'विश्वगुरु' बनने का खोखला ढोंग और शिक्षा का सरेआम 'कत्ल', पिछले एक साल में 4791 सरकारी स्कूलों पर ताला, बिना छात्रों के लाखों की सैलरी डकार रहे मास्टर, सिस्टम के 'महा-घोटाले' पर कब चलेगा हंटर

‘विश्वगुरु’ बनने का खोखला ढोंग और शिक्षा का सरेआम ‘कत्ल’, पिछले एक साल में 4791 सरकारी स्कूलों पर ताला, बिना छात्रों के लाखों की सैलरी डकार रहे मास्टर, सिस्टम के ‘महा-घोटाले’ पर कब चलेगा हंटर

आजकल हमारे ‘राष्ट्रवादी’ नेताओं से बड़े भारी-भारी शब्द सुनने को मिलते हैं। कोई ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा ठोक रहा है, कोई ‘अमृतकाल’ का झुनझुना बजा रहा है, तो कोई डिजिटल इंडिया और नई शिक्षा नीति (NEP) के नाम पर अपनी पीठ थपथपा रहा है।

भाषण-वाषण सुनकर ऐसा लगता है जैसे हमारे देश के सरकारी स्कूलों में बच्चे आईपैड (iPad) लेकर पढ़ रहे हैं और रातों-रात कोई बहुत बड़ा चमत्कार हो गया है।

पर भाई, सच कहूं तो ग्राउंड की हकीकत इतनी डरावनी और खौफनाक है की अगर आप असलियत जान लेंगे, तो इन सफेदपोश नेताओं और अफसरों से आपका भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा।

ज़रा सोचिए, एक तरफ तो हम चांद और सूरज पर पहुंचने की बातें कर रहे हैं, और दूसरी तरफ इसी देश में हर रोज़ औसतन 13 सरकारी स्कूलों के दरवाज़ों पर ताला जड़ा जा रहा है!

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना। जिस वक्त देश में नए स्कूल खुलने चाहिए थे, नई बिल्डिंग-विल्डिंग बननी चाहिए थी, उस वक्त हमारी सरकारें और ये भ्रष्ट सिस्टम मिलकर स्कूलों की सरेआम हत्या कर रहे हैं।

ये कोई नॉर्मल बात नहीं है। किसी स्कूल का बंद होना किसी बैंक में चोरी होने से लाख गुना ज्यादा खतरनाक है।

बैंक से तो सिर्फ पैसा लुटता है, लेकिन जब गांव का एक सरकारी स्कूल बंद होता है, तो वहां के सैकड़ों गरीब, मज़दूर, दलित और आदिवासी बच्चों का पूरा का पूरा भविष्य लुट जाता है।

बड़े अफसरों और नेताओं के बच्चे तो AC कमरों वाले महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, तो इन्हें क्या फर्क पड़ता है की किसी गांव के टूटे-फूटे स्कूल पर ताला लग गया?

असल में ये कोई प्रशासनिक मजबूरी नहीं है; ये इस देश के गरीब बच्चों के हाथों से किताबें छीनने और उन्हें हमेशा के लिए अनपढ़, गुलाम और मज़दूर बनाए रखने की एक बहुत ही शर्मनाक राजनीति है।

‘UDISE रिपोर्ट’ का वो काला सच जिसने सरकार के ‘शिक्षा मॉडल’ की उखेड़ दी बखिया, एक साल में 4,791 सरकारी स्कूल बंद

अगर आपको लग रहा है की मैं हवा में तीर मार रहा हूँ, तो ज़रा शिक्षा मंत्रालय की अपनी ही ताज़ा रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए।

अभी हाल ही में UDISE+ 2025-26 (यू-डाइस प्लस) की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसके आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं की शिक्षा के नाम पर कितना बड़ा गदर मचा हुआ है।

इस सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ पिछले एक साल के अंदर पूरे देश में 4,791 सरकारी स्कूल हमेशा के लिए दफन कर दिए गए।

2024-25 में देश में कुल 14,71,473 स्कूल थे, जो अब घटकर 14,66,682 ही रह गए हैं। मतलब महज़ 365 दिन के अंदर 4700 से ज्यादा स्कूलों का नामोनिशान मिटा दिया गया।

अब ज़रा राज्यों का हाल सुनिए। ऐसा नहीं है की ये बीमारी किसी एक जगह की है। तेलंगाना में 1,392 स्कूलों पर ताला ठोक दिया गया, पश्चिम बंगाल में 568 स्कूलों को बलि चढ़ा दिया गया, आंध्र प्रदेश में 474 और तमिलनाडु में 369 स्कूलों का राम-नाम सत्य कर दिया गया।

ये आंकड़े देखकर दिमाग सुन्न पड़ जाता है भाई। बजट के टाइम पर तो शिक्षा के नाम पर हज़ारों करोड़ों रुपये का ढिंढोरा पीटा जाता है।

कागज़-वागज़ पर दिखाया जाता है की शिक्षा पर इतना पैसा खर्च हो रहा है। पर वो पैसा जा कहां रहा है?

