दुनिया 'चांद' पर और हमारे वैज्ञानिक 'सड़क' पर ! नहीं रुक रहे 'ISRO' छोड़ कर जाने वाले महान वैज्ञानिकों के इस्तीफे, अच्छी सैलरी ना देकर 'स्पेस मिशन' को बर्बाद करने का सरकार का ये कैसा अंधेर राज

दुनिया ‘चांद’ पर और हमारे वैज्ञानिक ‘सड़क’ पर ! नहीं रुक रहे ‘ISRO’ छोड़ कर जाने वाले महान वैज्ञानिकों के इस्तीफे, अच्छी सैलरी ना देकर ‘स्पेस मिशन’ को बर्बाद करने का सरकार का ये कैसा अंधेर राज

जब चंद्रयान-3 ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा गाड़ा था, तो पूरे देश में दीवाली मन रही थी। लेकिन उस जश्न के बीच जो सबसे घटिया चीज़ मुझे लगी, वो थी हमारे नेताओं की वो बेशर्म ‘क्रेडिट लेने की होड़’।

जो नेता विज्ञान का ‘व’ तक नहीं जानते, जिन्हें ये नहीं पता की क्रायोजेनिक इंजन क्या होता है, वो टीवी कैमरों के सामने आकर ऐसे छाती ठोक रहे थे जैसे रॉकेट उन्होंने ही अपने हाथों से बनाया हो।

लेकिन आज मैं आपको उस टीवी कैमरे के पीछे का वो खौफनाक और कड़वा सच बताने जा रहा हूं, जिसे ये सरकार और ये सड़ा हुआ सिस्टम इस देश की जनता से छुपाने की पूरी कोशिश कर रहा है।

जिन वैज्ञानिकों के खून-पसीने और रातों की नींद के दम पर ये नेता तालियां बटोरते हैं, उन वैज्ञानिकों को अंदर ही अंदर घुट-घुट कर जीने पर मजबूर किया जा रहा है। आज ISRO के वैज्ञानिक धड़ाधड़ इस्तीफ़ा दे कर जा रहे हैं।

जब कोई टॉप का साइंटिस्ट हमारे देश का स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन (ISRO) छोड़कर जाता है ना, तो वो सिर्फ एक सरकारी नौकरी नहीं छोड़ता। वो भारत के अंतरिक्ष में सुपरपावर बनने के सपने का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने साथ ले जाता है।

आज जो इस देश में ‘ब्रेन ड्रेन’ की आंधी चल रही है, वो हमारे पूरे के पूरे स्पेस मिशन को सूली पर लटका देगी। हमारे वैज्ञानिक चांद पर पानी खोज रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर हमारे बिकाऊ सिस्टम ने उन्हें ‘सड़क’ पर ला खड़ा किया है।

ये लेख भारत माता के उन असली हीरोज़ के दर्द की वो आवाज़ है जिसे दिल्ली में बैठे बाबू और मंत्री अपनी फाइलों के नीचे दबाना चाहते हैं।

ISRO के 100 से ज्यादा टॉप वैज्ञानिकों का इस्तीफा और LVM 3 के डायरेक्टर का जाना, गगनयान मिशन पर मंडराता खौफनाक खतरा

अगर किसी को लग रहा है की ये सिर्फ एक-दो लोगों के नौकरी छोड़ने का मामला है, तो ज़रा इन हैरान करने वाले आंकड़ों पर नज़र डालिए।

आपका दिमाग सुन्न पड़ जाएगा ये जानकर की पिछले मात्र 10 महीनों के अंदर, ISRO के 100 से ज़्यादा ए-ग्रेड (Group-A) के टॉप वैज्ञानिकों और तकनीकी अफसरों ने अपनी नौकरी से इस्तीफा (Resignation) दे दिया है।

इनमें वो वैज्ञानिक भी शामिल हैं जो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेकर घर बैठ गए हैं। जी हां, 100 से ज़्यादा टॉप के दिमाग!

ज़रा सोचिए, ये कोई आम क्लर्क या चपरासी नहीं हैं जिन्हें रातों-रात कोई भी रिप्लेस कर देगा। ये वो लोग हैं जिन्होंने 15-20 साल तक रॉकेट साइंस की गहराइयों में अपनी पूरी ज़िंदगी गला दी थी।

सबसे ज़्यादा इस्तीफों की ये झड़ी बेंगलुरु के यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) और तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से लग रही है।

ये दोनों सेंटर इसरो के दिल और दिमाग माने जाते हैं। जब दिमाग ही खाली हो जाएगा, तो रॉकेट क्या खाक उड़ेगा?

