जिस आधुनिक आतंकवाद के जनक 'यासिर अराफात' के खौफ से कांपती थी दुनिया, उसे 'बड़ी बहन' बनकर पालती थीं 'इंदिरा गांधी', खून से रंगे हाथों को गाँधी परिवार ने बांटे देश के 'शांति पुरस्कार'

जिस आधुनिक आतंकवाद के जनक ‘यासिर अराफात’ के खौफ से कांपती थी दुनिया, उसे ‘बड़ी बहन’ बनकर पालती थीं ‘इंदिरा गांधी’, खून से रंगे हाथों को गाँधी परिवार ने बांटे देश के ‘शांति पुरस्कार’

सच कहूं तो इस देश के इतिहास की जब भी कोई पुरानी और दबी हुई फाइल खुलती है, तो अंदर से सिर्फ और सिर्फ गद्दारी की बदबू आती है।

बचपन से लेकर आज तक हमारे दिमाग में क्या ठूंसा गया? हमें यही रटाया गया ना की गाँधी और कांग्रेस परिवार तो चरखा चलाने वालों का परिवार है।

ये तो ‘शांति’ और ‘अहिंसा’ के पुजारी हैं। इन्होंने तो दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाया है। लेकिन आज उस सफेद खादी के नकाब को नोचकर फेंकने का वक्त आ गया है।

आज देश के हर सनातनी को ये जानना ही पड़ेगा की जो कांग्रेसी नेता दुनिया के सामने कबूतर उड़ाकर शांति का नाटक कर रहे थे, असल में वो बंद कमरों में दुनिया के सबसे खूंखार और खून के प्यासे जिहादी आतंकवादियों के साथ बैठकर चाय पी रहे थे।

ज़रा एक नाम याद कीजिए- यासिर अराफात (Yasser Arafat)। जो लोग 1970 और 80 के दशक का इतिहास जानते हैं, उन्हें पता होगा की ये नाम कोई मामूली नाम नहीं था।

ये वो नाम था जिसे सुनकर दुनिया के बड़े-बड़े मुल्कों की रूह कांप जाती थी। ये वो आतंकवादी था जिसके एक इशारे पर सरेआम लोगों के गले काट दिए जाते थे, बम धमाके होते थे और मासूमों का खून पानी की तरह बहाया जाता था।

लेकिन हमारे देश की उस वक्त की महान सेक्युलर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्या किया? जिस कातिल को पकड़ने के लिए पूरी दुनिया की पुलिस और खुफिया एजेंसियां कुत्तों की तरह घूम रही थीं, उस जिहादी दरिंदे को इंदिरा गांधी ने अपना ‘भाई’ बना लिया।

उसे कांग्रेस ने भारत का ‘स्टेट गेस्ट’ (State Guest) यानी राजकीय मेहमान बनाकर अपने सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

उसे रेड कारपेट बिछाकर दिल्ली बुलाया जाता था। ये सिर्फ एक कूटनीतिक गलती नहीं थी भाई! ये इस देश की आत्मा और हमारे स्वाभिमान का सरेआम अपमान था।

देश की जनता को अहिंसा का ज्ञान पिलाने वाले ये सेक्युलर नेता असल में एक जिहादी आतंकवादी को अपने घर का दामाद बनाकर पाल रहे थे।

ओलंपिक में खिलाड़ियों का खून और विमानों की हाईजैकिंग, ‘आधुनिक आतंकवाद’ का गॉडफादर था खूंखार ‘यासिर अराफात’

अगर आज की नई पीढ़ी को लग रहा है की यासिर अराफात कोई आज़ादी का सिपाही या कोई बड़ा नेता था, तो ज़रा उसके खूनी और जिहादी इतिहास के वो पन्ने खोलकर देखिए जो दरबारी इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से आपसे छुपा लिए।

ये आदमी कोई नेता-वेता नहीं था, ये ‘आधुनिक आतंकवाद’ (Modern Terrorism) का असली गॉडफादर था। आज जो दुनिया भर में आप जिहादी संगठनों को बम फोड़ते और लोगों को मारते देखते हैं, उस पूरे खौफनाक सिस्टम को इसी आदमी ने डिज़ाइन किया था।