अगर पैसा खर्च हो रहा है तो स्कूलों की छतें क्यों टपक रही हैं? बच्चों को पीने का पानी और वॉशरूम तक नसीब क्यों नहीं हो रहा?

असलियत ये है की वो सारा पैसा सिस्टम में बैठे दीमक चाट रहे हैं, और जब स्कूल जर्जर होकर गिरने लगता है, तो बेशर्म अफसरशाही उसे ठीक कराने के बजाय सीधे उस पर ताला जड़ देती है।

मध्य प्रदेश बन गया शिक्षा का कब्रिस्तान, जहाँ आधी से ज्यादा स्कूलों की सरेआम कर दी गई हत्या

लेकिन भाई, पूरे देश में अगर शिक्षा का कहीं सबसे भयानक कत्लेआम हुआ है, तो वो है मध्य प्रदेश! मध्य प्रदेश तो अब सही मायनों में सरकारी शिक्षा का कब्रिस्तान बन चुका है।

UDISE की रिपोर्ट का सबसे डरावना हिस्सा यही है। पूरे देश में जो 4,791 स्कूल बंद हुए हैं ना, उनमें से आधे से ज्यादा यानी 2,426 स्कूल अकेले मध्य प्रदेश में बंद हुए हैं। मतलब पूरे भारत में हर दूसरा बंद होने वाला स्कूल एमपी का है।

मध्य प्रदेश की सरकार मंचों से चीख-चीख कर ‘सीएम राइज’ (CM Rise) स्कूलों का सपना बेचती है। ढोल पीटा जाता है की हम ऐसे स्कूल बनाएंगे जो प्राइवेट स्कूलों को टक्कर देंगे।

पर ज़मीनी हकीकत क्या है? एक ‘सीएम राइज’ स्कूल बनाने का झूठा लॉलीपॉप देकर, उसके आस-पास के 10-15 चालू सरकारी स्कूलों का गला घोंट दिया गया।

ये तो वही बात हुई कि किसी गरीब को फाइव-स्टार होटल में खाना खिलाने का सपना दिखाओ और उसके घर की सूखी रोटी भी छीन लो!

ज़रा जाकर देखिए झाबुआ, अलीराजपुर और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल इलाकों का क्या हाल कर दिया है इस सिस्टम ने।

इन इलाकों में जब एक सरकारी स्कूल बंद होता है, तो वहां का आदिवासी बच्चा किसी दूसरे स्कूल में एडमिशन नहीं लेता, बल्कि वो सीधा मजदूरी करने निकल जाता है।

इन बच्चों के हाथों से कलम और स्लेट छीनकर इस भ्रष्ट सिस्टम ने उन्हें फावड़ा और तगारी थमा दी है। और मजे की बात देखिए, एमपी में नेता विपक्ष और कुछ नेताओं ने बवाल तो काटा है, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

‘विलय’ के नाम पर शिक्षा का सरेआम चीरहरण, और गरीब बच्चों को अनपढ़ रखने की शर्मनाक राजनीति

अब जब इन शिक्षा विभाग के बड़े-बड़े बाबू लोगों और अफसरों से पूछा जाता है की भाई तुमने इतने स्कूल क्यों बंद कर दिए, तो जानते हैं ये क्या बहाना बनाते हैं? ये भारी-भरकम अंग्रेजी का शब्द फेंकते हैं- “मर्जर” (Merger) यानी विलय!

अधिकारी बड़ी बेशर्मी से कहते हैं की हमने स्कूल ‘बंद’ थोड़ी किए हैं, हमने तो बस कम बच्चों वाले छोटे स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिला दिया है ताकि टीचरों और संसाधनों का सही इस्तेमाल हो सके।

सुनने में बड़ा अच्छा लगता है ना? पर ज़रा ज़मीन पर उतरकर इस ‘विलय’ वाले नाटक का खौफनाक सच देखिए।

मान लीजिए एक गांव में स्कूल था, जहाँ मोहल्ले की 50 बच्चियां पढ़ने जाती थीं। अब सरकार ने कहा की इस स्कूल का ‘मर्जर’ कर दिया गया है और अब से इन बच्चियों को 5 किलोमीटर दूर वाले पंचायत के बड़े स्कूल में जाना होगा।

अब आप खुद छाती पर हाथ रखकर बताइए, क्या गांव-देहात का कोई भी गरीब और मज़दूर बाप अपनी 10-12 साल की बच्ची को रोज़ 5 किलोमीटर दूर पैदल किसी सुनसान रास्ते, हाइवे या नदी-नाले पार करके स्कूल जाने देगा? बिल्कुल नहीं!

