आज जब मैं अखबारों में दिल्ली से लेकर मेवात तक पत्थरबाज़ी, दंगों और हमारी शोभा यात्राओं पर होने वाले हमलों की खबरें पढ़ता हूं, तो मेरा खून खौल जाता है।
हम दिन-रात इन जिहादियों को कोसते हैं, उनके कट्टरपंथ को गालियां देते हैं, लेकिन इनके पीछे का असली गुनहगार तो कोई और ही है।
ये जो दंगाई आज हमारे सर पर बैठ के नाच रहे हैं ना, इसकी जड़ें 1947 की उस ऐतिहासिक गद्दारी में दबी हुई हैं जो दिल्ली में बैठकर हमारे साथ की गई थी।
इस देश के कांग्रेसी दरबारियों ने एक बहुत बड़ा और खौफनाक सच दशकों तक तिजोरी में बंद करके रखा। 1946 के उन प्रांतीय चुनावों का नंगा सच!
रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए भाई, उस चुनाव में लगभग 90 प्रतिशत मुसलमानों ने जिन्ना की मुस्लिम लीग और ‘पाकिस्तान’ के निर्माण के लिए खुलेआम वोट किया था।
उन्होंने डंके की चोट पर पर्चे बांटे थे, रैलियां की थीं और कहा था की हम हिंदुओं के साथ एक देश में नहीं रह सकते, हमें अपना अलग इस्लामिक देश चाहिए।
चलो भाई, मान लिया। तुमने देश बांट दिया, भारत के टुकड़े कर दिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है की जब देश धर्म के आधार पर बंट ही गया था, तो पाकिस्तान मांगने वाले ये सारे जिहादी वहीं क्यों नहीं गए?
इनमें से करोड़ों कट्टरपंथियों ने यहीं हिंदुस्तान में अपने तंबू क्यों गाड़ लिए? इसका इकलौता और सीधा जवाब है- जवाहरलाल नेहरू!
नेहरू ने अपनी सत्ता की हवस, अपनी ‘इंटरनेशनल इमेज’ और एक खास वोटबैंक के लालच में उन लोगों को भारत में ही रोक लिया जिनकी वफादारी सिर्फ और सिर्फ एक इस्लामिक देश के लिए थी।
ये वो गद्दारी थी जिसने हमारे देश को परमानेंट दंगों का एक ऐसा अड्डा बना दिया जिसकी आग में आज तक आम हिंदू अपना खून बहा रहा है।
जिस देश को बंटवारे के बाद एक शुद्ध सनातन राष्ट्र बनना चाहिए था, उसे नेहरू के सेक्युलर अहंकार ने एक ऐसी धर्मशाला बना दिया जहाँ देश तोड़ने वाले ही छाती तानकर बैठ गए।
डॉ अंबेडकर की वो ऐतिहासिक चेतावनी जिसे नेहरू ने कुचला, ग्रीस और तुर्की की तरह ‘100 प्रतिशत पॉपुलेशन एक्सचेंज’ क्यों नहीं हुआ
आजकल ये जो जय भीम-जय मीम वाले लोग सड़कों पर घूमते हैं ना, ज़रा इन्हें बाबा साहेब अंबेडकर की वो असली किताब पढ़ाओ।
1940 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘Pakistan or the Partition of India’ (पाकिस्तान या भारत का विभाजन) नाम की एक ज़बरदस्त किताब लिखी थी।
इस किताब में बाबा साहेब ने एकदम साफ और कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी की हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ चैन से नहीं रह सकते।
उन्होंने डंके की चोट पर लिखा था की अगर बंटवारा होता है, तो आबादी की सौ प्रतिशत अदला-बदली (Complete Population Exchange) होनी ही चाहिए।
अंबेडकर जी कोई हवा में बात नहीं कर रहे थे। उन्होंने 1923 के ग्रीस और तुर्की (Lausanne Treaty) का इंटरनेशनल उदाहरण दिया था।
वहां भी धर्म के नाम पर भयंकर बवाल और कत्लेआम चल रहा था, तो दोनों देशों ने बैठकर अपनी-अपनी आबादी को पूरी तरह से एक्सचेंज कर लिया था।
जो ईसाई तुर्की में थे वो सब अपना घर-बार छोड़कर ग्रीस आ गए, और जो मुस्लिम ग्रीस में थे वो सब के सब तुर्की चले गए।
वहां 100 प्रतिशत पॉपुलेशन एक्सचेंज हुआ और आज वहां कोई रोज़-रोज़ का मज़हबी दंगा नहीं होता।
बाबा साहेब ने चीख-चीख कर अपनी किताब में कहा था की अगर इन जिहादियों को भारत में छोड़ा गया, तो देश में हमेशा दंगे होंगे।
