हम भारत के लोग बहुत बड़ी गलतफहमी में जीते हैं। हम सोचते हैं की दुनिया में जो भी विज्ञान है, जो भी मशीनें हैं, वो सब उन ‘पश्चिम के गोरों’ की देन हैं।
ये दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे गंदा सफेद झूठ है! 11वीं सदी का वो दौर याद कीजिए। जब यूरोप के वो तथाकथित ‘गोरे’ लोग घने अंधेरे में जी रहे थे।
जब उन्हें ढंग से नहाना-धोना तक नहीं आता था, जब वो जंगलों में जानवरों की खाल और पत्ते लपेट कर घूमते थे और छोटी-छोटी बीमारियों से कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे थे!
ठीक उसी वक्त भारत के मालवा की धरती पर एक ऐसा महान हिंदू सम्राट राज कर रहा था, जो अपने महलों में बैठकर भविष्य की मशीनें और उड़ने वाले विमानों का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर रहा था!
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ परमार वंश के उस अजेय हिंदू शेर की, जिनका नाम था- महाराजा भोज (1010-1055 ई.)।
राजा भोज वो हिंदू सम्राट थे जिनके एक हाथ में दुश्मनों का सिर काटने वाली भवानी तलवार थी, तो दूसरे हाथ में विज्ञान और इंजीनियरिंग का ऐसा खौफनाक ज्ञान था जो आज के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों के पसीने छुड़ा दे।
आज जब नासा (NASA) और दुनिया भर के वैज्ञानिक रोबोटिक्स और एयरोनॉटिक्स (Aviation) की बातें करते हैं, तो उन्हें शायद पता नहीं है की उनके इस विज्ञान का बाप आज से एक हज़ार साल पहले ही भारत की माटी में पैदा हो चुका था।
‘समरांगण सूत्रधार’ का विज्ञान, जब गोरों को लोहा पिघलाना नहीं आता था तब राजा भोज ने लिख दिया था रोबोटिक्स, यंत्रो का ज्ञान
ज़रा राजा भोज के लिखे हुए उस महान संस्कृत ग्रंथ के पन्ने खोलकर देख लीजिएगा, जिसका नाम है- ‘समरांगण सूत्रधार’ (Samarangana Sutradhara)।
जब अंग्रेज़ भारत आए, तो उन्होंने बड़ी चालाकी से हमारे ग्रंथों को सिर्फ ‘माइथोलॉजी’ यानी काल्पनिक कहानियां बताकर दुनिया के सामने पेश किया।
लेकिन ‘समरांगण सूत्रधार’ कोई कहानी की किताब नहीं है मेरे भाई। ये पूरे 83 अध्यायों का एक इंजीनियरिंग मैनुअल (Engineering Manual) है। इसमें वास्तुकला, शहर बसाने के तरीके, और मशीनों को बनाने का ऐसा सटीक और ज़बरदस्त गणित लिखा है की आज के इंजीनियर इसे देखकर सिर पकड़ लेते हैं।
ज़रा इस महान ग्रंथ के 31वें अध्याय को उठाकर पढ़िए। इस अध्याय का नाम ही है- ‘यंत्र विधान’ (Yantra Vidhanam)।
यंत्र यानी मशीन! आज के ये गोरे हमें मशीन की परिभाषा सिखाते हैं ना? राजा भोज ने आज से एक हज़ार साल पहले संस्कृत के श्लोकों में मशीन की वो परिभाषा लिख दी थी जो सीधे-सीधे फिजिक्स के सबसे बड़े नियमों को चुनौती देती है।
राजा भोज ने श्लोक में लिखा है की यंत्र वो है जो पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की ऊर्जा को कंट्रोल करके इंसानी काम को आसान बना दे।
अरे भाई, ये कोई साधारण बात नहीं है! राजा भोज ने अपनी इस किताब में बाकायदा गियर, पुली, पहियों और पेंडुलम का ऐसा सटीक गणित और नाप-तौल लिख दिया था, जिसे समझने में यूरोप वालों को सदियां लग गईं।
उन्होंने लिखा है की एक मशीन को बनाने के लिए लकड़ी, तांबा, लोहा, और सीसा (Lead) जैसी धातुओं का कैसे और किस अनुपात में इस्तेमाल करना चाहिए।
ये जो ‘इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन’ का ढोल यूरोप वाले पीटते हैं ना, उस रेवोल्यूशन के सारे पुर्ज़े असल में भारत के इसी सनातन विज्ञान से चुराए गए थे।
जब राजा भोज ये सब श्लोकों में लिख रहे थे, तब यूरोप वालों को धातुओं को ठीक से पिघलाना तक नहीं आता था!
