम और अटूट भक्त थे। उनके माथे पर भस्म का तिलक और हाथों में भवानी तलवार हमेशा सज कर रहती थी।
जब बड़े-बड़े रजवाड़े अंग्रेजों के खौफ से कांप रहे थे, तब भारत माता के इस वीर सपूत ने अपनी मातृभूमि और सनातन धर्म की रक्षा के लिए अकेले ही अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ली थी।
अंग्रेज़ों और अर्काट के जिहादी नवाब का वो नापाक गठजोड़ जिसे नेरकट्टमसेवल के इस हिन्दू सम्राट ‘पुली थेवर’ ने जूतों तले कुचला
उस वक्त दक्षिण भारत में एक बहुत ही गंदा और गद्दारी भरा खेल चल रहा था। वहां अर्काट का एक क्रूर और जिहादी नवाब राज कर रहा था, जिसका नाम था मुहम्मद अली खान।
इस नवाब ने सत्ता के लालच में आकर अपनी ज़मीर बेच दी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेज़ों) के साथ एक नापाक गठजोड़ कर लिया।
नवाब ने बड़ी बेशर्मी से अंग्रेजों को ये अधिकार दे दिया की वे भारत के स्थानीय हिंदू राजाओं और ज़मींदारों से ज़बरदस्ती ‘लगान’ (टैक्स) वसूलें।
मतलब ज़रा इस मक्कारी को समझिए! ज़मीन हमारी, खून-पसीना हमारा, और टैक्स वसूलने वाले ये विदेशी लुटेरे?
मुहम्मद अली खान और अंग्रेजों को लगा की जैसे बाकी राजा उनके खौफ से डरकर चुपचाप टैक्स दे रहे हैं, वैसे ही पुली थेवर भी डर कर घुटने टेक देंगे।
इसी गलतफहमी में अंग्रेज़ जनरल अलेक्जेंडर हेरॉन (Alexander Heron) और नवाब की एक भारी-भरकम फौज टैक्स वसूलने के लिए नेरकट्टमसेवल की तरफ निकल पड़ी।
उन्हें लगा की वो अपनी तोपों की गड़गड़ाहट से उस हिंदू शासक को डरा देंगे। लेकिन जब अलेक्जेंडर हेरॉन ने पुली थेवर के दरबार में अपना फरमान भेजा, तो वहां से जो खौफनाक जवाब आया, उसने अंग्रेजों के पूरे अहंकार को चकनाचूर कर दिया।
पुली थेवर ने सीना तानकर उस अंग्रेज़ जनरल की आंखों में देखते हुए वो ऐतिहासिक दहाड़ लगाई की-
“ये मेरी मातृभूमि है! मैं भगवान महादेव के अलावा किसी भी अंग्रेज या उसके इस जिहादी नवाब को अपनी ज़मीन का एक दाना या एक फूटी कौड़ी भी टैक्स में नहीं दूंगा। अगर हिम्मत है तो आकर मेरी तलवार से अपना टैक्स वसूल लो!”