उन्होंने यहाँ तक कहा था की सेना में इनकी वफादारी संदिग्ध रहेगी और ब्लैकमेलिंग की राजनीति हमेशा चलती रहेगी।
लेकिन उस अहंकारी नेहरू को तो अपना सेक्युलर चोला चमकाना था! उसे दुनिया को दिखाना था की देखो मैं कितना महान हूँ।
नेहरू ने अपने अहंकार में बाबा साहेब की इस सबसे तार्किक, वैज्ञानिक और ज़रूरी चेतावनी को जूतों तले कुचल दिया।
उन्होंने इस देश को हमेशा के लिए एक सुलगते हुए ज्वालामुखी पर बिठा दिया। अगर उस वक्त नेहरू ने अंबेडकर जी की बात मान ली होती, तो आज भारत में ना कोई अलगाववाद होता, ना कश्मीर की समस्या होती और ना ही आतंकवाद का ये नंगा नाच होता।
‘जिन्ना’ का वो खुला ऑफर, और नेहरू का सेक्युलर अहंकार जिसने भारत के सीने पर हमेशा के लिए बांध दिया एक जिहादी टाइम बम
अब ज़रा इस ड्रामे का दूसरा पहलू देखिए जिसे सुनकर आप अपना सिर पकड़ लेंगे। जिन्ना, जिसने खून की नदियां बहाकर पाकिस्तान लिया था, वो खुद इस बात के लिए राज़ी हो गया था।
नवंबर 1946 में मोहम्मद अली जिन्ना ने खुलेआम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसने साफ शब्दों में कहा था की अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का सिर्फ एक ही अचूक तरीका है- “पॉपुलेशन एक्सचेंज”।
यानी जिन्ना खुद कह रहा था की सारे हिंदू-सिख हिंदुस्तान आ जाएं और सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं।
जिन्ना बहुत चालू और धूर्त आदमी था। उसे पता था की अगर पाकिस्तान में हिंदू-सिख बहुसंख्यक या मज़बूत रहे, तो वो अपने शरिया कानून और अपनी मनमानी नहीं कर पाएगा।
वो पाकिस्तान को सौ फीसदी एक इस्लामिक और जिहादी देश बनाना चाहता था। और भाई, उसने किया भी वही!
पाकिस्तान और बांग्लादेश बनने के बाद उन्होंने वहां से हिंदुओं और सिखों को बेरहमी से काटा, उनकी ज़मीनें छीनीं और उन्हें खदेड़ कर भगा दिया। जो बच गए उनका जबरन खतना कर दिया गया।
पर यहाँ दिल्ली में बैठे नेहरू क्या कर रहे थे? उन्होंने जिन्ना के इस पॉपुलेशन एक्सचेंज वाले सीधे ऑफर को बड़ी ठसक से ठुकरा दिया।
नेहरू ने ज्ञान पेला की “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश बनेगा, हम किसी को यहाँ से नहीं निकालेंगे।”
नतीजा क्या हुआ? पाकिस्तान में हमारे हिंदू साफ हो गए, वहां उनका नामोनिशान मिटा दिया गया। लेकिन भारत में वो सारे दंगाई शांतिदूत और जिहादी रुक गए जिन्होंने देश के टुकड़े करवाए थे।
1947 में जो टाइम बम नेहरू ने हमारी छाती पर बांधा था, आज वो 25 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुका है। ज़रा इस मक्कारी को देखिए! जो लोग वोट डालकर देश बांट चुके थे, उन्हें यहाँ ‘अल्पसंख्यक’ का वीआईपी (VIP) पास थमा दिया गया।
आज वही लोग छाती तानकर हमारे ही देश में शरिया कानून मांग रहे हैं, हमारे संसाधनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं और हमारी शोभा यात्राओं पर छतों से पत्थर बरसा रहे हैं।
नेहरू के उस एक फैसले ने भारत की डेमोग्राफी का जो कबाड़ा किया है, उसकी कीमत आज हर हिंदू अपना खून देकर चुका रहा है।
पाकिस्तान में कटते रहे हिन्दू सिख और दिल्ली में जिहादियों को बिरयानी खिलाते रहे नेहरू, कांग्रेस की इस शर्मनाक गद्दारी का नंगा सच
1947 के उस बंटवारे का जो खौफनाक मंज़र था, वो कोई सच्चा हिंदुस्तानी भूल नहीं सकता।
जब पश्चिमी पाकिस्तान (पंजाब, सिंध) और पूर्वी पाकिस्तान (बंगाल) में हमारे हिंदू और सिख भाइयों का सरेआम कत्लेआम हो रहा था, जब हमारी बहन-बेटियों का सरेआम चीरहरण हो रहा था, तो इस कांग्रेस ने क्या किया?