बात 1972 के म्यूनिख ओलंपिक (Munich Olympics) की है। जर्मनी में पूरी दुनिया के खिलाड़ी शांति और खेल के उस महाकुंभ में हिस्सा लेने गए थे।

तभी यासिर अराफात की संस्था पीएलओ (PLO) से जुड़े ‘ब्लैक सेप्टेंबर’ नाम के एक खूंखार जिहादी गुट ने ओलंपिक विलेज पर हमला कर दिया।

इन्होंने 11 निहत्थे और बेगुनाह इजरायली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया। उन खिलाड़ियों के हाथ-पैर बांध दिए गए। उन्हें जानवरों की तरह पीटा गया और फिर उन्हें बेरहमी से गोलियों से भून डाला गया।

पूरा ओलंपिक विलेज खून से लाल हो गया था। खेल के मैदान को शमशान बनाने वाला वो मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि यही यासिर अराफात था।

और ये तो सिर्फ एक बानगी है। आज जो आप सुनते हैं की फलां जगह से पैसेंजर विमान हाईजैक (Plane Hijack) हो गया, जानते हैं दुनिया को ये खौफनाक तरीका किसने सिखाया?

ये इसी यासिर अराफात और इसके पाले हुए जिहादी गुटों की देन है। 1960 और 70 के दशक में पैसेंजर विमानों को अगवा करना, उनमें बैठे सैकड़ों मासूम औरतों-बच्चों की कनपटी पर बंदूक रखना और फिर उन्हें बम से उड़ा देने की धमकियां देना- ये अराफात का रोज़ का धंधा था।

वो कोई आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ रहा था, वो सीधे-सीधे पूरी दुनिया में एक खौफनाक जिहादी सिंडिकेट चला रहा था। अमेरिका से लेकर यूरोप तक की सरकारें इसे एक खूंखार आतंकवादी मानती थीं।

अमेरिका ने तो बाकायदा पीएलओ को एक खूंखार आतंकी संगठन घोषित कर रखा था। जो आदमी दुनिया भर में स्कूलों, बसों और बेगुनाहों को बम से उड़ा रहा हो, वो इंसान नहीं बल्कि एक खूनी भेड़िया था। और इसी भेड़िये को हमारी कांग्रेसी सरकारें अपने रूम में चाय पिला रही थीं।

दुनिया कांपती थी और इंदिरा गांधी उसे अपना मुंहबोला ‘भाई’ कहती थीं, खूंखार कातिल को गले लगाने वाली इस ऐतिहासिक गद्दारी का नंगा सच

अब ज़रा इस पूरे खूनी ड्रामे के उस सबसे गंदे और शर्मनाक हिस्से को समझिए जिसने दुनिया भर में भारत का सिर शर्म से झुका दिया था।

जिस यासिर अराफात के नाम से लोग खौफ खाते थे, जानते हैं वो भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को क्या कहकर बुलाता था?

वो इंटरनेशनल मीडिया के सामने, कैमरे पर डंके की चोट पर इंदिरा गांधी को अपनी ‘बड़ी बहन’ (Elder Sister) कहता था!

और इंदिरा गांधी ने भी इस जिहादी कातिल को अपना ‘मुंहबोला भाई’ मान लिया था। ज़रा सोचिए इस भयानक और क्रूर रिश्ते को! एक तरफ भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, और दूसरी तरफ भारत की प्रधानमंत्री का भाई कौन? दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी!

1974 का वो काला साल इस देश के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे कभी धोया नहीं जा सकता। जब पूरी दुनिया अराफात पर थूक रही थी, जब इजरायल और पश्चिमी देश उसके खून के प्यासे थे, तब इंदिरा गांधी ने क्या किया?