और सबसे बड़ा झटका तो तब लगा, जब ‘विक्टर जोसेफ टी’ (Victor Joseph T) ने भी इस्तीफा दे दिया। अब आप सोच रहे होंगे की ये विक्टर जोसेफ कौन हैं?

भाई साहब, ये वो सीनियर साइंटिस्ट हैं जो हमारे सबसे महत्वाकांक्षी ‘गगनयान मिशन’ (Gaganyaan Mission) के लिए उस भारी-भरकम रॉकेट LVM-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे।

LVM-3 वही रॉकेट है जो पहली बार भारत के अंतरिक्ष यात्रियों (इंसानों) को अंतरिक्ष में लेकर जाने वाला है।

जो इंसान इस पूरे रॉकेट को डिज़ाइन कर रहा था, जो इस मिशन का डायरेक्टर था, वही बीच मिशन में इसरो छोड़कर चला गया!

ये कितनी भयानक बात है, इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं। जब पायलट ही बीच समंदर में जहाज़ छोड़कर चला जाए, तो गगनयान कैसे उड़ेगा?

क्या हमारे अनपढ़ नेता और फाइलें चबाने वाले सरकारी बाबू इस रॉकेट को अंतरिक्ष में ले जाएंगे? इस सिस्टम ने देश के सबसे बड़े स्पेस मिशन को सरेआम सूली पर चढ़ा दिया है।

500 मिलियन डॉलर की प्राइवेट फंडिंग और ISRO की कंजूसी, चंद पैसों के लिए देश का टैलेंट बिकने को मजबूर

अब एक बहुत ही सीधा सा सवाल उठता है की आखिर वो कौन सी मजबूरी आ गई जो देश के लिए जान छिड़कने वाले ये महान वैज्ञानिक अचानक से इसरो छोड़कर भाग रहे हैं?

इसका जवाब है- इस सड़े हुए सरकारी सिस्टम की कंजूसी और प्राइवेट सेक्टर का वो भारी-भरकम पैसा, जिसके आगे अब देश का टैलेंट बिकने को मजबूर है।

याद कीजिए, 2020 में केंद्र सरकार ने स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल दिया था। 2023 में ‘भारतीय अंतरिक्ष नीति’ (Indian Space Policy) लागू कर दी गई।

इसके बाद तो भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की ऐसी बाढ़ आ गई जैसे बरसात में कुकुरमुत्ते उग आते हैं। आज देश में 400 से ज़्यादा रजिस्टर्ड स्पेस स्टार्टअप्स हैं।

पिक्सेल (Pixxel), स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace), ध्रुवा स्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) जैसी प्राइवेट कंपनियों ने मार्केट में गदर मचा रखा है।

इन प्राइवेट कंपनियों के पास कोई फंड की कमी नहीं है। इनके पास करीब 500 मिलियन डॉलर (यानी अरबों रुपये) का भारी-भरकम विदेशी और स्वदेशी निवेश (Funding) आ चुका है।

अब ये कंपनियां क्या कर रही हैं? ये सीधे इसरो के उन अनुभवी वैज्ञानिकों को पकड़ रही हैं जो सरकारी सिस्टम में बाबूगिरी और कम सैलरी से परेशान हैं।

ये प्राइवेट कंपनियां हमारे इसरो के वैज्ञानिकों को उनके सरकारी वेतन से 5-5 गुना ज़्यादा सैलरी, करोड़ों के स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs) और एक ऐसा आज़ाद माहौल दे रही हैं जहाँ उन पर कोई अनपढ़ मंत्री या सरकारी बाबू अपना डंडा नहीं चला सकता।

अरे भाई! एक वैज्ञानिक भी तो इंसान है। उसका भी परिवार है, उसके भी बच्चे हैं। वो पूरी ज़िंदगी देश के नाम कर देता है, लेकिन जब उसे अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई या घर चलाने के लिए ईएमआई (EMI) भरनी पड़ती है, तो क्या वो सिर्फ मेडल और तालियों से अपना पेट पालेगा?

हद तो तब हो गई जब इसरो के ही पूर्व चीफ (डॉ. सोमनाथ एस) को एक प्राइवेट कंपनी ‘अग्निकुल कॉसमॉस’ के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में ऑब्ज़र्वर (Observer) के तौर पर शामिल होना पड़ा!

जब देश के सबसे बड़े स्पेस संस्थान का पूर्व बॉस प्राइवेट कंपनी के साथ जुड़ सकता है, तो फिर एक आम वैज्ञानिक क्यों नहीं जाएगा?