वहां से लाशों से भरी हुई ट्रेनें भारत आ रही थीं। जो हिंदू अपना पुश्तैनी घर, अपनी उपजाऊ ज़मीन, अपना करोड़ों का कारोबार और अपनी सब कुछ लुटाकर, खून से लथपथ होकर भारत पहुंच रहे थे, उन्हें यहाँ दिल्ली के रिफ्यूजी कैंपों और गंदे टेंटों में सड़ने के लिए लावारिस छोड़ दिया गया। बारिश में उनके पास छत नहीं थी, खाने को दाना नहीं था।
और ठीक उसी वक्त दिल्ली में ये नेहरू और गांधी क्या कर रहे थे? ये लोग दिल्ली की मस्जिदों में जा-जाकर उन मुसलमानों को गले लगा रहे थे और उन्हें सुरक्षा की गारंटी दे रहे थे जिन्होंने भारत के टुकड़े करवाए थे!
ये कैसा इंसाफ था भाई? जो हिंदू अपना सब कुछ गंवा कर तुम्हारे भरोसे आए थे, उनके लिए तुम्हारे पास छत नहीं थी, और जो इस देश के टुकड़े कर चुके थे, उन्हें तुम बिरयानी खिला रहे थे और उनकी ज़मीनें उन्हें वापस दे रहे थे।
1950 का वो गद्दार ‘नेहरू लियाकत समझौता’ जब पूर्वी पाकिस्तान में कटते हिन्दुओं की सुरक्षा की ज़मानत खुद उनके जिहादी कातिलों को दे दी गई
इस गद्दारी की आखिरी और सबसे खौफनाक कील ठुकी 1950 में। जब पाकिस्तान के लियाकत अली और नेहरू के बीच वो मनहूस ‘नेहरू-लियाकत समझौता’ (Delhi Pact) हुआ।
अगर आप सोचते हैं की 1947 के बंटवारे के बाद हिंदुओं का कत्लेआम रुक गया था, तो आप उस कांग्रेसी धोखे का शिकार हैं जो दशकों से हमारे दिमाग में भरा गया है।
बंटवारे के तीन साल बाद, 1950 में पूर्वी पाकिस्तान (जो आज बांग्लादेश है) में एक बार फिर से जिहादियों का नंगा नाच शुरू हो गया था। वहां के बचे-खुचे हिंदुओं को उनके घरों से खींच-खींच कर काटा जा रहा था।
और उनकी संपत्तियों पर जिहादी गिद्धों ने कब्ज़ा कर लिया था। अपनी जान और अपनी औरतों की इज़्ज़त बचाने के लिए लाखों हिंदू खून से लथपथ होकर भागते हुए भारत के बॉर्डर पर आ रहे थे।
पूरे भारत का हिंदू उस वक्त गुस्से से खौल रहा था। देश की जनता और हिंदू नेता डंके की चोट पर मांग कर रहे थे की भारत की सेना को तुरंत पूर्वी पाकिस्तान में घुसकर उन जिहादी दरिंदों को कुचलना चाहिए और अपने हिंदू भाइयों को बचाना चाहिए।
लेकिन दिल्ली के तख्त पर कौन बैठा था? वही शांति का ढोंग रचने वाले जवाहरलाल नेहरू!