उन्होंने 1974 में पीएलओ (PLO) को भारत में आधिकारिक मान्यता दे दी! आपको जानकर घिन आएगी की भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला गैर-अरब (Non-Arab) देश बन गया था।

अरे भाई, क्या मजबूरी थी हमारी? हमारा उस फिलिस्तीन और उस अराफात से क्या लेना-देना था? लेकिन नहीं, इंदिरा गांधी ने उस कातिल के लिए भारत के दरवाज़े खोल दिए।

जब भी अराफात भारत आता था, तो इंदिरा गांधी उसे गले लगाती थीं। वो तस्वीरें आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं, जिन्हें देखकर किसी भी स्वाभिमानी हिंदुस्तानी का खून खौल उठेगा। एक चुनी हुई प्रधानमंत्री, एक जिहादी दरिंदे के गले लग रही है!

हद तो तब पार हो गई जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई। उनके अंतिम संस्कार में ये जिहादी अराफात दिल्ली पहुंचा और कैमरे के सामने फूट-फूट कर रोने का नाटक करने लगा।

“मेरी बड़ी बहन चली गई, मेरा परिवार उजड़ गया…” ये वो शब्द थे जो एक कातिल बोल रहा था।

ये सिर्फ एक कूटनीतिक रिश्ता नहीं था भाई, ये भारत के स्वाभिमान और हमारी सुरक्षा के साथ सरेआम किया गया एक नीच समझौता था। तुम दुनिया को क्या संदेश दे रहे थे? यही ना की भारत आतंकियों की पनाहगाह है!

नेहरू और इंदिरा के नाम पर देश के सबसे बड़े ‘शांति पुरस्कार’, एक जिहादी आतंकवादी के कदमों में रख दिया गया भारत का सम्मान

अगर आपको लग रहा है की ये गद्दारी सिर्फ गले मिलने और ‘भाई-बहन’ के इस घिनौने रिश्ते तक सीमित थी, तो ज़रा अपने दिलों को थाम लीजिए।

क्योंकि इसके बाद कांग्रेस परिवार ने जो किया, उसने इस देश के सम्मान को सीधे गटर में फेंक दिया।

जब इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने, तो जिहादियों को पालने का ये कांग्रेसी शौक और भी ज़्यादा भयंकर रूप ले चुका था।

राजीव गांधी की सरकार ने तय किया की जिस यासिर अराफात के हाथ हज़ारों बेगुनाहों के खून से सने हैं, जिसने ओलंपिक के खिलाड़ियों को भुनवा दिया था, उसे भारत का सबसे बड़ा ‘इनाम’ दिया जाएगा।

साल 1988! राजीव गांधी की सरकार ने यासिर अराफात को भारत का सबसे प्रतिष्ठित ‘जवाहरलाल नेहरू इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग अवार्ड’ (Jawaharlal Nehru Award for International Understanding) दे डाला।

अरे बेशर्मों! इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग? जो आदमी प्लेन हाईजैक करके लोगों की गर्दनें काटता हो, उसे तुम भारत का सबसे बड़ा सम्मान दे रहे हो?

और बात सिर्फ मेडल की नहीं थी, इस अवार्ड के साथ लाखों रुपये की भारी-भरकम नकदी (Cash Prize) भी उस जिहादी के कदमों में रख दी गई। भारत के टैक्सपेयर का पैसा एक आतंकवादी को इनाम के रूप में दिया गया!

लेकिन इस सेक्युलर ढोंग की सबसे खौफनाक और गंदी तस्वीर तो 1991-92 में सामने आई। कांग्रेसियों ने इस कातिल को ‘इंदिरा गांधी अवार्ड फॉर पीस’ (Indira Gandhi Award for Peace, Disarmament and Development) देने का ऐलान कर दिया।

ज़रा एक मिनट के लिए रुकिए और इस बात की क्रूरता को महसूस कीजिए। ‘शांति का पुरस्कार’ (Peace Prize)!

एक ऐसे इंसान को शांति का पुरस्कार दिया गया जिसका पूरा वजूद ही अशांति, खून और बम धमाकों पर टिका था। जिसने म्यूनिख में खून की होली खेली हो, उसे भारत शांति का मेडल पहना रहा था।

क्या ये उन बेगुनाह इजरायली खिलाड़ियों की लाशों पर थूकना नहीं था? क्या ये उन मासूम औरतों और बच्चों के मुंह पर तमाचा नहीं था जिन्हें पीएलओ के जिहादियों ने हवाई जहाज़ों में बंधक बनाकर मार डाला था?