ये हमारे सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है की हम अपने टैलेंट को कौड़ियों के भाव काम करने पर मजबूर कर रहे हैं और फिर उम्मीद करते हैं की वो हमारे लिए चांद-तारे तोड़ कर लाएंगे।

धड़ाम से गिरते रॉकेट और फेल होते मिशन, वैज्ञानिकों के जाने से कैसे बर्बाद हो रही है ISRO की बरसों की मेहनत

अगर किसी को लग रहा है की “अरे कोई बात नहीं, पुराने लोग गए तो क्या हुआ, नई भर्ती कर लेंगे,” तो वो इंसान दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है।

रॉकेट साइंस कोई एसएससी (SSC) या रेलवे की नौकरी नहीं है भाई! ये कोई बच्चों का खेल थोड़ी है की तुमने एक चपरासी हटाया और दूसरे को बिठा दिया।

जब एक सीनियर साइंटिस्ट जाता है, तो वो अपने साथ वो 20 साल का तजुर्बा ले जाता है जो उसने कई रॉकेटों को फेल होते और सफल होते देखकर कमाया था।

उसी तजुर्बे की कमी का नतीजा आज इसरो भुगत रहा है। हमारे जो करोड़ों-अरबों के मिशन हैं, वो अब धड़ाम से गिर रहे हैं।

ज़रा इन ताज़ा फेलियर का नंगा सच सुनिए। जनवरी 2024 में इसरो ने PSLV-C58 मिशन लॉन्च किया था।

सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उड़ान के तीसरे चरण में मात्र 203 सेकंड के बाद अचानक से रॉकेट के चैंबर का प्रेशर एकदम से गिर गया। नतीजा क्या हुआ?

रॉकेट अपनी सही कक्षा (Sun-synchronous orbit) तक पहुंच ही नहीं पाया और उसमें रखा हुआ करोड़ों का राडार सैटेलाइट अंतरिक्ष में ही नष्ट हो गया!

और बात सिर्फ एक मिशन की नहीं है। फिर मई 2024 में PSLV-C61 (EOS-09 और RISAT-1B वाला) मिशन भी इसी तरह से बुरी तरह असफल रहा।

जो इसरो कभी एक साथ 104 सैटेलाइट लॉन्च करके दुनिया में डंका बजाता था, आज उसके रॉकेट बीच आसमान में क्यों भटक रहे हैं?

क्योंकि जिन हाथों और जिन दिमागों ने उन रॉकेटों को डिज़ाइन किया था, वो तो तंग आकर इस्तीफा देकर प्राइवेट कंपनियों में चले गए!

अगर ये ब्रेन ड्रेन ऐसे ही चलता रहा, अगर हमारे सीनियर साइंटिस्ट ऐसे ही इसरो छोड़कर जाते रहे, तो यकीन मानिए, भारत के जो सबसे बड़े सपने हैं- जैसे ‘चंद्रयान-4’, 2035 तक बनने वाला ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (BAS), और ‘मंगलयान-2’!

ये सब सिर्फ सरकारी फाइलों में सड़ कर रह जाएंगे। हमारी बरसों की वो मेहनत, जिसे एपीजे अब्दुल कलाम और विक्रम साराभाई जैसे महान लोगों ने सींचा था, उसे आज के इस बाबू कल्चर और कंजूस सिस्टम ने सरेआम हवा में उड़ा कर राख कर दिया है!

सैलरी बढ़ाने के बजाय इस्तीफे रोकने का तुगलकी फरमान, अंतरिक्ष विभाग की तानाशाही से घुट रहा है वैज्ञानिकों का दम

जब इसरो (ISRO) से धड़ाधड़ 100 से ज़्यादा टॉप वैज्ञानिकों ने अपनी नौकरी को लात मार दी, तो दिल्ली में बैठे हमारे अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) और सरकारी बाबुओं के पसीने छूट गए।

उन्हें लगा की अगर ऐसे ही दिमाग वाले लोग प्राइवेट कंपनियों में भागते रहे, तो हमारे गगनयान और चंद्रयान का क्या होगा?

