भारत से 'अंडमान निकोबार' हड़पना चाहते थे 'अंग्रेज', ब्रिटेन और पाकिस्तान में मिलाने की रची गई थी साज़िश, कैसे लौह पुरुष 'सरदार पटेल' के एक 'मास्टरस्ट्रोक' ने उड़ा दी अंग्रेजों के इस खौफनाक 'मंसूबे' की 'धज्जियां'

भारत से ‘अंडमान निकोबार’ हड़पना चाहते थे ‘अंग्रेज’, ब्रिटेन और पाकिस्तान में मिलाने की रची गई थी साज़िश, कैसे लौह पुरुष ‘सरदार पटेल’ के एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ ने उड़ा दी अंग्रेजों के इस खौफनाक ‘मंसूबे’ की ‘धज्जियां’

दोस्तों कभी फुर्सत मिले तो दुनिया का नक्शा खोलकर देखना। हमारे हिंदुस्तान के ठीक नीचे, नीले समंदर के बीचों-बीच कुछ द्वीप नज़र आएंगे।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह’ की। हमें बस इतना ही पढ़ाया गया है की ये भारत का एक केंद्र शासित प्रदेश है।

लेकिन सच कहूँ तो, 572 छोटे-बड़े द्वीपों का ये समूह हिंद महासागर (Indian Ocean) का वो ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’ (Unsinkable Aircraft Carrier) है जिसे खुद कुदरत ने भारत की सुरक्षा के लिए समंदर के बीचों-बीच खड़ा किया है।

आज अगर हम समंदर में सीना तानकर चलते हैं, तो उसकी इकलौती वजह यही द्वीप समूह है।

लेकिन क्या आप जानते हैं की 1947 में जब हमारा देश आज़ाद हो रहा था, तब अंग्रेजों द्वारा एक ऐसा खौफनाक खेल खेला जा रहा था, जिसने लगभग भारत की समुद्री ताकत को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया था?

अंग्रेज जाते-जाते भारत के सीने में एक ऐसा खंजर घोंपने वाले थे जिससे आज़ाद हिंदुस्तान समंदर में कभी सिर नहीं उठा पाता।

अगर उस दिन लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी कूटनीतिक तलवार निकालकर अंग्रेजों के गले पर नहीं रखी होती, तो आज अंडमान पर हमारा तिरंगा नहीं, बल्कि ब्रिटेन का झंडा या पाकिस्तान का चाँद-तारा लहरा रहा होता।

आइए आज 1947 की उस खुफ़िया साज़िश का एक-एक पन्ना खोलते हैं।

आज जिस ‘हिंद महासागर’ पर हिंदुस्तान का बजता डंका, उसे हमेशा के लिए छीनने की रची गई थी सबसे खौफनाक साज़िश

इस पूरी साज़िश को समझने से पहले ज़रा अंडमान निकोबार की आज की ताकत को समझ लीजिए, तभी आपको पता चलेगा की अंग्रेज आखिर हड़पना क्या चाहते थे।

आज भारत की पहली और इकलौती ‘ट्राई-सर्विस कमांड’ (Tri-Services Command) अंडमान में ही मौजूद है। इसका मतलब है की यहाँ हमारी थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों एक साथ मुस्तैद रहती हैं।

आज अगर चीन (China) का कोई भी जंगी जहाज़ या पनडुब्बी मलक्का स्ट्रेट से होते हुए हिंद महासागर में घुसने की जुर्रत करती है, तो अंडमान में बैठे हमारे नौसैनिक और सुखोई लड़ाकू विमान उनके रडार पर मौत बनकर चमकने लगते हैं।

समंदर की इस पूरी बेल्ट पर आज हिंदुस्तान का डंका बज रहा है। अगर कोई भी विदेशी ताकत समंदर के रास्ते भारत की तरफ आंख भी उठाती है, तो सबसे पहले उसे अंडमान की इस अभेद्य दीवार से टकराना पड़ेगा।

लेकिन 1947 के उस दौर में हालात बिल्कुल अलग थे। भारत के टुकड़े हो रहे थे। एक तरफ पाकिस्तान बन रहा था, तो दूसरी तरफ 562 से ज़्यादा रियासतों को समेटने की चुनौती थी।

दिल्ली में बैठे ज़्यादातर राजनेताओं का पूरा फोकस सिर्फ ज़मीनी बँटवारे और दंगों पर था। उन्हें समंदर की अहमियत या जियो-पॉलिटिक्स (Geo-politics) से कोई खास लेना-देना नहीं था।