दुनिया भर के यहूदी संगठनों ने इस पर भयंकर विरोध जताया था। इंटरनेशनल मीडिया हैरान थी की भारत जैसा देश एक खूंखार आतंकवादी को ‘शांति का मसीहा’ कैसे घोषित कर सकता है।

लेकिन कांग्रेसी दरबारियों और इस सेक्युलर इकोसिस्टम को कोई शर्म नहीं आई। इन्होंने उस जिहादी अराफात को भारत का हीरो बना दिया।

ये पुरस्कार सिर्फ अराफात को नहीं दिए गए थे, ये पुरस्कार असल में इस देश के ज़मीर की नीलामी थे। एक आतंकी को खुश करने के लिए भारत के सम्मान को उसकी जूतियों पर रगड़ दिया गया था।

सिर्फ मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने के लिए गाँधी परिवार ने बेचा देश का ज़मीर, इस खौफनाक तुष्टिकरण ने भारत की जड़ों में डाला तेज़ाब

अब एक बहुत ही सीधा और चुभने वाला सवाल उठता है। आखिर वो क्या मजबूरी थी जिसके कारण इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी के आगे नतमस्तक थे?

क्या यासिर अराफात भारत को कोई बहुत बड़ी तकनीक दे रहा था? क्या वो हमें हथियार दे रहा था? या क्या वो भारत की गरीबी दूर कर रहा था? नहीं! अराफात भारत को खून, खौफ और आतंकवाद के अलावा कुछ नहीं दे सकता था।

तो फिर कांग्रेस ने उसे सिर पर क्यों बिठाया? इसका जवाब इस देश की उस घिनौनी और गद्दार राजनीति में छुपा है जिसने हमेशा सत्ता की मलाई चाटने के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर लगाया।

कांग्रेस को अराफात से कोई प्यार नहीं था, उन्हें प्यार था भारत के अंदर बैठे उस ‘विशाल जिहादी वोटबैंक’ से, जो अराफात को अपना मज़हबी हीरो मानता था।

ये तुष्टिकरण की सबसे नीच और खौफनाक पराकाष्ठा थी। भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों को ये दिखाने के लिए की “देखो, हम तुम्हारी मज़हबी भावनाओं की कितनी कद्र करते हैं, हम पूरी दुनिया से लड़कर फिलिस्तीन के इस जिहादी नेता के साथ खड़े हैं”, कांग्रेस ने भारत के खज़ाने, भारत के सम्मान और देश की आत्मा को नीलाम कर दिया।

ये लोग चंद वोटों के लिए एक ऐसे आदमी की चापलूसी कर रहे थे जिसके हाथों से निर्दोषों का खून टपक रहा था।

और ज़रा इस गद्दारी के उस खौफनाक साइड-इफेक्ट को देखिए जिसने इस देश की जड़ों में तेज़ाब डालने का काम किया।

जब देश की प्रधानमंत्री खुद एक ग्लोबल आतंकी को ‘भाई’ कहकर गले लगाएगी, उसे राजकीय मेहमान बनाएगी, तो ज़ाहिर सी बात है की देश के अंदर पल रहे उन स्लीपर सेल और कट्टरपंथियों के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच जाएंगे।

कश्मीर के जिहादियों, सिमी (SIMI) जैसे संगठनों और देश के अंदर पनप रहे गद्दारों को एक सीधा मैसेज मिल गया था की “अगर तुम हथियार उठाओगे, खून बहाओगे, तो दिल्ली में बैठी सरकारें तुमसे डरेंगी और तुम्हें गले लगाएंगी।”

इसी अराफात प्रेम ने भारत के अंदर आतंकवाद के वो बीज बोए जिनका ज़हर आज तक हम कश्मीर से लेकर केरल तक भुगत रहे हैं।

जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग ही जिहादियों को हीरो बना देंगे, तो फिर गली-मोहल्ले के जिहादियों को कानून का क्या डर रहेगा? गाँधी परिवार की इस एक गद्दारी ने देश की आंतरिक सुरक्षा को दशकों पीछे धकेल दिया।

