'अकबर' को भरे दरबार में उसकी 'औकात' याद दिलाने वाला 'मारवाड़' का हिन्दू शूरवीर 'राव चंद्रसेन', महाराणा प्रताप से भी पहले पूरे 20 साल तक पिया जिहादियों का खून

‘अकबर’ को भरे दरबार में उसकी ‘औकात’ याद दिलाने वाला ‘मारवाड़’ का हिन्दू शूरवीर ‘राव चंद्रसेन’, महाराणा प्रताप से भी पहले पूरे 20 साल तक पिया जिहादियों का खून

जब भी हमारे राजपूताना के शौर्य, स्वाभिमान और त्याग की बात होती है ना, तो हर हिन्दू की जुबान पर सबसे पहला नाम महाराणा प्रताप का आता है।

और आना भी चाहिए, क्योंकि प्रताप ने मुगलों की जो नींद हराम की थी, वो इतिहास का सबसे सुनहरा पन्ना है।

लेकिन सच कहूँ तो हमारा इतिहास इतना विशाल और गहरा है की कई ऐसे शूरवीर हीरो भी रहे हैं, जिनके बिना महाराणा प्रताप की वो धधकती हुई आग शायद कभी शुरू ही नहीं हो पाती।

आज मैं आपको राजपूताना के एक ऐसे खूंखार और ज़िद्दी शेर की कहानी बताने जा रहा हूँ, जिसने महाराणा प्रताप से भी लगभग 10 साल पहले दिल्ली के जिहादी बादशाह अकबर के छक्के छुड़ाने शुरू कर दिए थे।

हम बात कर रहे हैं मारवाड़ के उस महाप्रतापी हिन्दू शासक की, जिसे इतिहास ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहता है- राव चंद्रसेन!

महाराणा प्रताप से भी पहले मुगलों की गर्दन नापने वाला मारवाड़ का असली हिन्दू शेर, ‘राव चंद्रसेन’

16वीं सदी का वो दौर राजपूताना के लिए सबसे भारी और खौफनाक दौर था। दिल्ली में बैठे मुगलिया बादशाह अकबर का आतंक अपने चरम पर था।

राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) में उस वक्त राव मालदेव का राज था, जिन्हें इतिहास के सबसे प्रतापी और ताकतवर राजाओं में गिना जाता है।

राव मालदेव के कई बेटे थे, जिनमें राम सिंह सबसे बड़े थे, उदय सिंह (जिन्हें मुगलों ने बाद में ‘मोटा राजा’ कहा) उनसे छोटे थे और सबसे छोटे थे राव चंद्रसेन।

राव चंद्रसेन का जन्म 16 जुलाई 1541 को हुआ था। भले ही चंद्रसेन अपने भाइयों में सबसे छोटे थे, लेकिन उनकी रगों में जो राजपूती खून दौड़ता था, उसका उबाल एकदम अलग था।

उनके अंदर जिहादियों को लेकर इतनी भयंकर नफरत थी की वो मुगलों के नाम पर ही अपनी तलवार पर हाथ रख लेते थे।

राव मालदेव एक बहुत दूरदर्शी राजा थे। वो अपने दोनों बड़े बेटों (राम सिंह और उदय सिंह) की कमज़ोरियां और उनका लालची स्वभाव अच्छे से जानते थे।

मालदेव को पता था की अगर मुगलों की आंधी को मारवाड़ में घुसने से रोकना है, तो गद्दी पर एक ऐसा शेर चाहिए जो अकबर की आँखों में आँखें डालकर उसकी गर्दन नाप सके।

और इसीलिए, तमाम विरोधों के बावजूद, राव मालदेव ने अपने सबसे छोटे और सबसे शूरवीर बेटे राव चंद्रसेन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

1562 में जब राव मालदेव का निधन हुआ, तो मारवाड़ की गद्दी पर राव चंद्रसेन बैठे।

गद्दी के लालच में राव चंद्रसेन से उनके अपनों ने की गद्दारी, दिल्ली के जिहादी बादशाह अकबर का वो घिनौना खेल