नतीजा क्या होता है? बच्ची की पढ़ाई वहीं के वहीं छूट जाती है। वो घर के चूल्हे-चौके में लग जाती है। सिस्टम के इन सूट-बूट वाले अफसरों को एसी कमरों में बैठकर ‘मर्जर-मर्जर’ खेलने में बड़ा मज़ा आता है, लेकिन असलियत में ये मर्जर नहीं है; ये गांव की गरीब बच्चियों को स्कूल से बाहर फेंकने का सीधा और क्रूर फरमान है।

ड्रॉपआउट का जो भयंकर रेट इस विलय की वजह से बढ़ा है, उसे सरकार और ये बाबू लोग आंकड़ों की बाजीगरी में बड़ी सफाई से छुपा जाते हैं। उन्हें बस अपने फाइलों के टारगेट पूरे करने हैं।

उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई गरीब बच्चा अनपढ़ रह गया या किसी बच्ची की पढ़ाई छूट गई। ये पूरा का पूरा सिस्टम अब गरीबों का खून चूसने वाली मशीन बन चुका है!

बिना बच्चों के खाली स्कूलों में मुफ्त की मलाई खा रहे 20 हजार टीचर, और बेशर्म सिस्टम का ‘महा घोटाला’

अब ज़रा इस UDISE रिपोर्ट के उस सबसे दिमाग घुमा देने वाले आंकड़े पर आते हैं जिसे देखकर किसी भी ईमानदार टैक्सपेयर का खून खौल उठेगा।

एक तरफ तो सरकार के पास गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए मास्टर नहीं हैं, टाट-पट्टी नहीं है, और दूसरी तरफ सिस्टम का एक ऐसा महा-घोटाला चल रहा है जिसकी कोई हद ही नहीं है।

रिपोर्ट चीख-चीख कर बता रही है की पूरे देश में 5,663 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहाँ आज की तारीख में एक भी बच्चा पढ़ने नहीं आता। एनरोलमेंट (Enrollment) एकदम ज़ीरो है!

अब आप सोचेंगे की जब स्कूल में कोई बच्चा ही नहीं है, तो वो स्कूल बंद हो गया होगा। पर नहीं भाई, असली खेल तो यहीं से शुरू होता है।

इन 5,663 खाली और ‘भूतिया’ स्कूलों में 20,667 सरकारी मास्टर बाकायदा तैनात हैं! ज़रा इस बात की गंभीरता को समझिए।

बीस हज़ार से ज्यादा ऐसे सरकारी मास्टर हैं जो पूरे साल किसी भी क्लास में नहीं जाते, जिन्होंने पूरे साल चॉक का एक टुकड़ा तक नहीं उठाया, लेकिन हर महीने की पहली तारीख को उनके खाते में 50 हज़ार से लेकर 80 हज़ार रुपये तक की मोटी पगार खटाक से गिर जाती है।

ये लोग रोज़ सुबह स्कूल जाते हैं, रजिस्टर में अपने साइन ठोकते हैं, धूप सेंकते हैं, मोबाइल पर व्हाट्सएप चलाते हैं, स्वेटर बुनते हैं, गप्पें मारते हैं और शाम को घर वापस आ जाते हैं।

ये हराम की मलाई आखिर किसके पैसों से बंट रही है? ये आपके और हमारे खून-पसीने के टैक्स का पैसा है जिसे ये मुफ्तखोर डकार रहे हैं!

और आपको क्या लगता है, शिक्षा विभाग के बड़े-बड़े बाबू लोगों और डीईओ (DEO) को इस बात की भनक नहीं है? सब पता है इन हरामखोरों को!

ये कोई छोटी-मोटी चूक नहीं है, ये नीचे से लेकर ऊपर तक सेट की गई पूरी की पूरी एक ‘बंदरबांट’ है। इन मास्टरों की सैलरी पास करने के एवज़ में बाबू लोग अपना मोटा कमीशन काटते हैं।

कागज़ों पर फर्जी अटेंडेंस और फर्जी रिपोर्टें बनाकर सरकार की आंखों में धूल झोंकी जा रही है। एक तरफ हमारे देश का गरीब बच्चा बिना मास्टर के अनपढ़ रह जा रहा है, और दूसरी तरफ ये 20 हज़ार टीचर बिना पढ़ाए सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

अगर ये घोटाला नहीं है, तो फिर इसे क्या कहेंगे?