और इसी ‘सॉफ्टनेस’ का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने एक ऐसी सीक्रेट स्क्रिप्ट तैयार की थी, जिसके तहत भारत को इस समुद्री ब्रह्मास्त्र से हमेशा के लिए महरूम कर दिया जाता।

ये एक ऐसी साज़िश थी, जो अगर कामयाब हो जाती, तो आज भारत समंदर के मामले में पूरी तरह से लाचार और अपाहिज होता।

जाते जाते अंग्रेजों ने बिछाई थी सीक्रेट बिसात, अंडमान को अपनी परमानेंट जागीर बनाने का रचा था गंदा खेल

अब सवाल ये उठता है की जब अंग्रेज पूरा का पूरा इतना बड़ा हिंदुस्तान छोड़कर जा ही रहे थे, तो उन्हें इन गिने-चुने द्वीपों से इतना मोह क्यों हो रहा था?

भाई साहब, इसके पीछे अंग्रेजों की वो गिद्ध दृष्टि थी जो 50 साल आगे का भविष्य देख रही थी।

दरअसल, दूसरा विश्व युद्ध (World War II) 1945 में खत्म हो चुका था। भले ही ब्रिटेन वो युद्ध जीत गया था, लेकिन उसकी आर्थिक कमर पूरी तरह टूट चुकी थी।

अंग्रेज जान चुके थे की अब वो भारत को और ज़्यादा दिन तक गुलाम बनाकर नहीं रख सकते। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत और उनकी रॉयल नेवी (Royal Navy) को एशिया में अपना दबदबा बनाए रखना था।

बर्मा (आज का म्यांमार), मलाया, सिंगापुर और पूरे हिंद महासागर को कंट्रोल करने के लिए उन्हें एक ‘मिलिट्री और नेवल बेस’ की सख्त ज़रूरत थी। और इसके लिए अंडमान निकोबार से बेहतर कोई जगह हो ही नहीं सकती थी।

अंग्रेजों ने अपने खुफ़िया दस्तावेजों (ब्रिटिश आर्काइव्स) में एक ‘कंटिंजेंसी प्लान’ (Contingency Plan) तैयार किया।

इस प्लान के तहत तय हुआ की भारत को आज़ादी दे दो, लेकिन ‘अंडमान और निकोबार’ को भारत के नक्शे से बिल्कुल काट दो।

ब्रिटिश हुकूमत चाहती थी की इन द्वीपों को ब्रिटेन की एक ‘परमानेंट क्राउन कॉलोनी’ (Permanent Crown Colony) घोषित कर दिया जाए।

मतलब, जैसे उन्होंने हांगकांग या फ़ॉकलैंड आइलैंड्स को अपनी जागीर बना रखा था, बिल्कुल वैसा ही खेल वो अंडमान के साथ खेलना चाहते थे।

और इस चोरी को सही साबित करने के लिए अंग्रेजों ने कैसा गंदा और बेहूदा लॉजिक गढ़ा, ज़रा वो सुनिए। उन्होंने तर्क दिया की भाई, ये द्वीप तो भारत की मुख्य भूमि से 1200 किलोमीटर दूर हैं!

इनका भारत से कोई सीधा जमीनी जुड़ाव है ही नहीं। अंग्रेजों ने कहा की हम यहाँ भारत से आने वाले एंग्लो-इंडियन (Anglo-Indian) परिवारों को बसाएंगे और यहाँ के मूल निवासियों (आदिवासियों) के साथ मिलकर इसे सीधे लंदन से कंट्रोल करेंगे।

ज़रा सोचिए इनकी चालबाज़ी! हमारे ही देश के द्वीप, जहाँ हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना खून बहाया, उस ज़मीन को ये गोरे अपनी ‘परमानेंट जागीर’ बनाने का बंदोबस्त कर रहे थे।

अगर ये क्राउन कॉलोनी बन जाती, तो हिंद महासागर में ब्रिटिश पनडुब्बियां हमेशा के लिए भारत को घेर कर रखतीं।

पाकिस्तान के दो टुकड़ों को जोड़ने के लिए अंडमान मांग रहा था जिन्ना और अंग्रेजों ने भी दे दिया था इस जिहादी का साथ

जैसे ही अंग्रेजों के इस सीक्रेट प्लान की भनक बाहर निकली, इस खौफनाक खेल में एक और सबसे घटिया खिलाड़ी की एंट्री हो गई। और वो खिलाड़ी था- मोहम्मद अली जिन्ना!