हमारे हिन्दू समाज और राजपूताना का अगर कोई सबसे बड़ा और कड़वा सच है, तो वो ये है की हमें कभी मुगलों या पठानों ने नहीं हराया… हमें हमेशा हमारे ही घर के जयचंदों और गद्दारों ने हराया है।

जिस दिन राव चंद्रसेन मारवाड़ की गद्दी पर बैठे, उसी दिन उनके अपने सगे भाइयों ने राजपूताना के स्वाभिमान की पीठ में खंजर घोंप दिया।

राम सिंह और उदय सिंह गद्दी न मिलने की वजह से इतने पागल और अंधे हो गए थे की वो भूल गए की उनका खून क्या है और उनका धर्म क्या है।

भाईसाहब, ये दोनों भाई बेशर्मों की तरह भागकर सीधा दिल्ली में बैठे जिहादी बादशाह अकबर की शरण में चले गए!

अकबर तो इसी बात का इंतज़ार कर रहा था की कब राजपूताना में कोई फूट पड़े और वो मारवाड़ पर मुगलों का हरा झंडा गाड़ दे।

जब अकबर ने देखा की मारवाड़ के ही राजकुमार उसके दरबार में आकर भीख मांग रहे हैं और अपने ही सगे भाई राव चंद्रसेन के खिलाफ मदद मांग रहे हैं, तो अकबर की बांछें खिल गईं।

अकबर जानता था की राव चंद्रसेन वो मिट्टी नहीं है जो मुगलों के आगे घुटने टेक दे। चंद्रसेन ने गद्दी पर बैठते ही मारवाड़ की सीमाओं को मज़बूत करना शुरू कर दिया था और मुगलों के दलालों को अपने राज्य से बाहर खदेड़ दिया था।

अकबर ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया। उसने राम सिंह की मदद करने का बहाना बनाया और 1564 में अपने सबसे खतरनाक सेनापति ‘हुसैन कुली खान’ को एक बहुत बड़ी मुगल और जिहादी फौज देकर सीधा जोधपुर (मारवाड़) पर हमला करने के लिए भेज दिया।

जैसे ही वो जिहादी फौज मेहरानगढ़ किले के करीब पहुँची, राव चंद्रसेन और उनके मुट्ठी भर वफादार राजपूत शेरों ने मुगलों पर वो कहर बरपाया की मुगलों की फौज के छक्के छूट गए।

राव चंद्रसेन की तलवार जिस भी जिहादी की गर्दन पर पड़ती, उसका सिर धड़ से अलग होकर मारवाड़ की सूखी रेत में गिर जाता। किले के बाहर लाशों के ढेर लग गए थे।

लेकिन दिक्कत ये थी की मुगलों की फौज लाखों में थी और उनके पास तोपखाना था। वहीं दूसरी तरफ चंद्रसेन के पास सैनिक कम थे और उनके अपने ही सगे भाई मुगलों के साथ मिलकर किले के सारे गुप्त रास्ते दुश्मन को बता रहे थे।

पर राव चंद्रसेन ने हार नहीं मानी। उन्होंने मेहरानगढ़ के किले के अंदर से मुगलों को महीनों तक नाकों चने चबवाए।

किले के अंदर खाने-पीने का राशन खत्म होने लगा, लेकिन चंद्रसेन के राजपूतों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

आठ महीने के लंबे और खूनी संघर्ष के बाद, जब चंद्रसेन को लगा की आमने-सामने की लड़ाई में मुगलों की इस फौज को किले के अंदर से हराना नामुमकिन है, तब उन्होंने एक बहुत ही ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लिया।

उन्होंने तय किया की वो मारवाड़ की ज़मीन को मुगलों का कब्रिस्तान बनाएंगे, लेकिन किले में बैठकर नहीं, बल्कि जंगलों और पहाड़ों में उतरकर! राव चंद्रसेन ने मेहरानगढ़ का वो विशाल और सुरक्षित किला छोड़ दिया।