जो इस्राइल हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा उसकी पीठ में कांग्रेस ने घोंपा खंजर, एक आतंकी को पालने के लिए सच्चे दोस्त का कर दिया सौदा

इस पूरे ड्रामे का सबसे दर्दनाक और शर्मनाक पहलू वो है जब हम देखते हैं की अराफात को खुश करने के चक्कर में कांग्रेस ने उस देश की पीठ में खंजर घोंप दिया जो हमेशा, हर मुश्किल वक्त में भारत के साथ एक सच्चे भाई की तरह खड़ा रहा।

मैं बात कर रहा हूँ इस्राइल (Israel) की।

ज़रा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पन्नों को पलटिए। जब पाकिस्तानी सेना हमारी सीमा पर मंडरा रही थी, जब अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना सातवां बेड़ा (7th Fleet) बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था, और दुनिया के ज़्यादातर देशों ने भारत का साथ छोड़ दिया था, तब जानते हैं हमारी मदद किसने की थी?

तब इस्राइल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर (Golda Meir) ने बिना दुनिया की परवाह किए, गुप्त रूप से भारत को हथियार और मोर्टार सप्लाई किए थे। इस्राइल ने हमारे लिए अपने खज़ाने और हथियारों के गोदाम खोल दिए थे।

लेकिन युद्ध जीतने के बाद इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने क्या किया? उन्होंने उस सच्चे दोस्त इस्राइल को जूतों की नोक पर रखा! कांग्रेस ने दशकों तक इस्राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं बनाए। भारत में इस्राइल का कोई दूतावास नहीं खुलने दिया गया।

क्यों? क्योंकि कांग्रेस के नेताओं को डर था की अगर हमने इस्राइल से दोस्ती की, तो भारत के मुल्ले नाराज़ हो जाएंगे! उन्हें डर था की यासिर अराफात बुरा मान जाएगा और अरब देशों के जिहादी आका खफा हो जाएंगे।

मतलब, जिसने तुम्हारी जान बचाई, जिसने तुम्हें हथियार दिए, तुमने उसे ही अछूत बना दिया? और जिसने ओलंपिक में निर्दोषों को भूना, उसे तुमने ‘शांति’ का मेडल पहना दिया!

क्या दुनिया के किसी भी देश ने अपनी विदेश नीति के साथ इतना गंदा और शर्मनाक मज़ाक किया होगा?

और ये इस्राइल ही था जिसने 1999 के करगिल युद्ध (Kargil War) में भी हमारी लाज बचाई थी।

जब पाकिस्तानी घुसपैठिए कारगिल की ऊंची चोटियों पर बैठकर हमारे जवानों पर गोलियां बरसा रहे थे और हमें सटीक हमले के लिए तकनीक चाहिए थी, तब इस्राइल ने ही हमें लेज़र गाइडेड बम (Laser Guided Bombs) और ड्रोन तकनीक दी थी।

इस्राइल कभी पीछे नहीं हटा, लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने हमेशा एक जिहादी आतंकवादी को खुश करने के लिए देश की सुरक्षा और सबसे सच्चे दोस्त को सूली पर टांग कर रखा। ये इस देश की विदेश नीति का सबसे काला अध्याय है।

कांग्रेस और गाँधी परिवार का जिहादी प्रेम इस देश को ले डूबेगा। इस देश की जनता को भी अब ये फैसला करना होगा।

जो पार्टी, जो कुनबा खून के प्यासे आतंकियों को ‘भाई’ बनाकर पालता रहा हो, जिसने वोटबैंक की भूख में देश के ज़मीर को नीलाम कर दिया हो, उसे इस देश की सत्ता तो दूर, इस देश की सड़कों पर भी वोट मांगने का कोई हक नहीं है।

देश के उन करोड़ों हिंदुओं को ये पता चलना चाहिए की जिस पार्टी को वो अपना वोट देते रहे, वो असल में बंद दरवाज़ों के पीछे किन जिहादी भेड़ियों को चाय पिला रही थी।

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