जब जिन्ना को पता चला की अंग्रेज अंडमान को भारत से अलग करने की जुगाड़ में हैं, तो उसकी लार टपकने लगी। उसे लगा की बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए।

उसने बिना कोई शर्म किए सीधे ब्रिटिश हुकूमत (तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) को एक चिट्ठी ठोक दी और मांग कर ली की चूँकि अंडमान को बांटा जा रहा है, इसलिए ये द्वीप तो ‘पाकिस्तान’ को मिलने चाहिए!

अब आप सोच रहे होंगे की भाई जिन्ना का अंडमान से क्या लेना-देना? वहां तो दूर-दूर तक कोई मुस्लिम आबादी का इतिहास ही नहीं था।

लेकिन जिन्ना का वो बेहूदा लॉजिक सुनेंगे तो आपका खून सच में उबल जाएगा।

जिन्ना ने कहा की देखो भाई, पाकिस्तान के दो हिस्से बन रहे हैं। एक तरफ है ‘वेस्ट पाकिस्तान’ (आज का पाकिस्तान) और दूसरी तरफ है ‘ईस्ट पाकिस्तान’ (आज का बांग्लादेश)। इन दोनों के बीच हज़ारों किलोमीटर का फासला है। भारत तो हमें अपने बीच से रास्ता देगा नहीं!

तो जिन्ना का तर्क था की इन दोनों हिस्सों के बीच समंदर के रास्ते व्यापार करने और सेना भेजने के लिए, अंडमान द्वीप समूह पाकिस्तान के लिए एक ‘स्टॉपओवर’ (रुकने का अड्डा) या एक महत्वपूर्ण ‘लिंक’ का काम करेगा!

मतलब अपनी सुविधा के लिए वो हमारे अंडमान को ईस्ट पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का दावा ठोक रहा था।

अब मज़े की बात देखिए! अंग्रेजों ने जिन्ना की इस बेतुकी मांग को तुरंत खारिज नहीं किया। बल्कि अंदर ही अंदर वो बहुत खुश हो रहे थे।

ब्रिटिश हुकूमत का तो पुराना मंत्र ही था- “फूट डालो और राज करो” (Divide and Rule)। उन्हें लगा की अगर अंडमान को लेकर भारत और पाकिस्तान आपस में लड़ते रहे, तो आज़ाद होने के बाद भी हिंदुस्तान कभी समंदर में मज़बूत नहीं हो पाएगा।

अंग्रेजों की मिलीभगत साफ़ दिख रही थी। उनका सोचना था की अगर किसी वजह से ब्रिटेन अंडमान को अपनी ‘क्राउन कॉलोनी’ नहीं भी बना पाया, तो इसे जिन्ना को दे दो।

पाकिस्तान तो वैसे भी अंग्रेजों का ही पाला हुआ मोहरा था। अगर अंडमान पाकिस्तान के पास चला जाता, तो ब्रिटेन जब चाहे तब वहां अपने नेवल जहाज़ खड़े कर सकता था।

कुल मिलाकर बिसात पूरी तरह से बिछ चुकी थी। अंग्रेजों का ड्राफ्ट तैयार था और जिन्ना की गिद्ध दृष्टि अंडमान पर गड़ी थी।

देश के बँटवारे के उस खूनी दौर में, दिल्ली में बैठे कई बड़े नेताओं को इस बात का अंदाज़ा तक नहीं था की भारत के हाथ से उसका सबसे बड़ा समुद्री खज़ाना फिसलने वाला है।

लेकिन… उन्हें ये नहीं पता था की दिल्ली के उसी सत्ता के गलियारे में एक ऐसा ‘शेर’ भी बैठा था, जिसकी नज़रें ज़मीन के चप्पे-चप्पे से लेकर समंदर की अथाह गहराइयों तक गड़ी हुई थीं।

एक ऐसा फौलादी इंसान, जो भारत माता का एक इंच भी कटने देने को तैयार नहीं था।

दिल्ली के सॉफ्ट नेताओं की चुप्पी के बीच जब लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया मोर्चा और अकेले दम पर पलट दी पूरी ब्रिटिश बिसात

1947 का वो दौर कोई मामूली दौर नहीं था। पूरा देश उबल रहा था। भारत के टुकड़े हो रहे थे और खून की नदियां बह रही थीं।

उस वक्त दिल्ली में बैठे हमारे कई ‘सॉफ्ट’ और आदर्शवादी नेताओं का पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर अटका था की पंजाब और बंगाल की लकीरें कैसे खिंचेंगी।