प्राइवेट स्कूल माफियाओं की जेब भरने के लिए सरकारी शिक्षा को नीलाम कर रहे भ्रष्ट हुक्मरान

अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की आखिर सरकारें अपने ही स्कूलों को इतनी बेरहमी से खत्म क्यों कर रही हैं? आखिर सरकारी शिक्षा का इस कदर गला घोंटने के पीछे साज़िश क्या है?

इसका सीधा सा और कड़वा सच ये है की हमारे देश का पूरा का पूरा शिक्षा तंत्र अब प्राइवेट स्कूल माफियाओं की मुट्ठी में कैद हो चुका है। ये स्कूल बंद होना कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि एक बहुत ही सोची-समझी ‘क्रोनोलॉजी’ है।

सरकारी सिस्टम जानबूझकर अपने स्कूलों का बेड़ा गर्क करता है। वहां मास्टर नहीं भेजे जाते, पीने का पानी बंद कर दिया जाता है, छतें टूटने दी जाती हैं।

जब हालात बद से बदतर हो जाते हैं, तो गांव का गरीब से गरीब आदमी भी तंग आकर अपने बच्चे को सरकारी स्कूल से निकाल लेता है।

और जैसे ही गांव का सरकारी स्कूल बंद होता है, अगले ही दिन वहां किसी प्राइवेट स्कूल की पीली बस हॉर्न मारती हुई पहुंच जाती है।

ये प्राइवेट स्कूल कोई शिक्षा के मंदिर नहीं हैं भाई, ये गरीबों का खून चूसने वाली जोंक हैं। ज़रा पता करवा लीजिए, आपके शहर या जिले के जितने भी बड़े-बड़े और महंगे प्राइवेट स्कूल हैं, उनके असली मालिक कौन हैं? उनमें से आधे से ज्यादा स्कूल तो इन्हीं सफेदपोश नेताओं, मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों के हैं।

अब खेल समझ आया आपको? अपनी खुद की प्राइवेट दुकानों को चमकाने के लिए, अपनी जेबों में करोड़ों का डोनेशन भरने के लिए, ये हुक्मरान जानबूझकर सरकारी स्कूलों को नीलाम कर रहे हैं।

आज हालत ये हो गई है की एक दिहाड़ी मज़दूर या छोटा किसान अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए साहूकारों से कर्ज़ लेने पर मजबूर है।

प्राइवेट स्कूलों में हर साल किताबें बदल दी जाती हैं, जूते और मोज़े भी किसी तय की गई दुकान से खरीदने का फरमान सुनाया जाता है। लूट का एक ऐसा नंगा नाच चल रहा है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है।

सिस्टम पूरी तरह से बिक चुका है। जिन नेताओं को हमने वोट देकर इसलिए कुर्सी पर बिठाया था की वो हमारे बच्चों के लिए स्कूल बनवाएंगे, वो नेता आज प्राइवेट माफियाओं के साथ बैठकर कमीशन की शराब पी रहे हैं।

शिक्षा मंत्री और सोए हुए सिस्टम पर अब चलना चाहिए हंटर वरना एक पूरी पीढ़ी हो जाएगी बर्बाद

शिक्षा, जो हर गरीब बच्चे का पैदाइशी और संवैधानिक हक था, उसे आज एक ऐसा धंधा बना दिया गया है जहाँ बिना पैसे के गरीब का बच्चा सिर्फ और सिर्फ अंगूठा छाप बनने के लिए पैदा हो रहा है।

लेकिन सरकार में बैठे मंत्रियों और शिक्षा विभाग के मगरमच्छों को अब ये साफ-साफ समझ लेना चाहिए की जनता अब बेवकूफ नहीं है।

वो जो 20 हज़ार टीचर बिना पढ़ाए फ्री की पगार तोड़ रहे हैं, उन पर तुरंत बर्खास्तगी की गाज गिरनी चाहिए।

उन्हें नौकरी से निकालकर उनके घरों की कुर्की होनी चाहिए ताकि जनता का लूटा हुआ पैसा वापस सरकारी खजाने में आ सके।

और वो जो भ्रष्ट डीईओ और अफसर स्कूलों पर ताला जड़ने के फरमान जारी कर रहे हैं, उन्हें कॉलर पकड़कर जेल की सलाखों के पीछे डालना चाहिए।

जिस दिन ये पब्लिक भड़केगी ना, उस दिन ये सिस्टम, ये भ्रष्ट बाबू और ये झूठे वादे करने वाले नेता अपनी कुर्सियां छोड़कर भागते नज़र आएंगे।

शिक्षा कोई खैरात नहीं है जो ये नेता हमें एहसान करके दे रहे हैं, ये हमारा हक है। और अगर सीधेपन से हमें हमारा हक नहीं मिला, तो फिर इस सड़े हुए सिस्टम की पीठ पर जनता का हंटर चलना तय है!

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