भाई ये कोई मामूली बात नहीं थी! उस दौर में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी बगावत की आवाज़ उठाना सीधे-सीधे मौत को दावत देना था।
लेकिन पुली थेवर की इस ललकार ने अंग्रेजों के उस गुरूर को पैरों तले रौंद दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी आगबबूला हो गई।
उन्हें समझ आ गया की अगर इस हिंदू शेर को आज नहीं कुचला गया, तो कल पूरा दक्षिण भारत अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर देगा। और यहीं से भारत की आज़ादी के उस पहले महासंग्राम की नींव रखी गई।
कलक्कड़ का ऐतिहासिक महासंग्राम जब पहली बार भारत के किसी योद्धा ने अंग्रेजों को उनकी औकात याद दिलाई
पुली थेवर की उस ललकार के बाद वो हुआ, जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। साल था 1755! अर्काट के नवाब और अंग्रेज़ जनरल अलेक्जेंडर हेरॉन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
उन्होंने एक बहुत विशाल फौज तैयार की, जिसमें भारी तोपखाने और बंदूकधारी सैनिक शामिल थे। वो कलक्कड़ (Kalakadu) के मैदान में आ डटे।
उन्हें पूरा यकीन था की उनकी आधुनिक तोपों के सामने पुली थेवर की तलवारें और भाले कुछ ही घंटों में हार मान लेंगे।
लेकिन उन अंग्रेजों को इस भारत की माटी की असली ताकत का अंदाज़ा ही नहीं था। पुली थेवर सिर्फ एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि एक बेहद चतुर और खूंखार रणनीतिकार भी थे।
उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई के बजाय ‘गुरिल्ला युद्धनीति’ का वो भयंकर तांडव शुरू किया की अंग्रेजों की फौज की पैंट गीली हो गई।
पुली थेवर ने मदुरै और त्रावणकोर के वीर योद्धाओं को अपने साथ मिलाया और जंगलों, पहाड़ियों और घाटियों के बीच छुपकर अंग्रेजों पर ऐसे खौफनाक हमले किए की अंग्रेज़ सेना को संभलने का मौका ही नहीं मिला।
जैसे ही अंग्रेज़ अपनी तोपें सेट करते, पुली थेवर के सैनिक चीते की फुर्ती से उन पर टूट पड़ते, उनके कमांडरों को बेरहमी से काट डालते और वापस जंगलों में गायब हो जाते।
रणभूमि का मंज़र इतना भयानक था की कलक्कड़ की माटी उन विदेशी लुटेरों के खून से लाल हो गई। नवाब के सैनिक अपनी जान की भीख मांगते हुए इधर-उधर भागने लगे।
अलेक्जेंडर हेरॉन, जो खुद को एक बहुत बड़ा अंग्रेज़ जनरल समझता था, वो अपनी जान बचाकर वहां से एक कायर की तरह भागा।
ये भारत के इतिहास का वो पहला और सबसे सुनहरा पन्ना था, जब अजेय मानी जाने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज को किसी हिंदू शासक ने पहली बार युद्ध के मैदान में कुत्तों की तरह खदेड़ कर हराया था!
कलक्कड़ के इस युद्ध ने अंग्रेजों का वो सारा घमंड तोड़ दिया। पुली थेवर ने पूरे देश को ये बता दिया की अगर सीने में मातृभूमि के लिए आग हो, तो विदेशी तोपें भी हमारी तलवारों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती हैं।
गद्दार यूसुफ खान का धोखा और मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते अपना राज-पाठ लुटाने वाले इस वीर का बलिदान
पुली थेवर इतने पर ही नहीं रुके। उन्हें पता था की अंग्रेज़ दोबारा लौटकर आएंगे और वो ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाएंगे। इसलिए उन्होंने एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया।
उन्होंने दक्षिण भारत के सभी हिंदू शासकों का एक ‘महागठबंधन’ बनाया ताकि इन अंग्रेजों को हमेशा के लिए समंदर में धकेल दिया जाए।
पुली थेवर ने तो यहाँ तक की मराठा साम्राज्य से भी संपर्क किया ताकि अंग्रेजों के खिलाफ एक राष्ट्रीय मोर्चा खड़ा किया जा सके।