ज़मीनी बँटवारे और दंगों के शोर में, समंदर के बीच चल रहे इस खौफनाक ब्रिटिश खेल की आवाज़ दिल्ली तक पहुँच ही नहीं पा रही थी।

सच कहूँ तो, उस वक्त के कई बड़े नेताओं को समंदर की अहमियत (Maritime Security) या जियो-पॉलिटिक्स का कोई खास इल्म ही नहीं था।

उनके लिए अंडमान निकोबार सिर्फ एक ‘काले पानी’ की जेल वाली जगह थी, जहाँ से आज़ादी के बाद अब कुछ लेना-देना नहीं था।

अंग्रेजों ने इसी बात का फायदा उठाया। लार्ड माउंटबेटन और उनकी ब्रिटिश लॉबी को पूरा यकीन था की भारतीय नेता तो ज़मीन के बँटवारे में इतने उलझे हुए हैं की अगर हम चुपचाप अंडमान को भारत के नक्शे से गायब भी कर देंगे, तो ये लोग चूं तक नहीं करेंगे।

और अगर कोई आवाज़ उठी भी, तो हम ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ (Soft Diplomacy) का चूर्ण चटाकर उन्हें मना लेंगे।

लेकिन अंग्रेजों की इस चालाकी के बीच सबसे बड़ी रुकावट बनकर खड़े थे सरदार वल्लभभाई पटेल। पटेल इस मिट्टी के फौलाद से बने थे।

उनकी बाज़ सी नज़रें सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनकी दृष्टि समंदर की उन अथाह गहराइयों तक जा रही थी जहाँ अंग्रेज अपनी नेवल बेस बनाने के सपने देख रहे थे।

जैसे ही पटेल जी के खुफ़िया तंत्र ने उन्हें ये भनक दी की अंग्रेज ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ के ड्राफ्ट में अंडमान को भारत से अलग करने की चाल चल रहे हैं और इसमें जिन्ना भी गिद्ध की तरह ताक लगाए बैठा है… लौह पुरुष का माथा ठनक गया!

पटेल जी तुरंत समझ गए की ये सिर्फ एक द्वीप का मामला नहीं है, बल्कि ये भारत के गले में हमेशा के लिए एक ब्रिटिश और पाकिस्तानी फंदा डालने की साज़िश है।

अगर आज ये द्वीप भारत के हाथ से निकल गए, तो कल को आज़ाद हिंदुस्तान समंदर में घुट-घुट कर मरेगा। भारत को चारों तरफ से घेर लिया जाएगा।

पटेल जी को पता था की ऐसे मामलों में ‘शांति’, ‘अहिंसा’ और ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ से काम नहीं चलता। दुश्मन अगर जबड़ा फाड़कर खड़ा हो, तो हाथ जोड़ने से नहीं, बल्कि उसका जबड़ा तोड़ने से ही ज़मीन बचती है।

और बस, यहीं से सरदार पटेल ने अपनी कूटनीतिक तलवार म्यान से निकाली और अकेले दम पर पूरी ब्रिटिश लॉबी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

“सत्ता हस्तांतरण के कागज़ फाड़कर फेंक दूंगा”, लार्ड माउंटबेटन को दी गई सरदार पटेल की वो दहाड़ जिससे कांप गया पूरा ब्रिटिश साम्राज्य

अब आता है इस पूरी साज़िश का वो क्लाइमैक्स, जिसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

तारीख नज़दीक आ रही थी। लार्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) ने बड़ी चालाकी से आज़ादी के मसौदे (Draft) में अंडमान और निकोबार को भारत से अलग रखने वाला क्लॉज़ (Clause) डाल दिया था।

माउंटबेटन को लगा की वो पटेल को अपनी मीठी-मीठी बातों और ब्रिटिश हुकूमत के रुतबे से डरा लेंगे।

लेकिन माउंटबेटन शायद भूल गए थे की उनका पाला किसी ‘सॉफ्ट’ नेता से नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के ‘आयरन मैन’ से पड़ा है!