अब ज़रा सोचिए, एक अक्लमंद और समझदार सरकार ऐसे हालात में क्या करती? वो तुरंत अपने वैज्ञानिकों को बुलाती, उनकी परेशानी सुनती, उनकी सैलरी बढ़ाती और उन्हें प्राइवेट सेक्टर जैसी सुविधाएं देने का वादा करती।

लेकिन नहीं भाई! ये भारत का सड़ा हुआ बाबू-सिस्टम है। यहाँ दिमाग और टैलेंट की नहीं, सिर्फ ‘डंडे’ की भाषा बोली जाती है।

वैज्ञानिकों की सैलरी बढ़ाने या उन्हें सुविधाएं देने के बजाय, सरकार ने उनके ऊपर तानाशाही का एक ऐसा खौफनाक हंटर चला दिया जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल जाएगा।

अभी हाल ही में, 14 जुलाई 2026 को अंतरिक्ष विभाग ने रातों-रात एक नया और खौफनाक ‘तुगलकी फरमान’ (Memorandum) जारी कर दिया।

पहले क्या होता था की अगर किसी वैज्ञानिक को इसरो की नौकरी छोड़नी होती थी, तो वो अपने सेंटर के डायरेक्टर (जैसे VSSC या URSC के चीफ) को इस्तीफा देता था और वो डायरेक्टर उसे मंज़ूर कर लेता था।

लेकिन अब सरकार ने इन सेंटर डायरेक्टर्स से ये पावर ही छीन ली है!

इस नए तानाशाही नियम के तहत ये फरमान सुना दिया गया है की गगनयान और राष्ट्रीय महत्व के दूसरे बड़े मिशन्स से जुड़ा कोई भी ‘ग्रुप-ए’ (Group-A) का वैज्ञानिक या तकनीकी अफसर अब आसानी से इस्तीफा नहीं दे सकता।

उसका इस्तीफा ‘नॉर्मल पॉलिसी’ के तहत मंज़ूर ही नहीं किया जाएगा। अब वो फाइल धक्के खाते हुए सीधे दिल्ली जाएगी और वहां बैठे बाबू तय करेंगे की उस वैज्ञानिक को नौकरी छोड़ने देनी है या नहीं।

अरे भाई, क्या तुमने इन वैज्ञानिकों को बंधुआ मज़दूर समझ रखा है? तुम टैलेंट को पैसे और इज़्ज़त से रोक नहीं पा रहे, तो अब कानून का डंडा चलाकर उन्हें ज़बरदस्ती लैब में बिठाओगे?

ज़रा दिमाग लगाइए, अगर कोई इंसान दिल से तुम्हारे संगठन में काम ही नहीं करना चाहता, अगर वो अपनी सैलरी और सिस्टम से इतना फ्रस्ट्रेट हो चुका है, तो क्या तुम बंदूक की नोक पर उससे रॉकेट बनवा लोगे?

क्या ज़बरदस्ती रोके गए दिमाग से गगनयान अंतरिक्ष में उड़ पाएगा? ये कोई पत्थर तोड़ने की मज़दूरी नहीं है, ये रॉकेट साइंस है।

यहाँ इंसान का दिमाग तभी चलता है जब वो खुश हो और उसे उसका पूरा हक मिले। इस तुगलकी फरमान ने इसरो के बचे-खुचे वैज्ञानिकों का भी दम घोंट कर रख दिया है।

अनपढ़ नेताओं की ऐश और रॉकेट बनाने वालों को झुनझुना, इस सड़े हुए सरकारी सिस्टम पर अब फूटेगा जनता का गुस्सा

इस पूरे ड्रामे में सबसे ज़्यादा खून तो तब खौलता है जब हम इस देश के दोगलेपन को देखते हैं। एक तरफ वो अनपढ़ और जाहिल नेता हैं, जिन्हें शायद ये भी नहीं पता होगा की चांद पर ऑक्सीजन है या नहीं।

लेकिन उन नेताओं को क्या मिलता है? उन्हें लाखों रुपये महीने की सैलरी, महंगी गाड़ियां, दिल्ली में आलीशान बंगले, फ्री हवाई यात्राएं, फ्री बिजली, मुफ्त का इलाज और जब तक वो ज़िंदा रहेंगे, तब तक उन्हें भारी-भरकम पेंशन मिलती रहेगी।

ये सारा पैसा कहां से आता है? हमारे और आपके टैक्स से!

और दूसरी तरफ वो वैज्ञानिक हैं जो रात के 2-2 बजे तक लैब में जागकर इस देश को सुपरपावर बनाने का ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे हैं।

उन्हें ये सरकार क्या देती है? सातवें पे-कमीशन (7th Pay Commission) का वो सड़ा हुआ झुनझुना! एक साधारण से आईएएस (IAS) बाबू या बैंक के क्लर्क के पे-स्केल में इन महान वैज्ञानिकों को तौल दिया जाता है।

उन्हें ना तो कोई करोड़ों का पैकेज मिलता है और ना ही वो रसूख जो एक घटिया से नेता को मिल जाता है।

और हद तो तब हो गई जब देश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ‘जितेंद्र सिंह’ ने इन इस्तीफों पर बहुत ही बेशर्मी से एक बयान दे दिया।

जब मीडिया ने पूछा की इतने सारे टॉप वैज्ञानिक इसरो छोड़कर क्यों जा रहे हैं, तो मंत्री जी ने बड़ी ठसक और घमंड के साथ कहा-

“अरे कोई बात नहीं, इसरो में तो लोग आते-जाते रहते हैं, कोई बड़ा संकट नहीं है। हमारे पास बहुत बड़ी वर्कफोर्स है।”

वाह रे हमारे देश के रहनुमाओं! तुम्हारे लिए उस इंसान के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता जो गगनयान का प्रोजेक्ट डायरेक्टर था?