जब हिंदुओं का खून पानी की तरह बह रहा था, तब नेहरू ने सेना भेजने के बजाय एक ऐसा खौफनाक और गद्दारी भरा कदम उठाया, जिसने भारत के इतिहास को शर्मसार कर दिया।
अप्रैल 1950 में नेहरू ने पाकिस्तान के खूंखार प्रधानमंत्री ‘लियाकत अली खान’ को बड़े सम्मान के साथ दिल्ली बुलाया, जिसके इशारे पर वहां हिंदुओं का कत्ल हो रहा था।
और दिल्ली में बैठकर इन दोनों ने एक कागज़ के टुकड़े पर साइन किए, जिसे इतिहास में ‘नेहरू-लियाकत समझौता’ (Delhi Pact) कहा जाता है।
इस गद्दार समझौते में क्या लिखा था? इसमें बड़ी बेशर्मी से तय किया गया की दोनों देश अपने-अपने अल्पसंख्यकों (Minorities) की सुरक्षा करेंगे।
मतलब ज़रा इस मूर्खता और क्रूरता को समझिए! जो जिहादी सरकार और जो कट्टरपंथी भीड़ वहां कल तक हिंदुओं को जानवरो की तरह काट रही थी, नेहरू ने उन्हीं कातिलों के हाथ में हिंदुओं की सुरक्षा की गारंटी सौंप दी!
नेहरू ने बड़ी ठसक से भारत के लोगों से कहा की “अब पाकिस्तान के हिंदू सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि लियाकत अली ने मुझे कागज़ पर लिखकर वादा किया है।”
क्या किसी भेड़िए ने कभी कागज़ पर लिखकर भेड़ों की जान बख्शी है?
नेहरू के इस सेक्युलर फ्रॉड को देखकर उस वक्त कैबिनेट में बैठे सच्चे शेर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और के.सी. नियोगी का खून खौल उठा।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उसी वक्त नेहरू के मुंह पर इस्तीफा दे मारा और मंत्री पद की कुर्सी को लात मार दी।
उन्होंने संसद में दहाड़ते हुए नेहरू से कहा था की “तुम उन जिहादियों पर भरोसा कर रहे हो जिनकी बुनियाद ही हिंदुओं के खून पर टिकी है? पाकिस्तान कभी इस समझौते को नहीं मानेगा, तुमने बंगाल के हिंदुओं को मरने के लिए उनके कातिलों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है।”
और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की वो चेतावनी एक-एक अक्षर सच साबित हुई! भारत ने तो अपने उस ‘सेक्युलर कीड़े’ के चक्कर में इस समझौते का पूरा पालन किया।
भारत में रुके हुए जिहादियों को वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया, उनके लिए हज कमेटियां बनीं, वक्फ बोर्ड बने। लेकिन पाकिस्तान ने क्या किया? पाकिस्तान ने उस ‘नेहरू-लियाकत समझौते’ का इस्तेमाल रद्दी के पेपर की तरह किया।
समझौते के बाद भी वहां हिंदुओं का कत्लेआम नहीं रुका। जो हिंदू 1947 के आसपास पाकिस्तान और बांग्लादेश में 20 से 22 प्रतिशत के करीब थे, वो आज वहां कट-कट कर और धर्म बदल-बदल कर मात्र 1 या 2 प्रतिशत रह गए हैं।
नेहरू ने इस समझौते के नाम पर अपने ही हिंदू भाइयों की पीठ में वो छुरा घोंपा था, जिसका दर्द आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में बचे हुए मुट्ठी भर हिंदू अपनी बेटियों के अपहरण और जबरन निकाह के रूप में झेल रहे हैं।
ये कोई राजनीतिक भूल नहीं थी, ये जिहादी तुष्टिकरण के लिए हिंदुओं के खून का सरेआम किया गया सौदा था!
आज़ादी के बाद जिहादियों को बांटी मुफ्त की मलाई, वक्फ बोर्ड से लेकर हज सब्सिडी तक नेहरू की देन
अगर आपको लग रहा है की नेहरू ने पाकिस्तान मांगने वाले इन जिहादियों को सिर्फ भारत में रुकने की इज़ाज़त दी थी, तो आप अभी तक इस गद्दारी का पूरा सच नहीं जानते।
नेहरू ने सिर्फ इन्हें रोका नहीं, बल्कि इन्हें इस देश के असली मालिकों (हिन्दुओं) के सर पे बिठाकर VIP सुविधाएं बांटना शुरू कर दिया।
1954 में नेहरू ने ही Waqf Act पास करके इन जिहादियों के हाथ में ज़मीन हड़पने का वो कानूनी हथियार थमा दिया था जो आज इस पूरे देश को निगल रहा है।
जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे, उनकी ज़मीनें हमारे उन हिन्दू शरणार्थियों को मिलनी चाहिए थीं जो अपना सब कुछ लुटा कर आए थे।
लेकिन नेहरू ने उन ज़मीनों को वक्फ बोर्ड के हवाले कर दिया! आज उसी वक्फ बोर्ड के पास लाखों एकड़ की वो ज़मीनें हैं जिन पर ये जिहादी ऐश कर रहे हैं।
बात यहीं नहीं रुकी भाई। इस देश के आम हिन्दू के खून-पसीने के टैक्स से इन कट्टरपंथियों के लिए ‘हज सब्सिडी’ की शुरुआत की गई।
संविधान के ‘आर्टिकल 30’ की आड़ में इनके मदरसों को पूरी छूट दे दी गई की तुम जो चाहो पढ़ाओ, सरकार दखल नहीं देगी।
नेहरू ने उस वक्त जो मलाई इन जिहादियों को चटाई थी, उसी का नतीजा है की आज ये छाती तानकर हमारे ही देश के संसाधनों पर डाका डाल रहे हैं!