वो अपने वफादार सैनिकों के साथ भाद्राजूण की पहाड़ियों की तरफ निकल गए। मुगलों ने मेहरानगढ़ पर कब्ज़ा तो कर लिया, लेकिन वो राजपूताना के उस असली शेर को पकड़ने में बुरी तरह नाकाम रहे।

1570 का नागौर दरबार, जब राजपूताना के इस शेर ने भरी महफ़िल में अकबर को उसकी औकात याद दिला दी

साल था 1570… राजपूताना में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। पानी और अनाज की कमी से त्राहि-त्राहि मची थी।

और इसी मजबूरी का फायदा उठाने के लिए दिल्ली के जिहादी बादशाह अकबर ने एक बहुत ही चालाक चाल चली। उसने ‘अकाल राहत’ का झूठा नाटक रचते हुए राजस्थान के नागौर में एक बहुत बड़ा ‘शाही दरबार’ लगाया।

अकबर चाहता था की पूरा राजपूताना उसके सामने घुटने टेक दे ताकि दिल्ली के तख्त पर कोई उंगली उठाने वाला न बचे।

और दुःख की बात देखिए, अकबर अपनी इस गंदी चाल में काफी हद तक कामयाब भी हो गया। नागौर के इस दरबार में बीकानेर, जैसलमेर और कई बड़ी-बड़ी रियासतों के राजा अपनी आज़ादी का सौदा करने पहुँच गए।

मुगलों के खौफ और सत्ता के लालच में इन हिन्दू राजाओं ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और कुछ ने तो शर्म की सारी हदें पार करते हुए अपनी बेटियों के रिश्ते तक मुगलों को दे दिए।

अकबर अपने तख्त पर सीना चौड़ा करके बैठा था। उसे लग रहा था की आज पूरे राजपूताना की रीढ़ टूट चुकी है। लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था की मारवाड़ का शेर अभी ज़िंदा है!

राव चंद्रसेन भी हालातों का जायज़ा लेने के लिए नागौर के इस शाही दरबार में पहुंचे। जैसे ही चंद्रसेन ने दरबार के अंदर कदम रखा, उनका खून खौल उठा।

उन्होंने देखा की राजपूताना के बड़े-बड़े सूरमा अकबर के सामने सिर झुकाए खड़े हैं। और तो और, उनके अपने ही सगे गद्दार भाई (उदय सिंह / मोटा राजा और राम सिंह) अकबर के पैरों में बैठकर मारवाड़ की गद्दी की भीख मांग रहे थे!

अकबर बहुत शातिर था। उसने जानबूझकर चंद्रसेन को नीचा दिखाने के लिए उनके गद्दार भाइयों को दरबार में ज़्यादा तवज्जो दी और उन्हें भड़काने की कोशिश की।

अकबर को लगा की मुगलों की इतनी बड़ी फौज और दरबार की चकाचौंध देखकर चंद्रसेन डर जाएंगे और बाकी राजाओं की तरह आकर उसके पैरों में गिर पड़ेंगे।

लेकिन वो राव चंद्रसेन थे! उनकी रगों में कोई मिलावटी खून नहीं, बल्कि मारवाड़ का वो खौफनाक राजपूती खून दौड़ रहा था जो झुकने से बेहतर कट जाना पसंद करता है।

जब अकबर ने चंद्रसेन की तरफ ‘अधीनता स्वीकार करने’ का प्रस्ताव बढ़ाया, तो इस हिन्दू शूरवीर ने उस प्रस्ताव को अपनी जूतियों तले कुचल दिया!

भरे दरबार में… जहां हज़ारों मुगल सैनिक नंगी तलवारें लिए खड़े थे, जहां अकबर का गुरूर सातवें आसमान पर था… वहां राव चंद्रसेन ने अकबर को उसकी औकात याद दिला दी।

उन्होंने मुगलों की किसी भी शर्त को मानने से साफ इंकार कर दिया और बिना अकबर को कोई सम्मान दिए, अपना सीना ताने, भरे दरबार को लात मारकर वहां से निकल गए!