लेकिन हमारे इस महान देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य क्या रहा है? गद्दारी! जब अंग्रेज़ सीधे युद्ध के मैदान में पुली थेवर से नहीं जीत पाए, तो उन्होंने अपनी सबसे नीच और गंदी चाल चली।
उन्होंने भारत के ही एक गद्दार को खरीदा। उसका नाम था यूसुफ खान। ये यूसुफ खान असल में पहले एक हिंदू था जिसका नाम ‘मरुदनायगम पिल्लई’ था, लेकिन बाद में इसने अपना धर्म बदल लिया और अंग्रेजों का सबसे बड़ा चाटुकार कुत्ता बन गया।
अंग्रेजों ने इस गद्दार यूसुफ खान को भारी तोपखाना और एक बहुत बड़ी फौज देकर पुली थेवर को कुचलने के लिए भेजा। साल 1761 में यूसुफ खान ने नेरकट्टमसेवल के किले को चारों तरफ से घेर लिया।
वहां जो युद्ध हुआ, वो किसी भी इंसान की रूह कंपाने के लिए काफी है। यूसुफ खान लगातार किले की दीवारों पर तोपें बरसा रहा था। दो महीने तक वो खौफनाक घेराव चला।
किले के अंदर खाने-पीने का सामान खत्म होने लगा था, पुली थेवर के सैनिक रोज़ शहीद हो रहे थे। लेकिन उस वीर हिंदू शेर ने सफेद झंडा नहीं फहराया। वो अपनी छाती ताने किले की प्राचीर पर खड़ा रहा। उसने हथियार डालने से साफ इंकार कर दिया।
जब अंग्रेज़ी तोपों ने किले की दीवारें तोड़ दीं, तो पुली थेवर और उनके मुट्ठी भर सैनिकों ने नंगे सीने उन बंदूकों का सामना किया।
अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए उस वीर ने अपना राज-पाठ, अपना किला और अपना सर्वस्व हंसते-हंसते लुटा दिया, लेकिन कभी अंग्रेजों और उस गद्दार नवाब के आगे अपना सिर नहीं झुकाया।
वो लड़ते हुए किले से बाहर निकल गए और जंगलों में जाकर फिर से अपनी फौज खड़ी करने लगे।
महादेव के मंदिर में ‘रहस्यमई’ तरीके से टूटी हथकड़ियां और शिव में समा गया ये अजेय हिंदू शेर
लेकिन 1767 आते-आते किस्मत ने एक और क्रूर मोड़ लिया। अंग्रेज़ कैप्टन कैंपबेल ने एक और साज़िश रची और धोखे से पुली थेवर को बंदी बना लिया।
अंग्रेजों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा की अब वो इस बगावती शेर को सरेआम फांसी पर लटकाकर पूरे दक्षिण भारत में अपना खौफ कायम कर देंगे।
अंग्रेज़ सैनिक पुली थेवर को हथकड़ियों और भारी ज़ंजीरों में जकड़ कर फांसी देने के लिए ले जा रहे थे। रास्ते में पुली थेवर ने उन अंग्रेज़ सैनिकों से अपनी एक आखिरी इच्छा जताई।
उन्होंने कहा की वो ‘शंकरनारायण स्वामी मंदिर’ में जाकर अपने आराध्य भगवान शिव की आखिरी बार पूजा करना चाहते हैं। अंग्रेजों को लगा की अब तो ये ज़ंजीरों में जकड़ा है, भाग कर कहां जाएगा। उन्होंने इजाज़त दे दी।
पुली थेवर मंदिर के गर्भगृह में गए। बाहर अंग्रेज़ सैनिक बंदूकों के साथ पहरा दे रहे थे। जब काफी देर हो गई और पुली थेवर बाहर नहीं आए, तो अंग्रेजों का माथा ठनका। वो दरवाज़ा तोड़कर गर्भगृह के अंदर घुसे।
लेकिन अंदर जाकर उन्होंने जो नज़ारा देखा, उसने उन विदेशी लुटेरों के होश उड़ा दिए!
अंदर कोई नहीं था। पुली थेवर वहां से रहस्यमयी तरीके से गायब हो चुके थे! ज़मीन पर सिर्फ उनकी वो भारी-भरकम टूटी हुई हथकड़ियां और ज़ंजीरें पड़ी थीं।
स्थानीय लोगों और हमारी सनातन आस्था के अनुसार, जब वो वीर उस गर्भगृह में गया, तो उसने अपने महादेव को पुकारा।
भगवान शिव ने अपने इस परम भक्त को दुश्मनों के हाथों मरने नहीं दिया। पुली थेवर एक दिव्य ज्योति में तब्दील हुए और साक्षात अपने इष्ट देव की मूर्ति में समा गए।
अंग्रेज़ पागल कुत्तों की तरह पूरे इलाके में उन्हें ढूंढते रहे, लेकिन वो कभी भी उस हिंदू शेर को फांसी के फंदे तक नहीं ले जा पाए।
हर हर महादेव! भारत माता की जय!