आज के परमानेंट दंगों और लव जिहाद की असली जड़, नेहरू की उस एक गलती की कीमत आज अपना खून बहाकर चुका रहा सनातनी
ज़रा आज के भारत का नक्शा उठाकर देख लीजिए। आज जो हम कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मज़हबी खून-खराबा देख रहे हैं, वो रातों-रात पैदा नहीं हुआ है।
अगर 1947 में बाबा साहेब अंबेडकर की वो दूरदर्शी बात मान ली गई होती और 100 प्रतिशत आबादी की अदला-बदली हो गई होती, तो ज़रा सोचिए आज भारत कैसा होता?
अगर सारे जिहादी और पाकिस्तान समर्थक उसी वक्त इस देश से चले गए होते, तो क्या 1990 में कश्मीर घाटी में हमारे कश्मीरी पंडितों का वो खौफनाक नरसंहार होता?
क्या गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के अंदर हमारे 59 कारसेवकों को ज़िंदा जलाया जाता? क्या आज मेवात, मालदा, और मुज़फ्फरनगर में हमारी रामनवमी की शोभा यात्राओं पर छतों से पेट्रोल बम और पत्थर बरसते?
बिल्कुल नहीं! नेहरू की उस एक भयंकर ऐतिहासिक गद्दारी ने इस पूरे देश को ‘परमानेंट दंगों’ की एक ऐसी भट्टी में झोंक दिया, जिसकी आंच में आज हर आम हिंदू झुलस रहा है।
जो लोग 1947 में इस देश के टुकड़े करवाने के बाद भी बेशर्मी से यहीं रुक गए थे, वो कोई ‘भाईचारे’ के लिए नहीं रुके थे भाई। उनका मकसद बहुत साफ था।
पाकिस्तान तो उन्होंने इस्लाम के नाम पर ले ही लिया था, अब वो भारत में रुक कर इस बचे हुए हिस्से को भी दारुल-इस्लाम बनाना चाहते थे।
आज ये जिहादी चार-चार बीवियां ला रहे हैं और दस-दस बच्चे पैदा करके रॉकेट की स्पीड से अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं।
और इनका खर्चा कौन उठा रहा है? इनका खर्चा वो बेचारा आम हिंदू उठा रहा है जो सुबह से शाम तक गधे की तरह पसीना बहाता है और ईमानदारी से टैक्स भरता है।
हमारे टैक्स के पैसों से ये लोग मुफ्त का राशन डकार रहे हैं और मुफ्त का इलाज ले रहे हैं। इसके अलावा, वक्फ बोर्ड नाम के उस खौफनाक जिहादी कानून के दम पर आज इन्होंने देश की लाखों एकड़ बेशकीमती ज़मीनों, हमारे मंदिरों और रेलवे की संपत्तियों पर कब्ज़ा जमा लिया है।
ये सीधे-सीधे गज़वा-ए-हिंद की तैयारी है। इन्हें अब किसी हथियार की ज़रूरत नहीं है। ये तो बस जनसांख्यिकी को बदलकर, अपने बच्चों की फौज खड़ी करके लोकतंत्र के नंबर गेम में हिंदुओं को कुचलना चाहते हैं।
नेहरू ने अपने उस झूठे सेक्युलर अहंकार में आकर इस देश के सीने पर जो जिहादी टाइम बम बांधा था, आज वो बम टिक-टिक कर रहा है और फटने की कगार पर है।