तुम्हारा ये अहंकार ही इस देश की सबसे बड़ी बीमारी है। तुम सोचते हो की तुम किसी भी नए लड़के को लाकर 100 करोड़ के रॉकेट के सामने बिठा दोगे और वो आसमान में उड़ जाएगा?

ये बयान इस बात का साक्षात सबूत है की सत्ता के नशे में चूर इन नेताओं को टैलेंट की कोई कद्र नहीं है।

जब चुनाव आते हैं, तो यही नेता इसरो के वैज्ञानिकों की सफलता का पोस्टर छपवाकर वोट मांगते हैं, और जब वो वैज्ञानिक अपना हक़ मांगते हैं, तो उन्हें ‘आते-जाते लोग’ कहकर ज़लील कर दिया जाता है। लानत है ऐसे सिस्टम पर!

गगनयान से लेकर चंद्रयान 4, ISRO के अगले अहम् मिशनों पर छाए सरकार के उपद्रव के काले बदल

इन 100 टॉप वैज्ञानिकों के जाने से सिर्फ एकाध सैटेलाइट नहीं लेट होगा, ज़रा अपनी आंखें खोलिए और ISRO के उन आने वाले महा-प्रोजेक्ट्स की लिस्ट देखिए जो अब सीधे तौर पर सूली पर लटकने वाले हैं।

सबसे पहला और सबसे बड़ा मिशन है ‘गगनयान’, जिसके बारे में मैंने आपको पहले ही ऊपर बता दिया है ।

इसके बाद नंबर आता है ‘चंद्रयान-4’ (Chandrayaan-4) का। चंद्रयान-3 ने तो सिर्फ चांद पर लैंडिंग की थी, लेकिन चंद्रयान-4 का मिशन उससे दस गुना ज़्यादा मुश्किल है।

इसे चांद की सतह पर उतरकर वहां से मिट्टी और पत्थर के सैंपल वापस धरती पर लेकर आने हैं। ये एक ऐसी तकनीक है जो दुनिया के गिने-चुने देशों के पास ही है।

लेकिन जब तुम्हारे पास ऐसे जटिल मिशन को लीड करने वाले सीनियर साइंटिस्ट ही नहीं बचेंगे, तो क्या सरकारी बाबू चांद से मिट्टी लेकर आएंगे?

और बात यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका की नासा (NASA) के साथ मिलकर जो ‘निसार’ (NISAR) नाम का सबसे बड़ा और महंगा रडार सैटेलाइट तैयार हो रहा है, उस पर भी अब खौफनाक ग्रहण लग चुका है।

इसके अलावा मंगलयान-2 (Mangalyaan-2) और शुक्रयान (Shukrayaan-1) जैसे वो मिशन जो भारत को ग्रहों की रेस में अमेरिका और चीन के बराबर खड़ा करने वाले थे, उन पर भी इन इस्तीफों का सीधा और भयंकर असर पड़ेगा।

और हमारा सबसे बड़ा सपना? ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (Bharatiya Antariksh Station)! भारत सरकार ने छाती ठोककर ऐलान किया था की 2028 तक हम अपने स्पेस स्टेशन का पहला हिस्सा अंतरिक्ष में भेज देंगे और 2035 तक हमारा खुद का स्पेस स्टेशन होगा।

लेकिन मेरे भाई, स्पेस स्टेशन हवाबाज़ी या नेताओं के भाषणों से नहीं बनते। उन्हें बनाने के लिए वो तेज़ दिमाग चाहिए जो आज बाबुओं की तानाशाही और कम सैलरी की घुटन से भाग रहे हैं।

अगर सरकार ने रातों-रात अपना ये तानाशाही रवैया नहीं बदला और वैज्ञानिकों का सम्मान नहीं किया, तो चीन और अमेरिका स्पेस पर राज करेंगे और हम भारतीय सिर्फ ज़मीन पर खड़े होकर अपना माथा पीटेंगे।

भारत माता की जय!

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