जब माउंटबेटन और पटेल जी का आमना-सामना हुआ, तो कमरे का माहौल एकदम तनावपूर्ण था। पटेल ने जैसे ही वो ड्राफ्ट देखा, उनकी आँखों में शोले भड़क उठे।

उन्होंने माउंटबेटन की आँखों में सीधे आँखें डालकर जो दो-टूक अल्टीमेटम दिया, उसकी गूंज आज भी समंदर की लहरों में महसूस की जा सकती है।

सरदार पटेल ने बिना किसी लाग-लपेट के, डंके की चोट पर कहा- “सुनो! अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा।

अगर ब्रिटिश हुकूमत ने इसे भारत से अलग करने की, या अपनी क्राउन कॉलोनी बनाने की कोई भी जुर्रत की, तो कान खोलकर सुन लो… भारत ‘सत्ता हस्तांतरण’ (Transfer of Power) के समझौते पर हस्ताक्षर ही नहीं करेगा!”

एक हिंदुस्तानी नेता, दुनिया की सबसे बड़ी ब्रिटिश हुकूमत को उसके मुँह पर खुली धमकी दे रहा था की “अगर अंडमान नहीं मिला, तो मैं तुम्हारे आज़ादी के इन कागज़ों को फाड़कर फेंक दूंगा!”

इस धमकी का मतलब समझते हैं आप? इसका सीधा सा मतलब था की अगर भारत साइन नहीं करेगा, तो अंग्रेजों को शांति से भारत छोड़ने का मौका नहीं मिलेगा।

पूरे देश में बगावत और मार-काट मच जाएगी और मुट्ठी भर अंग्रेज भारत के 40 करोड़ लोगों के गुस्से की आग में ज़िंदा जल जाएंगे।

ब्रिटेन पहले ही विश्व युद्ध से कंगाल हो चुका था, वो भारत में एक और हिंसक क्रांति झेलने की हैसियत में बिल्कुल नहीं था।

पटेल जी की वो खौफनाक दहाड़ और उनका अड़ियल रवैया देखकर लार्ड माउंटबेटन का पसीना छूट गया। माउंटबेटन अच्छी तरह जानते थे की पटेल जो कहते हैं, वो करते हैं।

ये इंसान ना तो झूठे वादे करता है और ना ही खोखली धमकियां देता है। माउंटबेटन ने तुरंत लंदन में बैठे अपने आकाओं को संदेश भेजा की “भाई, पटेल अड़ गया है।

अगर हमने अंडमान को लेकर ज़िद की, तो भारत आज़ादी का पूरा समझौता ही रद्द कर देगा!”

और आखिरकार… दुनिया के जिस ब्रिटिश साम्राज्य के राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, उस पूरे के पूरे साम्राज्य को इस अकेले हिंदुस्तानी शेर के आगे अपने घुटने टेकने पड़े।

अंग्रेजों ने चुपचाप अंडमान को अलग करने का वो क्लॉज़ हटा दिया। पटेल के इस एक खूंखार ‘मास्टरस्ट्रोक’ ने ब्रिटिश हुकूमत के सपनों की धज्जियां उड़ा दीं।

और रही बात मोहम्मद अली जिन्ना की? जिन्ना, जो अंडमान को ईस्ट पाकिस्तान से जोड़ने के सपने देख रहा था, पटेल जी के इस एक झटके ने उस कट्टरपंथी का अंडमान हड़पने का सपना, सपना ही रह गया और ये ‘अंडमान और निकोबार’ द्वीप हमेशा-हमेशा के लिए भारत के हिस्से बन गए।

आज अंडमान द्वीप समूह ‘मलक्का स्ट्रेट’ (Strait of Malacca) पर एक खूंखार शेर की तरह बैठा है।

मलक्का स्ट्रेट दुनिया का वो सबसे अहम समुद्री रास्ता है, जहाँ से होकर चीन का 70 से 80 प्रतिशत कच्चा तेल और व्यापार गुज़रता है।

आज भारत की ट्राई-सर्विस कमांड ने वहां बैठकर सीधे चीन की गर्दन दबोच रखी है। अगर कल को चीन ने बॉर्डर पर कोई भी हिमाकत की, तो भारत अंडमान में बैठे-बैठे मलक्का स्ट्रेट का चोकपॉइंट (Chokepoint) ब्लॉक कर देगा और चीन की इकॉनमी कुछ ही हफ्तों में घुटनों पर आ जाएगी।

चीन का ये खौफ, समंदर में भारत की ये बादशाहत और हमारी ये अभेद्य समुद्री सुरक्षा… ये सब कुछ हमें किसी खैरात में नहीं मिला है दोस्त!

ये सिर्फ और सिर्फ लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की उस बाज़ वाली नज़र और उनके अड़ियल रवैये का नतीजा है, जिसने आज़ादी के वक्त ही भारत का 100 साल का भविष्य सुरक्षित कर दिया था।

शत-शत नमन लौह पुरुष को!

Scroll to Top