मेहरानगढ़ का त्याग और भाद्राजूण के जंगलों से शुरू हुआ जिहादियों के खौफनाक संहार का वो खूनी अध्याय

नागौर के उस दरबार में अपनी सरेआम बेइज़्ज़ती होने के बाद अकबर पागल कुत्ते की तरह बौखला गया।

उसे समझ आ गया था की जब तक मारवाड़ का ये शेर ज़िंदा है, मुगलों का राजपूताना जीतने का सपना कभी पूरा नहीं होगा। चंद्रसेन ने अकबर के उस अजेय होने के घमंड को बीच चौराहे पर नंगा कर दिया था।

अकबर ने अपनी पूरी ताकत मारवाड़ पर झोंक दी। उसने अपनी सबसे खूंखार और भारी-भरकम मुगल फौजें जोधपुर और भाद्राजूण की तरफ रवाना कर दीं।

राव चंद्रसेन जानते थे की मुगलों के पास लाखों की फौज और तोपखाना है। आमने-सामने के युद्ध में मुट्ठी भर राजपूत सैनिकों के साथ मुगलों को हराना नामुमकिन था।

और यहीं से राव चंद्रसेन ने वो ऐतिहासिक और खौफनाक युद्ध नीति रची, जिसे आज दुनिया ‘छापामार युद्ध’ (Guerrilla Warfare) के नाम से जानती है।

चंद्रसेन ने भाद्राजूण भी छोड़ दिया और वो सिवाना के दुर्गम जंगलों में चले गए। सिवाना का किला अरावली की उन भयंकर और कंटीली पहाड़ियों के बीच बसा था, जिसे ‘राठौड़ों की शरणस्थली’ (Refuge of Rathores) कहा जाता था।

चंद्रसेन ने मारवाड़ की धरती को मुगलों के लिए एक खुला कब्रिस्तान बना दिया। उन्होंने अपनी सेना को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया और जंगलों-पहाड़ियों में छिपा दिया। अब मुगलों की शामत आ चुकी थी।

अरावली की घाटियों में छापामार युद्ध और मुगलों के बड़े-बड़े कमांडरों को बेरहमी से काटने वाला राव चंद्रसेन का रौद्र रूप

मुगल फौज जब सिवाना और मारवाड़ के जंगलों में घुसती, तो उन्हें लगता था की वो चंद्रसेन को आसानी से पकड़ लेंगे। लेकिन अरावली की पहाड़ियों में चंद्रसेन की तलवारें उनकी मौत बनकर इंतज़ार कर रही होती थीं।

राव चंद्रसेन की रणनीति बहुत साफ थी- मुगलों को आमने-सामने मत लड़ो, उनके रसद (खाने-पीने के सामान) के काफिलों को लूट लो, उनके कैंपों पर आधी रात को हमला करो और उन्हें काटकर वापस पहाड़ों में गायब हो जाओ।

अकबर ने चंद्रसेन को पकड़ने के लिए एक के बाद एक अपने सबसे खूंखार जिहादी जनरल भेजे। पहले शाहबाज़ खान को भेजा, फिर जलाल खान को भेजा, और यहाँ तक की गद्दार हिन्दू राजाओं (बीकानेर के राय सिंह) को भी चंद्रसेन के पीछे लगा दिया।

लेकिन मारवाड़ के इस शेर ने इन सबकी ऐसी धज्जियां उड़ाईं की मुगलों के कैंपों में मातम छा गया।

एक किस्सा तो इतना खौफनाक है की मुगलों की रूह कांप जाती थी। जलाल खान मुगलों का एक बहुत ही क्रूर और वहशी कमांडर था।

उसे बड़ा घमंड था की वो चंद्रसेन को ज़िंदा पकड़ लाएगा। जलाल खान अपनी भारी फौज लेकर सिवाना के जंगलों में घुसा। लेकिन राव चंद्रसेन तो इसी शिकार के इंतज़ार में बैठे थे!