‘Da vInci’ से सदियों पहले राजा भोज के दरबार में नाचते थे ‘ऑटोमैटिक रोबोट’ और पहरा देते थे मशीनी सैनिक
आज अगर आप किसी भी स्कूल के बच्चे से पूछेंगे की दुनिया का पहला रोबोट किसने डिज़ाईन किया था, तो वो रटा-रटाया जवाब देगा- 15वीं सदी में इटली के लियोनार्डो दा विंची (Leonardo da Vinci) ने।
ये पश्चिमी दुनिया का वो फ्रॉड है जिसे उन्होंने पूरी दुनिया के दिमाग में जबरन ठूंस दिया है।
अरे, दा विंची के दादा-परदादा पैदा भी नहीं हुए थे, जब हमारे महान हिंदू सम्राट राजा भोज के महलों में बाकायदा लकड़ी और धातुओं से बने हुए ऑटोमैटिक रोबोट्स चलते-फिरते थे!
ज़रा ‘समरांगण सूत्रधार’ के उस विज्ञान को पढ़िए जहाँ राजा भोज ने इन मशीनी मानवों का ज़िक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में ‘द्वारपाल यंत्र’ (दरवाज़े पर पहरा देने वाले रोबोट) बनाने की पूरी विधि लिखी है।
राजा भोज के महलों के बाहर लकड़ी और लोहे से बने ऐसे विशाल मशीनी सैनिक खड़े होते थे, जिनके हाथों में असली तलवारें और भाले होते थे।
जैसे ही कोई अजनबी या दुश्मन दरवाज़े के पास आता था, तो अंदर फिट किए गए एक खास मैकेनिज़्म की वजह से वो रोबोट अपनी तलवार हवा में घुमाने लगते थे और अपनी आंखें लाल कर लेते थे।
ज़रा सोचिए इस लेवल की इंजीनियरिंग को! आज से हज़ार साल पहले मोशन सेंसर (Motion Sensor) जैसी टेक्नोलॉजी को हमारे हिंदू राजा ने बिना बिजली के, सिर्फ हवा और पानी के दबाव से हासिल कर लिया था।
और बात सिर्फ पहरेदारों तक सीमित नहीं थी भाई। राजा भोज ने ऐसे ‘मनोरंजन वाले रोबोट्स’ भी बना लिए थे जिन्हें देखकर आज के साइंसदानों का दिमाग चकरा जाए।
उनके दरबार में लकड़ी के बनाए हुए ऐसे कृत्रिम पक्षी होते थे जो संगीत की ताल पर हुबहू असली पक्षियों की तरह नाचते थे और आवाज़ें निकालते थे।
किताब में ऐसी ‘मशीनी पुतलियों’ (Female Robots) का ज़िक्र है जो राजा के सिर्फ एक इशारे पर पानी के फव्वारे चला देती थीं, और महलों के दीयों में अपने आप जाकर तेल भर देती थीं।
ये सब हवा में नहीं हो रहा था। राजा भोज ने इसके पीछे का पूरा विज्ञान बताया है। इन रोबोट्स को चलाने के लिए वो लोग हाइड्रोलिक्स यानी पानी का दबाव, और न्यूमैटिक्स यानी हवा के दबाव का इस्तेमाल करते थे।
इसके साथ-साथ इन मशीनों के अंदर पारे (Mercury) को एक बहुत ही खास तरीके से ट्यूब्स में भरा जाता था ताकि मशीन का बैलेंस बना रहे और वो खुद-ब-खुद (ऑटोमैटिक तरीके से) मूवमेंट कर सके।
ज़रा एक मिनट के लिए सोचिए उस नज़ारे को। जब एक विदेशी यात्री भारत आता होगा और राजा भोज के दरबार में बिना किसी इंसान के मशीनों को चलते-फिरते, नाचते और पहरा देते देखता होगा, तो वो तो हैरान ही रह जाता होगा!
ये हमारे सनातन धर्म का वो अजेय और गौरवशाली इतिहास है जिसे अंग्रेज़ों ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत ज़मीन में गाड़ दिया।
वो नहीं चाहते थे की इस देश का हिंदू कभी अपने विज्ञान और अपनी ताकत को पहचान सके।
‘राइट ब्रदर्स’ का सफेद झूठ, 900 साल पहले ही ‘पारे’ की खौलती ऊर्जा से आसमान में उड़ते थे राजा भोज के ‘विमान’
जब भी आसमान में उड़ते हुए हवाई जहाज़ (Aeroplane) की बात आती है, तो ये गोरे अंग्रेज़ कहते हैं की “हवाई जहाज़ का आविष्कार 1903 में अमेरिका के राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने किया था।”
पूरी दुनिया को यही रटा दिया गया की राइट ब्रदर्स ही एविएशन के असली बाप हैं।
भाई! राइट ब्रदर्स ने जो एक खटारा सा लकड़ी का ढांचा कुछ सेकंड के लिए हवा में उछाला था, उससे पूरे 900 साल पहले हमारे हिंदू सम्राट राजा भोज ने बाकायदा उड़ने वाले विमानों का ऐसा विज्ञान लिख दिया था की आज के जेट इंजन बनाने वाले वैज्ञानिक भी उसे पढ़कर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।