जैसे ही जलाल खान की फौज पहाड़ियों के बीच फंसी, चंद्रसेन के राजपूत शेरों ने चारों तरफ से उन पर भूखे भेड़ियों की तरह धावा बोल दिया।

मुगलों को अपनी तलवारें निकालने तक का मौका नहीं मिला। चंद्रसेन की तलवार हवा में चमकी और जलाल खान जैसे खूंखार जिहादी कमांडर का सिर धड़ से अलग होकर मारवाड़ की धूल फांकने लगा!

उस दिन अरावली की मिट्टी जिहादियों के काले खून से लाल हो गई थी। जलाल खान की मौत की खबर जब दिल्ली दरबार में पहुँची, तो अकबर के पसीने छूट गए।

मुगलों के कैंपों में राव चंद्रसेन का ऐसा भयंकर खौफ बैठ गया था की मुगल सैनिक मारवाड़ के जंगलों की तरफ जाने के नाम से ही कांपने लगते थे।

अकबर ने अपने जीवन में इतने युद्ध लड़े, लेकिन मारवाड़ के इस एक अकेले योद्धा ने उसकी पूरी मुगलिया सल्तनत की नाक में ऐसा दम कर दिया था की अकबर को दिन-तारे नज़र आ गए थे!

वो हिन्दू शूरवीर जिसने अपनी मौत तक नहीं टेके मुगलों के आगे घुटने और बन गया महाराणा प्रताप के शौर्य का असली गुरु

राव चंद्रसेन ने पूरे 20 साल तक (1581 में अपनी मौत तक) अरावली के जंगलों, घाटियों और पहाड़ों में अपना जीवन बिताया। मुगलों की विशाल फौजें उनके पीछे कुत्तों की तरह लगी हुई थीं।

लेकिन मारवाड़ के इस शेर की रीढ़ की हड्डी इतनी मज़बूत थी की वो भूखा रहा, प्यासा रहा, दर-दर की ठोकरें खाईं, लेकिन उस जिहादी अकबर के सामने एक बार भी अपना सिर नहीं झुकाया!

मुगलों ने मारवाड़ की चप्पे-चप्पे की खाक छान ली, लेकिन चंद्रसेन कभी उनके हाथ नहीं आए। वो मुगलों के लिए एक ऐसा ‘भूत’ बन गए थे जो अचानक जंगलों से प्रकट होता, जिहादियों की गर्दने काटता और वापस पहाड़ों में गायब हो जाता।

हम सब महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा पढ़ते हैं की कैसे उन्होंने हल्दीघाटी (1576) और दिवेर के युद्ध में मुगलों की ईंट से ईंट बजा दी थी।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की प्रताप को मुगलों से लड़ने का वो रास्ता, वो ‘छापामार युद्ध’ (Guerrilla Warfare) और जंगलों को अपना किला बनाने की वो रणनीति किसने सिखाई थी?

चंद्रसेन ने ही पूरे राजपूताना को ये सिखाया था की अगर मुगलों की लाखों की फौज को हराना है, तो पत्थर के किलों में कैद मत रहो… बाहर निकलो और इन अरावली के जंगलों को अपना हथियार बनाओ!

लेकिन दुखद बात ये है की जिस वीर ने मुगलों से हार नहीं मानी, वो एक बार फिर अपनों की गद्दारी का ही शिकार हुआ।

1581 के जनवरी महीने में, सारण के जंगलों में राव चंद्रसेन को उनके ही एक गद्दार सामंत (वैरीसाल) ने उन्हें धोखे से ज़हर दे दिया था, जिससे उनका निधन हो गया।

राव चंद्रसेन पंचतत्व में विलीन हो गए, लेकिन मरते दम तक उन्होंने मुगलों की गुलामी का पट्टा अपने गले में नहीं बंधने दिया।

अकबर हमेशा इस बात को लेकर कुढ़ता रहा की वो अपनी पूरी ज़िंदगी में उस मारवाड़ी शेर को अपने दरबार में झुकने पर मजबूर नहीं कर पाया।

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