अगर किसी काले अंग्रेज़ को इस सनातन सत्य पर शक हो, तो उसे ‘समरांगण सूत्रधार’ के श्लोक नंबर 95 से लेकर 100 तक पढ़ने को कह देना।
इन श्लोकों में राजा भोज ने ‘दारु विमान’ (लकड़ी के विमान) बनाने की पूरी साइंटिफिक प्रक्रिया लिख दी है। राजा भोज बताते हैं की आसमान में उड़ने वाला विमान एक विशाल पक्षी के आकार का होना चाहिए।
इसे बनाने के लिए एक ऐसी विशेष लकड़ी का इस्तेमाल होना चाहिए जो बहुत हल्की हो, लेकिन लोहे जैसी मज़बूत हो ताकि वो हवा के भारी दबाव को झेल सके।
विमान के पंख बिल्कुल किसी असली पक्षी की तरह दोनों तरफ मजबूती से जोड़े जाने चाहिए।
लेकिन सबसे हैरान कर देने वाला विज्ञान तो उस विमान के ‘इंजन’ का था! आज के गोरे हमें जेट इंजन और टर्बाइन का ज्ञान देते हैं ना? राजा भोज ने आज से एक हज़ार साल पहले ‘मरकरी वोर्टेक्स इंजन’ यानी ‘पारे के इंजन’ का आविष्कार कर लिया था।
श्लोक में साफ़ लिखा है की उस लकड़ी के विमान के पेट (निचले हिस्से) में Mercury से भरा हुआ एक मजबूत लोहे का यंत्र रखा जाना चाहिए।
विमान उड़ता कैसे था? उस पारे के यंत्र के ठीक नीचे तांबे का एक बर्तन रखकर उसमें भयंकर आग जलाई जाती थी।
जैसे ही आग की गर्मी से वो Mercury खौलता था, तो उसके अंदर से एक भयानक ऊर्जा (Thrust) पैदा होती थी।
राजा भोज लिखते हैं की पारे की उस खौलती हुई भयानक ऊर्जा और हवा के ज़बरदस्त दबाव से उस लकड़ी के विमान के पंख फड़फड़ाने लगते थे और वो मशीन आसमान का सीना चीरते हुए मीलों दूर तक उड़ान भरती थी!
जो Mercury आज के आधुनिक विज्ञान में सबसे जटिल और रहस्यमयी धातु मानी जाती है, उस पारे को ईंधन (Fuel) की तरह इस्तेमाल करके 11वीं सदी में भारत के आकाश में विमान उड़ाए जा रहे थे।
और ये गोरे हमें बताते हैं की हम सपेरे थे? असल में ये वो चोर हैं जिन्होंने हमारे ही संस्कृत के ग्रंथों को चुराया, उन्हें अपनी लैब में ले जाकर पढ़ा और फिर उसी विज्ञान पर अपना अंग्रेज़ी ठप्पा लगाकर खुद को दुनिया का सबसे बड़ा आविष्कारक घोषित कर दिया।
गोरों को राजा भोज का तमाचा, विज्ञान को लालची पश्चिम से बचाने के लिए खुद दफन कर दिया था विमानों का फॉर्मूला
अब इस जगह पर आकर कोई भी मैकाले का गुलाम या पश्चिमी सोच वाला आदमी एक बहुत ही सड़ा हुआ सवाल पूछता है।
वो कहते हैं की “अगर राजा भोज ने इतने भयंकर रोबोट और उड़ने वाले विमान बना लिए थे, तो फिर उन विमानों को बनाने का पूरा फॉर्मूला और नाप-तौल आज हमारे पास क्यों नहीं है? राजा भोज ने उसे लिखा क्यों नहीं?”
अरे मूर्खों! हमारे हिंदू सम्राट कोई तुम्हारी तरह लालची व्यापारी नहीं थे। वो एक सच्चे सनातनी थे, जिन्हें पता था की धर्म और मानवता की रक्षा कैसे की जाती है। राजा भोज ने ‘समरांगण सूत्रधार’ में खुद इस बात का जवाब दिया है। उन्होंने अपने श्लोक में स्पष्ट रूप से लिखा है-
“यंत्राणां घटना नोक्ता गुप्त्यर्थं नाज्ञतावशात्”
(यानी, “मैंने इन यंत्रों और विमानों को बनाने की पूरी और सटीक विधि इसलिए नहीं बताई क्योंकि मुझे इसका ज्ञान नहीं है, बल्कि इसलिए इसे गुप्त रखा है ताकि ये किसी गलत हाथ में न पड़ जाए।”)
ज़रा इस सनातन सोच की गहराई में उतर कर देखिए। राजा भोज अपने ज़माने के सबसे बड़े विज़नरी थे।
वो जानते थे की ये उड़ने वाले विमान और ये खौफनाक रोबोटिक मशीनें ऐसी ताकत हैं, जो अगर किसी दुष्ट, लालची और विदेशी आक्रांता के हाथ लग गईं, तो वो इस विज्ञान का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ निर्दोष लोगों को काटने, उनके राज्य हड़पने और पूरी मानवता को तबाह करने के लिए करेगा।
राजा भोज ने विज्ञान को विनाश का हथियार नहीं बनने दिया।
